समिधा – 7




  समिधा –7


    
       कालरात्रि बीत चुकी थी। बेटी के घर किया जाने वाला नेगचार पूजा पाठ निपटा कर पारो की बिदाई कर दी गयी।
 
    एक माँ जितना कर सकती थी उससे कहीं ज्यादा बढ़ चढ़ कर किया था दुर्गा ने। उस पर घर के सभी का साथ भी था। इतने उत्साह से ब्याह की तैयारियों में लगी दुर्गा पारो की बिदाई होते ही जैसे एकदम अकेली पड़ गयी थी।
   उसे कुछ पल को ज़िन्दगी ही वीरानी सी लगने लगी थी, आज तक सुबह शाम पारो का चेहरा देख देख कर ही तो जी रही थी , अब आज से वो कारण भी समाप्त हो चुका था।
     पारो के जाते ही वो अपने कमरे में गयी और पारो की वहीं एक ओर रखी किताब को सीने से लगाये पलंग में कटे पेड़ सी ढह गई।
   ऑंसू थे कि रुकने का नाम नही ले रहे थे , रोते रोते हिचकियाँ सी बंध गयी थी कि तारा पानी का गिलास और चाय लिए कमरे में चली आयी…

“काकी माँ ! ओ काकी माँ, इतना कौन रोता है भला? इधर देखो। बेटी अपने घर चली गयी वो तो जाना ही था ना। इतना सुंदर घर बार है और जमाई तो और भी सुंदर फिर किस बात का रोना।”

   तारा की बातें सुन दुर्गा को कुछ ढांढस हुआ और पानी पीती  वो चुपचाप ऑंसू बहाती बैठी रही।
उसे ज़बरदस्ती चाय पिला कर तारा वापस नीचे काम समेटने चली गयी और दुर्गा अपने कमरे की खिड़की पर खड़ी दूर मंदिर में चलते भजनों को सुनती रही।

    ससुराल में बड़े लाड़ से नई दुल्हन और दूल्हे के स्वागत करने के साथ ही घर की औरतें बाकी के नेगचार निपटाने में लग गईं।
       थकान से कुम्हलाई पारो अपने लिए कोई ठौर चाह रही थी। उसे घर की पूजा बाड़ी में बैठा कर औरतें इधर उधर निकल गयी थी, दूल्हे का भी अता पता नही थी। किसी को आसपास ना देख पारो ने अपना घूंघट उलट दिया और आंखें फाड़े इधर उधर देखने लगी। छोटे से कमरे में बड़ी बड़ी भगवानों की तस्वीरें लगी थी बीच में लंबी सी काली माँ की प्रतिमा के एक ओर रामकृष्ण परमहंस की तस्वीर लगी थी।
   धूप और गुग्गुल से कमरा सुवासित था, एक ओर चंदन पेटी पड़ी थी। उसमें से चंदन निकाल प्रतिमा के पैरों पर लगाने के बाद पारो सभी तस्वीरों पर हाथ जोड़े आंखें मूंदे बैठी थी कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। वो चौन्क कर पीछे पलटी, एक लगभग उसी की हमउम्र लड़की खड़ी थी….

  ” क्या हुआ काकी माँ! डर गयीं? “

  उसे देख पारो को जोइता की याद आ गयी, पारो मुस्कुरा उठी..

  “नही मैं क्यों डरूँगी भला? वैसे तुम कौन हो?”

  ” मैं आपकी सबसे बड़ी जेठानी की छोटी बेटी हूँ।”

  ” तुम छोटी हो तो बड़ी कहाँ है?”

  पारो की बात सुन लाली ज़ोर से हँसने लगी।।।

  ” उसका तो दो साल पहले ही ब्याह हो गया था!

    ” ओह्ह ! फिर क्या? वो अपने काका बाबू के ब्याह में क्यों नही आई?”

” वो माँ बनने वाली है ना ! माँ उसे कह रहीं थीं तेरी उम्र कम है मिष्टी ऐसे में दौड़ भाग करने से माँ और बच्चे दोनो की सेहत को खतरा हो सकता है। इसलिये नही आई।”

  ” हम्म ! क्या उमर होगी उसकी? ”

  ” सत्रह की होगी शायद।”  कुछ सोचती सी लाली कह उठी और उसकी बात सुन पारो भी किसी गहरी सोच में डूब गई।
    इधर कुछ दिनों से तारा बऊ दी भी उसे कुछ अजीबोग़रीब बातें सिखाने पढ़ाने लगी थीं। कुछ उसकी समझ में आता और कुछ नही भी आता।
      लेकिन तारा बउ दी ने एक बात पर बार बार ज़ोर दिया था कि इतनी जल्दी माँ बनने का झंझट उसे नही मोल लेना चाहिए। उन्होंने उसे और भी कई जानने और न जानने योग्य ज्ञान दे रखा था।
      लाली इधर उधर की बातें बताती अपनी काकी माँ से कुछ देर ही में बहुत हिल मिल गयी थी….

    मेहमानों की आवाजाही बहु की मुहँ दिखाई खाना पीना इसी सब में सांझ हो आयी।
    शाम तक भी पारो को अपना कमरा और आराम करने की जगह नही मिली थी।
  रात का खाना निपटाते ही देबज्योति कि भाभियां और दीदियों ने पारो को सजा संवार कर उसके कमरे में पहुंचा दिया…

   रजनीगंधा की बेलों से उसकी पलंग की पाटियाँ सजी पड़ी थी। पूरा कमरा बेले और चंपा के फूलों से सुवासित था।
     पारो इतनी भी नादान नही थी कि इन फूलों का मतलब ना समझती हो लेकिन इतनी जानकार भी नही थी कि इसका परिणाम समझ पाए…

  उसे उसके पलंग पर बिठा कर हंसी ठिठोली करती भाभियां और नंदे बाहर चली गईं। पारो ने हाथ पकड़ कर लाली को अपने पास ही रोक लिया।
   लाली की माँ ” काका बाबू के आते ही तुरंत बाहर चली आना ” कह कर लाली को मीठी सी झिड़की दे बाहर चली गईं।

      लाली पारो के पास बैठी उसे अपने स्कूल की बातें बताती रही, उसकी बातें सुनते सुनते ही जाने कब पारो की आँख लग गयी… उसे सोता देख लाली चुप हो गयी , थकान से उसकी भी आंखें मूँदी जा रहीं थी, वो भी कुछ ही देर में पलंग का एक कोना पकड़े गहरी नींद में डूब गई…

   देबज्योति के कमरे में आते तक में दोनों काकी भतीजी एक ही पलंग पर बेसुध सोई पड़ी थी। देव मुस्कुरा कर दरवाज़ा उड़का कर वही किनारे रखे सोफे पर ही तकिया लगाए सो गया…

    अगली सुबह पारो की नींद खुली तब तक भोर हो चुकी थी, देव सुबह ही उठ कर कमरे से बाहर जा चुका था उसके निकलते ही पारो की जेठानी आकर लाली को भी उठा ले गयी थी। पारो की गहरी नींद देख उन्होंने उठाना सही नही समझा और चुपचाप ही चली गईं थी।
   पारो हड़बड़ा कर उठ बैठी। अपने कपड़े निकाले वो नहाने चली गयी। उसकी सास ने उसे पिछले दिन ही बता दिया था आज वो सभी उनके कुलग्राम निकलेंगे किसी ज़रूरी पूजा पाठ के लिए।
  वहाँ से लौटने के बाद ही वो मायके अपनी माँ से मिलने जा पाएगी।
  माँ से मिलने जा पाएगी यही सोच उसका मन खिल उठा..

*******

    ऑफिस में अपने क्यूबिकल में बैठा वरुण अपने काम में लगा था कि एच आर वाला राहुल उसके पास चला आया, हाथ में पकड़े पेपर को उसने वरुण की ओर लहराया और उसे थमा दिया..

  ” क्या है ये ?”

  ” खुद देख लो।”

  वरुण ने ध्यान से देखा , उसका अमेरिका में काम करने का एल 1 वीज़ा क्लियर हो गया था। खुशी से उसने खड़े होकर राहुल को ही गले से लगा लिया।
   लेकिन एकाएक खड़े होने से कुछ सेकंड को उसका सर घूम गया।
   अपने सर को थामे वो वापस अपनी कुर्सी में बैठ गया…
  राहुल उसके गले से झूले उसे शुभकामना देता रहा, एक एक कर और लोग भी वहीं जमा हो गए। ऑफिस में एकदम से उत्साह का माहौल हो गया। अमेरिका प्रोजेक्ट के लिए जाना मतलब सिर्फ कैरियर पर चार चांद लगना ही बस तो होता नही, एक तरह से रुपये पैसों की बढ़ोतरी के साथ ही एक पॉश और शानदार जीवन की शुरुवात भी होता है। इसी से नौकरी पे आते ही अधिकतर युवाओं का सपना वही होता है ,और आज वरुण का वो सपना पूरा होने जा रहा था।
     ऑफिस की बधाइयों के बाद वरुण ने तुरंत अपने घर पर फ़ोन कर अपने पिता को जानकारी दी और खुशी खुशी बाकी औपचारिकताओं को पूरा करने चला गया।
    ऑफिस में लंच ब्रेक पर कादम्बरी का फ़ोन आ गया, वो  उसके ऑफिस के आस पास ही किसी काम से आई थी , वरुण के साथ ही लंच करना चाहती थी,  लेकिन वरुण की टीम ने पहले ही वरुण को अपने साथ बाहर लंच पर ले जाना तय कर रखा था…

“पर अचानक कैसे टीम के साथ बाहर जाना तय हुआ? कुछ स्पेशल है क्या?”

“हाँ मेरा वीज़ा क्लियर हो गया!”

  “व्हाट? तुमने बताया नही! कब जाना है?

  ” दो चार दिन में डेट आ जायेगी, आज सुबह ही तो पता चला…

  ” तुम्हें सुबह पता चल गया था, और तुम अभी बता रहे हो? ये क्या बात हुई वरुण..”

  ” सॉरी कादम्बरी, मैं असल में भूल गया था।

  ” भूल गए थे?? मैं कबसे वेट कर रही थी और तुम कहते हो तुम भूल गए थे।

  वरुण एकाएक कुछ कह नही पाया, गलती तो हुई ही थी कि उसने कादम्बरी को बताया नही था। वो अक्सर ऐसे मौकों पर खामोश ही हो जाया करता था,वो वापस चुप हो गया…
   बात कादम्बरी ने ही शुरू की..

  ” चलो कोई नही! तुम लंच अपने कलीग्स के साथ ही कर लो, हम शाम को मिलते हैं। सात बजे मैं नाइट एंड लाइट रेस्तरां में तुम्हारा वेट करूँगी ओके!”

  सात तो उसे ऑफिस से निकलने में ही बज जाते थे उसके बाद थकान इतनी हो जाती थी कि सप्ताह के दिनों में कहीं जाना वरुण के लिए परेशानी भरा हो जाता था बावजूद उसने कादम्बरी को हाँ कह ही दिया।
     ऑफिस की सारी औपचारिकता निपटा कर वरुण को रेस्तरां पहुंचते में आठ बज गए, बहुत हड़बड़ी के साथ वो पहले से बुक की हुई सीट पर पहुंच तो गया लेकिन कादम्बरी वहाँ नही थी, कहीं नाराज़ होकर चली तो नही गयी सोच कर उसे फ़ोन लगाने ही जा रहा था कि उधर से कादम्बरी का फोन आ गया।

  ” पार्टी कार्यालय में ही पापा ने कोई ज़रूरी मीटिंग रख दी थी, बस अभी निकल रही हूँ, तुम पहुंच गए न?”

  वरुण के हाँ कहते ही उसे इंतज़ार करने कह कादम्बरी ने फ़ोन रख दिया, किन्हीं ज़रूरी या गैरजरूरी कामों में उलझी कादम्बरी को रेस्तरां पहुँचने में ही घण्टे डेढ़ घंटे लग गए, इतंजार करता बैठा वरुण वहीं कैरिओके पर गाते गायक को सुनता बैठा था…

         “कल और आएंगे नग़मों की
         खिलती कलियाँ चुनने वाले
         मुझसे बेहतर कहने वाले
          तुमसे बेहतर सुनने वाले
         कल कोई मुझको याद करे
         क्यूँ कोई मुझको याद करे
          मसरूफ़ ज़माना मेरे लिये
         क्यूँ वक़्त अपना बरबाद करे
         मैं पल दो पल का शायर हूँ….

   थकान से बोझिल पलकों के साथ वरुण उठ कर जाने को था कि भागती हुई सी कादम्बरी आकर उसके गले से झूल गयी, उसकी बाहें थामें वो उसे रेस्तरां से भीतर पब में ले गयी….
     पब के अंधियारे कोने में सिगरेट के धुँए के बीच वरुण की बाहों में झूलती कादम्बरी आज खुद को भूल जाने को तैयार थी  वरुण में ही खुद को खो देने को तैयार थी।
    नशे के साथ साथ रात भी गहराने लगी थी, वरुण कादम्बरी को सहारा दिए अपनी गाड़ी में डाले उसके घर छोड़ अपने घर  निकल गया…

*******

     कुलग्राम में कुलदेवी पूजा के बाद पूरे परिवार का आसपास घूमने फिरने का कार्यक्रम बन गया, और इसी सब में चार पांच दिन बिता कर पूरा ठाकुर परिवार सहर्ष वापस लौट आया, लेकिन इस सब के बीच ना पारो को देव से मिलने का मौका मिला और न देव को पारो से…
    वहाँ से लौटने के अगले दिन ही सुबह बाली दा पारो को लेने चले आये….

  ” पूस लगने के पहले पहले बउ माँ को अपने खुद के घर पर होना चाहिए , कल ही वापस लेने देव को भेज दूंगी।”

  आंगन में अपनी सुमिरनी जपती बैठी ठाकुर माँ ने नवेली बहु  के भाई को आदेश दे दिया…
   देव का छोटा भाई दर्शन अपनी भाभी का बैग कंधे पर उठाए आगे आगे भाग कर जीप में रख आया, जाते जाते बाली दा ने एक पांच सौ का नोट ज़बरदस्ती दर्शन के बार बार मना करने पर भी उसकी जेब में  डाल ही दिया।
    ये  किशोर वय का बालक उन्हें जाने क्यों बड़ा अपना सा लगता था, उनकी पारो से कुछ एक आध साल ही बड़ा था, इसी से शायद अपनी बहन सी झलक उसमें पाकर बाली दा को उसका बचपना अभिभूत कर जाता था।
   
    चार दिन से ससुराल में ओढ़ रखा गंभीरता का चोला पारो ने मायके पहुंचते ही उतार फेंका। पूरा मायका बेटी के स्वागत को पलक पांवड़े बिछाए बैठे था।
   अपना मनपसंद खाना खाती अपने कमरे की खिड़की पर चढ़ी बेल के फूल उतार उसकी वेणी गूँथती पारो एक बार फिर घर की लाडली पारो बन बैठी थी।
    लेकिन ससुराल से पहली बार मायके आयी लड़की का समय पलक झपकने से भी जल्दी बीत जाता है…. लगा पारो अभी ही तो आयी थी और जाने का वक्त भी आ गया…
    मायके में एक दिन ही पूरा बिता पायी थी कि अगले दिन देबज्योति का छोटा भाई देवदर्शन और देव के रिश्ते के बड़े भाई यानी लाली के पिता लाली को भी साथ लिए पारो को लेने चले आये…
   लाली को देख कर पारो खिल उठी,वो लाली को साथ लिए ऊपर अपने कमरे में चली गयी… अपनी किताबें दिखाती पारो उसे अपनी सहेलियों स्कूल सबके किस्से सुनाती रही जब तक नीचे से तारा दोनो को खाने के लिए बुलाने नही चली आयी…
   खाना पीना निपटते ही पारो एक बार फिर विदा होकर अपनी ससुराल पहुंच गई।
   घर की औरतों से घिरी पारो को देव की एक झलक भी नही मिली थी। वो इधर उधर ताकती अपने चार दिन के ताजा पति को ढूंढ रही थी, यही हाल देव का भी था, कुलग्राम जाने से लेकर आज तक में वो ठीक से पारो को देख तक नही पाया था….
       हालांकि आज की रात उसकी कई जागती रातों के इंतज़ार के खत्म होने की रात थी।
     आज की रात उसके सपनों के साकार होने की रात थी….. ये एहसास ही इतना गुदगुदाने वाला था कि वो सुबह से कुछ अलग ही उत्साह से काम पर लगा और दिनों की अपेक्षा घर देर से ही पहुंच पाया था।
    खाना पीना होने के बाद भी वो बिना किसी काम के भी घर के बीचोबीच खुले आंगन में अपने पिता काका बाबू दादी माँ , माँ सभी के साथ बैठा बातों में लगा था।
   एक तो स्वभाव से संकोची उस पर संयुक्त परिवार का लड़का , बेचारा देव चाहता तो था कि भाग कर पारो के पास पहुंच जाए लेकिन वहाँ से उठे किस बहाने से यही सोचता ज़मीन कुरेदता बैठा रहा।
    पहले कुंवारा था,जब मन किया उठ कर अपने कमरे में चला जाता था, पर आज चाह कर भी अपने उसी कमरे में जाने में संकोच से पैर मनो भारी हुए जा रहे थे।
     कुछ देर में ही सभी के लिए कटोरियों में पायेश ( खीर) लिए देब की माँ चली आयी..

  ” ए की बाबून ! तू अभी तक यही बैठा है, चल जा अपने कमरे में जा ।

  ” हाँ माँ जा ही रहा हूँ…  आखिर वहाँ से उठने का बहाना मिल ही गया था उसे..

  देव उठा ही था कि उसकी बड़ी भाभी बाकी के लोगों के लिए खीर लेती आयी और ट्रे से एक कटोरी उठा कर देव के हाथ में रख दी..
   देव का दिल किया कटोरी उठा के सीधा कमरे की ओर दौड़ लगा दे, इसी कटोरी से पहले अपनी दुल्हन को खिला कर खुद खा ले लेकिन फिर वही संकोच आड़े आ गया, बेचारा कटोरी को देखता खड़ा ही था कि भाभी चहक उठी…

  ” सिर्फ देखने से खीर खत्म नही होगी उसे चखना भी पड़ता है समझे”

  ” जी बउ दी समझा।”

  ” अरे क्या समझे? अगर मेरी बात समझते तो अब तक अपने कमरे में होते।”

   देव झेंप गया,चाहता तो वो भी यही था,बस वहां सजी महफ़िल से उठना नही हो पा रहा था, उसने बड़ी लाचारगी से अपनी भाभी की ओर देखा, उन्होंने तुरंत उसके मन की बात समझ ली, एक और कटोरी उसकी ओर बढ़ा कर अपेक्षाकृत कुछ तेज़ आवाज़, में ही बोल उठी…

  ” देवर जी अगर आप हो सके तो ये कटोरी पारो के लिए भी ले जाइए, अब इतनी देर गए उसे यहाँ कहाँ बुलाऊंगी, सब के बीच खा भी नही पाएगी ना।”

  ” जी बउ दी ”

  मुस्कुरा कर आंखों ही आंखों में अपनी भाभी को आभार व्यक्त करता देव अपने कमरे की ओर बढ़ गया…

  क्रमशः

  aparna. ..


  
 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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