समिधा -8

समिधा 8


    समिधा –8



        सुबह वरुण की नींद बहुत देर से खुली। घर पर भी किसी ने उसे जगाने की ज़हमत नही उठायी। उसने समय देखा और हड़बड़ा कर उठ बैठा, तभी उसकी माँ उसके लिए चाय लिए चली आयी…

” उठ गया तू, ले चाय पी ले।”

  “माँ आज तो बहुत देर हो गयी। ऑफिस के लिए लेट हो गया…”

  ” कैसे लेट हो गया, अरे आज शनिवार है बेटा, आज तो तेरी छुट्टी होती है ना।

  ” ओह्ह हाँ!  माँ दिमाग से एकदम निकल गया था। “

   अपने ही बालों पर हाथ फिराता बैठा वरुण मुस्कुरा उठा, पलंग से उठ कर वो बालकनी में जा खड़ा हुआ। माँ ने उसके हाथ में चाय पकड़ाई और वहीं कुर्सी खिंचे बैठ गयी…

  “बंटी एक बात पूंछू बेटा?”

  वरुण अपनी माँ की तरफ देखने लगा..” ये भी कोई पूछने की बात है माँ? तुम तो आज भी मेरी गलती पर मुझे थप्पड़ लगा सकती हो फिर ? जो पूछना है कहना है कहो ना!”

  ” बंटी क्या सच में तू इस शादी से खुश है? “

  वरुण आश्चर्य से अपनी माँ का चेहरा देखने लगा

  ” ऐसा क्यों पूछ रही हो माँ ? क्या मेरी किसी बात से तुम्हें ऐसा लगा?”

” नही बेटा ! तुझे तो अच्छे से जानती हूँ आखिर मेरे ही रक्त मांस से बना है तू। नौ महीने अपनी कोख में रखा है तुझे। मुझसे ज्यादा तुझे और कौन समझेगा भला।
  जानता है बचपन में तू जब सिर्फ आठ साल का था, एक बार पीछे आंगन में खेल रहा था,उसी वक्त वहाँ एक सांप निकल आया, मैं तुझे पकड़ने को तेरी तरफ भागी ही थी कि तू चिल्ला उठा” माँ इधर मत आना सांप है कहीं तुम्हें काट ना दे”
    जो बच्चा इतनी सी उम्र में दूसरों के लिए इतना सोच सकता है वो बड़ा होने पर कितना सोचेगा भला।
मैं जानती हूँ तू स्वभाव से ही संकोची है,सामने वाले को बुरा ना लग जाये इसलिए हंसते हंसते बिना मन की बात भी झेल लेता है।
  लेकिन बेटा इस बार मैं ऐसा नही चाहती। शादी ब्याह बहुत बड़ा निर्णय होता है, पूरा जीवन निर्भर करता है इस पर बेटा, इसलिए सोच समझ कर ही निर्णय लेना।

   वरुण सर झुकाये बैठा चाय पीता रहा…

” बंटी तेरी पूरी ज़िंदगी का सवाल है। मन में कोई बात ना रखना, अगर एक पल को भी लगे कि तू शादी नहीं करना चाहता तो अभी बता दे क्योंकि बेटा बाद में बड़ी मुश्किल हो जाएगी ।”

  ” मुश्किल तो अभी भी होगी माँ , आखिर सगाई तो हो ही चुकी है !”

  माँ ने बेटे को देखा बेटे ने माँ को दोनो के हृदय ने एक दूसरे की पीड़ा पढ़ ली।
    मुश्किल तो अब भी होगी कहने वाले लड़के के मन में ज़रूर ये चल रहा कि शादी तोड़ना मुश्किल का काम है मतलब अगर मुश्किल ना होती तो क्या वरुण शादी तोड़ देता?

  “मैं तेरे लिए सब झेल लुंगी बेटा, तू बता तो सहीं?”

  ” नही माँ मुझे कोई परेशानी नही है। तुम भी इतना सोचो मत। कादम्बरी एक बड़े घर की लड़की ज़रूर है लेकिन वो भी हमारे परिवार की मर्यादाओं को समझती है। समाज के नियम कायदों को मानने वालों में से है माँ। थोड़ी बेबाक सी है बोलने में सोचती नही है लेकिन है समझदार, शिष्टाचारी है, तुम्हें उसके स्वभाव से कोई शिकायत नही होगी माँ ।”

   माँ ने चुपचाप अखबार का एक पन्ना उसके सामने कर दिया।
   अखबार के ‘शहर की खबर’ कॉलम में बीती रात कादम्बरी की पब की नशे में झूमती फ़ोटो के साथ टैग लाइन थी–” राजनीति के भावी सूत्रधार”
   इसके साथ ही लंबा चौड़ा सा लेख भी लिखा था जिसे बिना पढ़े ही वरुण ने एक तरफ रख दिया..

. ” पापा ने भी देख लिया क्या? “

  वरुण के सवाल पर ना में सर हिला कर उसकी माँ ने अखबार उठाया और उसके टुकड़े टुकड़े कर वहीं रखें डस्ट बिन में डाल दिये

  ” तेरे पापा के वॉक से आने के पहले जब मैं अखबार पर सरसरी नज़र डाल रही थी तभी ये पेज दिख गया और इसे मैंने पापा की नज़र में पड़ने से पहले ही हटा दिया।”

  ” हम्म ” छोटे से हम्म के साथ वरुण वहाँ से उठ गया। तस्वीर में कादम्बरी के साथ खड़े लड़के की पीठ नज़र आ रही थी लेकिन वो समझ गया था कि उसकी माँ उसे पहचान गयी थी।
 
   वरुण के नहा कर नीचे आने तक में उसकी माँ ने उसका पसन्दीदा नाश्ता तैयार कर रखा था।
  बेडमी पुरियों के साथ आलू की सब्जी देख एकबारगी वो खिल उठा..” क्या बात है आज तो ठेठ उत्तरभारतीय नाश्ता बना रखा है तुमने? कोई खास वजह?

” बच्चे का मनपसंद नाश्ता बनाने की भी कोई खास वजह होती है क्या?”
   माँ के जवाब पर मुस्कुरा कर उसने प्लेट उठायी और अपने पिता को यहाँ वहाँ देखने लगा…
 

  ” पापा कहाँ है,नज़र नही आ रहे? “

  “अभी तो निकलें हैं, आज उनका रूटीन चेक’प का दिन है ना।”

  ” अरे तो मैं साथ चला जाता ना ।”

  वरुण प्लेट नीचे रख लपक कर बाहर भागा ,उसके पापा गेट तक ही पहुंचे थे। माँ को बाहर से बता कर की पापा के साथ जा रहा हूँ,वो गाड़ी निकाले उन्हें साथ लेकर अस्पताल निकल गया।

   *******

    पापा के चेक’प के लिए इधर से उधर भागते फिरतें वरुण को एकबारगी लगा कि बीच बीच में अक्सर उसका सर घूमने लगता है उसके बारे में भी एक बार डॉक्टर से सलाह ले लेनी चाहिए लेकिन फिर जाने कुछ सोच कर उसने अपने पिता के सामने डॉक्टर को अपनी समस्या बताना सही नही समझा।
    वैसे समस्या इतनी बड़ी थी भी नही कि वो डॉक्टर से सलाह लेता। आजकल काम भी तो ज्यादा ही होने लगा था, काम की अधिकता में कई बार उसका दोपहर का खाना छूट जाया करता ,हो सकता है उसी कमज़ोरी के कारण ही चक्कर सा आ जाता था। सही ढंग से खाना पीना सोना होते ही समस्या भी चली जायेगी…

  ” चलें वरुण!”

  पापा की आवाज़ सुन वो भी बाहर निकल पड़ा। डॉक्टर ने सिर्फ रूटीन जांचें कर के उसके पिता की चलने वाली सामान्य दवाओं को ही आगे बढ़ाया था।
   बाहर पापा को गाड़ी में बैठने बोल वो अस्पताल की ही फार्मेसी की ओर दवाएं लेने बढ़ रहा था कि सामने से आते एक अपनी ही उम्र के युवक से टकराते टकराते बचा था। सामने से आता युवक कुछ हड़बड़ी में था, उसके पीछे ही एक दुबली पतली सी युवती थी और साथ थी  एक लगभग चालीस बयालीस साल की महिला।
   गोरा चेहरा गोल गोल आंखें और घुंघराले से माथे पर आती लटें। उसे जाने क्यों ये चेहरा बहुत जाना पहचाना सा लगा लेकिन दूर पास के सारे रिश्तेदारों , दोस्तों पड़ोसियों के चेहरे खंगाल लेने पर भी ये चेहरा किसी जान पहचान वाले चौखटे पर फिट नही बैठा।
   कुछ सोचता हुआ सा वो आगे बढ़ गया…

  उसके पास से होकर गुजरते बाली और तारा डॉक्टर के पास तारा को दिखाने आये थे, और साथ ही आयी थी दुर्गा।
        तारा को दूसरा महीना लग चुका था , अब तक डॉक्टर से सामान्य जांच पड़ताल भी नही हुई थी। इसलिए वो तीनों अस्पताल आये थे।
     तारा की जांच में सारी बातें सामान्य पाकर डॉक्टर ने ज़रूरी कुछ दवाएं और पथ्य बता कर उन्हें वापस भेज दिया।

   पिता को साथ लिए वरुण घर पहुंचा की घर पर पहले से मौजूद मेहमानों को देख उसकी आंखें चमक उठी ।
    उसकी मासी और उनके बच्चे आये हुए थे। मासी का बेटा कमल और बेटी लिली लगभग उसी के हमउम्र थे , उन लोगों के साथ नाश्ते की प्लेट लिए वो अपने कमरे की ओर चला गया।
    कमल और वरुण अपने कमरे में बातों में लग गए , बीच बीच में रोली उनके लिए चाय कॉफी भी लेती आ रही थी।
  अस्पताल में डॉक्टर के केबिन में फ़ोन साइलेंट पर रखना ज़रूरी होने से वरुण ने फ़ोन को जो उस समय साइलेंट कर रखा था वापस रिंगर में डालना ही भूल गया।
   कमल के साथ बातों में लगे वरुण का फ़ोन साइलेंट मोड़ पर कादम्बरी के बारह मिस्ड कॉल और ढेरों मेसेज के साथ वरुण की राह देखता एक ओर पड़ा रहा।

*******

    आज तीसरी रात थी और देव की पारो से मन भर बातें  तो दूर एक दूसरे को नज़र भर देखना भी नही हो पाया था।
     आज देव को दुकान का कुछ हिसाब किताब भी करना था इसलिए रात के खाने के बाद से ही वो अपने कमरे में बैठा अपना काम देख रहा था।
   रसोई में औरतों का खाना निपटते ही पारो और लाली किसी बात पर क़हक़हे लगाती कमरे में चली आयीं।
   देव पर नज़र पड़ते ही पारो चुप सी एक ओर खड़ी रह गयी। उसे ऐसे देख लाली भी कुछ सोचती खड़ी रह गयी, एकाएक उसे सुझा नही की क्या कहा जाए…

” क्या हुआ तुम दोनों वहाँ क्यों खड़ी हो,भीतर आ जाओ!”

  देव के चेहरे की मुस्कान देख दोनो अंदर चली आयीं

  ” अब मैं चलती हूँ काकी, तुम भी आराम करो।”

  ” अरे क्यों !? कुछ देर तो रुको ना लाली, मुझे अपनी आज की पढ़ाई ही सुना दो!”

  लाली ने देव की तरफ देखा उसके इशारे में हाँ कहते ही वो पारो के साथ बैठी उसे अपने स्कूल की बातें बताने लगी।
   कुछ देर में बाहर से उसकी माँ के बुलाने पर वो बाहर चली गयी। उसके जाते ही देव ने भी अपना बस्ता समेट लिया और दरवाज़ा बंद कर वापस आ गया…

  ” देख रहा हूँ, लाली से खूब दोस्ती हो गयी है तुम्हारी।”  

  मुस्कुरा कर पारो ने हां में सर हिला दिया…

  ” घर पर और किस किस से जमने लगी है तुम्हारी?”

  ” सभी से ! ठाकुर माँ से, बउ दी से दर्शन से और लाली से।”

  ” और मुझ से? “

  ” तुमसे अभी बात ही कहाँ हुई जो जमने लगे ?”

  ” हम्म ! दो दिन से तो तुम मेरे कमरे में पहुंचते में ही सो जाती थीं , तो बात कैसे होती भला?”

  पारो ने हंसते हुए अपने कान पकड़ लिए…

  ” सोचती तो थी कि तुम्हारे आते तक जागूँ लेकिन थकान से नींद आ जाती थी।”

  ” हम्म ! तो आज नही थकी हो?”

  ” नही!”

  ” मैं एक बात पूछ सकती हूँ तुमसे?”

  ” हाँ पूछो ना!”

  “मुझसे पहली बार मिलने पर कहा था ना कि मुझे पढ़ने दोगे?”

  देव कुछ सोच में पड़ गया फिर हाँ में सिर हिला दिया

  ” तो क्या मैं भी लाली के साथ स्कूल जा सकती हूँ?”

  पारो की बात सुन देव ज़ोर से हँस पड़ा

  ” लाली के साथ ही क्यों?”

  ” लाली के साथ क्यों नही भला? वो भी तो मेरी ही उम्र की है। हम दोनों सहेलियां साथ साथ स्कूल आना जाना कर लेंगे, और साथ ही स्कूल का सारा काम भी कर लेंगे लेकिन घर का सारा काम भी मैं कर लुंगी, तुम उसकी चिंता मत करना!”

  ” बड़ी समझदार हो तुम तो!”

  ” और क्या ? माँ ने सब समझा कर भेजा है , उस दिन तुमने पूछा था ना कि इतनी छोटी उम्र में शादी क्यों कर रही हो? अब देख लो दिमाग में मैं अपनी उम्र से ज्यादा समझदार हूँ कि नही!”

   देव का चेहरा एक पल को बुझ गया… वो समझ रहा था कि पारो की माँ की मजबूरी थी कि पारो का जल्द से जल्द ब्याह कर दे लेकिन पारो जैसी अधखिली कलि को फूल बना दे वो इतना नासमझ और जल्दबाज़ नही था।
    आखिर उसकी प्यारी भतीजी लाली की उम्र की ही तो थी पारो भी,फिर कैसे वो इस स्वछंद उड़ती फिरती तितली को रौंद सकता था।
   थी तो उसी की, आखिर ब्याह कर के लाया था… उसके अठारह के होने तक राह देखने में कोई बुराई भी न थी, तब तक वो भी मन भर कर पढ़ लिख लेगी।


  ” किस सोच में डूब गए देव बाबू!”

  “पारो ! एक बात कहूंगा तुमसे! तुम मेरी बात समझ पाओगी?”

” जब कहोगे तभी तो बता पाऊँगी ?”

  देव खुल कर मुस्कुरा उठा

  ” बातें बनाने में बड़ी तेज़ हो! पारो मैं ये कहना चाहता था कि भले ही अठारह की होने से पहले ही तुम्हारा ब्याह करवा दिया घर वालों ने लेकिन हमें हमारी शादीशुदा जिंदगी शुरू करनी है या नही ये तो हमारे हाथ में ही है!”

  ” मतलब !”

  ” मतलब जब तक तुम अठारह की नही हो जाती हम सिर्फ दोस्तों की तरह रहेंगे। समझीं!”

  पता नही पारो क्या समझी क्या नही लेकिन उसने पूरी मुस्तैदी से हाँ में सर ज़रूर हिला दिया।
    उसके बाद तो आधी रात तक दोनो की बातें चलती रहीं। कभी अपनी शैतानियां सुनाती पारो कभी अपनी समझदारी के किस्से सुनाती पारो एक बार फिर से अपने मायके की देहरी में फुदकती चिरैया बन गयी थी।

    पारो और लाली के किस्सों का हिस्सा घर का एक और सदस्य चुराने लगा था और वो था दर्शन। देव का प्यारा छोटा भाई देवदर्शन ।
   वो लाली से दो जमात ऊपर पढ़ाई कर रहा था, दोनो साथ ही स्कूल आया जाया करते, उन दोनों की स्कूल की सारी तैयारी पारो ही करती।
  उनके स्कूल से आते ही पूरे दिन भर का किस्सा जब तक न सुन लेती उसे चैन नही मिलता।और फिर रात में वही सारी बातें देव को सुनाती।
   घर के कामों के साथ साथ पारो का दिन लाली और दर्शन के संग पढ़ने और खेलने कूदने में भी बीतने लगा था। हालांकि घर वालों के सामने पारो का भागना दौड़ना वर्जित था, आखिर वो एक संभ्रात घर परिवार की कुलवधू जो थी।

        इसी से वो अक्सर कभी पोखरे कभी मंदिर जाने के बहाने लाली के साथ निकलती और बाहर पहले से उनका रास्ता देखते खड़े दर्शन के साथ दोनो लड़कियां कभी नाव में बैठ पूरा पोखरा घूम आती कभी चंडी मंडप के आम के बगीचे से कच्ची कैरी तोड़ लाती।
   इन्ही उछलकूद के बीच पारो को ससुराल आये पांच महीने बीत गए और इन पांच महीनों में पारो को उस घर में तीन दिलअजीज़ दोस्त मिल गए थे लाली दर्शन और  देव!

   देव तो अब उसका सबसे खास मित्र बन चुका था। कभी किन्ही बातों पर उसकी लाली या दर्शन से बहस भी हो जाती लेकिन देव ऐसा था जिसके पास उसकी हर समस्या का समाधान होता था।
      घर भर के लिए पायेश बनाने की शर्त हो या पोखरे से महाराज की लायी बड़ी सी रोहू पकाना हो हर किसी मुश्किल को देव चुटकियों में सुलझा कर रख देता।
   पारो को उसकी जीवन नैय्या में बैठाए आस पास के रोड़ों रुकावटों से बचाता निकलता देव बस अब तक उसकी पढ़ाई के बारे में घर पर किसी से बात नही कर पाया था।
  पारो को और तो सारी सुविधा थी लेकिन शाम के वक्त जब लाली और दर्शन अपनी किताबें खोले पढ़ते होते उस वक्त रसोई में अपनी सास के साथ सरसों के तेल में छौक छोड़ती पारो का कलेजा उमड़ने लगता। क्या वो पढ़ पाएगी भी या नही?

  आखिर एक रात जी कड़ा कर उसने देव को चुनौती दे ही डाली। देव खुद परेशान था कि आख़िर किस तरह वो अपनी ठाकुर माँ को पारो की पढ़ाई के लिए मनाए। लेकिन उस रात की पारो की ज़िद काम कर गयी। अगली सुबह दुकान पर अपने पिता के सामने उसने पारो की पढ़ाई की बात रख ही दी, और उसकी आशा के विपरीत उसके पिता ने उस बात पर उसे एक जोरदार झिड़की लगा दी।
   ब्याह के बाद औरतों को बस अपनी घर परिवार और गृहस्थी की सोचनी चाहिए इस सब से परे सोचने वाली औरतों को रौरव नरक में जलना पड़ता है।
   अपनी औरत को नरक की अग्नि से बचाने का देव के पास यही उपाय था कि अब घर के किसी बुजुर्ग सदस्य से वो उस बारे में बात  ही न करे।

    उस दिन बाबा के घर लौटने के बाद शाम जब दुकान बढ़ाने की सोच रहा था कि पार्थो चला आया..

  “क्या देव जब से शादी कर ली दोस्तों को तो भूल ही गया ना!”

  ” अरे नही पार्थो! आजकल थोड़ा दुकान में भी व्यस्तता बढ़ सी गयी है। अब बाबा कम ही काम देखतें हैं। यहाँ का सारा काम अब मैं ही देखने लगा हूँ, बाबा आजकल हाट वाली दुकान देख रहें हैं काका बाबू के साथ। पर तुम सुनाओ, तुम इधर अचानक ही गायब हो गए। कहाँ थे आजकल?”

  ” नौकरी मिल गयी है ना। गंगा डेल्टा फिशरी परियोजना में काम कर रहा हूँ आजकल! पढ़ने का समय भी नही निकाल पाता हूँ। इसलिए ही तो इस साल एम ए प्राइवेट में भर दिया है मैंने।
  किताबें लाकर घर पर पढ़ लो और मज़े से बस इम्तिहान  के दिन कॉलेज जाना होगा। ”

  ” अरे दोस्त बड़े पते की बात बता दी तुमने।”

  देव ने आगे बढ़ पार्थो को गले से लगा लिया। पार्थो हतप्रभ बैठा यही सोचता रहा गया कि ऐसी क्या पते की बात बता गया वो जो खुद उसके भी समझ से परे थी।
     दुकान में चाय नाश्ता मंगवा कर पार्थो को खिला पिला कर विदा देने के बाद एक अलग ही उल्लास में भरा देव नौकरों से दुकान बढ़वा  कर चाबी डाले घर की ओर निकल गया।
   आज इतने महीनों बाद उसके पास अपनी प्रियतमा के लिए बहुत अच्छी खबर जो थी….

  क्रमशः

aparna….

    


  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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