समिधा -9




  समिधा 9

      पार्थो से बात होने के बाद देव के मन में भी यह विचार जाग गया कि घर पर बिना किसी से कहे पारो अगर प्राइवेट इम्तिहान दे ले तो घर पर किसी को कोई परेशानी नही होगी क्योंकि किसी को मालूम ही नही चलेगा।
   
      देव के कदम तेज़ी से घर की ओर बढ़ चले। मन में उमंगों की बहार लिए जाते जाते उसकी नज़र पान वाले चौरसिया बाबू पर पड़ी और खुशी से उसने तीन चार बीड़े अपनी दुल्हनिया के लिए बंधवा लिए।
    घर पहुंचते ही उत्साह ज़रा कम करना पड़ा वरना हर किसी को कारण भी तो बताना पड़ता।
    खाना पीना निपटने के बाद कमरे में पहुंचा देव पारो की बाट देखता बैठा था , लेकिन आज ही घर की बड़ी बेटी यानी लाली की बड़ी बहन मिष्टी अपनी दो महीने की छोटी सी बिटिया को लेकर मायके रहने आयी थी, उसी के सेवा भार में लगी पारो को कमरे में आने में वक्त लग रहा था।
  एक पान का बीड़ा मुहँ में चुभलाते वो गलियारे में घूमता इधर से उधर हर कमरे की खिड़की से झांक भी लगाता चला जा रहा था कि कहीं तो पारो की झलक मिले की तभी उसकी दूसरे नम्बर की भाभी यानी लाली की चाची सामने से चली आयी…

  “क्या हुआ देव ? आपकी पारो से भेंट नही हुई क्या?”

  ” नही बऊ दी मैं तो मिष्टी की गुड़िया को खिलाने जा रहा था”

“, ओह्ह तो इधर किधर चले आये, वो तो ओसारे के दूसरी तरफ के कमरे में हैं, और सुनो आप पान खा रहे हो क्या?”

” हाँ बऊ दी ! आपको भी चाहिए क्या?”

” क्यों नही चाहिए होगा? पान के लिए भी कोई मना करता है भला। मुझे तो दो चाहिए एक आपके भैया के लिए भी।”

  मुस्कुरा कर भाभी ज़रा लजा गयीं और देव भाग कर दो पान उठा लाया, उसी समय लाली की माँ उधर से होकर गुज़री..

  “अरे वाह ! मैं आज ही महाराज को बोलने वाली थी कल से मिष्टी के लिए पान ले आना। क्या है ऐसे समय में पान खाने से दांत मजबूत बने रहते हैं ना। और रखें हैं क्या?”

  ” हाँ है ना बऊ दी ! दो और हैं।”

  बेचारा देव वापस भाग कर बचे दोनो पान अपनी बड़ी भाभी के हाथ में रख गया, दोनो भाभियां यहाँ थीं तो फिर आखिर वो कहाँ थी, जिससे अपने मन की बात कहने को वो इतना व्याकुल हो रहा था।
   दोनो भाभियों की अनर्गल प्रश्नोत्तरी का कुछ भी जवाब देता वो थक कर अपने कमरे में लौट आया।
   वैसे तो वो सोफे पर ही सोया करता था , और पलंग पर पारो लेकिन आज अपनी ही धुन में मग्न वो पलंग पर लेटा ऊपर छत पर घुमतें पंखे को देखता सोचता रहा कि उससे प्राइवेट पढ़ाई की बात सुन पारो खुशी से नाच उठेगी। सोचते सोचते वो गहरी नींद में डूब गया, कि अचानक दरवाज़े पर कुछ खटका हुआ, चौन्क कर उसकी नींद खुल गयी, उसने देखा पारो कमरे मे आने के बाद धीरे से दरवाज़े की कुंडी लगा रही थी।
    वो धीमे कदमों से चलती देव के पास आ कर खड़ी हो गयी, देव ने एक हाथ अपनी आंखों के ऊपर रखा हुआ था जिससे हाथ की ओट में वो पारो के देख पाए।
   पारो ने धीरे से देव के पैरों को छू कर अपने माथे से लगाया और उसकी बगल से तकिया उठाने उस पर झुकी ही थी कि देव उठ गया और अचानक चौंकने से वो अपना संतुलन खो कर उस पर गिर पड़ी…
     शरारत से कराहता हुआ देव हंसते हुए उठ बैठा…

  ” क्या हुआ ? ज्यादा तो नही लग गयी?”

  ” लगी तो बहुत है , बहुत ही ज्यादा।”

  ” दिखाओ ज़रा? मैं मलहम लगा दूं?”

  ” मलहम वाली चोट नही है ये !”

  ” फिर ? ”

  देव ने शरारत से मुस्कुराते हुए उसके दोनो हाथ पकड़ कर उसे अपने सामने बैठा लिया ….

  ” तुम्हारे लिए पान लेकर आया था!”

  ” कहाँ है ? दो फिर !”

  ” दोनों भाभियों ने खा लिए..”

  ” कोई बात नही ! कल फिर ले आना!”

  पारो को मुस्कुराते देख देव भी मुस्कुराने लगा..

“एक और चीज़ भी लाया हूँ, एक खबर या कह सकती हो एक आइडिया।”

  ” कौन सी खबर ?” पारो की आंखें चमक उठी

  ” तुम्हारी पढ़ाई की! अब तुम घर पर रह कर भी पढ़ सकती हो, इसके लिए स्कूल जाने की ज़रूरत नही पड़ेगी!”

  ” पर कैसे? बिना स्कूल गए भी पढ़ाई हो सकती है क्या भला?”

  ” हाँ बिल्कुल! उसके लिए अलग से फॉर्म भराये जातें हैं, और सिर्फ इम्तिहान देने ही स्कूल जाना पड़ता है। इससे एक बात ये अच्छी होगी कि घर पर किसी को मालूम भी नही चलेगा और तुम इम्तिहान देकर पास भी हो जाओगी।”

  पारो मुस्कुरा उठी…

  ” पर देव बाबू घर पर अगर किसी को पता चल गया तो क्या कोई मुसीबत हो जाएगी।”

  ” हाँ मेरी भोली पारो मुसीबत ही हो जायेगी। मैंने बाबा से बात करने की कोशिश की थी लेकिन उन्होंने तुम्हारे स्कूल के लिए साफ मना कर दिया, इसी से मुझे समझ आ गया कि ठाकुर माँ भी कभी तैयार नही होंगी बस तभी ये खयाल आया कि घर पर बैठ कर भी तो पारो पढ़ सकती है ना?”

  पारो ने आगे बढ़ कर देव के दोनो हाथ पकड़ लिए उन्हें माथे से लगा कर फिर चूम कर उसने छोड़ दिया

  ” आप कितना सोचतें हैं मेरे लिए। इतना कौन सोचता होगा? “

” मुझे क्या पता कौन सोचता है कौन नही। लेकिन मैं तो मेरी पारो की खुशी चाहता हूँ ना।”

  “कभी कभी तुम्हें देख कर ऐसा लगता है जैसे मेरे बाबा वापस आ गए, उनके लिए भी मेरी खुशी सबसे अधिक ज़रूरी थी। उनके बाद अब तुम भी वैसे ही लगने लगे हो।”

  देव ज़ोर से हँस पड़ा…

“जैसे हर लड़का अपनी बीवी में अपनी माँ की झलक चाहता है वैसे ही शायद हर लड़की अपने पति में पिता की झलक चाहती होगी , तुम्हारी बातें तो सुन कर ऐसा ही लग रहा।”

पारो उठ कर दोपहर के सूखे पड़े कपड़े तहाने लगी..

” अच्छा ये बताओ कि घर पर मैं पढूंगी कैसे?”

” रात में जब सब खा पीकर सो रहेंगे तब मैं और दर्शन तुम्हें पढ़ा देंगे। मेरे न रहने पर दिन के समय पढ़ाई में कोई समस्या आने पर दर्शन से पूछ लेना।

  ” हम्म लाली से भी मदद मिल जाएगी।”

” लाली से उम्मीद कम है क्योंकि मैं तुम्हें दसवीं का इम्तिहान दिलवा रहा हूँ।”

  ” ओह्ह माँ ! मैं अभी दसवी का इम्तिहान दे भी पाऊँगी? पर ऐसा क्यों सोचा तुमने ?”

” क्योंकी इससे तुम जल्दी जल्दी स्कूल की सीढ़ियां पार कर जाओगी ना ?”

” और फिर डॉक्टर बन जाऊंगी?”

पारो के भोले सवाल पर हँस कर दुहरे होते देव ने सर पकड़ लिया

” डॉक्टर क्यों कलेक्टर ही बन जाना मेरी माँ । पर पहले इस घर में रहते हुए पढ़ तो लो। यहाँ जहाँ लड़कों की पढ़ाई का भी सिर्फ इतना महत्व है कि वो दुकान का हिसाब किताब कर सके उतनी ही पढ़ाई उनके लिए ज़रूरी मानी जाती है वहाँ एक लड़की वो भी घर की बहू की पढ़ाई का सोचना ही बहुत कठिन है। लेकिन पारो मैं पूरी कोशिश करूंगा कि तुम जितना पढना चाहो पढ़ सको। पर तुम्हें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। मंज़ूर है ना।”

   हँस कर उसने उसके हाथ थाम लिए, और पारो के सर पर चपत लगा कर उसकी डॉक्टर वाली बात पर देव वापस हँसने लगा

उसे हंसते देख वो भी जोर से हँसने लगी, तभी उनके कमरे के बाहर से गुजरती ठाकुर माँ के खांसने की आवाज़ सी आयी “ये आजकल के बच्चे सारी लाज शर्म छोड़ बैठे हैं, ऐसे जोर जोर से अपने कमरे में कौन हंसता है भला?” 
    उनकी आवाज़ कानों में पड़ते ही दोनो चुप लगा गए और उनके कदमों की आहट सुनाई देनी बंद होते ही दोनो के क़हक़हे उस कमरे में वापस गूंज उठे….

  *****


    वरुण को अमेरिका आये पांच महीने बीत चुके थे। वीज़ा क्लियर होते ही सब कुछ बस फटाफट होता चला गया था।
       कादम्बरी खुश थी वरुण के विदेश प्रवास से लेकिन साथ ही वो यह भी चाहती थी कि साल डेढ़ साल में ही वरुण वापस भी आ जाये।
   एक शाम वरुण के अमेरिका जाने के पहले जब दोनो किसी कैफे में साथ बैठे कॉफी की चुस्कियां भर रहे थे….

  ” जानती हो कादम्बरी मैं विदेश क्यों जाना चाहता हूँ?”

  ना में सर हिलाती मुस्कुराती कादम्बरी उसे निहारती अपनी कॉफी पीती रही…

“जिससे तीन चार साल में खूब रुपया कमा लूँ फिर आराम से जॉब छोड़ कर अपना कुछ काम शुरू कर सकूं !”

  ” रुपया कमाना तो ठीक हैं लेकिन जॉब क्यों छोड़ने की सोच रहे?”

  ” किसी की नौकरी करते हुए मैं मेरे पेरेंट्स को समय नही दे पाऊंगा। चार पांच साल बाद उन्हें भी सही देखभाल की ज़रूरत होगी और उससे भी बढ़कर उस उम्र में आपको यही ज़रूरत रहती है कि आपके बच्चे आपके आसपास हों, दो घड़ी आपके पास बैठ कर आपका हालचाल पूछ सकें। मॉर्निंग वॉक के समय आपकी छड़ी बन सकें। जैसे बचपन में कभी हमें माँ बाप ने पाला पोसा होता है वो वापस करने का समय होता है ये।
   अपना खुद का मेरा काम होगा तो मैं अपनी मर्ज़ी का मालिक रहूँगा, भरपूर समय अपने परिवार को दे पाऊंगा, तुम्हें हमारे बच्चे को सभी को तो समय चाहिए होगा न मेरा?”

   कादम्बरी का चेहरा बन गया, उसे वरुण की बात सिरे से बेसिर पैर की लगी। ये किस दुनिया से आया लड़का है जो नौकरी छोड़ कर मां बाप की सेवा करना चाहता है?

  ” मुझे तो बड़ा ही बेढ़ब सा प्लान लगा तुम्हारा। आजकल के ज़माने में जहाँ रूपया ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है वहाँ तुम नौकरी छोड़ने की बात कर रहे हो।
   अरे अमेरिका से आने के बाद तुम्हारे पास एक से एक बढ़ कर ऑफर रहेंगे, किसी बड़े ऑफर को चुन लेना। हाथ में पैसा रहे तो बाकी सारे काम हो जातें हैं वरुण। तुम्हें खुद सेवा करने की क्या ज़रूरत इस काम के लिए नौकर भी रखे जा सकते हैं ना। और सच कहूं तो आज कल के बुजुर्गों की जो जनरेशन है ना इन्हें भी खुद के लिए वक्त चाहिए। अब ये वो लोग नही रहे कि बेटा बहु नाती पोता इनके साथ रहें और ये खुश हो जाएं। इनके अपने दोस्त अपने शौक हैं इनकीं भी अपनी आजादी है। आज की जनरेशन के सास ससुर तो यही चाहतें हैं बेटा हर महीने मोटा माल इनके हाथ रख दे और इन्हें इनके हिसाब से जीने दे। मेरे घर का ही मैं उदाहरण बताती हूँ।
   मेरी ताई के बेटे यानी बड़े भैया अमेरिका में ही बसे हैं… जब उनका बेबी होना था तब भैया ने अपने मम्मी पापा को बुलाया, दोनो कुछ समय वहाँ रह के अपने कर्तव्य निभा कर वापस आ गए…
   अब भी ताई जी ताऊ जी कभी कभार कुछ दिनों के लिए जातें हैं भैया भाभी भी आतें हैं लेकिन कोई साथ नही रहना चाहता। यहाँ तक कि ताई अपने मुहँ से कहती हैं,क्या फायदा है साथ रहने से सम्बन्ध ही खराब होने है। ना बहु को हमारा रूटीन रास आएगा न हमें उसकी छोटी छोटी स्कर्ट्स रास आएंगी। इसलिए  देखा जाए तो दूर दूर रह कर प्यार बना हुआ है तो क्या बुराई है ?
 …
    मुझे भी यही सही लगता है हम हमारी लाइफ जियें और वो उनकी लाइफ। हाँ उन्हें  जब जिस चीज़ की ज़रूरत हो वो हम पूरी करतें रहेंगे।
चाहती तो मैं भी नही की तुम ज्यादा लम्बे समय तक अमेरिका रहो क्योंकि मुझे वहाँ की लाइफस्टाइल ही पसंद नही और फिर मेरा वहाँ कोई स्कोप भी तो नही है।
  मेरा तो कैरियर यही बन सकता है इसलिए खूब कमा के वापस आ जाओ और हम अपनी लाइफ स्टार्ट कर लें यही अच्छा रहेगा।”

  “पर पहले तो तुमने कहा था तुम्हें मेरी कमाई से भी फर्क नही पड़ता।”

  ” ऑब्विअसली बाबा! तुम्हारी कमाई से कहीं ज्यादा तो मुझे राजनीति के मेरे कैरियर मे मिल जाएंगे, लेकिन तुम्हारे विदेश प्रवास से मेरे पापा को फॉरेन रिटर्न दामाद तो मिल जाएगा ना।
   देखो मैं कुछ ज्यादा ही साफ शब्दों में बोल जाती हूं तुम बुरा मत मान जाना। मुझे तुम्हारे मॉम डैड के साथ रहने में भी कोई दिक्कत नही है यार, वैसे भी वो लोग बहुत प्यारे हैं बिल्कुल तुम्हारी तरह।
   मैं एक सामान्य बात बता रही थी कि जॉइंट फैमिली न रहने के पीछे के कारण सिर्फ बेटा बहु ही नही सासससुर भी होतें हैं लेकिन लोग बस सिक्के का एक ही पहलू देख कर निर्णय सुना देते हैं।
   कोई परिवार टूट गया तो ज़रूर इसके पीछे बहु का हाथ होगा जबकि रहता हर किसी का है।
   बाकी रही हमारी बात तो मुझे तुम्हारी फैमिली के साथ रहने में कोई दिक्कत नही है लेकिन मैं नही चाहती कि तुम नौकरी छोड़ कर अपना काम शुरू करो।
   बाकी ये सारी बाद कि बातें हैं सो अभी से क्यों सोचा जाए, अभी तो कॉफी पियो। ये लो तुम्हारी तो कॉफी भी ठंडी हो गयी…”
   …..

   वरुण ने देखा वाकई उसकी कॉफी पड़े पड़े ठंडी हो गयी थी….
   खिड़की से बाहर मैनहैट्टन शहर की बड़ी बड़ी इमारतें आसमान चूम रहीं थीं, और इन्हीं इमारतों की रोशनियों में डूबा वो अपने शहर कलकत्ता पहुंच गया था।
   कादम्बरी की उस दिन की कही बातें सच भी तो थीं। मन की साफ ही तो है तभी तो ऐसे बिंदास जो मन में आये कह जाती है। ज़िन्दगी को लेकर कितनी प्रैक्टिकल अप्रोच है उसकी, और सही भी तो है। एक ही जीवन तो मिला है उसे हम क्यों न खुद के हिसाबों से जियें…

   लेकिन इतनी सारी कैफियत खुद को दे लेने के बाद भी वो क्यों अपने मन के पेंचों में उलझ कर रह जाता था। क्या आज की दुनिया में उस जैसों को ही इमोशनल फूल कहा जाता है।
   शायद हाँ!!!
  पर वो और कर भी क्या सकता है? वो इमोशनल फूल है तो है।

जब सामने वाला उसके लिए खुद को नही बदल सकता तो वो क्यों खुद को बदले….

  ” यार वरुण ! यहाँ बैठे बैठे क्या कर रहा है?”

वरुण का रूम मेट और ऑफिस कलीग प्रज्वल कहीं बाहर से घूम फिर कर लौटा ही था कि खिड़की पर बैठे वरुण को छुट्टी वाले दिन भी घर पर ही देख चौंक गया।

  ” कुछ नही दोस्त, कॉफी पी रहा था।”

   ” चल फटाफट तैयार हो जाओ। यहाँ हिन्दू सोसाइटी में जो हमारा मंदिर है ना वहाँ आज प्राण प्रतिष्ठा की पूजा है।

  ” यार मैं तो मंदिर वन्दिर जाता नही।”

  “अबे मैं कौन सा तुझे दर्शन करने जाने बोल रहा हूँ। आज वहां भंडारा भी होता है। और क्या टेस्टी खाना मिलता है यार, मतलब मज़ा ही आ जाता है बस।
  तू दर्शन मत करियो भोग खा कर आ जाना। अबे एक दिन तो खाना बनाने की टेंशन से मुक्ति मिलेगी आखिर।”

  वरुण उसकी बात मान उसके साथ मंदिर निकल गया।

  जिस वक्त दोनो दोस्त मंदिर पहुंचे आरती की स्वरलहरी हर दिशा में गूंज रही थी।

     ” दीन बंधु दुःख हर्ता तुम रक्षक मेरे
       स्वामी तुम ठाकुर मेरे…
        अपने हाथ उठाओ , द्वार खड़ा तेरे.. ओम जय जगदीश हरे…

      विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा
        स्वामी पाप हरो देवा…
        श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ ,संतन की सेवा.. ओम जय जगदीश हरे….”

    आरती के शब्दों का चमत्कार था या मधुर गायन का वरुण के दोनों हाथ सामने स्थित पाषाण प्रतिमा के आगे जुड़ गए….
    और मन मे उठते विकारों ने  अनजाने ही आंखों से बह रहे  आंसूओं का रूप धर लिया और मन की पीर उस दीनबंधु दुखहर्ता से सामने धार बन  बह चली….

क्रमशः

  aparna….


.दिल से ……

    समिधा कहानी अब भी अपने पूरे रूप में शायद बहुतों को स्पष्ट नही हो पा रही है क्योंकि पारो के ब्याह के बाद कइयों के सवाल थे कि अब वरुण और पारो कैसे मिलेंगे?

    समिधा नास्तिकता से आस्तिकता की ओर मुड़ते युवक की कहानी है , एक ऐसी युवती की कहानी है जो समाज की रूढ़ियों या बचपन के संस्कारों से आस्तिक होते हुए भी अपने जीवन की डगर में नास्तिक होती चली गयी।
    और जीवन संघर्ष में अनचाहे ही दोनो कब एक ऐसे हवन की समिधा बन साथ जुड़ गए जिसका  प्रारब्ध और फल दोनो को ही पता नही था।

   कहानी से जुड़े रहें , धीरे धीरे सारे भाग आपके सामने खुलते चले जायेंगे…..
 
 
    इतने ढेर सारे प्यार के लिए आप सभी का हार्दिक आभार धन्यवाद शुक्रिया नवाज़िश!!!

aparna… …
   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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