समिधा

”  समिधा “

   यज्ञ , हवन में प्रयुक्त लकड़ियों को समिधा कहा जाता है। सूर्य की समिधा मदार होती है तो चंद्रमा की पलाश।
   आहुति या हव्य तभी पूरी तरह से हवन को समर्पित हो पाता है जब समिधा सही पड़ी हो।

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                     समिधा

   
      ” अब तुम एक साधारण मनुष्य नही हो वरुण , जल्दी ही मठ के नियमों के अनुसार तुम आचार्य वरुनानन्द हो जाओगे। तुममें असीमित ज्ञान है और और उस ज्ञान की पताका तुम्हें सारे संसार में लहरानी है। कृष्ण में आसक्त तुम्हारा मन हृदय अब तुम्हें गीता के उस अद्भुत और कालजयी ज्ञान से संसार को सिक्त करने का उत्तरदायित्व देता है।
     कलियुग में धर्म की स्थापना के लिए किए हवन की समिधा हो तुम वरुण।
   वो समिधा हो जो खुद जल कर भी हवन को पूर्ण करता है और जिसकी खुशबू से युगों युगों तक संसार महकता रहता है।
     तुम्हारा जन्म इसी पावन कल्याणकारी कर्म के लिए हुआ है वरुण! बाकी सब भूल जाओ।
       वो कन्या भी  हमारे लिए इसी पावन हवन की समिधा सी है।
    मठ उसका भी बुरा नही होने देगा, उसे भी संसार के कल्याणार्थ कुछ ना कुछ कार्य दे दिया जाएगा। उसकी तरफ से ध्यान हटा लो।
   कल मठाधीश तुमसे मिलने आ रहें हैं, और जल्दी ही तुम्हारा दीक्षा का समय तय कर दिया जाएगा।”

    बाकी सभी भक्तों के साथ-साथ वो भी अमृतानन्द स्वामी जी को प्रणाम कर उठ गया…
    
    बाहर गरजते बरसते बादलों का शोर भी उसके अंतरमन में चल रहे शोर से कम ही कोलाहल पैदा कर रहा था….


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इस सब से लगभग तीन साल पहले….
    
      नवंबर के महीने में छत पर खिली धूप में पानी की ऊंची सीमेंट की टंकी के नीचे बची लंबी खाली जगह में चटाई बिछाए पारो अपनी विज्ञान की किताब खोले अध्याय 5 को पढ़ने की हड़बड़ी में थी।
    अध्याय का नाम था लैंगिक जनन:–

    
“जब जनन प्रक्रिया में दो जीव जनक भाग लेते है तब उसे लैंगिक जनन कहते है। इसमे अर्धसूत्री विभाजन एवं निश्चेतन की क्रिया होती है नर युग्मक एवं मादा युग्मक बनते है जिनके संयोजन से बने युग्ननास के द्वारा नया जीव बनता है..”

     कल रात ही बाली दादा (भाई)  से ज़िद कर पारो ने अपनी आठवीं कक्षा के लिए किताबें ख़रीदवाई थीं और पढ़ने का शौक उसे रात ही सारी किताबों का एक चक्कर लगवा गया था।
   हालांकि पंद्रह की उम्र में लैंगिक जनन पढना,जानना उसे कुछ अधिक ही रोचक लग रहा था। लेकिन घर भर में फैले दर्जन भर लोगों के बीच वो किताब में दिए ईस अध्याय के चित्रों को ना तो आंखे फाड़े देख सकती थी और ना ही इनके बारे में लिखा पढ़ सकती थी। इसी से अगली दोपहर घर भर का भोजभात निपटते ही अपनी प्रिय विज्ञान की किताब उठाये छत पर चली आयी थी।
   छत का ये कोना उसे अपरूप प्रिय था। सबसे छिप कर उसने बाली दा के जाने कितने जासूसी उपन्यास यहां पढ़े थे। “कातिल कौन” ” दस बजकर दस मिनट” “खूनी खत” आदि कहानियों में कातिल को ढूंढने वाला छै फुटिया किसी फिल्मी हीरो से बढ़ कर दिखने वाला जासूस कर्मा अब उसके दिल में भी गुदगुदी मचाने लगा था…
     वैसे पढने का शौक उसे उसके पिता से ही तो मिला था, माँ तो अनपढ़ थीं। नौ दस वर्ष की उम्र में ही माँ ब्याह के यहाँ आ गयी थीं।
   माँ अक्सर उसे अपनी आपबीती सुनाया करती थीं। उसका जन्म भी बहुत बाद में हुआ था, और जब वो महज सात साल की थी उसके पिता को भयानक रोग राजयक्ष्मा ने जकड़ लिया था।
   उसकी दादी उसे राजयक्ष्मा की भी कहानी सुनाया करती थी ये भयानक रोग चंद्रमा को हुआ था क्योंकि वो अपनी बाकी पत्नियों की जगह रोहिणी पर अधिक आसक्त था इसी से कन्याओं की गुहार पर उसके ससुर ने उसे राजयक्ष्मा हो जाने का श्राप दे दिया था। इसी कारण चंद्रमा का आकार हर महीने घटता बढ़ता रहता था।
   आसमान में खिले चाँद को देख वो बचपन में सोचा करती की उसके बाबा भी मुरझाने के बाद फिर से खिल उठेंगे लेकिंन उसके बाल मन में उपजती सकारात्मकता को अंगूठा दिखाते उसके बाबा उस राजरोग का शिकार हो काल का ग्रास हो गए।
    अपने खाली समय का सदुपयोग वो अक्सर कालिदास, अश्वघोष, भास, शूद्रक, भवभूति, आदि को पढ़ कर करते। छोटी सी पारो के पल्ले कुछ नही पड़ता लेकिन वो अपने बाबा के उड़न खटोले से पलंग में उनके साथ दुबकी इन सारी रचनाओं को उनके मुहँ से सुना करती थी।
   
   उत्तर 24 परगना के सुदूर अंचल में स्थित ठाकुरगंवा के राय चौधरी परिवार में अब चौधरी उपनाम के अलावा कुछ नही बचा था। किसी समय बांग्लादेश से आये शरणार्थियों की मदद में अग्रणी रहे चौधरी जी के चार बेटों और छै बेटियों के परिवार के भरण पोषण में ही खेती खार निकल जाता, बची फसल बेच बाच कर और पुरानी जमींदारी के नाम पर ही गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी। सभी लड़कियों को यथायोग्य ब्याह कर चौधरी जी ने बेटों की भी नैया पार लगा दी थी। उन्होंने अपने समय में खूब पैसा कमाया था, लेकिन शरणार्थियों की मदद में उधार गये किसी रुपये का ब्याज तो छोड़ो मूल भी वापस नही ला पाए थे। चारों बेटों में से भी कोई भी एक कमाऊ नही निकला था , सबसे छोटा विश्वम्भर ही लिखने पढ़ने का शौकीन होने से अर्ज़ीनवीस हो गया था लेकिन रायचौधरी के परलोक गमन के पांचवे साल ही वो भी यक्ष्मा की भेंट चढ़ गए।
     भरे पूरे परिवार के बीच विश्वम्भर की पत्नी दुग्गा( दुर्गा)` और उनकी एकमात्र कन्या पारोमिता का पालन कठिन नही था। दिन दिन भर घर की सेवादारी में लगी दुग्गा पारो के हाथ जल्द से जल्द पीले कर देना चाहती थी।
   उसके तीनों जेठों के बच्चों का घर बस चुका था , उससे बड़े वाले जेठ के लड़के बाली से पारो का कुछ ज्यादा ही जुड़ाव था। पारो की कुशाग्र बुद्धि और पढ़ने की ललक देख अक्सर बाली उसके लिए कुछ ना कुछ पढ़ने को ले आता था, अपनी उम्र का सब पढ़ लेने के बाद अपनी पढ़ने की क्षुधा अक्सर वो बाली दादा के उससे छिपा कर रखे नावेल पढ़ कर पूरा कर लेती थी।

    इस साल उसे पंद्रहवाँ लगा था, कक्षा आठ में आते ही उसके अंदर भी कई तरीके के बदलाव आने लगे थे। इन बदलावों को महसूस करती दुग्गा ने अपने मन की बात अपनी बड़ी जेठानी के कानों में भी डाल दी थी। अब इस साल कैसे भी हो उन्हें इस लड़की के हाथ पीले कर इससे छुटकारा पाना ही था।

    रायचौधरी परिवार के सबसे छोटे पुत्र दिवंगत विश्वम्भर की इकलौती कन्या रत्न के लिए वर ढूंढने का काम पूरी चौकसी से चल निकला।
    दुनिया बहुत आगे बढ़ गयी थी। शहरी लड़कियां हॉट पैंट पहने जहाँ अपने गोल्डन रिट्रीवर या जर्मन शेफर्ड को घुमाती फिर रहीं थी , लड़के जहाँ चौदह पंद्रह  की उम्र से ही खुद को सिगरेट के कश और रात भर चलने वाली रंगीन पार्टियों में व्यस्त दिखाने की कोशिश में लगे थे वहीं ठाकुरगंवा में अब भी मध्यमवर्गीय परिवाओं की कन्याओं के बाल विवाह हो रहे थे।
    ऐसे ही किसी बाल विवाह की कार्ययोजना पारो के लिए भी रची जाने लगी थी।I

*****

   उस गांव से कुछ किलोमीटर दूर कलकत्ता के साल्ट लेक सिटी की पॉश कॉलोनी गुलमोहर में शिवदत्त मिश्रा के घर उनकी बहन बहनोई पधारे हुए थे…

  ” भाभी सच कहतीं हूँ , अगर यहां वरुण का रिश्ता पक्का हो गया ना तो आप सा खुशनसीब कोई नही होगा। लड़की के पिता क्षेत्र के विधायक हैं। सुनने में आ रहा इस बार पार्टी टिकट भी उन्हें ही मिलने वाला है।”

  “रमा जिज्जी इन सब बातों का लोभ नही है हमें। बस लड़की वरुण को भा जाए।”

  ” हां तो क्यों ना भायेगी भला? आप खुद देख लो तस्वीर। कैसा चान्द सा चेहरा है। भई इतने बड़े घर की लड़की है, देखो कैसी मक्खन सी उजली रखी है, बाल देखे कैसे लहरा रहे, बालों को धुलवाने भी पार्लर जाती है।

  ” इतने बड़े घर की लड़की को हम कैसे संभालेंगे रमा?”

  अबकी बार वरुण के पिता की आवाज़ थी जो अपनी बहन बहनोई के लाये मखमल से रिश्ते में भी मीन मेख निकाल ले रहे थे…

  ” अरे भाई साहब वरुण को कौन सा कलकत्ते में पड़े रहना है। उसका भी अमेरिका का वीजा लगने ही वाला है ना। शादी के बाद जहाँ वरुण वहाँ उसकी बीवी। हमें आपको चिंता करने की क्या ज़रूरत?

  ” फिर भी रमा! रिश्ता बराबर वालों में ही जमता है। कहाँ विधायक जी का परिवार और कहाँ मैं एक अदना सा बैंक क्लर्क।”

  ” भैया तुम होंगे अदना से क्लर्क लेकिन लड़का तुम्हारा गुणों की खान है। मेरे अनुज की शादी में ही विधायक साहब ने अपने वरुण को देखा था, और एक नज़र में ही उस पर रीझ गए थे। सुंदर भी तो बहुत है लड़का। जैसा रूप रंग वैसे गुण। पूरी शादी में जहाँ बाकी लड़के लड़कियों के आस पास मंडरा रहे थे हमारा वरुण इधर से उधर बस काम में लगा था। लड़कियां तो छोड़ो जाने कितनी माओं ने उसमें अपना भावी जामाता देख लिया होगा ना पूछो। सात रिश्ते तो वहीं खड़े खड़े में आ गए थे।
   वो तो क्या है , हमारे मुहल्ले में ही विधायक जी का पहले रहना था इसी से इनकीं तगड़ी जान पहचान है , इसी कारण तो इनके एक बुलावे पे दोनों पति पत्नी भागते चले आये थे हमारे अनुज के ब्याह में।
   वहीं वरुण पर नज़र पड़ी और दोनो को ही हमारा सजीला लड़का भा गया।
  अब भैया जब सामने से होकर रिश्ता आ गया है तो अब तुम ज्यादा ना नुकुर ना करो। कम से कम लड़का लड़की को मिल तो लेने दो।”

   रमा की बातों में सच्चाई थी, वरुण वाकई ऐसा लड़का था जिसे देख कर कोई उस पर जितना रीझता उससे बात कर उससे मिल कर पूरी तरह ही उसका मुरीद हो जाता।

    रमा की समझाइश रंग लाई और रविवार का दिन तय हुआ लड़के और लड़की के मिलने के लिए।

    इंजीनियरिंग करने के बाद वरुण कोलकाता में ही किसी सॉफ्टवेयर मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहा था। तेईस का हो चुका था और उसकी मैग्नेटिक पर्सनैलिटी और काम के प्रति उसकी लगन से प्रभावित उसके बॉस जल्दी ही उसका स्थानांतरण अमेरिका में पदोन्नति के साथ करने की सोच चुके थे।
   घर पर अपने लिए देखे जा रहे रिश्तों से उसे भी कोई परहेज न था, बल्कि अब वो भी शादी के लिए तैयार होने लगा था।

   वरुण के ऑफिस से वापस आते ही रमा बुआ ने उसे खींच कर अपने पास बैठा लिया…

   ” कैसा है बंटी?”

   बुआ जी फूफा जी को प्रणाम कर वो भी अपना लैपटॉप टेबल पर रख एक ओर बैठ गया। उसे पानी का ग्लास पकड़ा कर उसकी माँ ने उसकी छोटी बहन रोली को उसके लिए चाय बनाने रसोई में भेज दिया।
  
   ” ठीक हूँ बुआ जी। आप बताइए कैसे हैं आप सब। अनुज कैसा है, कब जा रहा दिल्ली ?”

  ” बस बेटा अनुज और बहू घूम फिर कर वापस आ जाएं उसके बाद दिल्ली निकल जाएंगे। ये प्राइवेट कंपनी वाले छुट्टी भी कहाँ देते हैं ज्यादा। अपनी ही शादी में मेहमानों सा आया था लड़का।
   अब तो बस तेरे भी फेरे हो जाएं तो भैया भाभी के साथ हम दोनों भी तीर्थ कर आएंगे।”

   अपनी ही शादी की बात सुन वरुण झेंप गया। वहाँ से उठने ही वाला था कि रोली ने आकर उसके हाथों में चाय पकड़ा दी।

    चाय पकड़े पकड़े ही वो खड़ा हो गया..

  “मैं ज़रा फ्रेश होकर आता हूँ माँ! ” माँ भी अपने शर्मीले के गुणों को जानती थी मुस्कुरा कर हां बोल वो अपनी नंद से बातों में लग गयी।

   सीढियां चढ़ अपने कमरे में पहुँच वरुण ने चाय टेबल पर रखी और बाथरूम में घुस गया। फ्रेश होकर निकलते में रोली दूसरी कप चाय बना कर ले आयी थी।
   टेबल पर चाय के कप के नीचे ही एक तस्वीर रखी थी। चाय का प्याला उठाते ही वरुण की नज़र उस तस्वीर पर चली गयी। बालों को एक ओर से सामने किये हुए गोरी सी लड़की तस्वीर में मुस्कुरा रही थी। तस्वीर मॅट्रिमोनी के लिए ही खिंचवाई हुई लग रही थी। वरुण के जीवन में आज तक कोई लड़की क्या उसकी परछाई तक नही आई थी इसी से उसे इस तस्वीर में ना पसंद करने लायक कुछ नही दिखा।
      उसने तस्वीर एक बार हाथ में उठा कर गौर से देखी और वापस वहीं रख चाय लिए बालकनी में चला गया…

   ” कैसी लगी भाभी? “

   रोली का चहकता हुआ सवाल हवा में उड़ गया, दूर कहीं बजती कृष्ण लहरी सुनता वरुण
    अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं,
    राम नारायणं जानकी वल्लभम ।। में खोया हुआ था।

   ” ओह्ह भाई आप ही से पूछ रहीं हूँ, एक तरफ तो आप खुद को नास्तिक कहते हो दूसरी तरफ भजन सुन के खुद को ही भूल जाते हो। क्या है ये।”

   हंसते हुए वरुण ने अपनी बहन के माथे पर एक चपत लगाई और बाहर घुप अंधेरे में चमकती बड़ी बड़ी मीनारों की रोशनी देखने लगा

   ” नास्तिक ही हूँ मैं। मुझे ना मॉम के लड्डू गोपाल पर कोई विश्वास नही है और ना ही उनके किये सत्यनारायण भगवान के व्रत पूजन पर। मुझे बस कोई कोई भजन सुनना अच्छा लगता है समझी छुटकी।
और भगवान को ना मानने का ये तो मतलब नही की मैं उनके भजन भी नही सुन सकता..
    मुझे तो सारे फिल्मी भक्ति गीत बड़े पसंद है
  “जय हो जय हो शंकरा आदि देव शंकरा” हो या “आया तेरे दर पे दीवाना ”  या फिर मुहम्मद रफी का गाया ” शिरडी वाले साईं बाबा आया है तेरे दर पे खयाली।”

   “बस बस समझ गयी, तुम्हें तो तुम्हारे पैदा होने के पहले के ही गाने ज्यादा पसंद है। वो कौन सा गाना है जो चाची के घर के पास वाले मंदिर में जाकर सुना करते थे तुम भाई।”

   वरुण ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा” तुझे अब भी याद है , अरे इतने बचपन की बात! “

  “कैसे याद नही रहेगा भाई। हर गर्मी की छुट्टी में चाची के घर जाना और शाम होते ही तुम कहीं भी रहो उस गाने को सुनने भाग कर वापस आंगन में चले आना। कौन सा गाना था वो?

” मदद करो संतोषी माता ! दर्शन दो संतोषी माता।”

   वरुण के बताते ही दोनो भाई बहन हंसते मुस्कुराते भीतर चले आये। दोनो की बातों के बीच कब हाथ में थमी तस्वीर सरक कर नीचे गिर गयी दोनो का ही ध्यान नही गया।

  क्रमशः

aparna…..



   
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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