जीवनसाथी – 111

बाँसुरी की गोद भराई


जीवनसाथी -111



बाँसुरी ने जैसे ही अपने कमरे से बाहर कदम रखा उसकी आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं…..
    उसके सामने पूरे रास्ते गुलाबों की पंखडियाँ बिखरी पड़ी थी…
   एक तरफ फूलों से सजी पालकी तैयार रखी थी। पालकी के कहारों की जगह पर प्रेम, विराट और बाँसुरी के ताई जी के दोनों बेटों के साथ ही रेखा भी खड़ी थी।
  बाँसुरी आश्चर्य से भरी उन सभी को देखती खड़ी ही रह गयी….

    वो आगे कदम बढ़ाने ही वाली थी कि उसके ताई के बेटे उसके भैया आगे चले आये। अपनी बहन का हाथ पकड़े उन्होंने उसे आगे ले जाकर पालकी में बैठा दिया…

    रेशमी तोशक के ऊपर भी हर तरफ गुलाबी पंखुड़ियां बिखरी पड़ी थीं।
  मुस्कुरा कर बाँसुरी अंदर बैठ गयी। वो बैठी ही थी कि पालकी का रेशमी पर्दा ज़रा सा खुला और निरमा का चेहरा बाँसुरी को नज़र आ गया…
     निरमा ने झुक कर बांसुरी के माथे पर छोटा सा तिलक किया और उसकी आरती उतार कर साथ खड़ी सहायिका को थाल पकड़ा दी…

   नज़र का काला टीका बाँसुरी के कान के पीछे लगाने के बाद निरमा ने पालकी वापस ढाँक दी।
    प्रेम विराट और ताई के बेटों ने बहुत संभाल कर धीरे से उस चंदन डोली को उठा लिया….

  पालकी अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ी। बाँसुरी को वापस अपनी शादी वाली रात याद आने लगी थी….
ऐसे ही पालकी में तो वो स्टेज तक लायी गयी थी।

   यहाँ भी वो उन रेशमी पर्दों से बाहर देख पा रही थी…

   आस पास लोगों को देख उसे समझ आ गया था , कि महल ने इस बार काफी बड़ा आयोजन कर रखा था….

   पालकी आखिर एक जगह जाकर रुक गयी…

  पालकी में से बाहर आने की वो सोच ही रही थी कि रुपा भाभी और जया ने उसके पर्दे खोल दिये और उसका हाथ पकड़ कर उसे बाहर उतार लिया…

   सुनहरी और हरे रंग की पोशाक में बाँसुरी बहुत खिल रही थी।
  उसने सामने देखा, लोगों का हुजूम उसे देखते ही खड़ा हो गया। वो धीरे से अपने सर का घूंघट संभाले आगे बढ़ने लगी… दोनो तरफ खड़े लोग उस पर फूल बरसाते रहे।
  रूपा भाभी और जया उसे साथ लिए मंच तक चले आये।
   वो पैर आगे बढ़ा कर सीढ़ियों पर रखने ही वाली थी कि उसका संतुलन बिगड़ा और गिरने से पहले ही उसे दो मज़बूत बाहों ने थाम लिया।

  उसका सन्तुलन बिगड़ता देख शेखर फौरन अपनी जगह से खड़ा होकर उस तक पहुंचता की राजा अजातशत्रु ने अपनी हुकुम को अपनी बाहों में थाम लिया।

  उसे साथ लिए राजा मंच पर ले चला।
मंच पर लगे सोफा के पास ही बाँसुरी की माँ पिता और ताई के साथ ही बाकी रिश्तेदार खड़े थे। सबको एक साथ खड़े देख बांसुरी आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी में डूब गई। वो जाकर अपनी मां के सीने से लग गई एक-एक कर सब से मिलते हुए उसके चेहरे की मुस्कान जा ही नहीं रही थी। उसने राजा की तरफ शर्माते हुए देखा और आंखों में आंखों में उसे धन्यवाद अर्पित कर दिया। राजा ने भी पलके झुका कर अपनी हुकुम का अभिवादन कर दिया…

” आपने बताया ही नहीं मां!-आप सब यहां आ रहे हैं?

” लाड़ो! कुंवर सा ने हम लोगों को भी तो मना कर दिया था। वह तुझे सरप्राइस देना चाहते थे। इतनी किस्मत वाली है मेरी गुड़िया रानी । अब जल्दी से एक नन्हा सा राजकुमार ले आ और सब कुछ अच्छे से हो जाए , फिर तुम दोनों को साथ ले कर माता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाऊंगी।”

बाँसुरी ने शरमा कर धीरे से हाँ में सर हिलाया और चुपचाप नीचे बैठ गई। पंडित जी ने विधि विधान से पूजा पाठ प्रारंभ कर दी।

पूजा समाप्त होते ही पंडित जी ने एक-एक कर महल की सभी महिलाओं को आगे बुलाना शुरू कर दिया…

सबसे पहले काकी साहेब यानी पिंकी की मां आगे चली आई । सहायिका के हाथ से गहने का डिब्बा लेकर उन्होंने बांसुरी की गोद में रखा इसके साथ ही फल मिठाई नारियल सब कुछ बांसुरी की गोद में डालकर उन्होंने उसे मन भर कर आशीर्वाद दे दिया।

माथे पर छोटा सा सिंदूर का तिलक लगाकर उसके कान में चुपके से कुछ कहा और मुस्कुरा कर एक ओर खड़ी हो गई।
बांसुरी ने झुककर उन से आशीर्वाद लिया और मुस्कुराती बैठी रही…
  
मायके और ससुराल की महिलाएं एक-एक कर आती रही और बांसुरी की गोद में मिठाई फल मेवे मिष्ठान्न गहने जेवर डालकर उसे आशीर्वाद देती रहीं।

रूपा भाभी जया, रेखा, पिंकी इन सब के निपटते ही रूपा ने निरमा को भी खींच कर आगे खड़ा कर दिया। राज महल की गोद भराई में निरमा संकोच वश एक तरफ पीछे खड़ी थी। उसे लग रहा था रानी की गोद भराई करने की उसकी औकात है या नहीं लेकिन रूपा उसे दोनों कंधों से पकड़ कर सामने ले आई ।

निरमा भी अपनी प्यारी सहेली के लिए एक तोहफा लेकर आई थी। उसने बांसुरी की गोद में फल मिठाइयां डालने के बाद अपने पर्स से एक मखमली डिब्बी निकाली और उसमें से एक पतली सी चेन निकालकर बांसुरी के गले में डाल दी।
चेन में लगे छोटे से लॉकेट में राजा की तस्वीर बनी हुई थी। बांसुरी ने तोहफा देखा और भावुकता में उसकी आंखों से दो बूंदें छलक पड़ीं। उन आंसुओं में छिपे प्रेम को देख भावुकता और कृतज्ञता से निरमा की आंखों से भी दो बूंद आंसू छलक पड़े।

“अरे कोई मुझे भी तो बताओ कि आप सब बांसुरी के कान में कह क्या रही हो?”

राजा के सवाल पर रूपा जया निरमा सभी राजा को छेड़ने लगीं….

” यह बातें आपसे कहने की नहीं है। वैसे तो गोद भराई की रस्म में ज्यादातर औरतें ही सम्मिलित होती है, लेकिन आपकी जिद थी कि आप अपनी हुकुम की गोद भराई खुद देखना चाहते हैं, तो आइए अब आप भी गोद भर दीजिए।

राजा भी मुस्कुरा कर आगे बढ़ गया।

मुस्कुराते हुए बांसुरी को देखते हुए उसने भी वहां रखे सारे सामान को बांसुरी की गोद में डाला और वापस उसे देख छेड़ने लगा…

” मैं तो आपके लिए कोई तोहफा ही लाना भूल गया हुकुम । कल रात तक काम में इतना व्यस्त था कि दिमाग से उतर गया।”

बांसुरी ने भी हंसकर राजा को देखा

“कोई बात नहीं साहब! आपसे तो मैं कभी भी तोहफा ले लुंगी। “

बाँसुरी ने मुस्कुरा कर उसे देखा कि तभी समर भी वहाँ चला आया…

“तोहफा मैं लेता आया हूँ हुकुम आपकी तरफ से।”

और आगे बढ़ कर उसने कुछ पेपर्स राजा के हाथ में रख दिए….

  राजा ने पेपर्स पर नज़र डाली और मुस्कुरा उठा। बाँसुरी के ट्रांसफर के पेपर्स थे यानी  उसे अब वापस दून जाने की ज़रूरत नही थी।

मुस्कुराकर राजा ने वह पेपर बांसुरी की गोद में डाल दिया…

” अब हमारी हुकुम को हमसे दूर जाने की जरूरत नहीं है!”

समर भी मुस्कुराने लगा….
बांसुरी ने समर की तरफ देखा- ” आप कोई गिफ्ट नहीं लाए मेरे लिए?”

समय ने मुस्कुराकर सिर झुका लिया-” मैंने तो अपने पूरे के पूरे राजा साहब आप को तोहफे में दे रखे हैं! रानी हुकुम इससे बढ़कर कीमती मैंने अपने जीवन में और कुछ नहीं देखा। और जो सबसे कीमती चीज देखी वह आप के हवाले कर दी अब इससे कम क्या तोहफा दे आपको?”

“बस आप लोगों से कोई बातें बनवा ले। हमारे साहेब की तरह ही आप भी बातें बनाने में बहुत एक्सपर्ट हो गए हैं। आप का तोहफा ड्यू रहा। समय आने पर मांग लूंगी, याद रखिएगा।”

“जी रानी साहेब बिल्कुल याद रखूंगा!”

राजा के कान में धीरे से कुछ कहकर समर वहां से निकल गया।
  कार्यक्रम जोर-शोर से शुरू था गोद भराई की रस्म के साथ ही गाना बजाना भी शुरू हो गया था।


    सोलह सिंगार करके गोदी भराई ले,
सोलह सिंगार करके गोदी भराई ले,
सइयां, सइयां, सइयां, सइयां,
सइयां से खेली बहुत अब छोटू को खिलाई ले,
सोलह सिंगार करके…


    एक के बाद एक गोद भराई गीतों में बेहतरीन प्रस्तुतियां चलती रही।
रूपा और जया ने सहायिकाओं से अपना और बांसुरी का खाना वही मंगवा लिया । इतनी भीड़ भाड़ के बीच बांसुरी से हालांकि कुछ भी खाया नहीं जा रहा था। दूसरी बात उसे यह भी लग रहा था कि राजा वहां से निकलना चाह रहा है।
   समर ने जाते वक्त जाने क्या कहा राजा के कान में कि उसके बाद से राजा का वहां मन ही नहीं लगा…
आखिर राजा ने बांसुरी की तरफ देखकर आंखों ही आंखों में उससे वहां से जाने की अनुमति मांगी और बिना खाए ही निकल गया।

   *****

तेज कदमों से चलते हुए राजा कार्यक्रम क्षेत्र से निकलकर अपने ऑफिस की तरफ बढ़ चला उसी वक्त विराज अपने कमरे से निकलकर कहीं जा रहा था राजा से टकराते टकराते बचा….

“आराम से चलो विराज !- अभी उठे हो सो कर?

“हां! जिसकी रातों की नींद गायब हो वह सुबह तो देर से ही सो कर उठेगा | सबकी किस्मत तुम्हारी जैसी नहीं होती है ना अजातशत्रु!”

विराज को कोई जवाब देने का राजा का मन नहीं था| वह चुपचाप ऑफिस की तरफ निकल गया और विराज अपने दोस्तों की मंडली से मिलने निकल गया|

ऑफिस के बाहर ही दरबान खड़ा था। राजा अजातशत्रु के वहां पहुंचते ही उसने बड़े अदब से झुक कर प्रणाम किया और दरवाजा धीरे से खोल दिया। अजातशत्रु के अंदर पहुंचते ही उसकी आंखें आश्चर्य से खुलकर चौड़ी हो गई, और उसने तुरंत जाकर आदित्य को अपने सीने से लगा लिया…

” कहां चले गए थे भाई? तुम्हारी बहुत फिक्र हो रही थी!”

आदित्य को पहली बार किसी ने इस तरह प्यार दिया था। उसकी आंखें छलक उठी। अजातशत्रु के सीने से लगे हुए उसने अपने बड़े भाई को और भी जोर से जकड़ लिया।

कुछ देर इसी तरह खड़े रहने के बाद वह अलग हुआ और उसने झुक कर राजा के पैर छू लिये। तफ़सील से बैठकर उसने दून से भागने से लेकर अब तक की सारी कहानी अजातशत्रु को कह सुनाइ।

केसर की हालत अब भी पूरी तरह से तो नहीं सुधरी थी, लेकिन वह पहले से अब काफी बेहतर थी। उसे आदित्य ने एक आरामदायक सोफे पर टेक लगा  कर बैठा दिया था।

“आप कैसी हैं केसर ?”

राजा ने केसर की तरफ देखा और शर्मिंदगी से केसर ने आंखें झुका ली आखिर वह किस तरह राजा से आंखें मिलाती?

राजा का नुकसान करने के लिए जाने उसने क्या-क्या नहीं किया था। ठाकुर साहब ने उसे एक मोहरा बनाकर राजा की जिंदगी में जहर घोलने को भेज दिया था। राजा और बांसुरी को अलग करने के षड्यंत्रों के अलावा भी उसने बहुत कुछ किया था। और इस सब के बाद भी यह राजसी जोड़ी उसकी जान बचाने के लिए लगी हुई थी। उसे अब अपनी तुच्छ बुद्धि पर तरस आने लगा था। क्यों उसने कभी भी सही और गलत को नहीं पहचाना ? क्यों उसने समय रहते ही ठाकुर साहब से कन्नी नहीं काटी? क्यों उसने इतने दिनों तक ठाकुर साहब की बातें मानी।

देर से ही सही उसे अकल तो आ ही गई थी। आखिर आदित्य का साथ उसे सही रास्ते पर ले ही आया ।उसने तो आदित्य को फंसाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
ठाकुर साहब तो यही चाहते थे कि भाई-भाई आपस में एक दूसरे के दुश्मन हो जाए! और पूरा परिवार एक दूसरे को मारकर तबाह हो जाए। उसने इस जलती आग में घी का काम किया था । लेकिन बावजूद आज राजा अजातशत्रु ही नहीं राजकुमार आदित्य भी उसकी जान बचाने में लगे हुए थे। तो क्या बदले में उसका कोई फर्ज नहीं बनता था उनके प्रति।

अपनी जगह से खड़े होकर वह भी राजा अजातशत्रु तक चली आई और उनके पैरों पर झुक गई….

” अरे अरे यह क्या कर रही है आप? हमारे यहां औरतें इस तरह पैरों में नहीं झुकती उठिए बाईसा!”

“आप हमें इतना सम्मान मत दीजिए राजा साहिब !हम इस के अधिकारी नहीं हैं। बहुत पाप किए हैं हमने अपने जीवन में बहुत गलतियां की हैं ।और अब उन गलतियों के पश्चाताप का समय आ गया है।”

राजा ने केसर को हाथ पकड़ कर सामने सोफे पर बैठा दिया और पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“राजा साहेब हम बातों को घुमा कर और उलझायेंगे नहीं। हम साफ़ सपाट शब्दों में कहना चाहते हैं, कि आज तक हमने जो भी गलतियां की हैं उनके पीछे हम खुद हैं।
क्यों हमारा दिमाग सही और गलत के बीच भेद नहीं कर पाया? क्यों हम ठाकुर साहब के कहने में आ गए? आखिर क्यों हमने उनकी हर गलत बात को मंजूर किया? असली दोषी तो हम ही हुए ना ! और अब हम अपनी सारी गलतियों को सुधारना चाहते हैं।
अब तक तो आप जान ही गए होंगे कि रेखा हमारी छोटी बहन है और वह ठाकुर साहब की बेटी नहीं है! ठाकुर साहब ने हमारे माता-पिता से रेखा को गोद ले लिया था और उसके बाद रेखा की जिंदगी को बेहतर बनाए रखने की शर्त पर वह हमसे कितना कुछ करवाते रहें! उनकी शर्तें तो खैर बहुत सारी होती थी, लेकिन अब उन पुरानी बातों का क्या रोना? अब हम आपसे सिर्फ यह कहना चाहते हैं। ठाकुर साहब की पत्नी की मौत में बांसुरी का कोई हाथ नहीं है हम खुद इसके चश्मदीद गवाह हैं।
जैसे ही ठाकुर साहब की पत्नी का केस फाइल होता है हम गवाह के तौर पर वहां जरूर जाएंगे, और ठाकुर साहब और उनकी पत्नी का सारा कच्चा चिट्ठा सबके सामने खोल देंगे।
आप निश्चिंत रहें राजा साहेब अब आपकी बांसुरी को हम कुछ नहीं होने देंगे।

“बहुत-बहुत शुक्रिया तुम्हारा केसर ।उनका केस लग चुका है । और परसों ही सुनवाई है हमें आज रात ही दून के लिए निकलना होगा।”

समर की बात पर केसर ने समर की तरफ देखा और एक बार फिर उसकी पलकें झुक गई- ” समर तुम भी हमें माफ कर देना हमने जो सब किया…

समर ने केसर की बात आधे में ही काट दी..-” कोई बात नहीं केसर ! अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं । हम सब समझते हैं तुम्हारी भी कुछ मजबूरियां थी।
वह कहते हैं ना सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। बस वही बात तुम्हारे साथ भी है। अब तुम हम सबकी नजरों में भूला नहीं हो।
तुमने अपनी गलतियां मान ली और तुम अपनी गलतियों का पश्चाताप भी करना चाहती हो यही सबसे बड़ी बात है।
वैसे तो अब सब सही ही होता दिख रहा है, लेकिन जाने क्यों मेरे दिमाग की घंटी बार-बार इस बात पर बज रही है कि ठाकुर साहब का कोई अता पता नहीं चला है। उन्हें अपनी पत्नी से भी ऐसा कोई प्रेम तो था नहीं । उन्होंने खुद ही अपनी पत्नी के ऊपर हमला करवाया था। यह भी मालूम चल चुका है और इसी सब को साबित करने के लिए केसर तुम्हारा कोर्ट में पेश होना बहुत जरूरी है।”

“तुम्हारी बात बिल्कुल सही है समर ! हम सब आज ही दून के लिए निकल जाएंगे! पर फिर भी मैं यह जानना चाहता था कि आखिर तुमने मुझे और केसर को ढूंढ कैसे निकाला?

उसी वक्त युवराज का सहायक राजा को बुलाने चला आया। कोई बहुत जरूरी बात होने से ही युवराज इस तरह से मीटिंग के बीच से राजा को बुला सकता है यह सोचकर राजा तुरंत वहां से निकल गया।

“आदित्य सा बस यही मत पूछिए बहुत मुश्किल था मेरा आपको और केसर को ढूंढना।
आप दोनों के ही फोन बंद थे हालांकि फोन आप लोगों के साथ होते तो फिर भी किसी तरह से मैं ट्रैक कर लेता लेकिन फोन भी आपके पास नहीं थे ! सबसे पहले मैंने यही गणित लगाना शुरू किया कि, अगर दून से आप उस वक्त पर भागेंगे तो किस दिशा में भाग सकते हैं। मुझे लगा आप बस रूट की जगह ट्रेन रूट को फॉलो करेंगे, क्योंकि अगर आप ट्रेन में चढ़ते हैं तो ठाकुर साहब के गुंडों का लंबी सी ट्रेन में आप को पकड़ना मुश्किल होगा। उसकी जगह एक छोटी सी बस से निकलना आप लोगों के लिए ज्यादा सुरक्षित नहीं रहता। मैंने आप लोगों के भागने के वक्त से डेढ़ से दो घंटों के भीतर की सभी ट्रेनों को खंगालना शुरू किया। उन सारी ट्रेन रूट्स को पता करने के बाद मुझे सबसे करीबी ट्रेन मध्य प्रदेश जाने वाली लगी। और मैंने अपने जासूसों को उस रूट की ट्रेन के सभी छोटे स्टेशंस पर दौड़ा दिया । मुझे बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। आप जब भिंड में थे वहां भी मैं पहुंच चुका था, लेकिन मेरे पहुंचने से पहले ही ठाकुर के गुंडे वहां पहुंच गए और आपको वहां से निकलना पड़ गया।
बस उसके बाद तो मुझे यह समझ आ ही गया था, कि आप यहां से बहुत ज्यादा दूर नहीं गए होंगे। क्योंकि आपके वहां से भागते ही उन गुंडों को मेरे आदमियों ने पकड़ लिया था, और पुलिस के हवाले कर दिया था। तो मुझे पता चल चुका था कि केसर बाईसा को गोली लगी है बस उस जगह के आसपास की जगह पर आदमी दौड़ाने से मुझे आपके बारे में खबर मिल गई।
    हालांकि इस सब दौड़ भाग में भी मुझे महीना भर लग ही गया और उस पूरे महीने आपको और केसर सा को उस छोटी सी जगह में बिना किसी सुविधा के गुजारना पड़ा जिसके लिए मुझे बहुत खेद है। क्योंकि मैं इससे ज्यादा कुछ कर नहीं पाया आपके लिए।
आप दोनों का यूँ एक साथ मिल जाना हमारे लिए बहुत खुशी की बात है। आप नहीं जानते- आपके गायब होने के बाद से ही राजा साहब बहुत परेशान थे। किसी भी बात में उनका मन नहीं लग रहा था। आप जानते ही हैं कि राजा साहब चुनाव की तैयारियों में भी व्यस्त हैं । इसके साथ ही रानी साहब भी अब अपने पूरे दिनों से हैं। ऐसे में इन्हें अपने छोटे भाई की बहुत जरूरत थी। विराज का हाल तो आप जानते ही हैं उनसे किसी भी तरह की कोई उम्मीद नहीं है।”

समर की बात सुनकर आदित्य भी मुस्कुराने लगा । केसर की तरफ उसने नज़र डाली।
उसे वाकई उम्मीद नहीं थी कि इतने कम समय में महल उसे इतने प्यार से अपना लेगा।

“चुनाव की तिथि क्या है समर?”

उसके सवाल पर समर ने कुछ कागजात उसके सामने बढ़ा दिये…-” बस बहुत ही जल्दी!
नामांकन भरा जा चुका है। और चुनाव की सारी तैयारियां अपने चरम पर है! ठीक पंद्रह दिन बाद चुनाव होने हैं। अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। सिर्फ इन दो हफ्तों में हमें ऐसा कुछ करना है कि जितनी सीट पर भी हुकुम और उनके कैंडिडेट खड़े हैं, वह सीटें हम भारी मतों से जीत सकें।

“बेशक हम ही जीतेंगे। एक बात और हम यह भी जानना चाहते थे समर! की इतनी कम सीट्स में जीतने के बावजूद भैया किसी भी ऊंचे पद को पा तो नहीं पाएंगे। क्योंकि सत्ता में तो वही पार्टी आएगी जिनके सबसे ज्यादा उम्मीदवार जीतेंगे और हमारे उम्मीदवार पक्ष और विपक्ष दोनों के ही उम्मीदवारों से आधे से भी कम है संख्या में।”

“आप सही कह रहे हैं आदित्य! इसीलिए चुनाव में मैं ऐसी तैयारी कर रहा हूं कि हमारे राजा साहब भारी मतों से जीतेंगे भी और बाकी के पक्ष और विपक्ष और बाकी पार्टियां बुरी तरह से हारेंगी भी।
दोनों पार्टी में अगर जीत हार का फैसला नहीं हो पाता है तब उसका पूरा फायदा हुकुम की पार्टी को मिलेगा और बस यही मेरी योजना है।
    मतदान ऐसे संपन्न होना चाहिए कि हुकुम की पार्टी के सभी लोग जीते और बाकी पार्टी के लोग ऐसे आंकड़ों से जीते कि जिस भी पार्टी को सत्ता में आना हो उसे हुकुम से हाथ मिलाना ही पड़े, और उस वक्त हुकुम को सर्वश्रेष्ठ पद देने की शर्त पर ही हम अपने जीते हुए कैंडिडेट के साथ उन से हाथ मिलाएंगे।”


“कहना तो तुम्हारा सही है समर लेकिन क्या भाई साहब इस बात के लिए तैयार होंगे?”

“राजा अजातशत्रु यानी हमारे हुकुम इस बात के लिए कभी तैयार नहीं होंगे। उन्होंने आज तक अपनी जिंदगी में हर जंग पूरी इमानदारी से जीती है, और आज भी वह मेरी इस बात के लिए तैयार नहीं होंगे। लेकिन इसीलिए मैं उन्हें यह सब बिना बताए करने वाला हूं आपसे भी उम्मीद करता हूं कि आप मेरी यह बात हम दोनों के बीच ही रखेंगे।
   फिलहाल राजा जी से कुछ भी कहने का कोई मतलब नहीं है अभी तो पंद्रह दिन बाकी है। उसके बाद देखते हैं आगे की रणनीति क्या होती है?
अभी तो नहीं लेकिन जीतने के बाद किसी भी तरीके से मुझे राजा साहेब को इस बात के लिए मनाना ही पड़ेगा।”


“आप बिल्कुल सही कर रहे हैं हम भी आपके पक्ष में हैं।

केसर की बात पर समर और आदित्य दोनों ने ही सहमति दे दी….-“अब आप दोनों भी कुछ खा पी लीजिए ! बहुत थके हुए हैं आप लोग अब अपने कमरे में जाकर आराम कर लीजिए। इस महल में अब आप पूरी तरह सुरक्षित हैं । विराज सा को अब तक आप दोनों के यहां पहुंचने की जानकारी नहीं दी गई है। हालांकि मैं यह जानता हूं कि विराज कितना भी बुरा हो लेकिन उसे अपनी और ठाकुर साहब के बीच के रिश्ते के बारे में मालूमात नहीं है । और इसीलिए ठाकुर साहब के गुंडों से भी उसका कोई लेना-देना नहीं है। पर फिर भी आप दोनों की सुरक्षा मेरे जिम्मे है। आप लोग ऑफिस के सामने वाले दरवाज़े से निकल कर अपने कमरों की ओर जाने की जगह इसी ऑफिस में पीछे की तरफ एक खुफिया दरवाजा है जो अंदर ही अंदर महल के सभी कमरों से जुड़ा हुआ है, वहाँ से अंदर जाएंगे।
उस दरवाजे से होकर आगे बढ़ते ही चौथे नंबर का कमरा आपका रहेगा आदित्य और सातवें नंबर पर आपका कमरा है केसर सा!
आप दोनों का खाना पीना और बाकी सारी आप की सुविधाओं की चीजें आपके कमरों में मेरे बहुत खास और विश्वासपात्र नौकरों के हाथ से मैं भिजवा दूंगा।
  अब मैं चलता हूं मुझे भी कुछ जरूरी काम है और इससे साथ ही आप लोग भी थोड़ा आराम कर लीजिए….


समर की बात मानकर आदित्य और केसर खुफिया दरवाजे की तरफ़ बढ़ गये समर भी साथ ही गया ।
ऑफिस में पीछे की तरफ एक बड़ी सी दीवार में बहुत ही बड़ी बुक्शेल्फ थी जिसमें किताबें भरी हुई थी । उस बुक्शेल्फ के एक तरफ एक छोटा सा ऐसा बटन था जो आसानी से नजर नहीं आ रहा था उस बटन को हल्के से दबाते ही वह बुक्शेल्फ एक तरफ को खिसक गई और सामने एक दरवाजा नजर आने लगा । उस दरवाजे को खोलते ही एक छोटा सा गलियारा बना हुआ था। समर वहां से आदित्य और केसर को लेकर अंदर चला गया। उन दोनों को उन के कमरों में छोड़कर वह बाहर निकल ही रहा था कि उसके फोन पर किसी का मैसेज चला आया- मैसेज पिया का था ….

” आजकल कहां भटक रहे हैं मंत्री जी नजर ही नहीं आते?”

“आप देखना चाहे तब तो नजर आएंगे?”

“मतलब इसमे भी मेरी गलती है?”

“मैंने ऐसा तो नहीं कहा।”

“तो जो कहा उसका क्या मतलब है?”

“इसका मतलब यह है कि आप इस वक्त कहां मिलेंगी मैं आ रहा हूं?

“क्या बात है मुझसे मिलने आ रहे हो?”

“नहीं मिलने नहीं तुम्हारी खबर लेने आ रहा हूं।”

“क्या मतलब?”

“आकर समझाता हूं पहले बताओ कहां मिलोगी?”

“अस्पताल के आगे वाले कॉफी शॉप पर आ जाओ!”

एक छोटा सा “हम्म” करके समर ने फोन जेब में डाला और बाहर निकल गया ।समर से बात करते हुए पिया को लगा भी कि समर और दिनों की तरह चुलबुला और मस्तीखोर लगने की जगह कुछ ज्यादा ही गंभीर लग रहा था। पिया को जाने क्यों ऐसा लगा जैसे समर उससे कुछ नाराज सा है। फिर भी अपने मन को समझा कर पिया कॉफी शॉप की ओर निकलने के लिए अपने केबिन से बाहर आ गई।

अस्पताल से वो निकल ही रही थी कि एक अर्जेंट डिलीवरी का केस चलाया। केस पास के ही गांव का था ।
गांव की किसी दाई ने बच्चा पैदा करवाने की कोशिश करी थी।
    गांव पर काम करने वाली दाईयां वैसे तो इन सब कामों में अनुभवी और कुशल होती हैं ,लेकिन उस दिन बच्चे का सिर बाहर नहीं आ पाने के कारण उस दाई ने जो भी दवाइयां प्रयोग की उसके कारण प्रसूता की हालत बिगड़ती चली जा रही थी।
बच्चा सही तरह से निकल नहीं पा रहा था और प्रसूता का दर्द के मारे बुरा हाल था। आनन-फानन में उसे लेकर गांव के लोग भागते हुए अस्पताल पहुंचे थे। उस प्रसूता की हालत देखकर पिया का उसे जूनियर डॉक्टर के सहारे छोड़ कर निकलने का मन नहीं हुआ और वह तुरंत अपना एप्रिन पहने ऑपरेशन थिएटर की ओर भाग चली।
   केस कॉम्प्लिकेटेड हो गया था। दर्द ले लेकर सात से आठ घंटों में प्रसूता पूरी तरह से थक चुकी थी। और अब उस पर बेहोशी छाने लगी थी। बच्चे का सिर इस तरह से फंसा हुआ था कि वो न तो सामान्य प्रसूति से निकल सकता था और ना ही ऑपरेट करके।

केस को देखकर पिया के भी हाथ-पांव फूल गए थे।

एक बार को उसे लगा कि अपने कच्चे अनुभव से क्या वह इतनी जटिल प्रसूति करवा पाएगी? लेकिन फिर भगवान का नाम लेकर उसने हाथ जोड़ें और अपने स्टाफ की सहायता से काम में जुट गई।
लगभग एक डेढ़ घंटे के अथक प्रयास के बाद एक नन्हा सा रोता हुआ बालक पैदा हो गया। पूरे अस्पताल में खुशी की लहर दौड़ गयी।
उस महिला के परिजनों की जान में जान आयी। वह दाई माँ जो घबरा कर एक किनारे जमीन पर चुपचाप बैठे भगवान का नाम जप रही थी, खुश होकर पिया के पैरों पर गिर पड़ी। अगर मां और बच्चे को कुछ भी हो जाता तो उस दाई का पूरा नाम खराब हो जाना था पिया ने उसे उठाकर उसके कंधे पर थपकी दी और उसे सामने कुर्सी पर बैठा दिया।

उस औरत के परिजनों से बात कर और उन्हें सारी बातें अच्छे से समझा कर पिया एक बार फिर कॉपी शॉप के लिए निकल गई।
निकलते हुए उसे ध्यान आया कि उसे इस सारे झंझट और फसाद में समर को फोन करके बताना तो याद ही नहीं रहा कि वह लेट हो जाएगी। उसने तुरंत अपने पर्स में से अपना फोन निकाला और समर को फोन लगाने के लिए फोन हाथ में लिया ही था कि देखा समर की पांच मिस कॉल मौजूद थीं। मुस्कुरा कर उसने समर का नंबर जैसे ही डायल किया नंबर व्यस्त बताने लगा।

दो तीन बार डायल करने के बाद भी समर ने फोन नहीं उठाया तो परेशान होकर पिया ने फोन अपने पर्स में डाला और कॉफी शॉप की तरफ निकल गई । जैसा कि उसे उम्मीद थी समर कॉफी शॉप पर मौजूद नहीं था। वहां पूछताछ करने पर पता चला कि कोई लड़का आधा पौना घंटा वहां किसी का इंतजार करता रहा और कॉफी पीकर कुछ समय पहले ही वहां से निकल गया।

पिया समझ गई कि वहां बैठ कर इंतजार करने के बाद जब उसने समर के द्वारा फोन लगाए जाने पर भी फोन रिसीव नहीं किया, तो झुंझला कर समर वहां से निकल ही गया होगा। जाहिर है वह इतना व्यस्त रहता है, ऐसे में उसका कितनी देर इंतजार करता? पिया ने अपना फोन वापस पर्स में डाला और समर के घर की तरफ निकल गई…….

क्रमशः

aparna ….










   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

49 विचार “जीवनसाथी – 111” पर

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