दहकते पलाश …

कुछ मोहब्बतें वक्त की मोहताज नही होतीं…

दहकते पलाश

बालकनी के ग्लास डोर के पास रखे कैनवास पर जंगलों में बेतरतीब दहकते पलाश उकेरते हुए माया इतनी मगन हो गयी थी कि सरु की लायी हुई दुसरी कॉफ़ी भी रखे रखे ठंडी हो गयी।

उसके टोकने पर जब ध्यान गया तब उसे एक और कॉफ़ी लाने बोल बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गयी, वही महीना, वही फ़ाग, वही सिन्दूरी पलाश … उसका कितना कुछ जुड़ा था इन सब से, और वैसे सोचा जाये तो कुछ भी नही जुड़ा था, बस कशिश का आसमान था और शिद्दत सी ज़मीन, पर किस्मत थी कि ना आस्माँ मिला ना ज़मीं ।।

उसे सब कुछ ऐसे याद है जैसे सब कल की ही बात हो, लगता ही नही कि पन्द्रह साल बीत गये उस होली को।
आज भी उस दिन की एक एक बात याद थी, सारा कुछ जैसे अब भी आंखों के सामने एक फिल्म की तरह चल रहा हो…..

कितनी चहल पहल होती थी उन दिनों उस मोहल्ले में। उसकी उम्र के ढ़ेर सारे बच्चे इधर उधर तूफान मचाए घूमते थे, और वो था इन सब का सरगना।
जाने कहाँ से ढूँढ ढूँढ के शरारतें लाता था, सारा मोहल्ला उसका सताया हुआ था,कभी किसी की छत पर सूखने वाले पापड़ चकनाचूर कर जाता, कभी किसी की पानी की टंकी में रंग घोल जाता, इन्हीं सारे बेमतलब के कामों में दिल लगता उसका, पढ़ाई लिखाई से दूर, अपने और अपनी मस्तियों में मगन ।
उसकी पक्की सहेली का भाई ना होता तो कभी उसका चेहरा तक ना देखती, पर ऐसा सोचना आसान था करना कठिन, क्योंकि उस निर्मोही को एक नज़र देखने के बाद कोई बिरला ही होगा जो उसका लुभावना चेहरा भूल सके, गोरे रंग पे काली बड़ी बड़ी आँखें और उनसे टक्कर लेता चौड़ा माथा, उसके लिये अक्सर माया की दादी कहा करती _” जे मिसराईन के घर कोई यक्ष गन्धर्व पैदा हुआ है, तभी हम मानुसों से नही निभे है इस खर्राट की। कितना हडकंप मचाए रखता है पर जे के लाने कितना भी गुस्सा हो मन में, इसकी मुस्कान देख सब उड़ जाती है बहुरिया।।
अगर कुछ पढ लिख जाये, नौकरी पा जाये तो कल अपनी माया के लिये हाथ पसार कर मिसराईन से इस छोरे को मांग लूंगी।”

” आप भी अम्मा, सुबह सुबह कलेस मचाई रहती हो, लक्षण देखें है रावण है पूरा, और फिर माया भी तो…..

माया की माँ ने तो बात वही खत्म कर दी पर उसके मन में कोई बीज जम ही गया था, जो होली के दिन खाद पानी पाकर बेल सा लहलहाने लगा था।।

सभी रंग गुलाल में डूबे थे, बस वही साफ सुथरी अपनी छत पर खड़ी मोहल्ले की भीड़ भाड़ देख देख कर हँस रही थी, तभी नीचे उसकी सहेलियों का झुंड गुज़रा और सब उससे नीचे आने का आग्रह करने लगे, सब की बात और थी पर उन सभी में उसकी पक्की सहेली रोली भी थी, उसकी बात काटना माया के लिये कठिन था, अपनी सोच में डूबी माया को उसकी दादी ने समझा बुझा कर नीचे भेज ही दिया था।
सारी सखियाँ माथे पर टीका लगा के उससे गले मिल रही थी कि किसी के मज़बूत हाथों ने उसे पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया, और उसका पूरा चेहरा गुलाल से भर दिया।
वो अबीर था!! जिसके कुँवारे हाथों ने माया के गालों पर जाने कितने दहकते पलाश खिला दिये थे।
उसके कानों में चुपके से “हैप्पी होली” बोल वो एक बार फिर अपनी टोली में मगन हो गया था।।

वो होली बीत गयी पर उसके लिये छोड़ गयी थी ढ़ेर सारे एहसास, जिन्हें वो चाह कर भी किसी से साझा नही कर सकती थी।
उसे हमेशा से खुद पर और अपनी किस्मत पर तरस आता था, पर अब एक नाराज़गी थी क्यों भगवान ने उसकी किस्मत ऐसी काली स्याही से लिख दी थी जिसे वो चाह कर भी मिटा नही पा रही थी।
उसके दादा और उनके बचपन के दोस्त का अपनी बचपन की दोस्ती को पक्का करने का निर्णय उसकी जीवन नैय्या डूबा गया था, सिर्फ सात बरस की तो थी जब मृत्यशैय्या पर लेटे उसके दादा ने अपनी आखिरी इच्छा के तौर पर अपने दोस्त के पोते से उसके फेरे फिरवा दिये थे, उस समय बाल विवाह होना बन्द हो चुका था पर अक्षय तृतीया के ही दिन उसके घर वालों ने उसे भी गड्डे गुडियों सा ब्याह दिया था, उसके विवाह को एक माह भी नही बीता की उसके दादा जी सिधार गये पर घर वालों के मन में एक संतुष्टी छोड़ गये थे अपनी अन्तिम इच्छा पूरी कर पाने की।

उसके ब्याह को दो साल हुआ ही था कि, किसी बीमारी की चपेट में आकर उसका पति भी नही रहा और ना रहे उसके दादा ससुर।
नौ साल की उम्र में जब उसे शादी और ससुराल का मतलब तक पता नही था, सुहागन का मतलब पता नही था, वो विधवा हो चुकी थी।।
माँ और दादी उसे गले से लगाये बिलखती रहीं, और कुछ देर सहने के बाद कसमसा कर उसने खुद को उनसे छुड़ाया और खेलने बाहर भाग गयी।।

धीरे धीरे समय के साथ उसे अपनी काली किस्मत का लेखा जोखा समझ आने लगा था, और जैसे ही उसने अपनी किस्मत से समझौता करने की सोची अबीर किसी खुशबूदार हवा के झोंके सा उसके जीवन की नीरस बगिया में फूल खिलाने धंसता चला आया था।

उस होली के बाद अबीर के एग्ज़ाम्स हुए और आगे की पढ़ाई के लिये वो बाहर चला गया था, वो शाम भी वो कैसे भूल सकती थी, रोली से उसे पता चल ही चुका था कि उसके अबीर भैया कोटा जा रहें हैं पढ़ने, उसके निकलने के समय पर वो चुपके से अपनी छत पर जा खड़ी हुई थी, उसे एक बार पूरी नज़र देखने के लिये!!
अपना सारा सामान कार की डिक्की में भरने के बाद उसने पलट कर एक बार उसकी छत की तरफ देखा भी था और घबराहट में माया दीवार की ओट में हो गयी थी, उसे देखने की अधूरी आस लिये ही वो चला गया था।
वो तो उसके जाने के बाद उसके जाने का असली कारण माया को पता चला था, जब एक शाम वो स्कूल से लौटी और अपनी माँ और दादी को बातें करते सुना__” क्या ज़रूरत थी अम्मा उनके घर जाने की, ऐसा भी लड़के में कौन सा हीरे मोती जड़ें हैं, ना होगी माया की शादी तो ना होगी, मैं अपनी बेटी को जीते जी कोई दुख ना होने दूंगी।”

” और तुम्हारे बाद उसका क्या होगा बहुरिया?? यही सोच कर तो जी घबराता है कि हम सब के बाद उस बेचारी का क्या होगा?”

” पढ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जायेगी अम्मा, वो खुद अपना सहारा बनेगी।। आइंदा आप किसी के घर माया का रिश्ता लेकर ना जाना, देखा नही मिश्राइन ने कैसे रातों रात लड़के को पढ़ाई के नाम पर बाहर भेज दिया जैसे हमारी माया की छूत लग जायेगी अगर यहाँ रहा तो।”

उसका कलेजा धक से रह गया था, तो इसलिये उसे बाहर भेज दिया!!
उस दिन के बाद से उसने रोली के घर आना जाना बिल्कुल बन्द कर दिया था, रोली ही क्या धीरे धीरे अपनी हर सखी सहेली से दूरी बना ली थी, और उसी समय उसकी मासी उसके लिये देवदूत बन कर आ गयी__
” दीदी माया का हाथ बहुत साफ है, बहुत अच्छी पेंटिंग करती है , इसे फाइन आर्ट्स में क्यों नही भेज देतीं ।”

और फिर सारे घर भर को मना मुनु के आखिर मासी उसे अपने साथ ले ही गयी थी। वल्लभ एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स में प्रवेश लेते ही उसका जीवन बदलने लगा था, अपनी फाइन आर्ट्स की डीग्री पूरी कर स्कॉलरशिप लेकर वो वेनिस से भी कोई एक्स्ट्रा डिप्लोमा कर आयी थी।।

रंगों से खेलती उसकी तुलिका अब उसके कैनवास में ही जीवन ढूँढने लगी थी।
रंग बिरंगे रंगों से सजी उसकी पेंटिंग्स देख कर कोई उसके बिना रंगों के जीवन को सोच भी नही सकता था।।

” दीदी कॉफ़ी पी लो वर्ना फिर ठंडी हो जायेगी।”
सरु की आवाज सुन वो वापस वर्तमान में लौट आयी, अगले हफ्ते ठीक होली से एक दिन पहले उसकी पेंटिंग एक्सीबिशन होनी थी, उसी के लिये वो तन मन से जुटी थी।।

मासी के साथ उसके जाने के चार महीने बाद ही उसके पापा का ट्रांसफर भी दूसरे शहर हो गया था और उस शहर उस गली से सारे नाते छूट गये थे, बस नही छूटा था अबीर का लगाया वो रंग जो अब भी माया अपने गालों पर महसूस कर पाती थी।।

*******

शाम हो चुकी थी, लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी, लोग घूम घूम कर अपनी पसंद की पेंटिंग्स देख रहे थे, उनमें से कुछ खरीद भी रहे थे, एक्सीबिशन हॉल के एक ओर बने छोटे से ऑफिस में माया अपनी साथी पेंटर के साथ बैठी कुछ ज़रूरी बातों में लगी थी कि उनकी एक हेल्पर ने अन्दर आ कर उन्हें बताया कि कोई एक आदमी है जो माया की वो पेंटिंग खरीदने की ज़िद पर अड़ा है जो वहाँ बेचने के लिये रखी ही नही गयी।।

” उनसे कह दो, वो पेंटिंग बिकाऊ नही है, उसे बस “एज़ अ मास्टर पीस” रखा है।”

” पर मैडम वो समझ ही नही रहे, कह रहे जब बेचना नही था तो यहां रखने की क्या ज़रूरत थी?”

” कौन सी पेंटिंग माया ‘ दहकते पलाश’?

” हाँ नेहा! मैं उसे किसी कीमत पर बेचने को तैय्यार नही हूँ, पता नही कौन रईसजादा है, जो ऐसे ज़िद पर अड़ा है।”

” हम्म तुम्हारा चेहरा पसंद आ गया होगा, तुम्हारे जैसी ही तो लगती है वो पेंटिंग, भले ही तुमने खूब सारे रंगों से चेहरे को रंग दिया है बिल्कुल जैसे किसी ने होली पर चेहरे पर खूब सारा अबीर गुलाल छिड़क दिया हो, बस हँसते हुए दांत नज़र आते हैं पर पेंटिंग लाजवाब है।”

” मैडम जी आप ही बात कर लो एक बार, हमारी तो सुन नही रहे वो साहब”

माया और नेहा ऑफिस से बाहर निकल आये, माया ने आगे बढ़ कर उस आदमी से कुछ कहना चाहा ही था कि पेंटिंग को देखता वो पलट कर माया के सामने हो गया, दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते ही रह गये।।

” मैं कैसे समझ नही पाया कि ये तुम हो माया।”
अबीर की बात पर माया ने शरमा कर आंखे नीची कर लीं….

” बहुत खूबसूरत पेंटिंग है, बिल्कुल तुम्हारी तरह, अभी तक समझ नही पा रहा था की बनाने वाला इसे बेचना क्यों नही चाहता, पर अब तुम्हें देख कर समझ आ गया…..”

” कैसे हो अबीर?”

” बिल्कुल वैसा ही जैसे पहले था, तुम कैसी हो?”

उसके सवाल पर वो मुस्कुरा उठी__

” क्या समझ गये? मैं आखिर क्यों नही बेचना चाहती इस पेंटिंग को?”

“बस उसी कारण जिसके लिये मैं इस पेंटिंग को खरीदना चाहता था, पर खैर अब मैं नही खरीदूंगा, तुम्हारी यादें तुम्हें मुबारक!! हाँ अगर तुम्हारी जगह किसी और ने ये बनाया होता तो किसी भी कीमत पर खरीद ही लेता, मेरी वाईफ को पेंटिंग्स का बहुत शौक है माया, आज अपनी सालगिरह पर सोचा उसे उसकी पसंद का तोहफा दूंगा पर यहाँ इस पेंटिंग ने मुझे रोक लिया, इसके आगे और कुछ देख ही नही पाया, इस पेंटिंग में मुझे तुम नज़र आई थी, पर जब ये देखा कि बनाने वाली भी तुम ही हो तो सब समझ आ गया मुझे।।”

उन दोनों को बातें करता छोड़ नेहा और बाकी लोग वहाँ से जा चुके थे….

” तुमने शादी की माया?”

” नही!! पहली टिकी नही और जब दूसरी करनी चाही तो जिससे चाहा वो जाने कहां गुम हो गया।”

” एक बार मुझसे कहा तो होता?”

” कब कहती, कैसे कहती? अगर तुम्हारी ‘ना’ होती तो मैं जीते जी मर जाती, अब तक जी रहीं हूँ और तुम्हारे दिये उन रंगों से ही अपना कैनवास भर रही हूँ, इतना काफी है अबीर , तुम मेरी तरफ से ये पेंटिंग रख लो।”

” मिलना नही चाहोगी मेरी वाईफ से?”

” वो भी आईं हैं क्या यहाँ?”

” हम्म !!, वो तुम्हारा ऑफिस है शायद।”

” अरे हाँ!! आओ उन्हें भी बुला लो, मैं तब तक कॉफ़ी के लिये बोलती हूँ!” कह कर माया आगे बढ़ गयी, उसके पीछे अबीर भी उसके ऑफिस में प्रवेश कर गया…..

” कहाँ हैं?? तुम्हारी वाईफ अन्दर नही आई??”

” मिलवाता हूँ, पहले चैन से बैठ तो जाऊँ!! इतने सालों की कितनी सारी बातें हैं, मेरे कोटा जाने के कुछ समय बाद तुम्हारा परिवार वो शहर ही छोड़ गया….
पहले तो रोली से तुम्हारे बारे में कुछ सुनने को भी मिल जाता था पर तुम लोगों के शहर छोड़ने के बाद तो तुम लोगों से सम्पर्क के सभी साधन बन्द हो गये, रोली को भी तुम्हारी कोई खबर ना थी, खुद को कहाँ कैद कर रखा था माया?”

” पता नही अबीर!! पर तुम्हारे घर से ना सुनने के बाद मेरी भी हिम्मत चूक गयी थी, और शायद घर वालों की भी, दादी तो अब रहीं भी नही, मेरे घर भर में सबसे ज्यादा उन्हें ही तुम पसंद थे।”

” और तुम्हें??”

अबीर की बात अनसुनी कर माया ने कॉफ़ी उसके आगे बढ़ा दी__” अब मिलवा भी दो अपनी वाईफ से।”

अबीर ने हाँ में सिर हिला कर अपने जेब से अपना वॉलेट निकाला और खोल कर माया के सामने कर दिया, उसमें उसकी वही पन्द्रह साल पुरानी रंगों से भीगी मुस्कुराती तस्वीर लगी थी__” ये कब निकाल ली थी तुमने ?”

” रोली को कह कर तुम्हें नीचे बुलाने से लेकर मोहित से छिप कर तस्वीर खिंचवाने तक की प्लानिंग थी मेरी, वो तो उसके बाद मैं पढ़ने बाहर चला गया वर्ना ….”

अबीर अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि नेहा हाथ में गुलाल से भरी प्लेट थामे दोनो के पास चली आयी …..
” आप दोनों को होली की शुभ कामनाएँ “

अबीर ने मुस्कुरा कर माया को देखा__” उस दिन एक काम अधूरा रह गया था माया”

प्लेट से ढ़ेर सारा गुलाल उठा कर अबीर माया की तरफ बढ़ा ही था कि माया ने अपने हाथों से गुलाल अबीर के गालों पर मल दिया ” उस दिन अधूरा रह गया था ये अरमान!! हैप्पी होली अबीर!!

aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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