जीवनसाथी- 112

जीवनसाथी – 112




मुस्कुराती हुई पिया अपनी गाड़ी उठाये महल की तरफ बढ़ गई उसे पता था कि समर इस वक्त अपने घर पर ही मिलेगा।
महल में पहुंचने के बाद वह सीधे समर के कमरे की तरफ बढ़ गई।
समर अपने कमरे में बैठा चार पांच लोगों से किसी बात पर सलाह मशवरा कर रहा था….
चुनाव को अब बहुत कम समय बाकी रह गया था, और इसलिए समर की व्यस्तता भी बहुत ज्यादा बढ़ गई थी।
मुस्कुराकर पिया भी उसकी कुर्सी के ठीक सामने कुर्सी खींच कर बैठ गयी।
समर में एक नजर उसे देखा और वापस अपनी फाइलों के पन्ने पलटने लगा।
वह अपने साथ के लोगों के साथ बातें करने और काम करने में इतना व्यस्त था कि पिया की तरफ ध्यान ही नही दे पाया।
कुछ देर तक पिया वहां बैठी उसे देखती रही, पर जब समर ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तब उसे भी गुस्सा आने लगा।

वह चुपचाप उठी और मुड़कर वापस जाने लगी । उसे जाते देख समर ने अपने साथ बैठे लोगों को इशारे से बाहर भेज दिया …- ” कहां चली जा रही हो?

समर के सवाल पर पिया चौक कर उसे देखने लगी-” अरे आप की मीटिंग खत्म हो गई मंत्री जी।

‘खत्म तो नहीं हुई लेकिन खत्म करनी पड़ी, अब बोलो कैसे आना हुआ यहां?’

“वाह आप पूछ तो ऐसे रहे जैसे जानते ही नहीं।”

” ओह्ह रियली! मैं नहीं जानता कि आप अपना कीमती वक्त निकालकर यहां किस लिए आई है?”

“ओह! तो यह बात है! मतलब मंत्री जी नाराज हो गए हैं! मैं कॉफी शॉप पर समय में नहीं पहुंच पाई इसलिए ना।

“किसने कहा मैं नाराज हो गया हूं? जिन लोगों को वक्त की कदर नहीं, मैं भी उनकी कदर नहीं करता।

“ओहो फिलॉस्फर जी सुनिए! वक्त की कदर और बेकद्री वाली कोई बात ही नहीं थी। मैं निकल ही रही थी कि एक इमरजेंसी केस चलाया, अब पेशेंट को एकदम इमरजेंसी में अकेला छोड़ कर तो मैं नहीं आ सकती ना!”

“तो आप क्यों आई हो? अभी भी पेशेंट के पास ही रहना था। मैंने तो नही बुलाया।”

“अब वह स्टेबल है, उसे मेरी जरूरत नहीं थी इसलिए मैं आ गई।”

“इसका मतलब आप के मरीज ही आपके लिए सबसे पहले हैं। जब उन्हें आपकी जरूरत नहीं होगी तभी आप बाकी लोगों पर ध्यान दे पाएंगी।”

“नहीं मेरा यह मतलब तो नहीं था!”

“तो और क्या मतलब है आपका?”

“मंत्री जी! हो क्या गया है आपको ? आप भी तो अपने कैरियर के लिए बहुत कॉन्शियस हैं। आपके लिए भी तो आपका काम ही सबसे पहले हैं। तो अगर मेरे लिए मेरा काम इंपॉर्टेंट हो गया तो आपको इतनी नाराजगी क्यों हो रही है ।यह तो गलत बात हुई ना आपके अपने खुद के लिए अलग रूल्स और मेरे लिए अलग रूल्स।”

“तुम्हारे लिए रूल्स बनाने वाला मैं होता कौन हूं? तुम्हारी लाइफ है तुम्हारे रूल्स तुम जो चाहे वह करो! जैसे चाहे वैसे रहो। बड़ी से बड़ी बातें मुझसे छुपा जाओ। मैं कौन होता हूँ तुम्हें कुछ बोलने वाला?”

“मैंने कौन सी बड़ी बात छुपा ली? “

पिया का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था उसकी चाची अभी कुछ दिन पहले ही उसकी मां के पास एक रिश्ता लेकर आई थी! लड़का रिश्तेदारी में ही था। डॉक्टर था और दिल्ली में अच्छी खासी प्रैक्टिस थी।
पिया का परिवार पिया के पीछे लगा हुआ था कि वह एक बार हां बोल दे तो चट मंगनी पट ब्याह कर उसके घर के लोग गंगा नहा लेंगे। वह तो पिया ही थी कि कोई ना कोई बहाना बनाकर अब तक उस रिश्ते के लिए टालती चली आ रही थी।
उसे अचानक से लगा कि कहीं समर को इस रिश्ते के बारे में कोई खबर तो नहीं हो गई।

“मैं तुम्हें बताने ही वाली थी लेकिन मौका ही नहीं मिला।”

“क्या बताने वाली थी?”

“यही कि घर पर रिश्ता देखा जा रहा है, और इस बार…..

समर ने पिया की बात आधे में ही काट दी, अब उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका था। अब तक तो वह बांसुरी की बात छिपाए जाने से ही नाराज था, लेकिन अब पिया ने जो बात बोली थी उसे सुनकर समर का दिमाग उड़ चुका था।

“क्या इस बार तुम हां करने वाली हो, तो जाओ कह दो किसने रोका है तुम्हें। तुम वैसे भी अपनी मर्जी की मालिक हो। नए जमाने की लड़की हो। तुम्हें किसी का बंधन क्यों पसंद आएगा भला?”

“यह कैसी बातें कर रहे हो समर?”

“कैसी बातें कर रहा हूं? बिल्कुल सही बातें कर रहा हूं! कौन है वह जहाँ तुम्हारा रिश्ता तय हो रहा है?”

“डॉक्टर ही है दिल्ली में है प्रैक्टिस करता है।”

“बस और क्या चाहिए? लड़के का अच्छा जमा जमाया अस्पताल है। शादी के बाद तुम दोनों हस्बैंड वाइफ मिलकर उस अस्पताल को चलाना।”

बातों का रुख कड़वाहट की ओर मुड़ता देख पिया ने सोचा कि कुछ हल्का-फुल्का मजाक करके बातों को हल्का बना लिया जाए!
वो हंसने लगी- ” हां बिल्कुल मैं और मेरा हस्बैंड अस्पताल खोलेंगे! और तुम जब भी जरूरत हो इलाज करवाने चले आना। तुम्हारा पूरा इलाज फ्री में होगा। और सुनो तुम्हारे साथ साथ तुम्हारे मॉम डैड तुम्हारे सारे परिवार का भी इलाज मेरे अस्पताल में फ्री हो जाएगा।”

समर का दिमाग इस वक्त इतना खराब था कि उसे यह लगा ही नहीं कि पिया ने सिर्फ मजाक के तौर पर यह कहा है !
समर चुपचाप उठकर अपने कमरे से बाहर निकल गया। पिया ने उसे रोकने और मनाने की कोशिश भी की ,वह इसके पीछे भागी लेकिन समर ने पलट कर उसे जोर से डांट लगा दी-” खबरदार जो मेरे पीछे आने की कोशिश की, इसी वक्त निकलो और अपने अस्पताल घर जहाँ जाना है चली जाओ। बस मुझे नज़र मत आना।”

आश्चर्य से समर को देखती पिया तेज तेज कदमों से वहां से बाहर निकल गई।

वह अपने काम के कारण ही तो लेट हुई थी कोई जानबूझकर तो उसने देर की नहीं थी। फिर समर इतना नाराज क्यों था? उसे समर की नाराजगी का कोई कारण समझ नहीं आया ?आंखों में मोटे मोटे आंसू लिए वह अपनी बाइक चलाती अपने हॉस्टल की तरफ बढ़ गई आज उसका मन बहुत ही खट्टा हो गया था।

वह घर पहुंची ही थी कि उसकी मां का फोन चला आया। मां बड़े उत्साह से उसे उसके होने वाले ससुराल वालों के बारे में बता रही थी। मां से कुछ देर बातें करने के बाद उसका मन थोड़ा हल्का होने लग गया था। लेकिन अब भी उसे समर के ऊपर बहुत तेज गुस्सा आ रहा था।

यह कैसा बचपना था समर का? बाकी पूरी दुनिया के लिए तो वह बहुत समझदार बन जाता था, फिर उसी के लिए इतना नासमझ इतना बच्चों सा क्यों हो जाता था?
कि तभी पिया की मां ने एक और विस्फोट कर दिया

“बेटा अमोल तुझसे मिलना चाहता है। मैंने तेरे शहर का पता बता दिया है वह कल सुबह तुझसे मिलने आ रहा है।
देख अब की बार कोई भी उटपटांग हरकत मत करना। इस बार संभाल लेना। वह दो दिन रुकेगा। कल रात में उसकी वापसी की फ्लाइट है। बस दो दिन अच्छे से बन संवर के उसे थोड़ा वक्त दे देना। क्योंकि बेटा यह रिश्ता तेरे पापा जी को और मुझे बहुत पसंद है। सब कुछ एकदम सही है किस्मत से ऐसे अच्छे रिश्ते मिलते हैं अब तो कोई नाटक या नखरा मत करना समझी।”

“अरे मां !!यह क्या किया? यहां क्यों भेज रही हो? यहां कहां रुकेगा वह? “

“वहां उसकी दीदी और जीजाजी रहते हैं। उनके घर पर रुकेगा । तुझसे बस मिलने आएगा, तो तू कल उसके मिलने आने के हिसाब से अपनी ड्यूटी देख लेना समझी।

“हां डॉक्टर थोड़ी ना हूं! मैं तो कलेक्टर हूं यहां कि।
मेरे से मिलने जुलने वालों के आधार पर ही मेरी ड्यूटी का टाइम डिसाइड करती है सरकार है ना।”

“अब वह सब मैं नहीं जानती, लेकिन लड़कियों के लिए पढ़ाई लिखाई जितनी जरूरी है उतना ही सही समय पर शादी पर हो जाना भी बहुत जरूरी है।
निम्मी की बुआ याद है? पढ़ाई पर पढ़ाई पढ़ाई पर पढ़ाई , इतनी पढ़ाई कर ली, उन्होंने कि उनके डिग्री के हिसाब से लड़का ही नहीं मिला।
सरोज आंटी की बेटी याद है पहले एमबीबीएस किया फिर उसके बाद रूरल सर्विस की उसके बाद एमडी किया। इसके बाद भी उसका मन नहीं भरा लड़की पीएचडी भी करना चाह रही थी अब देखो कुंवारी बैठी क्लिनिक में बस मरीजों के साथ टाइम पास करती है।
इसीलिए बड़े बुजुर्ग कह गए हैं लड़की अगर डॉक्टर बने तो पढ़ाई के बीच में ही उसको ब्याह दो, तभी वह ज्यादा सफल होती है । और सच मान पिया यह टोटका भी है पढ़ाई के बीच में शादी हो जाए तो पढ़ाई में भी इजाफा होता है। नौकरी भी जल्दी लगती है। और हर तरफ से बरकत होती है। और वो याद है तुझे, रुक्मिणी बुआ की मंझली बहु के चाचा की लड़कीं। अब तो वो क्या कहतें हैं ….

“मम्मी कहां से लाती हो यार ऐसे फंडे ! पहले ही दिमाग खराब हुआ पड़ा है और तुम हो कि के बी सी खेल रही हो।रुक्मिणी फुई की बहु के चाचा की लड़की कौन थी पहचाने और जीतें पचास हज़ार रुपये। “


” वो सब छोड़ , कल तू उससे मिलने चली जाना ,समझी? “

एक छोटा सा “हम्म” बोल कर उसने फ़ोन रख दिया।

*****

चुनाव की तैयारियां अपने अंतिम पड़ाव पर थीं। अब सभी की व्यस्तता बढ़ चुकी थी।
इसके साथ ही मायानगरी में भी दाखिले शुरू हो गए थे। निरमा पिछले कुछ समय से खाली भले ही बैठी रही हो लेकिन उसमें अपने काम को सम्पूर्णता से करने का जज़्बा था। राजा भैया के इतने विश्वास से दिए पद की गरिमा उसे बनाये रखनी थी। वो पूरे जोश से अपने काम में डूब गई थी।

ऐसे ही एक शाम वो अपना लैपटॉप खोले काम कर रही थी…
उसी वक्त अम्मा ने मीठी के लिए दूध बनाने गैस पर चढ़ा रखा था। बाहर ज़रा मौसम खराब होता देख अम्मा ने घर निकलने की इच्छा जताई जिसे निरमा ने मान लिया…

“बहुरिया खाना बना कर रख दिये हैं और बिटिया के लिए दूध बना कर भी रख दिये हैं। थोड़ा ठंडा हो जाये तब पिला देना। “

“ठीक है अम्मा ! “लैपटॉप से नज़र हटाये बिना ही निरमा ने जवाब दिया और वापस काम में लग गयी।
अम्मा अपने घर के लिए निकल गईं। मीठी वहीं इधर उधर खेलती बैठी रही।
मीठी कुछ देर में खेलते कूदते उसी टेबल तक पहुंच गईं जहाँ अम्मा जाते वक्त दूध रख गयीं थीं। दूध ज़रा किनारे ही रखा था।
मीठी अब चलने फिरने लगी थी वह टेबल पर के सामान इधर-उधर करती खेल रहे थी। दूध का गिलास गर्म था उसमें से धुआं निकल रहा था, मीठी उस गिलास तक पहुंचने ही वाली थी कि, तभी बाहर से प्रेम भागता हुआ भीतर चला आया। उसने टेबल पर रखा दूध का गिलास उठाया और उसे जरा भीतर की तरफ रख दिया। और तुरंत मीठी को गोद में उठा लिया…
प्रेम के कुछ इस तरह आने और मीठी को उठाने तक में निरमा का ध्यान भी उन दोनों पर चला गया वह भी चौक कर उन दोनों के पास चली आई।
उसने तुरंत मीठी को गोद में ले लिया….

निरमा की इस सब में कोई गलती नहीं थी , लेकिन फिर भी उसे आत्मग्लानि ने घेर लिया ।। वो मीठी को गोद में लिए एक किनारे जाकर बैठ गई ।उसने डरते हुए प्रेम की तरफ देखा…-” आई एम सॉरी प्रेम जी ! मैं अपने काम में इतनी मग्न हो गई थी, कि मेरा ध्यान ही नहीं गया कि ग्लास टेबल पर एकदम किनारे रखा है। और मीठी का हाथ पड़ कर गिर सकता है। मीठी उस दूध से जल सकती है। आइंदा मैं इस बात का पूरा ध्यान रखूंगी।”

प्रेम भी निरमा के पास आकर बैठ गया…-” इसमें तुम्हें सॉरी बोलने की क्या बात है निरमा? अब तुम्हें बस इतना करना कि अगली बार से गिलास मीठी की पहुंच से थोड़ा दूर रखा हो।

निरमा आंखें फाड़े प्रेम को देखती रह गई। कोई और आदमी होता तो अभी अपनी पत्नी को उसके इस तरह काम में मगन रहकर बच्चे की तरफ ध्यान ना देने के लिए सौ बातें सुना चुका होता। पुरूष का सहज स्वभाव यही तो होता है। गलती किसी की भी हो लेकिन उसका ठीकरा वह अपनी पत्नी के माथे ही फोड़ते हैं। उसने खुद अपने आसपास आज तक यही देखा था।

अगर औरत नौकरी कर रही है। घर से बाहर जाकर काम कर रही है, तब भी ज्यादातर घरों में पुरुष उन्हें इसी शर्त पर बाहर जाकर काम करने देते हैं, कि वह अपने घर के कामों में किसी भी तरह की कोई कोताही नहीं करेंगी।
जैसे बाहर जाकर काम करना स्त्रियों का कोई शौक हो। बाहर उन्हें काम करना ही नही पड़ता हो।
वो तो महज मौज मस्ती करने निकलती हों। वही काम अगर पुरुष बाहर जाकर करता है तो शाम को लौट कर वह इतना थक जाता है की फ्रेश होने के लिए उसे तुरंत गर्म चाय पानी सब कुछ सोफे पर ही चाहिए। लेकिन उसी काम को कर के बाहर से लौटी स्त्री घर भर में किसी से एक ग्लास पानी की भी उम्मीद नहीं कर सकती। चाहे उसने ऑफिस में कितनी भी मेहनत की हो कितना सारा भी काम किया हो,लेकिन शाम को थक कर लौटने के बाद उसे चाय भी पीनी हो तो खुद ही बनाना पड़ता है ।
अगर पुरुष ऑफिस में कुछ अधिक वक्त तक रुक कर काम करें तो वह उसका ओवरटाइम कहलाता है। लेकिन अगर कभी किसी औरत को ओवरटाइम करने रुकना पड़ जाए तो बेचारी मन ही मन घबराने लगती है कि घर जाने के बाद पति को क्या कहकर सफाई देगी।
बिना किसी गलती के वो हर पल एक अग्निपरीक्षा में जलती रहती है कि जाने उसकी किस चूक पर घर में बवाल मच जाए।
यही तो आज तक उसने अपने आसपास देखा था। उसकी पड़ोसन रीमा भाभी का यही हाल था। बेचारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाया करती थी। सुबह 8:00 बजे के स्कूल के लिए निकलने से पहले घर भर का लंच और नाश्ता तैयार करके , पति, बच्चों को टिफिन देकर अपना टिफिन लेकर निकलती। दोपहर तीन बजे आने के बाद अपनी इतनी थकान के बावजूद एक कप चाय पीकर और आधे घंटे का आराम लेकर वो रात के खाने की तैयारी में जुट जाती। इसके बावजूद अक्सर भाई साहब को यही कहते सुना कि-” भई हमारे ऑफिस की थकान की बात ही अलग है। जबकि वह दस बजे ऑफिस जाते और शाम पांच बजे वापस आ जाते। इस जाने और आने के पहले और बाद में उन्हें कोई एक्स्ट्रा काम नहीं करना पड़ता था। रीमा भाभी जाने से पहले उनके ऑफिस के कपड़े रुमाल मोज़े सब कुछ सलीके से पलंग पर निकाल कर रख जाती। उनके लौट कर आने के बाद हाथ मुंह धोने तक में गरम नाश्ता और चाय टेबल पर सजा चुकी होती। लेकिन इस सबके बावजूद उनके घर में कभी किसी ने रीमा भाभी के काम को कोई महत्व नहीं दिया। रीमा भाभी ऐसी अकेली औरत नहीं थी, बल्कि निरमा ने तो अपने आसपास अपने ऑफिस में कई महिलाओं को ऐसे ही खटते देखा था।

उसे हमेशा यही लगता था, जब एक आदमी नौकरी करता है तो उसके साथ उसका पूरा परिवार उसकी नौकरी करता है। सुबह उसके ऑफिस जाने के पहले से लेकर उसके ऑफिस से लौटने के बाद तक हर कोई उस आदमी के पीछे हाथ बांधे दौड़ता रहता है। लेकिन जब एक औरत नौकरी करती है तो वह अकेले अपनी नौकरी करती है। उसका साथ देने के लिए ना तो उसका पति होता है और ना ही बच्चा।

निरमा को अपने ख्यालों में खोए देख प्रेम उसके पास सरक आया।

“तुम कुछ ज्यादा ही घबरा गई हो शायद! ऐसी कोई बहुत बड़ी बात नहीं हो गई है निरमा। छोटे बच्चों के घर में इस तरह के छोटे मोटे हादसे होते रहते हैं। और फिर यहां तो कोई हादसा हुआ ही नहीं। मैंने पहले ही गिलास हटा दिया था। फिर क्यों इतनी परेशान हो? “

निरमा प्रेम के गले से लग कर सिसक उठी। वाकई प्रेम औरों से अलग था। बेहद अलग।
और इसीलिए शायद निरमा की जिम्मेदारियां भी बढ़ गई थी। उसने मन ही मन यह कसम उठा ली कि अब चाहे कितनी भी व्यस्तता हो लेकिन वह आइंदा ऐसी लापरवाही कभी नहीं करेगी। अगर उसे घर से बाहर जाकर काम करना है, तो उस काम के प्रति लगन में वह कभी भी अपने घर पति और बच्चे की उपेक्षा नही करेगी।
ऐसा करने में मेहनत जरूर थोड़ी ज्यादा हो जाएगी, लेकिन प्रेम जैसा पति अगर हर कदम पर उसकी सहायता करने को तैयार बैठा है, तो वह भी हर कठिनाई को पार करते हुए खुद को साबित करके रहेगी।

प्रेम के सीने से लगी निरमा ने खुद को थोड़ा सा और प्रेम में समेट लिया।

*******

सुबह-सुबह बांसुरी बालकनी में बैठी सामने के कमरे को देख रही थी। उसे वह पल याद आ रहे थे जब वह पहली बार पिंकी और राजा के साथ महल में आई थी। राजा के कमरे के ठीक सामने की तरफ़ उसे कमरा मिला हुआ था। वह जब भी अपने कमरे की बालकनी में आती वहां से अक्सर वह छुप-छुपकर राजा को देखा करती थी। और आज वह उसी कमरे की मालकिन बनी बैठी थी। खुद में कोई मुस्कुराती हुई बांसुरी अपनी सोच में गुम थी, कि राजा ट्रैक सूट और स्पोर्ट्स शूज पहने वहाँ चला आया…- ” यहां बैठे-बैठे क्या मुस्कुरा रही है मैडम! चलिए उठिए । वॉक पर चलना है।”

बांसुरी ने अलसाई हुई नजरों से उसे देखा-” हूं मुझे नहीं जाना!”

” ऐसे कैसे नहीं जाना? जाना ही होगा।
यह पूरा समय तुमने अपनी मर्जी से बिताया है। अब ये आखिर का जो थोड़ा सा वक्त बचा है, इसे तो मेरे हिसाब से जी लो।”

“बिल्कुल नहीं! कहा जाता है प्रेगनेंसी में सब कुछ मां की मर्जी से होना चाहिए।”

“लेकिन ऐसे में तो हमारा बच्चा जिद्दी हो जाएगा। अगर मेरे जैसा नहीं हुआ तो मेरी तो कोई बात ही नहीं सुनेगा फिर!”

“क्यों? क्या मैं आपकी बातें नहीं सुनती?”

” वही बातें सुनती हो जो तुम्हारे काम की होती है !जो तुम्हारे काम की नहीं होती उन्हें यूं ही उड़ा देती हो।”

“ऐसा कब किया मैंने राजा साहब जरा बताइए तो!”

“आप अभी क्या कर रही हैं हुकुम आप बताइए तो।”

“आप बहुत जिद्दी हैं साहब ! जाइए ना अपने चुनाव का काम देखिए!”

“पूरा दिन पड़ा है उसी काम के लिए!
यह सुबह का ही तो वक्त है, जब हम साथ में इस प्यारे से बगीचे में घूमते हुए टहलते हुए अपने बच्चे के बारे में बातें कर सकते हैं । चलिए हुकुम बहुत सुंदर मौसम है आइए मेरे साथ।”

और एक तरह से जबरदस्ती बांसुरी का हाथ थामे राजा अपने साथ वॉक करने ले गया। शुरू में थोड़ी देर आलस से चलने वाली बांसुरी कुछ देर बाद ही अपने अंदर ढेर सारी ऊर्जा महसूस करने लगी। बगीचे का एक लंबा चक्कर लगाने के बाद एक जगह बांसुरी को लेकर राजा नीचे ही घास पर बैठ गया।
बांसुरी के सामने बैठे राजा ने उसे अलग अलग तरीके से ध्यान लगाने की विधियां सिखाई और उसके साथ ही खुद भी ध्यान लगाने लगा।
एक डेढ़ घंटे का समय यूं ही बीत गया कि तभी राजा के फोन पर किसी का मैसेज आने लगा।

राजा ने देखा समर का मैसेज था।

ठाकुर साहब के कोर्ट केस के लिए आदित्य और केसर को साथ लेकर समर को दून के लिए निकलना था वह निकलने से पहले एक बार राजा से मिलना चाहता था।

“मैं भी साथ चलूंगा!”

राजा के इस मैसेज पर समर में बांसुरी की हालत का जिक्र किया लेकिन ना राजा को मानना था और न वह माना।

शाम को ही उन लोगों को वहां से निकलना था बांसुरी से इस बारे में जब राजा ने बात की तो बांसुरी ने सहर्ष सहमति दे दी..-” आप मेरी चिंता मत कीजिए साहब! यहां रूपा भाभी जया भाभी फूफू साहेब दादीसा तभी तो हैं। और फिर मम्मी भी तो रुक गई हैं। आप जल्दी से अपना काम निपटा कर आ जाइए । तब तक मैं और आपका छुटकू हम दोनों ही आपका इंतजार करेंगे।

मुस्कुराकर राजा बांसुरी के पास ही बैठ गया।

समर अपने कमरे से निकलकर ऑफिस की तरफ बढ़ गया जाते-जाते उसने पिया को फोन लगा लिया।

सुबह का वक्त था पिया कहीं व्यस्त थी। वह फोन नहीं उठा सकी। समर ने उसे एक मैसेज ड्रॉप कर दिया।

“आज रात की फ्लाइट से दून निकल रहा हूं । उसके पहले एक बार मिलना चाहता हूं। हो सके तो दो घंटे बाद उसी कॉफी हाउस में मिलना।”

पिया ने बांसुरी की हालत के बारे में समर से भी कुछ नहीं बताया था। और बांसुरी की ऐसी हालत के कारण ही उसके राजा साहब परेशान हो उठे थे, इसीलिए समर पिया से नाराज़ बैठा था। लेकिन गुजरते वक्त के साथ यह नाराजगी भी कम हो गई थी। उस दिन के किए अपने अशिष्ट आचरण के कारण उसे खुद भी मन ही मन ग्लानि से हो रही थी। इसलिए वह पिया से एक बार मिलकर माफी मांगना चाह रहा था। मैसेज छोड़ने के बाद वह अपनी तैयारीयों में जुट गया।

अपना सारा काम निपटा कर और सारी तैयारियां समेटकर समर कॉफी हाउस के लिए निकल गया। समय का पाबंद तो वो था ही, अपने तय समय में उसने कॉफी हाउस का दरवाजा खोला और अंदर हॉल में सभी तरफ नजर दौड़ा ली। हॉल में एक तरफ उसे पिया बैठी दिख गयी। मुस्कुराकर वो उसकी तरफ बढ़ा ही था कि, उसने देखा पिया अकेली नहीं थी। उसके साथ एक लड़का भी बैठा था।

समर बहुत धीमे कदमों से उस टेबल तक बढ़ ही रहा था कि उसने देखा उस लड़के ने अपने पास से एक गुलाब उठाकर पिया की तरफ बढ़ा दिया। पिया ने गुलाब को देखा और धीरे से हाथों में ले लिया। पिया और उस लड़के की नजर समर पर नहीं पड़ी थी।

समर कुछ देर को वहीं खड़ा रह गया। फिर खुद को और अपने गुस्से को संभालते हुए पिया से कभी ना मिलने की कसम खाते हुए वहां से बाहर निकल गया।

क्रमशः

aparna….









लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

50 विचार “जीवनसाथी- 112” पर

  1. वाह अपर्णा जी, ये पार्ट जबरदस्त था। समर का बचपना हो या निरमा की सोच, हर जगह खुद की जिंदगी की छवि देखने को मिली।
    और समर की गलतफहमी तो होनी बनती है ना क्योंकि जिससे हम प्यार करते है, उसे किसी दूसरे के साथ देख कर गुस्सा तो आयेगा ही ना…….

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