बाजीराव – एक प्रेम कहानी


मैं दो साल से पुणे में थी,सदाशिव पेठ मे,अब शादी के बाद वाकड़ आ गयी ……मालपानी ब्लूस मे ।।
बहुत बड़ी सोसाइटी और उससे भी बड़े लोग,मै और मेरे पतिदेव सॉफ़्टवेयर वाले हैं,सो हमारी जमात को यहाँ के लोग एलियन समझते हैं ।

हम दोनो कुछ एलियन से थे भी,अपने मे मगन,किसी से कोई लेना देना नही,हफ्ते मे 5दिन तो हम सुबह कब ऑफ़िस निकलते और कब शाम मे वापस आते ,किसी पड़ोसी को झलक भी नही मिलती,पर एक दिन सुबह जब मैं ऑफ़िस निकलते
समय दरवाजा बन्द कर रही थी,उसने मुझे लपक ही लिया,मुझे कई दिनों से महसूस हो रहा था,कि कोई मुझ पर नज़र रख रहा है,,मुझे लगभग रोज़ ही ऐसा लगता की सामने वाले घर के की-होल से कोई मुझे आते जाते देखता है,मै भी जानना चाहती थी कि आखिर एक शादीशुदा लड़की मे किसी को क्या इंटरेस्ट ,कौन है वो दीवाना? आखिर वो दिन भी आ ही गया,,अनु जल्दी मे थे ,सो वो नीचे पार्किंग से गाड़ी निकालने चले गये,और मै दरवाज़ा बन्द करने लगी,तभी…….

…एक बहुत मीठी सी आवाज कानों में पड़ी,
“अच्छा तो आप आयी हैं ,701में।”
मैने मुड़ के देखा ,एक लगभग मेरी ही उमर की औरत कॉटन का कफ्तान पहने बालों को पीछे क्लच किये चाय का कप पकड़े खड़ी थी।।

ओहो तो ये था मेरा दीवाना!! ,

मैने उसे एक फॉर्मल सी मुस्कान दी और हां में सर हिला दिया।

“जॉब करती हैं आप??”

मैने फिर स्माइल के साथ अपना सर हिला दिया।

“बच्चे कितने हैं आपके?”

मुझे समझ आ गया था की ये मुझ से भी बड़ी ढीठ है,मै जितना ही उससे बचने के लिए कोशिश कर रही थी,वो उतनी ही एकाग्रता से मुझसे चिपक रही थी,

“जी अभी शादी को ज्यादा समय नही हुआ।”

“अच्छा! आजकल तो भाई सब 4-5साल बाद ही सोचते हैं,हमने तो तुरंत ही कर लिया,अब देखो मेरा अर्णव तो इस जुलाई मे 5का हो जायेगा।”

पहली ही मुलाकात मे अपना परिवार पिटारा खोल लेने वाली औरतों से मुझे बड़ी चिढ़ होती है, अरे क्या ज़रूरत इतना बेतकल्लुफ़ हो जाने की।

मैने फिर से एक ज़हरीली स्माइल दी कि ये अपना मुँह बन्द कर ले पर नहीं ,वो मेरी सोच से कहीं आगे थी।।

“मेरा नाम प्रियंका है,और मेरे पति का रनवीर ,अब देखीये ना फिल्मों वाले रनवीर को तो दीपिका मिल गयी।”

अपने सेंस ऑफ़ ह्युमर पे उसे बड़ी हंसी आयी,और मेरा खून जलने लगा,मुझे पता था नीचे पार्किंग से गाड़ी निकाल के मेरे पतिदेव मेरी लेट लतीफ़ी के कारण क्रोध मे अंगार हो रहे होंगे ।

“आपसे मिल के बहुत अच्छा लगा,अभी चलती हूं,लेट हो रही हूँ,आओ आप कभी घर।बाय।”

“अरे आप अपना नाम तो बताती जाईये।”

इससे बचना मुश्किल था,,
“अपर्णा “!!
मै जल्दी से नाम बता कर लिफ्ट मे घुस गयी।

कुछ दो दिन बाद सुबह 9:30पे दरवाजे पे घंटी
बजी,आज तबियत कुछ नासाज़ थी इसीसे ऑफ़िस से छुट्टी ले ली थी,बहुत दिन से कुछ अच्छा पढ़ने का मन था,जैसे ही अनु ऑफ़िस निकले मैनें एक अच्छी सी कॉफ़ी बनायी, और बस अपनी किताब खोल के पढ़ना शुरु ही किया की कम्बख्त बेल बज गयी।।

ये वक्त तो हमारा घर पे होने का होता ही नही किसी ने गलती से बजा दी होगी,मैने ऐसा सोचा ही था की बेल फिर बज गयी,बहुत मजबूर होकर ही मुझसे किताबें छूटती हैं,बड़े बेमन से मैं गयी दरवाजा खोला ही था कि अनाधिकार चेष्टा से वो मेरे घर मे घुसती चली आयी।।

“मैनें सुबह ही देख लिया था,की आज भाई साब अकेले ही ऑफ़िस जा रहे, तभी समझ गयी थी कि आप घर पे होंगी,इसीलिये चली आयी,तबियत तो ठीक है ना।”

“वैसे आप आज ऑफ़िस गयी क्यों नही?”

“उस दिन आपने भाई साब का नाम भी नही बताया?”

“आप बोलती बहुत कम हैं अपर्णा जी।”

अरे क्या खाक बोलूं?तू कुछ बोलने दे ,तब तो बोलूं

“जी थोड़ा सर मे दर्द था,इसीसे छुट्टी ले ली।”

“अच्छा अच्छा ,कुछ बाम वाम लगाया या नही?,है या मैं ला दूं घर से??,डिस्प्रिन खा लो आप,5 मिनट मे दर्द दूर हो जायेगा।”

अब क्या डिस्प्रिन खाऊँ? इससे अच्छा तो ऑफ़िस ही चली जाती,थिन्कींग ज़ोन मे कम से कम एक घंटा आराम तो कर लेती।

मुझे समझ आ गया था,मैं आज प्रियंका की अदालत मे खड़ी थी जहां वो जब जी चाहे मुझे फांसी पे लटका सकती थी,मेरे बचने की कोई उम्मीद नही थी,इसीलिये मै उसके लिए चाय बनाने रसोई मे चली गयी।

मेरे पीछे वो भी आ गयी।

“घर बड़ा सुन्दर सजाया है आपने,भाई साब का नाम क्या बताया।”

“अभी मैने बताया ही कहाँ ??।”

अब मै भी मज़े ले रही थी,जब ओखली मे सर दे ही दिया तो मूसल से क्या डरना।

“हां,हां,,बड़ा प्यारा नाम है आपका,पर ज़रा बोलने मे कठिन है ना।”

“अच्छा इसीलिये आपके भाई साब मुझे अपर्णा नही बुलाते।”

और मैं हंसने लगी,उस बेचारी को मेरा पी जे समझ नही आया।पर फिर हमारी जो बातें शुरु हुई तो सीधे 1बजे उसे होश आया की उसके बेटे का घर आने का समय हो गया है।

आखिर हूँ तो मै भी औरत ही,बातों मे रस तो मुझे भी मिलता ही है। साढे तीन घंटों में उसने पूरे मालपानी का कच्चा चिट्ठा सुना के रख दिया, मिसेस सूद दिल्ली की हैं,मिस्टर सूद यहाँ डी आर डी ओ मे थे,अब रिटायर होने के बाद से यहीं घर बना लिया,दोनो बच्चे शादी के बाद से ही यू एस मे हैं ।।

मिसेस गोल्वलकर,मिसेस शिर्के,मिसेस पानिग्राही ,सभी की जन्म पत्रिका उसने सारे गृह नक्षत्रों के साथ ही मुझे रट्वा दी।

“चलती हूं यार ऐपी,बातों मे देख ना पता ही नही चला कब 1बज गया।वैसे मुझे तो पहले पहले लगा की तू ज़बान की बिल्कुल ही कच्ची है,पर तू भी खूब बोलती है,है ना।”

“हां और क्या ? मै भी बातों की व्यापारी हूँ ।”

जहां हमारी बातें बड़ी नफ़ासत से आप आप से शुरु हुईं थीं वहीं आप से तुम और 3 घन्टे बीतते बीतते तू पर आ गईं ,वो मेरे लिये प्रिया बन गयी और मै उसके लिये ऐपी।।

प्रिया वाकई बड़ी खुशमिजाज़,खुशरंग लड़की थी,पहले पहले मै जहां उससे बचने की कोशिश करती थी,वही अब मुझे धीरे धीरे उसका साथ भाने लगा था।

मेरे शाम को घर लौटने के वक्त पे वो अक्सर मुझे नीचे पार्क में या ऊपर गैलरी मे ही मिल जाती और फ़िर उसका बातों का पिटारा खुल जाता,और अनु हम दोनों को बातें करता छोड़ आगे बढ़ जाते।

“अपर्णा ! देख मैं आज तेरे लिये क्या लेके आयी हूँ ।”

उसके हाथ मे केसरोल देख कर मैं अन्दर से खूब खुश हो जाती ,कि चलो खाना बनाने की झंझट से मुक्ति मिली।

“करेला! मेरे इनको मेरे हाथ का करेला बहुत पसंद है।तो मैनें सोचा तुझे भी खिला के देखूँ ।खा के बताना कैसा लगा,तुझे भी बनाना सिखा दूंगी।”

थोड़ी देर पहले का उत्साह उड़न-छू हो गया,करेला भी कोई चीज़ है खाने की। पर ऊपर से मुस्कुरा के उसके हाथ से डोंगा ले लिया।

रात के खाने पे अनु को ही परोसा ,
” तुम नही लोगी ।”
“मैं कहाँ करेला खाती हूँ ।”
” हाँ,सही है,पहले ही इतना कड़वा बोलती हो,करेला खा लोगी तो राम जाने क्या कहर ढ़ाओगी।”

मैनें घूर के अनु को देखा पर उन्हें मुझे देखने की फुरसत ही कहाँ थी,वो तो करेले मे ही मगन थे,मैनें भी उनकी प्लेट से ही थोड़ा चखा
“करेला ऐसा भी बनता है! वाह ! प्रिया के हाथ मे जादू है”।

ऐसे ही प्रिया अपने छोटे मोटे कारनामों से मुझे मंत्रमुग्ध करने लगी थी,उसे वो सारे काम बखूबी आते थे,जो मेरे लिये “रॉकेट साईंस” थे। सिलाई कढाई बुनाई की वो ऐसी मास्टर थी की जटिल से जटिल डिसाईन भी सिर्फ किताबों से देख ही सुलझा लेती और मुश्किल से 5 दिनों मे बुन बान के खतम कर देती।।

मेरी ऐसी रोजमर्रा की कई परेशानियों का वो उपाय बन गयी थी,आलू ,टमाटर, चीनी ,चाय पत्ती जैसी छोटी मोटी रसोई की जरूरतों के लिये तो वो मेरा बिग बाज़ार ही थी।।प्रिया मेरा जादुई चिराग थी
और मैं उसका अलादीन।

मुझे वैसे भी अपने ऑफिस की लिटररी सर्कल के एक जैसे रंगे पुते चेहरों की बनावटी मुस्कान और बनावटी अपनेपन से बड़ी चिढ़ होती थी,उन सब कागज़ के फूलों के सामने प्रिया थी चम्पा का ताज़ा खिला फूल।।।

एक बार मैनें उसे ऐसे ही शाम की चाय पीते हुए छेड़ भी दिया
“प्रिया तू ना मुझे चम्पा का फूल लगती है।पर तुझे पता है गुरुदेव ने चम्पा के लिये क्या कहा है?”

“चंपा तुझमे तीन गुण रूप-रंग-और बास, अवगुण तुझमे एक है,भ्रमर ना आवें पास।”

“अच्छा ! तुझे पढ़ने का बड़ा शौक है,पर एक बात बता,ये गुरुदेव हैं कौन?”

उसकी ये बचकानी बात सुन मुझे जो हंसी का दौरा पड़ा की वो खुद भी हंस पड़ी।

“अरे मेरी झल्ली ,बाद मे बताऊंगी गुरुदेव कौन हैं,पहले तू चाय तो पिला,मुझसे तो ढंग की चाय भी नही बनती।।”

दशहरे के समय सोसाइटी मे तरह तरह के नृत्य गीत स्पर्धाओं का आयोजन होता था,इस बार प्रिया भी इसमे भाग लेना चाहती थी,वो भी मेरे साथ।

‘”यार ये डांस वान्स नही होगा मुझसे।”
“क्यों नही होगा? प्लीज़ चल ना ,बड़ा मज़ा आयेगा,गुजराती फोक सॉन्ग है,बहुत प्यारा है,बस तू ,मैं और मेरी दो और सहेलियां हैं,हम चारों मिल कर करेंगे।”
“मुझे अनु से पूछना पड़ेगा,पता नही वो मानेंगे या नही।”
“अरे वाह ,झूटी,जैसे बड़ा पूछ पूछ के सब करती है,पूरी तो तेरी ही चलती है तेरे घर मे, भाई साहब तो बड़े सीधे हैं।”पीछे-पीछे घूमतें हैं तेरे।”
“हाँ जी क्यों नही,बड़े सीधे हैं तुम्हारे भाई साब ,फिर भी बिना उनसे पूछे नही बता सकती।”
“मेरे ये तो बोलते हैं,प्रिया तुझे जो करना है कर ,बहुत प्यार करते हैं मुझसे,और खूब बात मानते भी हैं,चल ठीक है ,पूछ के बता दे कल तक।”

नवमी की रात को पहले बच्चों का फिर महिलाओं का कार्यक्रम तय था,,हम सब तैय्यार होके वहाँ पहुँच चुके थे।

जितनी महिलाएँ आसपास थी ,सभी आंखों ही आंखों मे मेरा एक्स रे उतार रही थीं,सबको पहली बार मेरा दीदार मिला था।।।
मिसेस गोल्वलकर,पानिग्रही,सुगंधा जैन,भारती ओझा,मिसेस वेद,मिसेस मोहन्ती,मिसेस शिर्के और सबकी बॉस मिसेस सूद।

“तुम्हारे भी बच्चे का डांस है क्या?”
“जी नही!! वो ……..” मेरी बात आधे मे ही काट कर प्रिया बोल पड़ी,”हम खुद डांस करने वाले हैं ।”
” ओहह अच्छा।”और सब की सब मुस्कुरा पड़ी।

जितना सोचा था,उससे भी कहीं ज्यादा अच्छा हुआ हमारा डांस।।
कुछ देर पहले की जो महिलायें व्यंग से हमे देख मुस्कुरा रहीं थीं,वही हमें अब गले लगा लगा के बधाईयाँ दे रहीं थी।

बहुत खुशनुमा माहौल मे जब नीचे मेरे पतिदेव मेरे फोटो खींच रहे थे तभी प्रिया किसी का हाथ थामे हमारे पास चली आयी।

“अपर्णा इनसे मिलो ,ये रनवीर हैं,मेरे पति!”
मैं और अनु पहली बार ही रनवीर से मिल रहे थे, हमेशा प्रिया से सुना ही था की ,उनका बिजनेस है ,जिसके कारण आधा समय उन्हे कलकत्ता, अहमदाबाद ,दिल्ली घूमना पड़ता है,पुणे महिने मे बीस दिन ही रह पाते,पर जब भी यहाँ होतें हैं,प्रिया और अर्णव को खूब घूमाते फिरातें हैं,पर इसके बावजूद आज तक उनसे हमारा मिलना नही हुआ था।
रनवीर सच मे काफी जिंदादिल और स्मार्ट थे,वो जल्दी ही हम सबसे घुल मिल गये।

“आपकी बहुत बातें सुनाती है प्रिया,ये आपकी बहुत बड़ी फैन है अपर्णा जी।”

“जी बहुत शुक्रिया!!”वैसे असल मे मैं इसकी फैन हूँ,मुझमे तो ऐसी कोई खूबी ही नही,ये तो प्रिया की मोहब्बत है बस।”

इसके दो तीन दिन बाद ही रनवीर एक बार फिर अपने कारोबारी आकाश मे गुम हो गये।।

नये साल का आगाज़ हो रहा था ,ऑफ़िस मे भी पार्टी होनी थी,ऑफ़िस के नये नये लड़के खूब चहक महक के पार्टी की तैय्यारियों मे लगे थे।

ओरिक्रोन इस दफ़ा पहली बार इतने बड़े पैमाने पे फैमिली पार्टी कर रहा था,सभी बहुत बहुत उत्सुक थे,अनु को भी हाथ पैर जोड़ के मना चुकी थी साथ चलने के लिये,पर ऐन मौके पे उनके बॉस के बेटे की जन्मदिन की पार्टी के कारण वो मुझे कोर्टयार्ड के बाहर ही उतार के चलते बने।।

मैरियट में शानदार पार्टी चल रही थी। सारी राग रागिनियां जैसे वहीं बह चलीं थी,सब खुश थे मगन थे,खाते पीते इससे-उससे मिलते आगे बढते जाते थे।
तभी दूर से मुझे देख के हाथ हिलाती रागिनी चली आयी,रागिनी और मैने एक साथ ही ओरिक्रोन मे काम करना शुरु किया था,इसीसे हमारे बीच अच्छा पक्का सा रिश्ता था,हम एक दूसरे की हमेशा ही मदद करते,एक दूसरे से समय समय पे सलाह मशविरा लेते रहते थे।।

बस एक बात पे हमारी बात नही बन पायी थी,और विचारों मे थोड़ा टकराव आ गया था ,जब डेढ़ साल पहले रागिनी ने बताया की उसका बचपन का प्यार अचानक उसे कहीं मिल गया और वो उस लड़के के साथ रहने जा रही है,मैनें उसे बहुत समझाया पर मुझे दकियानूसी, परंपरावादी,बोदी,डरपोक, और तरह तरह के सुन्दर शब्दों से नवाज़ के वो उस लड़के के साथ शिफ्ट हो गयी,उसके बाद मेरी भी शादी हो गयी।।

जब आपकी दुनिया खूबसूरत हो जाती है तब आपको बाहर की दुनिया मे भी कोई कालिख कोई गन्दगी नज़र नही आती,ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ,अनु से शादी के बाद मैने रागिनी को भी माफ़ कर दिया,हम एक बार फिर दोस्त बन गये।

कुछ समय बाद उसने बताया की उसी लड़के से उसने शादी कर ली,अब तो मैं उसके लिये और भी खुश थी पर आज तक मिस्टर रागिनी से मुलाकात नही हो पायी थी।।

आज रागिनी की खुशी देखते ही बन रही थी,लिव इन मे रहने वाली लड़कियों के मन मे गाहे बगाहे एक अनचाहा अनजाना डर हमेशा समाया रहता है,पता नही साथ रहने वाला,सात जन्मों के, सात फेरों के बन्धन मे बंधना चाहेगा या नही,….उसी हां,नहीं के फेर से आखिर रागिनी को मुक्ति मिल गयी थी,उसका रुम मेट उसका सोल मेट बन चुका था………आज उसकी खुशी उसके हर हाव भाव से,उसके हर साज शृंगार से ,उसके हर ओर छोर से बह रही थी……..वो भागी भागी आयी और मुझे गले से लगा लिया,बहुत खुश थी वो क्योंकि आज वो पहली बार हम सब से अपने पति को मिलवाने जा रही थी।।।पर……..


“ऐप्स इनसे मिलो ,ये मेरे साहब हैं,रनवीर जी।”
“ऐण्ड डार्लिंग ये है मेरी सबसे खास सहेली अपर्णा।”

मैनें उसे देखा,उसने मुझे।।।।

कुछ दो सैकेण्ड के लिये मुझे लगा जैसे पृथ्वी मेरे ही चारों ओर चक्कर काटने लगी है,या मैं स्वयं कोई गृह ,उपग्रह बन कर सूर्य की परिक्रमा कर रही हूँ। ऐसा ज़ोर का चक्कर तो मुझे कभी नही आया था,
मेरी आंखो के सामने कई सहस्त्र जुगनू नृत्य कर रहे थे,कान जैसे कुछ सुनना तो चाहते थे,पर अशक्त थे,मेरी सभी ज्ञानेन्द्रीयों और कर्मेन्द्रीयों ने अपने कार्य से त्यागपत्र दे दिया था।।

मेरे चेहरे का उड़ा हुआ रंग देख कर रागिनी घबरा गयी।।
” what happened apps ,r u all right??”
” मैं ठीक हूँ,रागिनी।।सुबह से काम के चक्कर मे खाना भूल गयी ,शायद इसीलिये बी पी डाउन हो गया लगता है।”

मेरा उस निर्लज्ज को दुबारा देखने का बिल्कुल मन नही था ,पर वो तो जैसे मुझे अपनी कैफियत वही देने को आकुल हो रहा था।।
आंखों ही आंखों मे उसने मुझसे मेरी दोनों सहेलियों से की जाने वाली बेवफाई के लिये माफ़ी मांग ली।।
लेकिन मेरी आंखों से निकलते अंगारे इतने तेज थे कि,वो झुलस गया,उससे वो आंच सहन नही हुई और एक बुरा सा बहाना बना कर चलता बना।।।

रागिनी को इतना खुश ,इतना चहकते मैने कभी नही देखा था,वो पार्टी मे पूरी तरह डूबी थी बिल्कुल वैसे ही जैसे रनवीर के प्यार मे,पर अब मुझे वहाँ घुटन सी हो रही थी,जल्दी ही बॉस से मिल के मैं वहाँ से निकल आयी।।

मेरे फ़ोन करने से अनु भी जल्दी ही वापस आ गये,उन्हें देखते ही मेरे सब्र का बान्ध टूट गया।।
उनके गले से लगे मैं रोती रही…..
“अरे कुछ कहोगी भी ,बाबू हुआ क्या,,क्यों इतना रो रही हो?? देखो तुम बताओगी नही तो मेरे दिमाग मे तो ऊलजलूल खयाल आने लगेंगे ना,बॉस से बहस हो गयी क्या,अच्छा वो चिराग के बच्चे ने कुछ परेशान किया क्या?”
“मेरा अच्छा बच्चा ,जल्दी से बता दे अब क्या हुआ?”अच्छा रुको मैं प्रिया को बुला के लाता हूँ,शायद उससे मिल के तुम्हें ठीक लगे।”

“नही,रुको प्रिया को मत बुलाना।”

और उसके बाद एक सांस मे मैनें अनु को रनवीर की सारी करतूत कह सुनाई।।

“अभी तो नही पर सुबह सबसे पहले जाके प्रिया को रनवीर की सच्चाई ही बताऊँगी ।”
“बताना ही है ,तो अभी क्यों नही?”
“आज की रात तो चैन से सो ले बेचारी,फिर तो….”
” वाह ! क्या खूब सहेली हो तुम,उसे एक रात की चैन की नींद जो दे दी।”
“ऐसा क्यों बोल रहे अनु?”
“इसलिए मेरी जान ,कि जैसे तुम आज की रात उसे सुकून से सोने देना चाहती हो,मैं चाहता हूँ,वो हर रात इसी सुकून के साथ सोये,तुम्हारे उसे सब कुछ सच बता देने से क्या होगा? या तो वो अपने पति को हमेशा के लिये छोड़ जायेगी ,या अपना मन मार के अपने बच्चे के भविश्य के लिये रनवीर की हरकत को अपनी किस्मत मान सब कुछ स्वीकार लेगी,पर उसके बाद उसका जो खुशहाल गृहस्थी का चित्र है वो तुम्हारे सामने हमेशा के लिये धूमिल हो जायेगा,वो फिर कभी तुमसे उतनी आत्मीयता से नही जुड़ पायेगी।”

“दूसरा ये हो सकता है, कि वो तुम्हारी बात सुनते ही भड़क जाये और अपने पति का घर छोड़ दे,पर उसके बाद क्या??,मायके में अपनी भाभी से परेशान माँ की शिकायत वो अक्सर तुमसे लगाती ही है,मतलब वहाँ से उसे कोई विशेष सहारा नही है,
मान लो तुम्हारे रिबेल विचारों से प्रभावित हो उसने कोई नौकरी कर भी ली तो क्या इतनी कम उम्र की
अकेली औरत के लिये हमारा सभ्य समाज उतना ही सभ्य रह पाता है,कदम -कदम पर अग्नि परीक्षा देती इस सीता को कहाँ कहाँ जाके बचा पाओगी, आज कम से कम उसके पास एक सुरक्षित छत है ,पति नाम का कवच है जो उसे समाज की ऊँची नीची पगडंडी मे गिरने नही देता,तुम उसे सब सच बता कर उसका संबल ,उसका सहारा उससे छीन लोगी।”

“तो इसका मतलब रनवीर को इतनी बड़ी गलती के लिये भी माफ कर दूं ।”

“हम तुम उसे माफ़ करने या सज़ा देने वाले कौन होतें हैं अपर्णा! मैं तो बस ये कह रहा कि जो गलती प्रिया ने नही की उसकी सज़ा प्रिया को मत दो,मैं और तुम रनवीर से भी बात कर के देखेंगे की आखिर ऐसा क्यों किया उसने।”

“हाँ,क्यों नही ,हो तो तुम भी मर्द ही ,अपनी ज़मात की ही तरफदारी करोगे ना ,अगर इसी का उलट हुआ होता तब भी क्या रनवीर को बताने नही जाते।”

“नही जाता,कभी नही जाता,अगर प्रिया के साथ रनवीर खुश होता ,तो मैं कभी उनके संसार मे आग लगाने नही जाता।”

“हो सकता है अनु,पर मैं तुम्हारे जैसे बड़े दिल वाली नही हूं,मैं कल ही जाके प्रिया को सब सच बता दूंगी।”

सुबह से हर एक कॉफ़ी के कप के साथ सिर्फ क्या बोलना है,और कैसे बोलना है ,यही अभ्यास करती रही,मन ही मन प्रिया के भविष्य का ताना बाना भी बुन लिया,अपने मन को पूरी तरह समेट कर आखिर मैनें उसके दरवाजे पे दस्तक दे ही दी।

“अरे आजा अन्दर ,मैं बस चाय ही चढ़ाने जा रही थी,सुबह सारे काम निपटा के आराम से बैठ के चाय पीने का मज़ा ही अलग है,है ना?”

“तू ऐसी रोयी सी क्यों दिख रही एपी ? भाई साहब से झगड़ा हुआ क्या?”

एक गहरी सांस लेके मैं खुद को तैय्यार करने लगी ,वही बैठा अर्णव अपनी किसी पेंटींग मे खोया था,और मैं उस बच्चे मे खो गयी…..बेचारे इस बच्चे का क्या कसूर,कैसा निर्दयी आदमी है,ऐसा फूल सा बच्चा,ऐसी हीरे सी बीवी और देखो ,कहीं और भी अपना एक संसार सजाये बैठा है…..पर जो भी हो इन दोनो प्राणियों को देख के कहीं से नही लग रहा था कि ये रनवीर के सताये हैं,इस पूरे घर में रनवीर की कस्तूरी घुली हुई थी,उसका मुकम्मल संसार यहाँ भी सजा था,उसके प्यार मे उसकी बीवी बुरी तरह से डूबी हुई थी,अपने बेटे का हीरो था रनवीर,,इन दोनो के सुखों की धुरी था वो।।।

भले उसकी दुनिया मे कोई और भी थी पर इन दोनो की तो पूरी दुनिया ही रनवीर था।

मेरे गालों पे कब दो बूंद आंसू लुढ़क आये,पता ही नही चला।
अचानक प्रिया ने आकर मुझे गले से लगा लिया
“तू मन क्यों छोटा करती है एपी,तुझपे भी भगवान अपनी मेहर बरसायेंगे,देखना एक साल होते होते तेरी गोद में तेरा अर्णव आ जायेगा।”

मेरा अर्णव को देख के दुखी हो जाना प्रिया को किसी और ही सोच की तरफ मोड़ गया,अरे जब हम मेहर बरसाने देंगे तभी तो बरसायेंगे ना भगवान भी।उसकी बात सुन मै मुस्कुरा पड़ी।

“अच्छा अब बता,तू क्या बताने आयी थी। तूने सुबह मैसेज किया था ना ,कुछ बहुत ही ज़रूरी बात बतानी है,चल बता भाई,सस्पेंस खतम कर।”
“ऐसा खतरनाक मैसेज किया तूने ,मै तो तब से सोच मे पड़ीं हूँ,कि मैडम आखिर बताने क्या वाली हैं ।”

मैं फिर से मुस्कुराने लगी।
“अच्छा सुन,तुझे आज तक तेरे भाई साहब यानी मेरे मियाँ जी का नाम नही पता ना,वही बताने वाली हूं ।
“अनुपम “!!

और मैं हंसने लगी,मुझे हँसता देख वो दोनो भी खिलखिला पड़े,कुछ देर इधर उधर की बात कर मैं उससे बिदा लेके घर जाने उठी ही थी की उसका फ़ोन बज उठा।

जल्दी जल्दी बातें खतम कर फ़ोन रख के उसने मुझे बताया,कि रनवीर का फ़ोन था
“तुम दोनों भी चलो ना हमारे साथ,मैं इन्हे टिकट बुक करने कह देती हूं,अभी इन्होनें 2ही सीट बुक की हैं,दो और हो जायेंगी।”

“ना प्रिया,कल की पार्टी के कारण अभी तक सर दर्द कर रहा,तुम लोग जाओ आराम से।।।।कैसी लगी बताना ,हम बाद मे चले जायेंगे,वैसे कौन सी फिल्म जा रहे हो।”

“बाजीराव मस्तानी।”

मैं अपने बढ़ते सर दर्द और बी पी के साथ अपने घर वापस चली गयी।।।।

aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

7 विचार “बाजीराव – एक प्रेम कहानी” पर

  1. क्या यह कहानी पुरी हो गई ,,, कितना विश्वास है प्रिया को अपने पति पर और उसके पति ने कैसे उसका विश्वास तोड़ दिया प्रिया को जब पता चलेगा तो क्या होगा उसका☹️☹️

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