बाजीराव -2

     ……………
                  मूवी का नाम सुन मन अजीब सा खट्टा हो गया,बहुत भारी कदमों से मैं घर वापस आ गयी

      जिंदगी अपनी गति से चल रही थी,पर मेरे अन्दर ही कुछ टूट गया सा लग रहा था,जिसकी किरचें मेरी रगों मे दौड़ दौड़ के मुझे बार बार रनवीर की बेवफाई याद दिला रही थी,बार बार ये याद दिला रही थी कि एक औरत होते हुए भी मैं दो औरतों के साथ हो रहे अन्याय को बदल नही पा रही,कभी कभी लगता भी कि मैं क्यों इतना सोचती हूँ,संसार में ऐसे बहुत से लोग है जिन्हें जिन्दगी मे परेशानियों ने घेर रखा है,पर क्या मैं सबकी मदद कर सकतीं हूँ? नहीं ना ! तो जो जहां जैसा है,वैसे ही रहने देना चाहिये ।।।।क्या मैनें ही सब सही करने का ठेका ले रखा है??
   
             ये विचार कुछ क्षणों के लिये मन को राहत देता पर फिर प्रिया और अर्णव का चेहरा मेरी आंखों के आगे घूम जाता ,और मैं एक गहरी उदासी मे डूब जाती।।
     
               इस घटना को सिर्फ दो ही दिन बीते थे ,पर ये दो दिन दो वर्षों की तरह ही लम्बे प्रतीत हो रहे थे,इन दो दिनों मे मैने सिर्फ और सिर्फ सोचा ही था,सिक्के के दोनो पहलू,प्रिया का जीवन ,अर्णव,रनवीर और इन सब के बीच जाने कहाँ से आ के फंस गयी मैं।।
  
     अनु को किसी प्रेसेंटेशन के लिये बैंगलूर जाना पड़ गया था,सो वो भी नही थे,मुझे रोने से टोकने के लिये।।।।
      
                        वैसे भी अभी मैं एकान्त चाह रही थी,मुझे जी भर के रोना था और मन भर के सोचना था ,इसी रोने और सोचने के बीच ही दो दिन बीत गये,मैने ऑफ़िस से भी छुट्टी ले ली थी,दिमाग मे बस प्रिया अर्णव और रनवीर घूम रहे थे…….तभी मन मे अचानक एक और नाम कौंध गया ,,रागिनी!!!

                रागिनी तो मेरे फ्रेम से एकदम ही गायब हो गयी थी,शायद प्रिया के लिये मन मे इतनी अधिक सहानुभूति आ गयी थी कि रागिनी की तरफ ध्यान ही नही गया ,पर हुआ तो उस बेचारी के साथ भी वही था,जो प्रिया के साथ।।

       अचानक खयाल आया की क्यों ना रागिनी से ही एक बार बात की जाये।।।।
   
                  अनु ने जाने से पहले बहुत समझाया था की ज्यादा सोचना मत ,दूसरों के मामलों से दूर रहना,सब कुछ अच्छी बच्ची की तरह सुनती,मैं  उनके सामने चुप ही थी ,वैसे भी उन्हें एक बात को इतना लम्बा खींचना पसंद नही आता था।।।।।

        जाने क्या सोच मैं उठी और तैय्यार हो रागिनी के घर की तरफ चल पड़ी,उसका घर पिम्परी मे था ,और अभी शाम के 7बजे ट्रैफिक अपने पूरे शबाब पे होता था,ऐसे समय अपनी गाड़ी से जाना जरा मुश्किल था,दुसरी बात मैंने उसका घर देखा भी नही था,शादी के बाद से उसने कभी हमे घर बुलाया  नही था,वो अपने मे व्यस्त थी और हम लोग अपने मे।

     टैक्सी लेकर मैं उसकी सोसायटी पहुचीं ,धड़कते दिल से उसके घर पे दस्तक दी….मुझे पता था,रागिनी 5.30 तक घर आ जाती है,दरवाजा रागिनी ने ही खोला।

     ” what a pleasant surprise apps,,अन्दर आ जा,अनुपम भी हैं क्या?”

  “नही,मैं अकेले ही आयी हूँ ।”तुझसे कुछ बात करनी थी,कुछ पूछना था,इसीलिये अकेली ही चली आयी।”

“आ बैठ,मैं पानी लेकर आती हूँ ।”

      मैं रागिनी का घर ,उसका महल देखती ही रह गयी,इतनी कलात्मक अभिरुचि की है रागिनी ,ये तो मुझे पता ही नही था,मेरे साथ जब रहती थी तो मेरा आधा समय सिर्फ घर की साफ सफाई और उसका सामान समेटने मे ही खतम हो जाता था,मैं कितना भी समझा लूं वो अपने अल्हड़पने या कह लो आलस को छोड़ ही नही पाती थी,ये घर तो कहीं से भी रागिनी का लग ही नही रहा था।।।।

       दरवाजे पर ही लकड़ी का बना सिपाही तैनात था,जिसके पैरों के पास पीतल का कलात्मक पानी से भरा बरतन रखा था,जिसमें ताज़े खिले फूल महक रहे थे।।
      लिविंग रुम मे उसका टर्किश गुदगुदा कालीन बिछा था,जिसमे उसके महंगे और ब्रांडेड सोफे धन्से जा रहे थे,सोफे के ठीक पीछे की दीवार पे आदमकद नटराज की काली मूर्ती चमक रही थी,ऊपर क्रिस्टल का झाड़फानूस दमक रहा था, एक तरफ ब्रौस के बड़े बड़े फूलदान सजे थे ,तो दुसरी तरफ एक रंगबिरंगी छोटी सी साईकल रखी थी,जिसमें कुछ इनडोर प्लांट्स सजे थे।।।।

       घर इतना खूबसूरत और कलात्मक था की बड़े से बड़ा कला पारखी भी नतमस्तक हो जाये,इस सुन्दर घर का सबसे सुन्दर कोना था वो दीवार जिसपे रागिनी ने अपनी कई सारी तस्वीरें लगा रखी थी,नीचे लकड़ी की बनी छोटी से शैल्फ थी,जिसके ऊपर उसे मिले अलग अलग अवार्ड्स सजे थे,और पीछे दीवार पे तस्वीरें,सबसे बीच मे उसकी आदमकद  तस्वीर थी,अकेली!!  और आस पास बाकी तस्वीरें,किसी मे महिला दिवस पे अवार्ड लेती हुई रागिनी किसी मे बेस्ट एम्प्लायी का अवार्ड लेती हुई रागिनी,पर इतनी तस्वीरों मे किसी भी तस्वीर मे रनवीर नही था,बल्कि हमारे बॉस सुनील 3-4तस्वीरों मे रागिनी के साथ बड़ी आत्मीयता के साथ मुस्कुराते नज़र आ रहे थे।।।

     “अरे तू वहाँ खड़ी है,चल आजा मैं तेरे लिये तेरी पसंदीदा एस्प्रेस्सो बना लायी हूँ ।”
  
    “घर बहुत सुन्दर  है,रागिनी!” थैंक यू सो मच ,फ़ॉर सच आ नाइस कौफ़ी ।”तुझे अभी भी मेरी पसंद याद है।”
   “कैसे भूल सकती हूँ एप्स ,तेरी रगों मे खून से ज्यादा तो कौफ़ी ही घुली है।”
  ऐसा कह कर रागिनी ज़ोर से हंस पड़ी ।

“हाँ ! जैसे तेरी रगों मे रनवीर का प्यार घुला है।”

पर अबकी बार रागिनी मुस्कुरा नही पायी, मैं दुविधा मे थी कि अचानक रागिनी मेरे पास आ कर बैठ गयी,मेरा हाथ अपने हाथों मे ले उसने कहना शुरु किया।।

   “अपर्णा तुझसे बहुत पहले ही ये सब बताना चाहती थी,पर सब कुछ इतनी जल्दबाजी मे हुआ की मुझे तुझसे या किसी और से कुछ कहने का समय ही नही मिला।”
“तुझे तो पता ही है की मैं शुरु से ही सुनील सर के साथ प्रोजेक्ट मे थी,साथ काम करते हुए हमारी अच्छी दोस्ती भी हो गयी।”
  
   “हाँ,ये तो मैं  अच्छे से जानती हूँ,बल्कि सारा स्टाफ जानता है कि तू उनकी फेवरेट है।।”

    “बस ,दोस्ती जैसे जैसे गहरी होती गयी,हम एक दूसरे के परिवारों के बारे मे भी जानते गये,सुनील की पत्नि “वूमेन्स एरा” की एडिटर है, गज़ब की तेज-तर्रार औरत है,उसे सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में ही सोचना पसंद है,अपने कैरियर को लेके वो इतनी पसेसिव है की शादी के सात सालों मे भी उसने बच्चे के लिये नही सोचा ।।।।।
    पहले इन्ही छोटी-छोटी बातों पे होने वाले पति पत्नि के मतभेद धीरे-धीरे झगडों मे बदलने लगे,और फिर उनके बीच की खाई इतनी गहरी हो गयी कि उसे पाटने की कोई गुंजाईश दोनो के बीच नही रह गयी।।।और दोनो ने तलाक लेने का निर्णय ले लिया।।
     ऐसी उदासी और टूटन भरे वक्त पे मै सुनील के साथ उसका सहारा बनी खड़ी थी,उसके लिये मेरी सहानभूति कब प्यार मे बदल गयी ,पता ही नही चला,जब कोर्ट के लीगल नोटिस के कारण कुछ समय के लिये सुनील और वनीता  को अलग रहना था,तब सुनील मेरे साथ रहने चला आया,हम दोनों ही शादी के पहले किसी से कुछ बताना नही चाहते थे,मैं  सुनील के साथ रह रही ,ये बस तुझे पता था,पर तुझे भी आधा अधूरा ही बताया था मैनें ।।

    “जाने कहाँ से वनीता को इस बात की भनक लग गयी,और वो एकदम से भड़क गयी ,उसकी स्त्री सुलभ डाह अचानक ही सर उठा के खड़ी हो गयी और उसने सुनील से तलाक को मना कर दिया।।।”
    “बहुत समझाने बुझाने पर  वो तलाक के लिये तो तैय्यार हो गयी ,पर मुझसे उसे ऐसी जलन हुई की उसने एकदम ही बचकानी सी शर्त रखी कि जब तक मैं किसी और से शादी ना कर लूं वो कोर्ट मे हाज़िरी नही देगी……..हमें तो कुछ सूझ ही नही रहा था,पर तभी……”
     
      रागिनी ने पानी पी के अपना गला तर किया और फिर आगे बोलना शुरु किया।।

    “मेरे बचपन का दोस्त रनवीर मसीहा बन के हमारी मदद के लिये आगे आ गया।।।
      असल मे हमारा एक ओल्ड स्कूल ग्रूप है ,उस मे कुछ दिन पहले ही किसी ने  रनवीर का नम्बर भी जोड़ दिया,बातों बातों मे ही पता चला की वो भी यहीं पुणे रहता है,तब हमने मिलने का सोचा ।।।
    पुराने दोस्तों की बात ही अलग होती है………,जब वो मुझसे मिलने मेरे घर आया तब सुनील भी घर पे ही थे,बातें चली तो चलती चली गई और हमने उसे सारी बातें बता दी।।।
         उसने हमारी मुसीबत का एक अजीब सा हल निकाल लिया,वैसे भी जब तक सुनील का तलाक नही हो जाता मै और सुनील शादी नही कर सकते थे।।।
       वनीता ने सिर्फ  मेरी शादी की शर्त रखी थी उसकी शर्त ये तो थी नही की वो मेरी शादी मे आयेगी,तो बस उस दिन  औफ़िस पार्टी मे सिर्फ वनीता को दिखाने के लिये रनवीर मेरे पति बन के आये,उनका प्लान बस वनीता से मिल के निकलना था,वो तेरे साथ ही खड़ी थी,कुछ बनावटी ना लगे इसलिए मैनें पहले रनवीर को तुझसे मिलाया,खैर उस दिन तो तेरी तबियत बिगड़ गयी  और तू तुरंत ही चली गयी……रनवीर कुछ देर वनीता सुनील और मेरे साथ रहा,फिर वो भी चला गया।।।
    पर इस के बाद वनीता कुछ ठंडी पड़ गयी,उसका गुस्सा भी कम हो गया,और अब वो तलाक की सारी प्रोसेस मे सहयोग करने के लिये तैय्यार भी हो गयी है।।।

     “मैं बहुत पहले ही तुझे अपने और सुनील के बारे मे बताना चाहती थी,पर सुनील ने ही मना किया की औफ़िस मे अगर खबर फैल गयी तो वनीता हमारा जीना मुश्किल कर देगी।”

    “तो इसका मतलब रनवीर तेरा पति नही है।”

    “नही मैडम रनवीर मेरा पति नही है,पर हाँ अगले महीने आखिरी सुनवाई है,फिर सुनील का तलाक हो जाने के बाद मै और वो शादी कर लेंगे और सिंगापुर की ब्रांच मे ट्रांसफर भी ले लेंगे।”

  “अरे वाह ! बहुत खूब ,तूने तो सब कुछ प्लान कर लिया है।।”

   “हाँ!अब मैं भी एक सुकून भरी जिन्दगी चाहतीं हूँ,पर ये बता की तू मुझसे क्या पूछना चाहती थी??

  मैं मुस्कुराने लगी……
            “ये पूछना चाहती थी डम्बो कि तूने अपने घर का इंटीरियर किससे करवाया,तू तो इतनी कला मर्मज्ञ नही है।”

    “नही जी मैं कहाँ ? ये सब सुनील का किया धरा है,उन्हें भी तो तेरे जैसे सारे पागलों वाले शौक हैं ,जहां जातें हैं,कुछ ना कुछ उठा लातें हैं,एक और शौक भी तुझसे मिलता है,किताबों का,कभी फुर्सत मे उनकी लायब्रेरी देखना खुश हो जायेगी तू।”
  
      बाहर हल्की हल्की सी बारीश शुरु हो गयी थी,और अन्दर बैठे हम दोनों खुशी की बौछारों से सराबोर थे,तभी मेरा फ़ोन बज उठा,प्रिया का फ़ोन था।

   “कहाँ है एपी?तेरा घर भी बन्द है,तूने  चाबियां भी नही छोड़ी मेरे पास।।जल्दी से घर आ जा,तेरे लिये एक सरप्राईस है।”

    मैं कुछ पूछती उसके पहले ही फ़ोन कट गया, मेरा काम तो हो ही गया था,रागिनी से बिदा लेके मैं घर को चल दी।।।।रास्ते भर मुस्कुराते हुए,गुनगुनाते हुए घर पहुचीं ,मन फूल सा हल्का हो गया था,मेरा मन प्रिया से मिलने को बहुत बेचैन था,मैं प्रिया के घर पहुचीं तो वहाँ वाकई मेरे लिये सरप्राईस था,अनु वापस आ गये थे।
   
      बैठक मे अनु ,रनवीर के साथ बैठे चाय पी रहे थे,मैं भी शामिल हो गयी।।।।

        “तुम तो कल आने वाले थे ना?

    “क्या मैडम ? हमने सोचा एक दिन पहले पहुचं के आपको सरप्राईस किया जाये पर गायब होकर आपने ही सरप्राईस दे दिया।”

   प्रिया हँसते हुए मेरे लिये चाय बनाने अन्दर चली गयी तब मैं रनवीर से मुखातिब हुई…

    “रनवीर मैनें उस दिन आपके लिये बहुत गलत सोच लिया,मुझे माफ कर दीजिये।”

    “इसमें आपकी क्या गलती,आपकी जगह कोई भी होता तो यही समझता,गनीमत रही की आपने प्रिया से कुछ नही कहा,वैसे मैं उसके लिये भी तैय्यार था,मुझे मेरे प्यार पे भरोसा था,मै प्रिया को समझा लेता।”

     “क्या समझा लेते मुझे?”

    “भाभी जी रनवीर नही मैं आपको समझाना चाहता था,कि आप प्लीज़ अपर्णा के हाथ की ज़हरीली चाय की तारीफ ना किया करो,बल्कि इसे अच्छी चाय बनाना सिखा दो,जैसी आप बनाती हो।”
    “क्या भाई साहब ,कुछ भी बोलते हो आप ,इतनी प्यारी सी है मेरी सहेली,मीठी चाय नही बनाती तो क्या ,मीठा गाती तो है।”चल एपी कुछ सुना दे अच्छा सा।”

    “ना !आज तो अनु सुनायेंगे ,मेरा पसंदीदा गाना….
   
  “तू बन जा गली बनारस की,मैं शाम तलक भटकूं तुझमें…….”
    
    बाहर होती हल्की बारीश और भीतर चलते हास परिहास में  मेरे मन की सारी कालिख धुल गयी थी…….

aparna…..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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