जीवनसाथी -113

      जीवनसाथी – 113

     समर कुछ देर को वहीं खड़ा रह गया। फिर खुद को और अपने  गुस्से को संभालते हुए पिया से कभी ना मिलने की कसम खाते हुए वहां से बाहर निकल गया।

  गुस्से में समर मुड़कर जैसे ही आगे बढ़ा कि सामने से आते हुए वेटर से टकरा गया और वेटर के हाथ की ट्रे पूरी की पूरी नीचे गिर पड़ी । जिसके कारण वहां मौजूद सभी लोगों का ध्यान समर और उस वेटर की तरफ चला गया। पिया ने भी समर को देख लिया समर ने एक नजर मुड़ कर पिया को देखा और वहां से बाहर निकल गया। पिया हैरान-परेशान सी उसके पीछे उठकर जाने को हुई कि, सामने बैठे लड़के ने उसे टोक दिया….-” आप कहां चली जा रही है?”

पिया ने उसे देखा..-” एक बहुत इमरजेंसी केस है! अगर नहीं गई तो मरीज की जान चली जायेगी, मर जाएगा वो।

और पिया समर के पीछे निकलने लगी लेकिन दो कदम आगे बढ़ कर ही एक बार फिर वापस मुड़ कर आई…-” एक बात और कहनी थी आपसे! मैं अभी शादी नहीं कर सकती! आई एम सो सॉरी! मेरी मम्मी ने अगर पहले मुझसे पूछ लिया होता तो आपको यहां तक आने की जहमत ही नहीं उठानी पड़ती।  
     सॉरी!

           टेबल पर रखा अपना पर्स उठाकर पिया तेज कदमों से समर के पीछे निकल गई । लेकिन पिया के बाहर आते तक समर अपनी गाड़ी निकाल कर वहां से जा चुका था।
    पिया ने वक्त देखा उसके अस्पताल जाने का समय हो चुका था अब मुड़कर उस रेस्टोरेंट में जाने की उसकी इच्छा नहीं हुई।  वह गुस्से में सीधे अपने अस्पताल की ओर चल पड़ी उसे समर का व्यवहार समझ ही नहीं आ रहा था।

     पिया के फोन पर किसी का मैसेज आया और पिया ने इनबॉक्स देखा उसमें एक रोज पहले का समर का भी मैसेज पड़ा था।
    अब पिया को समझ में आया कि क्या बात हुई थी? उसने व्यस्तता में समर का मैसेज ही नहीं देखा था! उसे पता ही नहीं था कि समर ने उसे आज मिलने के लिए बुलाया है, उसने तुरंत समर के मैसेज का जवाब दिया और मुस्कुरा कर अपनी गाड़ी निकाल कर अस्पताल की ओर चली गई।

  अस्पताल पहुंचकर पिया ने समर को कई बार फोन किया, लेकिन समर फोन नहीं उठा सका।  वह पूरा दिन व्यस्तता में बीत गया। शाम में समर आदित्य केसर और राजा,प्रेम के साथ दून  के लिए निकल गया।

  जाने से पहले राजा बांसुरी के पास मिलने चला आया…..

” मैं जल्दी वापस आ जाऊंगा तब तक अपना और मेरी नन्ही बांसुरी का ख्याल रखना।

“आपसे किसने कह दिया कि आप की नन्हीं बांसुरी आने वाली है?”

“उसी ने कहा है जो आने वाली है।। एक दिन सपने में आई थी, और कहने लगी पापा मैं जल्दी से आपकी गोद में खेलने के लिए आने वाली हूं।”

राजा की बात पर बांसुरी मुस्कुराने लगी…-” कुछ भी बातें मत बनाइए, मैं जानती हूं बांसुरी नहीं आने वाली। बल्कि मेरे पास छोटा सा राजा अजातशत्रु आने वाला है।”

“अब तुम्हें कैसे पता कि राजा अजातशत्रु आने वाले हैं तुम्हारे पास।”

“सारी हरकतें बंदरो वाली है इसकी। अंदर ऐसी-ऐसी खुरापातें मचाता है, कि समझ आ जाता है, कि आपका बेटा ही है ।
      अगर अंदर बेटी होती तो मेरी जैसी शांत सुशील गंभीर और प्यारी सी होती। बेटा है इसीलिए आपके जैसा है। खुरापाती बदमाश और शैतान! 

“ओहो शांत सुशील और गंभीर! जरा देखूं चेहरा कितनी गंभीर हैं आप? “

“चलिए जाइए अब वरना आपको देर हो जाएगी!”

“बात तो आपकी सही है हुकुम! अगर समय पर नहीं निकला, तो समर फिर ऐसे कार भगाएगा की सीधे दून में जाकर रुकेगा।
    बल्कि फिर ऐसा होगा कि यहां से फ्लाइट लैंड बाद में करेगी समर की गाड़ी वहां पहले पहुंच जाएगी।”

    राजा की बात पर बांसुरी खिलखिला कर हंस पड़ी…-” बहुत छेड़ते हैं आप हम सभी को।  क्या मैं क्या समर और क्या प्रेम भैया किसी को नहीं छोड़ते।”

“क्यों छोडूँ?  मैं तुम तीनों में से किसी को कभी छोड़ना ही नहीं चाहता! और अगर भगवान की मर्जी रही तो कभी छोड़ना भी नहीं पड़ेगा। साथ जिएंगे साथ मरेंगे। “

बांसुरी ने मुस्कुराकर पास रखी प्लेट से कुमकुम का तिलक राजा के माथे पर लगाया और छोटी सी कटोरी से दही चीनी निकालकर राजा को खिला दिया….-” अब यह किसलिए हुकुम? पहले तो कभी दही नहीं खिलाई तुमने। “

“जी !क्योंकि पहले यह काम मां साहेब किया करती थी।  आप कहीं भी बाहर जाने वाले होते थे, तो वह हमेशा आपके माथे पर  तिलक लगा कर और दही चीनी खिलाकर ही आपको बाहर भेजती थीं। उनकी रीत उनकी बहू को निभानी ही होगी ना। “

राजा ने मुस्कुराकर बांसुरी के माथे पर अपना प्यार अंकित किया उसे कुछ घड़ी निहार कर बाहर निकल गया।

   *******

   अगले दिन सुबह से ही कोर्ट परिसर में आवाजाही बनी हुई थी अलग-अलग जगहों पर छोटी छोटी सी टेबल पर छतरी लगाएं और  कुर्सी सजाए वकील बैठे अपने लिए केस ढूंढने में व्यस्त थे।

    ठाकुर साहब का केस लग चुका था ठाकुर साहब को कोर्ट में मौजूद रहने के लिए समन जारी किया जा चुका था, लेकिन ठाकुर साहब उस वक्त जो भागे थे वो अब तक नदारद थे ।
   उनकी तरफ से जिरह करने उनका वकील मौजूद था अपने केस का नंबर आने पर राजा समर और आदित्य के साथ कोर्ट परिसर में पहुंच गया | केसर को वो लोग जानबूझ कर उसकी सुरक्षा के लिए साथ लेकर नही आये थे।

    अब क्योंकि समर ने वकालत कर रखी थी और उसके पास बाकायदा प्रैक्टिस के लिए लाइसेंस भी था, इसलिए ठाकुर साहब के खिलाफ बाँसुरी की तरफ से केस वही लड़ रहा था।
   
      बांसुरी के द्वारा तैयार किए गए सारे मसले जो ठाकुर साहब के खिलाफ थे को पूरी तरह से चांदी के वर्क से सजाकर समर ने कोर्ट में पेश कर दिया था।
  ठाकुर साहब के लीगल और इलीगल सारे धंधों  का कच्चा चिट्ठा उस फाइल में मौजूद था। उनके सारे कारनामों की लिस्ट तारीख के साथ वहां दर्ज थी। इन सारे कागजातों को कोर्ट में पेश करने से पहले ही इनकी एक सीडी बनाकर पहले ही जमा की जा चुकी थी।
      बहुत बार ऐसा भी होता है कि कुछ माननीय जज महोदय फैसला देने से पहले और कोर्ट में आने से पहले अपना होमवर्क करके आते हैं। अक्सर ऐसे माननीय कोर्ट केस से संबंधित फाइलों का अध्ययन घर पर ही कर कर आना पसंद करते हैं। ऐसे ही लोगों में एक थे माननीय न्यायाधीश  श्री दिनकर सूरी जी!!
   उन्होंने ना सिर्फ केस की फाइलें पढ़ ली थी, बल्कि ठाकुर साहब के बारे में अपने लेवल पर जाकर काफी कुछ जान समझ भी लिया था।
   समर भी इस बार कोई पेंच खाली नहीं छोड़ना चाहता था। इसलिए केस लगने से पहले ही जज के बारे में मालूमात करके वह उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर सारी बातें समझा चुका था।

     ऐसा प्रतीत हो रहा था कि केस एकतरफा हो चुका था। ठाकुर साहब के खिलाफ जितने सारे सबूत जमा थे, वे उन्हें सलाखों के पीछे ले जाने के लिए काफी थे। बावजूद गुनहगार ही वहां मौजूद नहीं था। कोर्ट के द्वारा पूछे जाने पर ठाकुर साहब के वकील ने उनकी गुमशुदगी के बारे में कोर्ट को जानकारी दे दी।

  वैसे तो ठाकुर साहब  के कारनामे गिनती से बाहर के थे लेकिन जिस बात पर उन पर बांसुरी ने केस लगाया था वह था-‘ बनारस में राजा पर हुआ जानलेवा हमला।”

    उस हमले से संबंधित सारी बातें और सारे गवाह बांसुरी ने समर को हस्तांतरित कर दिए थे। बनारस में उस वक्त जब राजा को गोली लगी थी घाट में बांसुरी के अलावा पांडे और उसकी महिला मित्र सुमन मौजूद थे। बांसुरी के बताए अनुसार और रोहित की मदद से समर ने उन दोनों को भी ढूंढ निकाला था।
      फिलहाल पांडे जी अपने पुश्तैनी व्यापार को आगे बढ़ा रहे थे यानी कि उसी यमराज के खौलते कड़ाहे में समोसे तल रहे थे, जिसे देखकर कभी वह डर जाया करते थे। और सुमन उनके घर पर उनकी रसोई संभाल रही थी दोनों का एक डेढ़ साल का बेटा भी था।
    हंसता खेलता यह परिवार समर को देख कर चौंका जरूर था। लेकिन जब समर ने राजा और बांसुरी की बात उन्हें याद दिलाई तो, उन दोनों को बनारस के घाट की वह शाम जब राजा और बाँसुरी को दशाश्वमेध घुमा कर और गंगा आरती दिखा कर पांडेय ने अपनी प्रेयसी सुमन से मिलवाया ही था और चारों खड़े घाट पर हँस बोल रहे थे कि राजा के कंधे पर दूर से किसी ने गोली चला दी थी। वो सारा वाकया वो सब कुछ उन दोनों को याद आ गया था । और वह दोनों केस की तिथि पर बुलाए जाने पर वहां उपस्थित थे। राजा से एक बार फिर मिलकर दोनों खुश थे। पांडे ने आगे बढ़कर राजा के चरण स्पर्श किए और राजा ने उसे गले से लगा लिया ।
    इन दोनों के अलावा लल्लन यानी कि इंस्पेक्टर रोहित भी वहां मौजूद था।

जिन दो लोगों ने गोलियां चलाई थी उन्हें भी पुलिस पकड़ चुकी थी।
  लेकिन वे दोनों सिर्फ भाड़े के टट्टू थे। और उन्होंने ठाकुर साहब के कहने पर ही गोली चलाई थी, इस बात को इन लोगों ने पुलिस के सामने तो कबूल कर लिया था लेकिन अगर यह लोग कोर्ट में मुकर जाते तो केस उल्टा भी पड़ सकता था।
    हालांकि अब तक की सारी बातें और सबूतों के आधार पर यही लग रहा था कि केस का फैसला राजा के पक्ष में आएगा और ठाकुर साहब को कड़ी से कड़ी सजा सुनाई जाएगी।
   
    माननीय न्यायाधीश के आदेश पर कोर्ट की प्रक्रिया शुरू हो गई।
    समर ने सारे केस को एक सरसरी तौर पर कोर्ट के समक्ष रखा और केस आगे बढ़ाने के लिए अनुमोदन किया ।
   माननीय न्यायाधीश के द्वारा ठाकुर साहब के वकील को केस को आगे बढ़ाने की बात कहने पर, उनके वकील ने अपना पक्ष रख दिया।
  
   ठाकुर साहब का वकील पुराना अनुभवी खिलाड़ी था। अब उसने ठाकुर साहब का पक्ष रखना शुरू किया…

    “हिज हाइनेस ! आप जानते ही हैं कि, न्यायालय की समस्त प्रक्रिया के लिए मेरे मुवक्किल का यहां मौजूद होना जरूरी है। अब क्योंकि मुवक्किल ही गायब है इसलिए ऐसे समय में केस को फिलहाल रद्द करके किसी और दिन के लिए मुल्तवी कर दिया जाना चाहिए…. मैं कोर्ट से दरख्वास्त करता हूं की अगली तिथि तक इस केस को मुल्तवी किया जाए”!

   वकील की इस बात पर समर भड़क उठा….

“कायदे से आपको आपके मुवक्किल को यहां पेश किया जाना चाहिए था। अगर आपके मुवक्किल समय पर उपस्थित नहीं होंगे, तो क्या केस इसी तरह तिथि पर तिथि में मुल्तवी किया जाता रहेगा? जैसा कि आप खुद जानते हैं कि रियासत के राजा साहब वर्सेस ठाकुर साहब वाद हैं। ऐसे में राजा साहब अपने सारे महत्वपूर्ण कामों को छोड़कर इस केस के लिए यहां उपस्थित हुए हैं। रानी बाँसुरी चूंकि अपने पूरे समय से हैं और अब उनकी सेहत के लिए उनका यात्रा करना उचित नही है इसलिए उनकी अनुपस्थिति के लिए पहले ही न्यायाधीश महोदय को आवेदन देकर आज्ञा ले ली गयी थी।
   इसलिए रानी बाँसुरी की जगह उनके पति राजा अजातशत्रु सिंह यहाँ मौजूद हैं तब क्या ऐसे में आपके मुवक्किल यानी के ठाकुर साहब को यहां समय पर उपस्थित नहीं होना चाहिए? वह भी तब जब उन्हें समन जारी किया जा चुका है।”

समर की बात पर वकील मुस्कुराने लगा …-“जी माननीय न्यायाधीश महोदय! मेरे काबिल दोस्त बहुत सही बात कह रहे हैं। मैं भी न्यायालय का  इसी बात पर ध्यान दिलवाना चाहता था के आखिर कोर्ट के केस की तारीख मालूम होने के बावजूद मेरे मुवक्किल कोर्ट में पेश क्यों नहीं हो पाए? “

” जी हां बिल्कुल कारण बताइए हम सब भी जानना चाहते हैं।

  “माननीय न्यायाधीश महोदय! मैं आपसे कहना चाहता हूं कि ठाकुर साहब को किसी ने किसी षड्यंत्र के तहत अगवा कर कहीं छिपा कर रख छोड़ा है। वरना आप सोचिए, वह इस शहर की जानी मानी हस्ती हैं । अगर यहां की कलेक्टर उन पर कोई वाद दायर करती हैं, तो वह सामने से आकर उस वाद का प्रतिवाद कर सकते हैं। आप जानते ही हैं कि शहर के जाने-माने पुराने रईसों में से एक है ठाकुर साहब ।आज तक कभी किसी की उनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं हुई।
   फिर आज महज एक झूठे केस से भागने के लिए वह क्यों  न्यायालय की अवमानना करेंगे?
     उनका व्यक्तित्व इतना असाधारण है , कि वह ऐसे छोटे-मोटे दोषारोपण से डरने वालों में से नहीं है। अब इस केस का मैं मेरा पक्ष आपके समक्ष रखता हूं।
   माननीय न्यायधीश महोदय बात सिर्फ इतनी थी, कि शहर में कुछ दिनों पहले एक नई कलेक्टर साहिबा ने अपना पदभार संभाला।
    कलेक्टर साहिबा का नाम भी मैं बताना चाहूंगा, श्रीमती बांसुरी अजातशत्रु सिंह। नाम से ही जाहिर है कि श्रीमती बांसुरी भोपाल के पास की रियासत विजय राघव गढ़ के राजा श्री अजातशत्रु सिंह की धर्मपत्नी है। अब ऐसे में आप खुद समझ सकते हैं कि उनकी चयन प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही होगी।
  अगर राजा साहब की धर्मपत्नी कलेक्टर बनना चाहेंगी तो कौन होगा जो उन्हें रोक सकता है।
    पहले पहल जब वह फील्ड ट्रेनिंग में थी, तब उन्होंने ठाकुर साहब के कुछ व्यापार पर गैर जरूरी अध्यादेश जारी किए और उनके कामों को रोकने का प्रयास किया।  जब ठाकुर साहब इस सिलसिले में उनसे मुलाकात करने गए तब बांसुरी देवी ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया। शहर की जानी मानी हस्ती अगर स्वयं मिलने आए तो इस तरह का घमंड दिखाना कहां की होशियारी मानी जाती है?
     खैर ठाकुर साहब इसमें भी नाराज नहीं हुए क्योंकि दूर के रिश्ते से श्रीमती बांसुरी उनकी रिश्तेदारी में भी आती थी।
  ठाकुर साहब ने श्रीमती बांसुरी देवी के घमंडी रवैया और उनके सनकीपने को उनका बचपना मानते हुए माफ कर दिया।  लेकिन बांसुरी देवी यहीं रुकने वालों में से नहीं थी उन्हें अभी अपनी अकड़ दिखानी बाकी थी।
   कुछ दिनों बाद जब उन्होंने दून में एडिशनल कलेक्टर का पदभार ग्रहण किया।  तब एक बार फिर वह ठाकुर साहब के कामों के पीछे पड़ गई।
   ठाकुर साहब इस बार फिर उनके कार्यालय में खुद उनसे मिलने गए लेकिन उस घमंडी और नकचढ़ी औरत ने उनसे वापस मिलने से इंकार कर दिया । तीन से चार बार जब ठाकुर साहब ने उन्हें संदेश भिजवाए तब श्रीमती बांसुरी देवी उनसे मिलने को तैयार हुई।
    माननीय न्यायधीश महोदय आपको बताते हुए मुझे खुद को अच्छा नहीं लग रहा लेकिन यह आजकल की रियासतें और राजा-महाराजा सिर्फ दिखावे के रह गए हैं।
    आप और हम सभी भली प्रकार जानते हैं कि अब आज के जमाने में राजा महाराजाओं का समय जा चुका है। अब देखा जाए तो इन पुराने रजवाड़ों में सिर्फ ऊंचे महल की दीवारें और इनके लंबे चौड़े नाम के अलावा इनके पास कुछ नहीं रह गया है।  आमदनी के साधन भी इनके पास सीमित हो गए हैं । लेकिन दिखावा आज भी मौजूद है। बड़ी-बड़ी गाड़ियां हाथी घोड़े पालकियां….. इनकी शान-ओ-शौकत किसी भी चीज में कम नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस सबके लिए उनके पास पैसे तो होते नहीं है, इसलिए अब यह लोग व्यापार में उतरने लगे हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि अधिकतर पुराने राजा महाराजा अपने महलों….

    वकील अपनी बात पूरी नहीं कर पाया था कि समर गुस्से में खड़ा हो गया और उसने न्यायाधीश को वकील की बात काटने के लिए गुजारिश की….-” माननीय न्यायाधीश महोदय! इन सब बातों से राजा अजातशत्रु और रानी बांसुरी का कोई लेना देना नहीं है।”

  “वकील बाबू संयम रखिये। जितनी अभी आपकी उम्र है उतने सालों का अनुभव है मेरा।  इसलिए मेरी बातों को ध्यान से सुनिए, मेरी सारी बातें आपस में एक दूसरे से जुड़ी हुई है।
     हां तो माननीय न्यायाधीश महोदय! मैं यह कह रहा था कि यह राजे महाराजे अपनी शानो शौकत को छोड़ तो सकते नहीं है, लेकिन उस शानो शौकत को बनाए रखने के लिए इनके पास रुपयों की भी कमी होने लगी है ।इसीलिए इनमें से अधिकतर लोग अब व्यापार में कूद रहे हैं ।कुछ लोग नौकरियों में भी जा रहे हैं । लेकिन नौकरी में जाना यानी किसी की नौकरी करना इनके लिए थोड़ा छोटा काम हो जाता है।
   तो यह लोग नौकरी भी अपनी शान के हिसाब से चुनते हैं। जैसे राजा साहब की रानी को अगर नौकरी करनी हो तो सिर्फ एक जिलाधीश का पद ही तो बचता है उनके लिए। अब रानी साहिबा जिलाधीश तो बन गई लेकिन जिलाधीश बनने भर से क्या होगा। उन्हें तो इस पद से अपनी तिजोरी भरनी थी। तो रानी साहिबा ने चुन चुन कर शहर के रईसों का कच्चा चिट्ठा निकालना शुरू किया। जितने भी शहर के जाने-माने रईस थे सबके व्यापार में इन्होंने अपनी टांग अड़ानी शुरू कर दी । किसी के अच्छे खासे चलते काम में टेंडर रोक दिया, तो किसी के कारखानों पर बंदिश लगवा दी।
   माननीय न्यायाधीश महोदय ऐसा कोई एक व्यक्ति होता तो , हम यह सोच भी सकते थे कि वह इंसान गलत है, और रानी साहिबा सही।
     लेकिन ऐसे दर्जन भर लोग इस शहर में मौजूद हैं।  यह सभी लोग अपनी अपनी शिकायतें लेकर ठाकुर साहब के पास पहुंचे। तब ठाकुर साहब को मालूम हुआ कि सिर्फ उन्हीं के कामों में रोड़ा नहीं लगाया जा रहा बल्कि यहाँ तो सारा व्यापारी वर्ग इन बातों से परेशान हैं।
    तब ठाकुर साहब ने अपना बड़ा दिल दिखाते हुए उस सारे व्यापारी वर्ग की समस्याओं को अपने सर माथे पर ले लिया।  सभी को आश्वासन दिया कि वह जल्द ही इस बारे में जिलाधीश महोदया से चर्चा करके कोई ना कोई रास्ता निकाल लेंगे। इन सारे लोगों की समस्याओं को एक साथ लेकर ठाकुर साहब एक बार फिर रानी बांसुरी से मिलने उनके ऑफिस पहुंचे। और आप जानते हैं न्यायाधीश महोदय इस बार रानी बांसुरी ने उन्हें मिलने के लिए बुला लिया, रानी बांसुरी ने अपने कार्यालय में उनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया।
    क्योंकि असल में रानी बांसुरी चाहती ही यहीं थी। उन्होंने जैसा जो प्लान सोच रखा था सब कुछ बिल्कुल वैसा ही हो रहा था। अब ठाकुर साहब अपने सारे व्यापारी वर्ग की समस्याओं के साथ उनके सामने बैठे थे उन्होंने एक-एक कर अपने सारे मित्रों की समस्याओं को रानी बांसुरी के सामने रख दिया। बांसुरी जी तो बस इसी मौके की तलाश में थी, उन्होंने सारी बातें सुनी और ठाकुर साहब के सामने इन सारी समस्याओं से निकलने का उपाय रख दिया।

      उन्होंने साफ सफेद शब्दों में कह दिया कि अगर उनकी मुंह मांगी रकम ठाकुर साहब और उनकी मंडली ठीक दो दिन के भीतर रियासत में पहुंचा देती है, तो रानी बांसुरी इन सब के ऊपर लगे हुए एलीगेशन्स हटा लेंगी, और इन सभी को काम करने का पूरा अवसर दिया जाएगा ।

  इसके साथ ही रानी बांसुरी ने यह भी कहा कि यह एक बार की रकम नहीं होगी हर छै महीने में यह रकम उन तक पहुंच जानी चाहिए। अगर इस रकम में कुछ भी कम ज्यादा होता है तो इसके लिए जिम्मेदार ठाकुर साहब होंगे।
    ठाकुर साहब भी पक्के  व्यापारी थे, उन्हें मालूम ही था कि अगर काम सरकारी है और सरकार की मदद से चलाना है तो इस तरह छोटी मोटी भेंट तो देवी को अर्पण करनी ही पड़ती है उन्होंने बहुत खुशी से बाँसुरी देवी की वह बात स्वीकार कर ली…

   ” इनका एक-एक शब्द झूठ है माननीय न्यायाधीश महोदय रानी बांसुरी अजातशत्रु सिंह से ईमानदार अधिकारी और कोई नहीं हो सकता। “

” वकील बाबू आप रानी बांसुरी के वकील है तो आप तो उनके पक्ष में ही कहेंगे! जिस तरह आप एक ईमानदार और अपने काम से काम रखने वाले साफ सुथरी छवि के व्यापारी पर आरोप लगा रहें हैं , मैंने तो फिर भी वही कहा जो सत्य है और जो सारा शहर कह रहा है।  न्यायाधीश महोदय अगर मैं आपको वह राशि बताऊंगा तब आप भी एकबारगी सोच में पड़ जाएंगे।
   लगभग चालीस करोड़ की राशि के बारे में रानी बाँसुरी ने ठाकुर साहब से कहा । ये राशि हर छै महीने मे उनकी रियासत में पहुंचा दी जानी चाहिए । ऐसा उनका हुकुम था।
  ठाकुर साहब इस बात पर भी तैयार थे, लेकिन इसी बीच ठाकुर साहब के साथ जुड़े व्यापारी वर्ग में असंतोष फैल गया।वो लोग इतनी अधिक धनराशि देने को तैयार नही थे।
   जब ये बात ठाकुर साहब ने रानी बांसुरी के सामने रखी तो रानी साहब ने उनकी बात मानने से साफ इंकार कर दिया उन्होंने कहा या तो इस राशि को देना स्वीकार कीजिए और या फिर मैं इसी तरह आप लोगों के काम को अटकाती रहूंगी और सरकार से मिलने वाली धनराशि आप तक पहुंचने नहीं दूंगी। एक तरह से रानी बांसुरी ने अपना असली रंग दिखा दिया था ।उसके बाद किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए ठाकुर साहब को रानी बांसुरी ने स्वयं अपनी रियासत में आमंत्रित किया।
    जहां उन पर इस बात का झूठा आरोप लगाकर कि वह राजा अजातशत्रु पर हमला करने वाले थे रानी बांसुरी ने और राजा अजातशत्रु में उन्हें पकड़वा लिया। अब ठाकुर साहब के पास वैसे भी हमेशा से ही गन रहती ही है और उस वक्त भी उनके पास उनकी गन मौजूद थी जिसका लाइसेंस भी उनके पास है। अब उस लाइसेंस शुदा गन के उनके पास मिलने से यह तो जाहिर नहीं होता कि वह उस वक्त वहां राजा अजातशत्रु पर जानलेवा हमला करने आए थे ,बावजूद वहां की पुलिस ने और प्रशासन ने राजा अजातशत्रु के भय से ठाकुर साहब को गिरफ्तार कर लिया।
   थाने में रखने पर भी रानी बांसुरी के आदेश के कारण और राजा साहब की पोजीशन से डरकर पुलिस वालों ने ठाकुर साहब पर ना चाहते हुए भी अत्याचार किए।
   हुजूर सिर्फ इतने से ही रानी बांसुरी का मन भर जाता तो और बात थी लेकिन रानी बांसुरी इतने में ही खुश नहीं थी उन्होंने इसके बाद दून पहुंचकर एक और काम किया।
    ठाकुर साहब ने क्योंकि इतनी बड़ी धनराशि एक बार में देने में असमर्थता जताई थी इसलिए इस बात से रानी बांसुरी बहुत अधिक नाराज हो चुकी थी। वह ठाकुर साहब और उनके परिवार पर इतनी क्रोधित थी कि उनसे बदला लेने के लिए एक तरफ तो ठाकुर साहब को उन्होंने झूठे आरोप लगाकर पुलिस के हवाले करवा दिया दूसरी तरफ ठाकुर साहब की धर्मपत्नी पर भी जानलेवा हमला करवा दिया। और उस हमले से ठाकुर साहब की पत्नी नहीं बच सकीं।

     जब जेल में ठाकुर साहब को इस बारे में पता चला तो वह बहुत दुखी हुए , वह तुरंत अपनी पत्नी के अंतिम दर्शनों के लिए दून पहुंचना चाहते थे। वह चाहते थे कि अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार वह अपने हाथों से करें , लेकिन एक बार फिर राजा अजातशत्रु और रानी बांसुरी के कहने पर पुलिस वालों ने कुछ ऐसा स्वांग रचा कि ठाकुर साहब तुरंत नहीं पहुंच पाए। जब तीन दिन बाद ठाकुर साहब को लेकर पुलिस दून के लिए रवाना हुई तो एक बार फिर आश्चर्यजनक रूप से ठाकुर साहब वहां से गायब हो गए।
   इस बात पर पुलिस ने यह रिपोर्ट तैयार की, कि ट्रेन से ठाकुर साहब पुलिसवालों को चकमा देकर भाग निकले लेकिन यह बात पूरी तरह बेबुनियाद है।
  पचपन साल की उम्र में पुलिस के हट्टे कट्टे जवानों को धोखा देकर चलती ट्रेन से फरार होना बिल्कुल उसी तरह असंभव है जैसे मीठी और स्वादिष्ट खीर से शक्कर का अचानक गायब हो जाना। “

  अपनी बात कहते कहते वकील साहब कुछ देर को थम गए और अपनी टेबल पर जाकर पानी का गिलास उठा लिया, समर ने उनकी तरफ घूर कर देखा और न्यायधीश महोदय से कुछ कहने ही वाला था, कि वकील साहब ने अपनी बात आगे बढ़ कर फिर रख दी..

  ” समर बाबू अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है।  आपकी मुवक्किल रानी बांसुरी ने जो भी और जितने भी आरोप ठाकुर साहब पर लगाएं हैं उन सारे आरोपों का जवाब एक-एक कर दूंगा आप बस सुनते रहिए……

क्रमशः

  aparna….
    
  
   
 
  
  
   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

49 विचार “जीवनसाथी -113” पर

  1. उफ ये कोर्ट केस तो काफी पेचीदा हो गया। अब समर ही बांसुरी को इस केस रूपी समर से निकलेगा, और ठाकुर के वकील को सबक सिखायेगा

    Liked by 1 व्यक्ति

  2. अरे वाह डाक्टर साहिबा, मैडिकल के साथ साथ लाॅ की डिग्री भी ले रखी शायद ।
    अब देखते हैं समय बाबू से कैसे बचेंगे ठाकुर साहब …..
    💐💐💐💐💐
    🙏🙏🌴🙏🙏

    Liked by 1 व्यक्ति

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s