समिधा – 26


    समिधा – 26

      केदारनाथ त्रासदी घट चुकी थी बहुत बड़ी संख्या में उत्तराखंड में तबाही मची थी, बहुत से लोग अब भी गुम थे जिनके बारे में कोई जानकारी किसी को भी नहीं थी | बचाए गए लोगों को हरिद्वार दिल्ली तक पहुंचाया जा रहा था।
       वरुण भी दिल्ली पहुंच चुका था……

    दिल्ली के एक अस्पताल में वरुण के ही साथ जाने कितने लोगों का इलाज चल रहा था। वरुण के चेहरे माथे हाथों पर पट्टियां बंधी थी और साथ ही उसके एक पैर में प्लास्टर बंधा हुआ था उसे होश में आए आधे से एक घंटा बीत चुका था।
   अपने आसपास की भीड़ और लोगों को देखकर उसे धीरे-धीरे वह भयानक मंजर याद आने लगा था। पर बार-बार सोचने पर भी उसे यह याद नहीं आ पा रहा था कि वह यहां तक पहुंचा कैसे कि तभी ड्यूटी में मौजूद नर्स उस तक पहुंच गयी…

” वरुण आप ही का नाम है? “

” जी सिस्टर। “

उससे सवाल पूछ कर वो नर्स वापस मुड़ गई, और कुछ देर में ही उसके साथ उसके पीछे वरुण के माता और पिता वहीं चले आये। वरुण की मां ने वरुण को देखा और भागकर उस तक पहुंच गई। उसके चेहरे को उन्होंने अपने सीने में भींच लिया। उनकी आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे। वरुण के पिता भी उसके पास उसके बेड तक चले आए, प्यार से उसके बालों पर हाथ फिराते वह भी अपने आंसू नहीं संभाल पाए।
    टीवी पर खबरें देख सुनकर उन्हें भी केदारनाथ त्रासदी की विभीषिका समझ में आ चुकी थी ।  खैर जो भी हो उनका बेटा मौत के मुंह से वापस आया था, यही उनके लिए सबसे बड़ी खुशी की बात थी।
अब इस बेटे को वो किसी भी हाल में वो नही खो सकते थे।
   अगले दिन ही कुछ जरूरी दवाओं की पर्ची के साथ वरुण की छुट्टी हो गई और उसके माता-पिता उसे साथ लिए कोलकाता के लिए निकल गए थे।

   सारे रास्ते वरुण खुद में खोया चुपचाप बैठा रहा….. उसके माता-पिता भी उसकी स्थिति की गंभीरता समझ रहे थे।  शारीरिक चोट तो थी ही, लेकिन इसके साथ ही अपने आप को मौत की कगार पर खड़ा देखना भी बहुत बड़ा मानसिक आघात था। वह लोग भली प्रकार समझ रहे थे कि उनका बेटा कितने बड़े सदमे में था और अभी किस परेशानी से जूझ रहा था।
 
                वरुण के पिता ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया….-” बेटा तुम जो चाहते हो, जैसा चाहते हो हमें सब मंजूर है! आखिर उसी कृष्ण ने तो तुम्हारे जीवन की रक्षा की है! तो अगर तुम अपना जीवन उसी कृष्ण को समर्पित करना चाहते हो, तो अब मुझे या तुम्हारी मां को इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है।”

  वरुण ने भरी हुई आंखों से अपने पिता की ओर देखा और उनके कंधे से सर टिका कर आंखें बंद कर ली….- वह क्या बता पाता कि उसके मन में कैसी पीड़ा चल रही थी?
होश में आने के बाद अस्पताल परिसर में उसे यह तो पता चल गया था की मिलिट्री के जवानों ने जो रेस्क्यू किया था और जिन लोगों को मदद मिल पाई थी उन्हीं भाग्यवानो में से वह भी एक था।
  
      पर जब उसके कृष्ण ने उसे बचा लिया तो देव को क्यों नहीं बचा पाए।
  उसने अपनी आंखों से देव की निष्प्राण  देह को देखा था और वही बात उसके मन को मरमांतक पीड़ा से मथे जा रही थी कि आखिर  वह देव को क्यों नहीं बचा पाया?

  ****

   वरुण को कोलकाता आए चार दिन हो चुके थे, लेकिन उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था । यहां तक की वही मंदिर परिसर जहां कभी पहुंचकर उसे अपूर्व शांति मिलती थी अब वह भी जैसे उसे मुंह चिढ़ा रहा था।
   कुछ भी करने में उसका मन नहीं लग रहा था।  हर जगह हर तरफ एक बेचैनी, एक अवसाद उसे घेरे हुए था।  उसे हर पल यही लग रहा था कि काश उसके कृष्ण ने उसे अपने पास बुलाकर देव को जीवित छोड़ दिया होता।
   सारे रास्ते अपनी ठाकुर मां की चिंता करने वाले देव ने आखिर अंत समय में भी उन्हें सकुशल वापस भेज ही दिया था। ठाकुर मां के बारे में सोचते ही अचानक वरुण के दिमाग में कुछ कौंध गया।
   देव ना सही देव से जुड़ी हुई बातों से जुड़कर तो उसके मन को ठंडक मिल ही सकती थी। पता नहीं क्यों ठाकुर मां का जिक्र उसके दिमाग में आते ही मन को एक शांति सी मिल गई थी। जैसे इसी बात की उसे तलाश थी उसने तुरंत तय कर लिया कि उसे देव के गांव जाना है।
   देव ने बातों-बातों में वैसे भी अपने गांव घर दुकान हर जगह का पता ठिकाना फोन नंबर सब कुछ वरुण को बता रखा था।
   अगले दिन सुबह सवेरे उठते ही वरुण देव के गांव के लिए निकल पड़ा।

   लगभग दो ढाई घंटे में वह देव के गांव पहुंच चुका था और उसके घर के सामने खड़ा था।
  दरवाजा हल्का सा उड़का हुआ था उसने बाहर लगी सांकल को खटखटा दिया।
    एक 17-18 साल के लड़के ने आकर दरवाजा खोल दिया …-“जी कहिए किस से मिलना है आपको?”

उसके सवाल पर उसे देखते ही वरुण के चेहरे पर मुस्कान आ गई….-” तुम दर्शन हो ना?”

   “हां  !! दर्शन हूं ! पर आप कौन?

वरुण ने दर्शन पर से नजर हटाई और बड़े से आंगन की तरफ उसकी आंखें घूम गई।  ठाकुर माँ अपनी चौकी पर बैठी खाली-खाली आंखों से उसे देख रही थी । पास में एक तख्त बिछा था जिस पर देव के पिता बैठे थे वही किनारे बैठे काका बाबू अखबार पढ़ रहे थे।
    एक तरफ देव की मां कुछ काम में व्यस्त थी, देव की ताई रसोई से हाथ पोछती हुई यही देखने बाहर आ रही थी कि कौन आया है?  दरवाजे की एक थाप पर जैसे पूरा घर आंगन में उमड़ आया था, अपने खोए हुए बेटे की खबर सुनने के लिए।
   वरुण को समझ में नहीं आ रहा था कि क्यों इस घर को देखते ही उसे इतना सुकून इतनी राहत मिल रही थी। ऐसा तो उसे अपने कलकत्ता वाले घर पहुंचने पर भी नही लगा था।
   इसी सुकून की तो उसे तलाश थी। पौधों में डाले पानी के कारण उठती ताजा मिट्टी की खुशबू थी, या पूजा घर से उठते गुग्गुल लोबान की खुशबू उसे ऐसे मोह में जकड़ चुकी थी कि वो उस खुशबू को आत्मसात करता कुछ पलों को खुद को भी भूल बैठा था कि वो वरुण है।

वह आगे बढ़ा और झुक कर उसने ठाकुर मां के पैर छू लिये ठाकुर माँ ने वरुण को पहचान लिया…

” ए की?  तुम अकेला क्यों आया मेरा देव कहां है? “

   “देव कहां है ?” यह सवाल सुनते ही वरुण के आंखों के आगे वह सारा मंजर एक बार फिर वापस घूम गया। उसने बड़ी मुश्किल से देव के पिता की तरफ देखा। ठाकुर मां की बात सुनकर उसके पिता और बाकी सदस्यों को यह अनुमान हो चला था कि यही वह लड़का वरुण है जो देव के साथ केदारनाथ में मौजूद था। देव के पिता उसकी मां और बाकी लोग वरुण की तरफ दौड़े चले आए। सब के सब अपने-अपने अंदाज में देव के बारे में पूछताछ करने लगे लेकिन उन सब के सवालों के जवाब देने में वरुण खुद को असमर्थ महसूस कर रहा था। तभी देव के काका बाबू सबको परे हटाते हुए वरुण तक चले आए……-” अरे आप सब शांत हो जाइए । यह लड़का भी तो उस भयानक त्रासदी से गुजर कर वापस आया है। उसे जरा सांस तो ले लेने दीजिए । अगर वह यहां इतनी दूर हमारे घर आया है, तो उसके पास देव के बारे में जरूर कोई ना कोई खबर तो होगी ही, आप लोग जरा शांति और धैर्य से काम क्यों नहीं लेते।”

  “और कितना शांति और धैर्य से काम लें? इतने दिन से धैर्य ही तो रखा है।  ठाकुर मां को आकर नौ दिन बीत गया लेकिन अब तक देव का कोई पता नहीं चला। “

देव की मां की अधीरता उनके आंसुओं के साथ बहने लगी, की देव की ताई ने आगे बढ़कर उन्हें सहारा दे दिया और एक तरफ बैठा दिया।

देव के पिता वरुण का हाथ पकड़ कर उसे अपने साथ अपने तख्त पर ले गए । वहां साथ में बैठा कर उन्होंने बड़ी उम्मीद से उसकी आंखों में देखा….-” बोलो बेटा देव तो तुम्हारे साथ ही था ना! कहां रह गया वो?

उनका यह सवाल वरुण को जाने किस गहरे कुएं में ले गया ।
      उसे लगा एक पिता को उनके पुत्र की असामयिक मृत्यु की खबर देना इस सृष्टि का सबसे कठिन काम है।

        वरुण ने अपनी सारी ताकत संकलित की और सामने बैठे देव के पिता के हाथों को अपने हाथों में थाम लिया…..

” आज से बल्कि अभी से आप मुझे ही अपना देव मान लीजिए बाबा। “

    “तुम्हारा मतलब क्या है? “
वरुण की बात कुछ कुछ समझते हुए भी शायद देव के पिता समझना नहीं चाहते थे! उनके सवाल पर वरुण ने एक बार सब की तरफ देखा और फिर देव के पिता की तरफ देखते हुए कह ही दिया ….

   “देव अब इस संसार में नहीं रहा। भगवान शिव ने स्वयं अपने धाम में उसे अपने चरणों में जगह दे दी!”

     वरुण अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गालों को छूकर निकल गया।  और उसे थप्पड़ मारने के बाद देव के पिता भरभरा कर वहीं गिर पड़े।
    देव की मां जहां बैठी थी वही पत्थर हो गई।  पूरा घर जो आज तक सिर्फ इसी उम्मीद से जी रहा था कि एक न एक दिन देव वापस आ जायेगा, सबकी उम्मीदें, सबकी आस जैसे एक पल में छनछनाकर टूट गयी।
    जो जहां था कुछ सेकंड्स को वहीं रह गया । जैसे सब कुछ पत्थर हो गया था उस घर के लिए और उसके बाद जो करुण प्रलाप शुरू हुआ कि घर की दीवारें भी थर्रा गयीं।
    क्या देव की मां, क्या उसकी काकी , क्या ताई क्या उसकी भाभियाँ… सब के सब देव का नाम लेकर विलाप में डूब गईं। उसके पिता अपना सिर दोनों हाथों से थामे पत्थर बने वहीं बैठे रह गए।  काका बाबू ने आगे बढ़कर उन्हें संभालने को थाम लिया, लेकिन वो खुद अपने आप को नही संभाल पा रहे थे। घर के और लड़के जो इधर उधर काम पर निकल गए थे को घर पर काम करने वाले पुराने नौकर ने फोन पर सारी जानकारी दे दी,सभी घर की ओर दौड़ पड़े।
   
      सभी दुखी थे, सभी एक दूसरे को संभाल रहे थे। आखिर सभी एक परिवार थे।
  
      ठाकुर माँ का रो रोकर बुरा हाल था। उन्हें बार बार यही लग रहा था कि वो अपनी जिद से देव को अपने साथ लेकर गयीं थीं। न वो उसे साथ चलने की ज़िद करतीं और न उसके साथ ये हादसा होता।
   उन्हें यूँ लग रहा था कि अब जब उनकी उम्र पूरी हो चुकी है तो आखिर ईश्वर ने उन्हें क्यों बचाया? उन्हें ले जाते और देव को छोड़ जाते तो क्या हो जाता?

     इस घर का इतना बड़ा अनर्थ हो गया था, और इस सब की ज़िम्मेदार वो खुद को मान रहीं थीं।
  उन्हें आखिर क्यों ये दिन दिखाने के लिए भगवान ने ज़िंदा रखा ? बस यही सवाल बार बार दोहराती वो अपने ही दुख से दुहरी होती जा रही थीं। वहीं देव की माँ तो अपने होश ही खो चुकी थीं।
   देव की ताई और काकी माँ उनके आज बाजू बैठीं उनके चेहरे पर पानी की बूंदे छींट उन्हें होश में लाने की भरसक कोशिश कर रही थीं, लेकिन अब जैसे देव की माँ अपनी सुधबुध खोए रहना ही चाहतीं थीं।
  सभी का दुख बड़ा था, बहुत बड़ा… फिर भी बड़ी मुश्किलों से ही सही सभी एक दूसरे को संभालने की कोशिश कर रहे थे।
        सब की तकलीफ से परेशान वरुण उस बड़े से आंगन के एक तरफ खड़ा चुपचाप सब कुछ देख रहा था। उसकी आँखों से भी अविरल धारा बह रही थी। वो खुद समझ नही पा रहा था कि आखिर क्यों वो इस परिवार से इतना लगाव महसूस कर रहा था।
   आखिर क्यों इस परिवार का दुख उसकी आँखों से बह जाने को व्याकुल हो रहा था।
   आखिर क्यों बार बार उसका मन देव के पिता के सीने से लगने को कर रहा था।
   वो अपने आंसू पोंछ रहा था कि उसके सामने किसी ने पानी से भरा गिलास बढ़ा दिया। उसने ग्लास पकड़ कर देखा सामने दर्शन खड़ा था…

” थैंक यू दर्शन !”

”  आपने मुझे पहचान कैसे लिया? “

इस बात का कोई जवाब वरुण के पास नही था। वो खुद नही समझ पा रहा था कि उसने दर्शन को कैसे एक बार में पहचान लिया था।
    और सिर्फ दर्शन ही क्या उसने तो देव के पिता उसकी माँ ,उसके काका बाबू काकी माँ, बड़े पापा और बड़ी माँ हर किसी को एक नज़र देख कर ही पहचान लिया था, लेकिन इस बात की कोई कैफियत नही थी उसके पास ।

   घर परिवार के लोग ही नही बल्कि इस घर के चप्पे चप्पे से वो वाकिफ लग रहा था।
   सभी को इतने करीब से वो कैसे जान समझ पा रहा था उसके खुद की समझ से बाहर था।

   नीचे मचे इतने सारे हाहाकार को चुप खड़ी वो भी ऊपर से सुन रही थी। लेकिन अभी तक परिवार में से किसी का ध्यान उस पर नही गया था….
     वो धीर मंथर गति से आकर ऊपर छज्जे पर खड़ी हो गयी… उसने नीचे देखा…
   पता नही उसके आने की आहट थी या कोई और कारण, लेकिन उसके आते ही वरुण की आंखे  ऊपर उठ गयीं थीं।

   उसने पारो की तरफ देखा… एक पल को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके कलेजे को पकड़ कर मसल दिया हो।
   इतनी पीड़ा!! इतनी ग्लानि!!

   और तभी उसके मन में वो आया जो नही आना चाहिए था। उसे लगा वो  एक पल में ऊपर छत पर उसके पास पहुंच जाए और उसे अपने सीने से लगाये भविष्य में मिलने वाले दुनिया के कटाक्षों और तिरस्कारों से उसे दूर ले जाये….

   लेकिन दूसरे ही पल उसने अपनी आंखें शर्म से नीचे झुका लीं। वो तो शायद इस भीड़ भाड़ में उसे देख भी नही पायी थी। दस दिन के उसके व्रत ने पहले ही उसे शारीरिक रूप से कमज़ोर कर दिया था उस पर पथरीली आंखों से सभी को देखती अब वो मानसिक रूप से भी थक चुकी थी  कि तभी दर्शन की एक ज़ोर की आवाज़ गूंज गयी…- “बऊ दी !”

  दर्शन के दौड़ कर सीढियां चढ़ते में पारो अपनी सुध बुध खो कर गिर चुकी थी…..

   दर्शन के पीछे ही दर्शन की बड़ी भाभी, काकी माँ और काका बाबू भी ऊपर की ओर दौड़ पड़े थे…

…. एक बार फिर हाहाकार मच चुका था, और इस सब में वरुण चुपके से बाहर निकल गया….
  .. वापस उस सत्य की तलाश में जिसे वो शायद कहीं खो आया था।

क्रमशः

aparna ……

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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