जीवनसाथी -114

कोर्ट केस

        जीवनसाथी – 114

   अपनी बात कहते कहते वकील साहब कुछ देर को थम गए और अपनी टेबल पर जाकर पानी का गिलास उठा लिया, समर ने उनकी तरफ घूर कर देखा और न्यायधीश महोदय से कुछ कहने ही वाला था, कि वकील साहब ने अपनी बात आगे बढ़ कर फिर रख दी..

  ” समर बाबू अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है।  आपकी मुवक्किल रानी बांसुरी ने जो भी और जितने भी आरोप ठाकुर साहब पर लगाएं हैं उन सारे आरोपों का जवाब एक-एक कर दूंगा आप बस सुनते रहिए……
      हां तो माननीय न्यायाधीश महोदय इनकी मुवक्किल रानी बांसुरी ने वही काम किया है जिसके लिए मैं कहना चाहूंगा उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।
  
   रानी बांसुरी ने जितने भी आरोप-प्रत्यारोप ठाकुर साहब पर लगाए उन सभी का एक मुख्य कारण तो मैं आपको बता ही चुका हूं, वह है अपनी रियासत की तिजोरी भरना। लेकिन इस सबके पीछे रानी बांसुरी के दिमाग के भीतर चल रहा जो षड्यंत्र था, अब मैं जरा उस पर नजर डालना चाहूंगा। बात जरा पुरानी है न्यायाधीश महोदय।
    हुआ यूं कि ठाकुर साहब के संबंध रियासत के महाराजा जी के साथ बहुत ही गहरे और अच्छे थे। इन दोनों मित्रों ने अपनी मित्रता को रिश्तेदारी में बदलने का सपना संजोया था। उस सपने को पूरा करने के लिए महाराज ने स्वयं आगे बढ़कर ठाकुर साहब की बेटी का रिश्ता अपने बेटे राजा अजातशत्रु के लिए मांग लिया था।
   रिश्ता रियासत की तरफ से ठाकुर साहब के घर गया था । इतने बड़े लोगों का रिश्ता पाकर ठाकुर साहब खुद को भी सम्मानित महसूस कर रहे थे। उनके पास मना करने का कोई भी कारण नहीं था। बेहद खुशी के साथ उन्होंने अपनी बेटी रेखा का रिश्ता राजा अजातशत्रु से तय करने को अपनी सहमति दे दी।
   लेकिन इस सबके बीच में रानी बांसुरी अचानक से किसी पके हुए फल की तरह टपक पड़ी।
   एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की होते हुए भी उन्होंने राजकुमार अजातशत्रु को अपने रूप से अपने प्रेम जाल में फंसा लिया। उसके बाद उन पर भावुकता से इतना दबाव बनाया कि राजकुमार अजातशत्रु  बांसुरी के अलावा किसी और के बारे में सोच भी ना पाए।
    उस वक्त राजकुमार अजातशत्रु बेहद परेशान थे, क्योंकि वह अपनी रियासत के खिलाफ भी नहीं जाना चाहते थे और बांसुरी को भी नहीं छोड़ पा रहे थे। क्योंकि आखिर वह है तो राजपूती खून , अपनी जबान से फिरना उन्होंने सीखा नहीं इसीलिए उनसे धोखेबाजी नहीं हो पा रही थी।
    उन्होंने अपने मन की इस पीड़ा को अपनी मां से साझा किया, तब उनकी मां, वह स्वयं और महाराजा जी मंत्रियों के साथ बैठकर परिचर्चा में लग गए। वह सभी ऐसा कोई उपाय निकालना चाहते थे कि ठाकुर साहब के साथ बना रिश्ता भी ना टूटे और राजकुमार अजातशत्रु का दिल भी ना टूटे।
   बड़ी अजीब सी मुश्किल परिस्थितियों में महल का भविष्य अटका पड़ा था। तब महारानी ने यह फैसला निकाला की राजकुमार अजातशत्रु की शादी बांसुरी से जरूर कर दी जाएगी लेकिन उसके बदले में राजकुमार अजातशत्रु को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ेगी। जिससे गद्दी पर उनके छोटे भाई राजकुमार विराज सिंह को बैठाया जाए और ठाकुर साहब की बेटी रेखा की शादी विराज सिंह के साथ कर दी जाए , जिससे ठाकुर साहब को भी अपमानित ना होना पड़े क्योंकि भले ही अजातशत्रु से ना हो लेकिन अगर उनकी बेटी का विवाह रियासत के होने वाले राजा से हो जाए तो ठाकुर साहब को दिए गए वचन का पालन भी हो जाएगा।

  महारानी जी ने अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय देते हुए बहुत ही त्वरित और बहुत सुंदर निर्णय लिया था। इस निर्णय पर महल में किसी को आपत्ति नहीं थी। स्वयं राजकुमार अजातशत्रु को भी आपत्ति नहीं थी, लेकिन जब बांसुरी जी को इस बारे में पता चला तो वह तिलमिला गई क्योंकि उस साधारण से मध्यमवर्गीय लड़की का मुख्य उद्देश्य तो इस रियासत की महारानी बनना ही था। राजकुमार अजातशत्रु से शादी होते ही अजातशत्रु की गद्दी विराज के हाथों सौंप दी जाती और उस स्थिति में बांसुरी कभी भी रानी बांसुरी नहीं बन पाती लेकिन उस वक्त परिस्थितियां इतनी उलझ गई थी कि बांसुरी से कुछ और करते नहीं बना और उन्होंने राजकुमार अजातशत्रु से विवाह कर लिया।

विवाह होते ही उन्होंने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया। बात बात पर राजकुमार अजातशत्रु से बहस करना लड़ाई झगड़ा करना उनकी रोज की आदतों में शुमार होने लग गया था। हालांकि उसी वक्त इनके घर पर दादी साहब की तबीयत बहुत बुरी तरह से बिगड़ गई और उन्होंने अजातशत्रु को राजा की गद्दी पर बैठे देखने की चाह सबके सामने रखी, उस वक्त महल में गुपचुप तरीके से एक छोटा सा सहमति पत्र तैयार किया गया। जिसके अनुसार राजा अजातशत्रु सिर्फ एक वर्ष के लिए गद्दी पर बैठेंगे और उसके तुरंत बाद उन्हें वह गद्दी विराज को सौंपने पड़ेगी।
   यह बात महल में बहुत ही कम लोगों को मालूम थी। लेकिन राजा अजातशत्रु ने अपनी पत्नी बांसुरी पर पूरा विश्वास करते हुए उन्हें इस बात के बारे में बता दिया था। राजा अजातशत्रु का राज्य अभिषेक हो गया। राजतिलक होने के साथ ही राजा अजातशत्रु गद्दी में बैठ गए बांसुरी प्रसन्न तो थी लेकिन मन ही मन में एक डर बना हुआ था कि कहीं एक साल बाद राजा जी की गद्दी न छीन जाए । राजा जी की गद्दी छीनते ही बांसुरी भी महारानी नहीं रह जाती और इसीलिए बांसुरी बेचैन रहने लगी। उसे पहले लगा था कि राजकुमार अजातशत्रु निर्विवाद रूप से गद्दी के उत्तराधिकारी हैं, और वही राजा बनेंगे लेकिन जब इस तरह के पेंच उन्होंने देखें तो वह तिलमिला गई उन्हें यह लगने लग गया कि साल भर के बाद गद्दी वापस विराज के पास चली जाएगी । कुछ समय तक तो बांसुरी अपने महल में प्रसन्न  थी लेकिन जैसे-जैसे 1 वर्ष की अवधि पूरी होने का समय आने लगा उनके मन की बेचैनी बढ़ने लगी। और वह बात-बात पर अपने पति से ही झगड़ा करने लग गई। इनके बीच के झगड़े फसाद इस कदर बढ़ने लग गए कि एक बार महल में किसी समारोह के दौरान भरी सभा में ढेर सारे लोगों के बीच रानी बांसुरी ने अपने ही पति पर कोई लांछन लगाया और उनसे रूठ कर महल छोड़कर निकल गई। उन्हें लगा था कि राजा अजातशत्रु और महारानी साहिबा उन्हें मनाने आ जाएंगे और महल वापस वह इसी शर्त पर लौटेंगी कि राजा अजातशत्रु ही सदा सर्वदा गद्दी पर बैठे रहे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, ना ही राजा अजातशत्रु उनके पीछे गए और ना महारानी साहेब!
    बांसुरी ने अपना फेंका पांसा उल्टा पड़ते देखा तो वह और भी तिलमिला गई लेकिन अब उनके पास और कोई चारा नहीं बचा था। महल से एक बार निकलने के बाद अब वह किस मुंह से महल वापस लौटती जबकि उन्हें महल से कोई वापस बुलाने नहीं गया था।

  नाराजगी में वह अपने मायके चली गई। रूठ कर वह अपने मायके में बैठी रही। लेकिन उन्हें पूछने वहां कोई नहीं आया। तब उन्होंने वापस अपना जाल फेंकना शुरू किया, और राजा अजातशत्रु को एक बार फिर अपने मोह पाश में बांधने की कोशिश शुरू कर दी। लेकिन दुनिया के सामने वह यह नहीं जताना चाहती थी कि वह अपना गुस्सा भूल कर राजा अजातशत्रु के पास वापस चली आई है। इसलिए वह अपने मायके में ही बनी रही, राजा अजातशत्रु पहले ही अपने सियासी कामों में व्यस्त थे उस पर पत्नी का इस तरह रूठना मनाना उनसे संभव नहीं हो पा रहा था। तब उन्होंने रानी बांसुरी के सामने महल वापस लौट आने की बात कही इस पर बांसुरी ने कहा कि वह कलेक्टर बनना चाहती हैं अगर राजा अजातशत्रु उन्हें कलेक्टर बनवा दें तो वह जरूर वापस लौट आएंगी। इसके बाद ही रानी बांसुरी को कलेक्टर बनवाने की कवायद शुरू हुई। इस सारे पचड़े में रानी बांसुरी के दिमाग में यह बात पूरी तरह से बैठ गई कि अगर ठाकुर साहब और उनकी बेटी नहीं होते तो विराज को गद्दी पर बैठाने की नौबत भी नहीं आती। अगर ठाकुर साहब के साथ महाराजा जी की कोई बातचीत नहीं हुई रहती तो वह बड़े आराम से अपने पति के साथ महल में राज कर सकती थी। बांसुरी के दिमाग में यह बुरी तरह से बैठ गया कि ठाकुर साहब और उनकी पुत्री रेखा दोनों ही बांसुरी और अजातशत्रु के दुश्मन हैं। यही बात बांसुरी ने राजा अजातशत्रु के दिमाग में भरनी शुरू कर दी। वह महल से और अपने पति से दूर जरूर थी लेकिन इस बीच भी वो राजा अजातशत्रु के दिमाग में ठाकुर साहब के खिलाफ जहर भरती रही, जबकि ठाकुर साहब ने हर कदम पर राजा अजातशत्रु की मदद करनी चाहिए लेकिन अजातशत्रु की आंखों पर बांसुरी नाम की पट्टी बंधी थी।
    अपने मन में सोच सोच कर ही रानी बांसुरी ने ठाकुर साहब के लिए जहर का घड़ा भर लिया। इसके बाद वह एक-एक कर ठाकुर साहब के अच्छे कामों में भी गलतियां निकालने लगी, और अपने आसपास के लोगों के मन में भी ठाकुर साहब के खिलाफ जहर भरने लगी।
     कलेक्टर बनने के बाद तो रानी बांसुरी के सपनों को पंख मिल गए उन्होंने जैसे कसम ही खा ली कि ठाकुर साहब को वो समूल  यहां से उखाड़ फेकेंगी।
    और ना सिर्फ ठाकुर साहब को बल्कि उनके सारे परिवार का अंत करने की इन्होंने ठान ली । माननीय न्यायाधीश महोदय आप सोच भी नहीं सकते कि इनकी भोली भाली शक्ल के पीछे कितनी चालाक औरत खड़ी है । अब आज भी देखिए कायदे से उन्हें यहां मौजूद होना चाहिए लेकिन अपनी गर्भावस्था का बहाना कर उन्होंने कोर्ट परिसर में आने से मना कर दिया।
   जबकि मैं आपके संज्ञान में यह बात लाना चाहता हूं कि अभी पिछले महीने तक वह यही दून में मौजूद थी। और लगभग 15 दिन पहले ही यहां से रियासत के लिए उनकी रवानगी हुई है। तो क्या कोर्ट के केस के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी ?और जब वह 15 दिन पहले तक यहां थी, तो अभी इन 15 दिनों में ही ऐसा क्या हुआ कि उन्हें रियासत पहुंचने की हड़बड़ी हो गई? वह छुट्टियां लेकर यहां पर भी रुक कर केस का इंतजार कर सकती थी । लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह खुद जानती हैं कि वह खुद भी गलत है।
ठाकुर साहब को केस में उलझाने के बाद उन्होंने उनकी पत्नी पर नजर रखना शुरू किया और एक दिन किसी अनजान नंबर से अनजान आदमी से उनकी पत्नी को कॉल करवा कर एक सुनसान जगह पर बुलवाया और उनकी गाड़ी पर एक ट्रक चढ़वा दिया। यह सब कुछ रानी बांसुरी के आदेश पर किया गया है। उस हादसे में ठाकुर साहब की पत्नी जिंदा नहीं बची यहां भी लाने बांसुरी का षड्यंत्र यही था कि ठाकुर साहब की धर्म पत्नी की मौत के बाद जब ठाकुर साहब उनके अंतिम दर्शन के लिए आएंगे तब ठाकुर साहब का भी काम तमाम कर दिया जाएगा।

अब आप खुद सोचिए माननीय न्यायाधीश महोदय कि अगर रानी बांसुरी जैसे लोग प्रशासनिक अधिकारी होंगे और प्रशासन और न्यायपालिका में इस तरह के लोग शामिल हो जाएंगे तो न्याय व्यवस्था का क्या होगा ? यह लोग न्याय व्यवस्था को अपनी उंगलियों पर चलने वाले कठपुतलियां समझते हैं और अपने पैसे और पद के मद में चूर होकर कुछ भी निर्णय लेते हैं।

न्यायाधीश महोदय मैं आपसे बस ये गुजारिश करना चाहता हूं की रानी बांसुरी ने जरूर ठाकुर साहब पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए हैं लेकिन मेरे मुवक्किल ठाकुर साहब निर्दोष हैं। और जिनके मैं सारे सबूत आपके पास जमा करने के लिए तैयार हूं। इसके साथ ही रानी बांसुरी द्वारा लगाए गए आरोपों के खिलाफ मैं उन पर ठाकुर साहब की तरफ से मानहानि का मुकदमा भी दर्ज करना चाहता हूं। रानी बांसुरी ने ठाकुर साहब के खिलाफ जो आरोप पत्र तैयार करवाया है, मैंने उस आरोप पत्र का जवाब लिखित में भी आपके समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। यह जवाब लगभग एक सौ तेरह पन्नों का है और जिसे पढ़ने के लिए आपको कम से कम पंद्रह दिन का समय जरूर चाहिए। तो मैं यही कहूंगा कि आप अगली कोई तिथि तय करके हमें दे दीजिए। जिससे मैं उस तिथि तक पुलिस की सहायता लेकर अपने मुवक्किल ठाकुर साहब को खोज कर निकाल सकूं। मुझे जाने क्यों पूरा विश्वास है कि उनके गुमशुदगी के पीछे भी रानी बांसुरी और राजा अजातशत्रु का ही हाथ है।
   मैं एक बात और कहना चाह रहा था, वह कि श्रीमती बांसुरी ना तो कलेक्टर बनने के योग्य है और ना रानी लेकिन क्योंकि उन्होंने इतने सारे षड्यंत्र सिर्फ रानी के पद के लिए किए इसीलिए मैं उनके नाम के साथ बार-बार रानी लगा रहा हूं क्योंकि कहीं ना कहीं दिल से मैं यही चाहता हूं कि इस केस के खत्म होने तक रानी बांसुरी के नाम के साथ यह पद हमेशा के लिए समाप्त हो जाए। उनके जैसी षड्यंत्रकारी औरत मैंने अपनी जीवन में कभी नहीं देखी । लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि जहां रियासतें हैं वहां षड्यंत्र भी हैं। और इन ऊंची ऊंची रियासतों के षडयंत्रों के पीछे हमेशा से औरतों के ही हाथ रहे हैं। आज फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है। और एक औरत ने इतनी बड़ी रियासत को हिला कर रख दिया है । देखा जाए तो राजा अजातशत्रु की स्वयं की कोई बुद्धि ही नहीं है। यह एक बुद्धिहीन व्यक्ति हैं जो पूरी तरह से अपनी पत्नी के हाथों की कठपुतली हैं। जिनकी पत्नी इन्हें चलने कहती है तो यह चलते हैं बैठने कहती हैं तो बैठते हैं। ऐसे व्यक्ति को राजा बना कर क्या रियासत की जनता ने सही किया है? खैर यह तो बाद में पूछे जाने वाले प्रश्न है । सबसे पहले तो हमें यही जानना है कि ठाकुर साहब के ऊपर जो यह गलत इल्जाम लगाए गए हैं उनके क्या और कितने सबूत रानी बांसुरी हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। माननीय न्यायाधीश महोदय मैं यह भी जानता हूं कि मेरे काबिल दोस्त समर सिंह ने आपके पास बहुत सारे लीपापोती वाले पत्र भेजे हैं। इसके साथ ही उन्होंने दो से तीन बार आपसे मुलाकात भी कर ली है । मैं यह भी समझता हूं कि हो सकता है एक सॉफ्ट कॉर्नर ऐसे में क्रिएट हो जाता है, लेकिन बावजूद आप न्याय की सबसे ऊंची वेदी पर बैठे हैं। जहां आंखों पर काली पट्टी बांधे आप सिर्फ न्याय को ही तौलेंगे। बाकी सारी बातें एक तरफ हो जाती है और इसलिए हमारी न्यायपालिका पर मुझे और मेरे मुवक्किल ठाकुर साहब को अटूट विश्वास है। मैं एक बार फिर आप से गुजारिश करता हूं कि केस को कुछ वक्त के लिए मुल्तवी किया जाए और मुझे कुछ दिनों के बाद की कोई तारीख दे दी जाए जिससे मैं ठाकुर साहब को खोज कर आपके सामने प्रस्तुत कर सकूं। “

   न्यायधीश महोदय ने सारी बातें सुनने के बाद समर की तरफ देखा…” अब आप इस केस पर क्या प्रकाश डालेंगे!”

समर ने मुस्कुराकर वकील साहब को देखा फिर न्यायाधीश महोदय को देखने के बाद अपनी बात शुरू की…-” माननीय न्यायाधीश महोदय अभी तक तो इन्होंने सिर्फ किस्से ही किस्से गढ़े हैं । प्रकाश तो अब मैं ही डालूंगा । क्योंकि जितनी भी सारी बातें मेरे मित्र वकील साहब ने कहीं, यह सब पूरी तरह से बेबुनियाद हैं। इन्होंने सोच समझकर एक अच्छी सी कहानी रची और उस कहानी को आपके सामने प्रस्तुत कर दिया। सच कहूं तो इस पूरी कहानी में सच का लवलेश मात्र भी नहीं है। रानी बांसुरी के बारे में राजा अजातशत्रु के बारे में इनकी रियासत के बारे में जो सब भी बताया है वह सब का सब झूठ है।
   जो भी व्यक्ति राजा अजातशत्रु को करीब से जानते हैं उन्हें वकील साहब के द्वारा लगाए गए एलिगेशन सुनकर ही हंसी के दौरे पड़ने लगेंगे। क्योंकि देखा जाए तो वकील साहब ने जैसी जैसी बातें राजा अजातशत्रु और रानी बांसुरी के बारे में कहीं हैं कोई बच्चा भी समझ जाए कि सारे के सारे दोष झूठे और कतई बेबुनियाद है।
   इनके दोषारोपण और वाद पर मैं शुरुआत से एक-एक बिंदु का उत्तर देता चलता हूं सबसे पहले उन्होंने कहा कि रानी बांसुरी अजातशत्रु सिंह जो कि विजय राघव गढ़ की रियासत के राजा अजातशत्रु की धर्मपत्नी है ने आईएएस की परीक्षा अपनी बुद्धिमत्ता और ईमानदारी के बल पर नहीं बल्कि राजा अजातशत्रु के पद की गरिमा की बदौलत प्राप्त की है। इस बारे में मैं यही कहूंगा कि हमारा देश चलाने वाली सरकार वकील साहब की तरह चश्मा नहीं लगाती। लोकतंत्र का समय है और हमारा देश आजाद हो चुका है ।ऐसे में कुछ एक रियासतें ही बची हैं उनमें से विजय राघव गढ़ भी एक है।
       न्यायधीश महोदय आप भी जानते हैं कि जब रियासतों का विलय हो रहा था उस समय राजा अजातशत्रु के पूर्वजों की नेकनामी की बदौलत और उनकी जनता का उनके प्रति प्रेम के कारण ही उनकी रियासत को छोड़ दिया गया था।  इसके बावजूद विजय राघव गढ़ की रियासत ने कभी भी अपने प्रिविपर्स या किसी और रियासती मुद्दे पर सियासी हुए बिना सरकार को समर्थन दिया। अब ऐसे में जब हर जगह इस रियासत ने अपनी इमानदारी और प्रभुता के डंके बजाये तब सिर्फ एक अदद पोजीशन के लिए क्या राजा अजातशत्रु अपनी नेकनामी को यूं ही बह जाने देंगे। सोचने वाली बात यह है की जिलाधीश का पद महत्वपूर्ण जरूर है लेकिन उस पद में आने के बाद व्यक्ति का कोई व्यक्तिगत जीवन नहीं रह जाता । उन्हें अपने जिले अपने संभाग अपनी जनता के बारे में सोच समझकर ही निर्णय लेना पड़ता है ऐसे में सिर्फ एक पद के लिए राजा और रानी अलग क्यों रहना चाहेंगे ।
   जाहिर है कि सिर्फ पद के लालच में रानी बांसुरी ने आईएएस का एग्जाम नहीं दिया। मैं यह जरूर मानता हूं कि वह एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की रही थी और इसीलिए शायद उनके अंदर मध्यमवर्गीय मूल्यों का खजाना भरा था। उन्होंने हमेशा से अपने आत्मविश्वास को सर्वोपरि रखा।
     एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की के लिए उसकी शिक्षा-दीक्षा सर्वदा सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस बात का जीता जागता उदाहरण रानी बांसुरी हैं। राजा अजातशत्रु से विवाह के पूर्व भी वह एक नामचीन अखबार में बहुत ही ऊंचे पद पर एक उचित पारिश्रमिक के साथ काम कर रही थी।
और राजा अजातशत्रु से विवाह के बाद भी उनके मध्यमवर्गीय मूल्यों में कोई परिवर्तन नहीं आया। अपनी शिक्षा दीक्षा को उन्होंने हमेशा सर्वोपरि रखा और इसीलिए विवाह के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी।
   एक बात जरूर वकील साहब ने सही कही वह यह है कि राजा अजातशत्रु की धर्मपत्नी अगर पढ़ाई कर कर कुछ बनना चाहे तो उनकी गरिमा के अनुरूप ही पद स्वीकार करना उन्हें शोभा देता है। अब वह हमारी और आपकी तरह वकालत करेंगी तो यह उन पर क्या शोभा ड़ेंगे?  इसलिए उन्होंने जिलाधीश का पद सोचा! पूरी मेहनत और लगन और ईमानदारी से उन्होंने इस परीक्षा के लिए तैयारियां की और परिणाम आप सबके सामने हैं । न्यायाधीश महोदय आप चाहे तो उनके  मेंटर और उनके साथी काम करने वाले उनके साथ पढ़ने वाले उनके दोस्तों को न्यायालय में अगली तारीख पर मैं प्रस्तुत कर दूंगा।
     अगला बिंदु जो वकील साहब ने रानी बांसुरी के कलेक्टर बनने के प्रति दिया था । वह यह था कि कलेक्टर बनने के बाद रानी बांसुरी यहां से धनराशि खींचकर अपनी रियासत की तिजोरी भरेंगी। यह बात सुनने में ही इतनी हास्यास्पद है कि इस पर मैं क्या कहूं मेरी समझ से परे है। जितनी धनराशि वो यहां एक जिले से खींच सकती हैं उससे दोगुनी राशि तो राजा अजातशत्रु अपनी रियासत की जनता में यूं ही बांट देते हैं । असल में वकील साहब दून से बाहर कभी गए नहीं तो इन्हें पता कैसे चलेगा।  वह कहते हैं ना कि कुएं के अंदर जो मेंढक रहता है, उसके लिए उसकी सारी दुनिया वह कुआं ही होता है। उसे मालूम ही नहीं होता कि कुएं के बाहर दुनिया कितनी खूबसूरत है।
मैं वकील साहब से गुजारिश करूंगा कि एक बार ही सही वह विजय राघव गढ़ की रियासत जरूर घूम कर आएं। उनका लगाया यह आरोप की रानी बांसुरी ने दून के खानदानी रईस और उद्योगपतियों आदि से रिश्वत ली और उससे अपनी तिजोरी भरी यह मेरे हिसाब से इतना बचकाना आरोप है, कि इस पर मैं उन्हीं से कहूंगा कि वह सबूत पेश कर दें। क्योंकि इतने निम्न स्तरीय आरोप पर कोई जवाब देना मैं रानी बांसुरी का अपमान समझता हूं।

” जब कोर्ट में केस लगा है तो आरोप और प्रत्यारोप तो लगेंगे ही इनमें क्या उच्च स्तरीय और क्या निम्न स्तरीय आपको जवाब तो सारे देने ही पड़ेंगे।”

  “मैंने कब यह कहा कि मैं जवाब नहीं दूंगा मैंने बस यह कहा कि आप सबूत तो पेश कीजिए। बातें, किस्से कहानियां तो कोई भी कर लेता है लेकिन जब तक उन किस्सों के उन कहानियों के पूरे साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करेंगे आपकी बात पर कोई यकीन नही करेगा।

      मैं जानता हूं जितनी मेरी उम्र है उतने सालों का तो आपका अनुभव है। आप मुझसे कहीं ज्यादा जानकार हैं तो आप कोर्ट की कार्यवाही भी मुझ से कहीं बेहतर जानते हैं। आप हर बात का अपने हर बिंदु का साक्षी ले आइए मैं उन्हें काटता जाऊंगा दूसरी बात जिन बिंदुओं को अभी मैंने कहा है इनके साक्ष्य मेरे पास पहले से मौजूद हैं और जो मैं कोर्ट में दाखिल कर चुका हूं….

  न्यायधीश महोदय ने हाँ में सिर हिला कर दोनों ही पक्षों को साक्ष्य प्रस्तुत करने कह दिया…

  … ठाकुर साहब का वकील जैसे इसी प्रतीक्षा में था, उसने एक बड़ा सा लिफाफा जज साहब की तरफ बढ़ा दिया…
    उसके चेहरे की कुटिल मुस्कान बता रही थी कि उसकी कहानी की तरह उसके सबूत भी थे……

क्रमशः

aparna…….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

46 विचार “जीवनसाथी -114” पर

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