शादी डॉट कॉम

a beautiful love stories

“पर्मिला अरे कहाँ मर गई पर्मिला(प्रमिला)? कोई है घर में कि नही,दरवाजा तो सदा ही खुल्ला छोड़े रखती हो दोनों माँ बेटी।”

बुआजी प्रमिला को आवाज़ लगाती घर के भीतर दालान तक चली आई,दालान के एक ओर बने रसोईघर में प्रमिला चाय चढ़ा रही थी,उसने झट से पल्लू सर मे सजाया और बुआजी को आकर धोक दिया(प्रणाम )

बुआजी अपने लपटें मारते गोरे रंग की तरह ही आग उगलती फिरतीं थीं,नाटे से कद की बुआजी रंग रूप में भटूरे का गुन्था हुआ आटा यानी मैदा लगतीं थी,उनके चमकीले रूप ने उन्हें इस कदर गर्व से भर दिया कि अपने शरीर पे चढ़ती चर्बी की तरफ उनका कभी ध्यान ही नही गया,बढ़ते बढ़ते अब उनके पेट कमर और कूल्हों पर ऐसे टायर तैनात थे कि वो एक छोटा मोटा सा ट्रक प्रतीत होती थीं ।।

    पर बुआजी में परोपकार की भावना कूट कूट कर भरी थी,किस किस के घर ब्याह के लायक लड़का लड़की मौजूद हैं,वो सूंघ के पता लगा लेती थी ,और ऐसे ऐसे रिश्ते खोज के बताती थीं कि लड़के लड़की के माता पिता अपना सर धुन लें,पर बुआजी की दबंग  पर्सनैलिटी के सामने ज़बान खोलना माने महाभारत का शंखनाद करना था इसीसे सब उनके सामने चुप लगा जाते,और घर से उनके जाते ही घर की महिलायें अपने पेट से आवाज़ निकाल निकाल कर उन्हें गालियाँ देती,पर मजाल किसी की जो उनके सामने चूं भी कर दें।

   प्रमिला उनके सगे भाई की पत्नि थी,पर एक तो भाई की पत्नि की वैसे ही कोई कदर नही,उसपे प्रमिला ने एक के पीछे एक दन्न से दो दो लड़कियाँ जन के हमेशा हमेशा के लिये खुद को उनके कोप का भाजन बना लिया था,बड़की तो फिर भी गोरी सुन्दर थी तो उस पे बुआ जी की नाराजगी कम रहती पर छुटन्कि!! एक तो मोटी उसपे निपट काली ,ना गेहूँई,ना सांवली ,,पूरी की पूरी काली।। अब ऐसी कन्या के ब्याह का आसमान नीला कैसे रहेगा वहाँ तो हमेशा काली बदरी छायी रहती वो भी  सिर्फ गरजती हुई,बरसना तो जैसे उसने जाना ही नही ,अच्छा इतने से ही खैर हो जाती तो भी ठीक था,पर छुटंकी एक नम्बर की मुहँफट भी थी..

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         भगवान ने चुन चुन के अवगुण उसमें पिरोये थे, अपनी माँ सा सपाट सादा फीका चेहरा चपटी नाक ,पिता का घोर कृष्ण वर्ण और बुआ की जलती ज़बान और इन सब के साथ बेहिसाब मोटापा!!
      
            कहने का तात्पर्य ये कि अगर ‘जीवनसाथी डॉट कॉम ‘ पे छुटकी का प्रोफाइल बनाया जाये तो ये प्रोफायल 5-6सालों तक प्रीमियम मेम्बरशिप के साथ भी वहाँ अपने पैर अंगद की तरह जमाये रहेगा ,बल्कि हो सकता है कि प्रोफाइल के इस अडिग,अचल व्यवहार के कारण ‘ जीवनसाथी’ वाले छुटकी को लाइफटाईम मेम्बरशिप दे दे,वो भी बिल्कुल फ़्री!!!

    घर की बड़ी लड़की वीणा का ब्याह हो चुका था,और अब बुआ जी की कृपादृष्टी छुटकी पर थी।।
बुआ जी नित नये तरह तरह के रंगीन सफेद काले, गोरे, अमीर ,गरीब हर तरह के रिश्तों की पोटली लिये चली आती,पर प्रमिला को उनकी इतनी कीमती पोटली में अपनी मुटल्लो के लिये कोई सजीला पसंद ही नही आता।।

“अरे पर्मिला अबकी ऐसा रिश्ता लाई हूँ,आंखे चुन्धिया जायेंगी तेरी,ये देख फोटू,लड़का सरकारी दफ्तर में काम करता है,,सारी बड़ी बड़ी फाइलें उसी की नाक के नीचे से इधर उधर होती हैं ।।”

प्रमिला ने फोटो देखी,लड़का पुराने वाले अदनान सामी को मात देता पूरा डबल डेकर बस लग रहा था।।

“हाय जिज्जी!! जे लड़का तो बहुतै मोटा है,हमरी बाँसुरी का क्या होगा??”

“अरे तो तुम्हरी बाँसुरी भी तो बस नामे की बाँसुरी है,लगे तो वो भी ढोल सी है,कहे दे रही हूँ पर्मिला जादा नाक भौ सिकोडोगी तो अंत में मिलेगा कोई दुहेजू तिहेजू,तब नई कहना कि जिज्जी कहाँ जाके मरूं ।”

“पर जिज्जी जे लड़का बिल्कुलै नही सुहा रहा का करें।”

अभी ननन्द भौजाई की गोष्ठी चाय के साथ चल ही रही थी कि प्रमिला की बड़ी लड़की वीणा भी अपने दो साल के लड़के को बेतरतीबी से खींचती घसीटती चली आई।।

“परनाम करते हैं बुआ,औ अम्मा कैसी हो?? कही कोनो बात आगे बढ़ी हमार मोटल्लो की या नही।”

“खुस रहो बिटिया!! बस तुम्हरे मुहँ मे घी सक्कर, लड़का सरकारी दफ्तर में काम करे है,ये देखो
  फोटू।”

“अरे वाह!! जोड़ी तो बहुत जमेगी ,दोनो डील डौल मे  एक ही से हैं,देखो अम्मा अब तुम जादा ना नुकुर ना करना,हमरी मानो तो इस अक्ती ब्याह निपटा दो, एक तो जैसे तुम पूड़ी कचौड़ी खिला खिला के उसे सींच रही हो लगता है पूरा सौ किलो का कर के ही मानोगी,बुआ वैसे लड़का करता क्या है?”

“सरकारी दफ्तर में ….” वीणा बड़ी बेसब्री थी,उसने बुआजी की बात आधे में ही काट दी-

“अरे बुआजी वो तो सुन लिये हम कि सरकारी दफ्तर में काम करता है,पर करता क्या है, अर्जिनवीस है,बाबू है कलेक्टर है,अरे है क्या,वो बताओ।”

“बिटिया वो …..बहुत खांस खखार के अपने गले को बार बार साफ कर अपनी आवाज़ को जितना धीमा कर सकती थी उतना धीमा कर के फुसफुसा के कहा- चपरासी है”

जितना ही आवाज़ दबा के बुआजी ने भावी दूल्हे का पद बताया उससे दुगुनी तेज़ आवाज़ में चिल्ला कर वीणा ने उस पदनाम को दुहराया -“क्या चपरासी है!! पर चपरासी के हिसाब से कुछ जादा मोटा नही है लड़का।।।”

भावी दूल्हे की पदप्रतिष्ठा सुन प्रमिला का मन बुझ गया,आखिर वो माँ थी,और हर माँ को अपना बच्चा जान से ज्यादा प्यारा होता है…एक स्वाभाविक सी बात ये भी है कि सभी बच्चों में सबसे कमजोर बच्चा माँ का सबसे अज़ीज़ होता है,हालांकी यहाँ वो कमजोरी शारीरिक नही अपितु सामाजिक थी।।

“अम्मा सुनो ,एक बात कहे दे रहे तुम्हें,इसे ना थोड़ा डायटिंग वाइटिँग कराओ वर्ना ऐसे ही अमजद खान,कादर खान के रिश्ते आयेंगे,तुम्हरी मुटकि भी तो टुनटुन बनती जा रही है।”

“ए दीदी तुमको इतना हमारी फिकर करने की ज़रूरत नही है,तुम उधर अपने सपूत को देखो, नाक बहा रहा है,ए गोलू इधर आओ,तुम्हारा नाक पोछ दें।”

“छुटकी तनिक अपनी ओर भी ध्यान दो,एक बात कहें,लड़के खुद भले ही ओम पूरी दिखते हों पर लड़की उन्हें कटरीना कैफ ही चाहिये,अब भई सब की किस्मत हमारे समान थोड़े ही ना होती है, हमारी सादी(शादी) ,में तो अम्मा बाऊजी को कोई मेहनत ही नई करना पड़ा,हम तो हुआं मेला में खड़े चाट खा रहे थे,और तुम्हरे जिज्जा को हमरा चटखारे लेना ऐसा भाया कि घर रिस्ता(रिश्ता) भेज दिये, और देखो चट मंगनी पट ब्याह ।”

“और झट गोलू”कह कर बाँसुरी हंसने लगी।।

“हमारे जिज्जा को चश्मा भी तो कितना मोटा लगा है दीदी बेचारे दूर से जाने किसे  देख हमारे घर रिश्ता भेज डाले,,खैर जिज्जा में एक खूबी तो है ,सहनशक्ती बहुत है उनमें,क्यों दीदी सही कहे ना हम।ए गोलू इधर आओ मौसी के पास ।”

बच्चे ने बडी अदा से सर हिला के मना कर दिया, और अपनी माँ से कुछ खिलाने की जिद करने लगा, उसकी जिद सुन छुटकी रसोई से कचौड़ियाँ प्लेट में सजा लाई और साथ में सोंठ की चटनी!!
    कचौड़ी देख बच्चे ने गन्दा सा मुहँ बनाया और क्रीम बिस्किट पाने को मचलने लगा,उसकी माँ जो बड़ी तल्लीनता से एक बेहद रोचक विषय पर अपनी माँ और बुआ से परिचर्चा में लीन थी,इस तरह बार बार अपनी साड़ी  झकझोरे जाने पे झल्ला उठी और पलट के बेटे को दो करारे हाथ जड़ दिये, जितनी ज़ोर का थप्पड़ नही था,उससे तेज़ पोंगा फाड़ कर बच्चा रो पड़ा,छुटकी ने आगे बढ़ कर उसे गोद में उठा लिया,और पवनपुत्र सी एक हाथ में भांजे और दूसरे हाथ मे कचौड़ी की तशतरी थामे वो अपने कमरे में चली गई ।।

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  छुटकी के जन्म के समय पूरे परिवार में कोई प्रसन्न नही हुआ,मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी दुसरी कन्या रत्न उसपे काली ,सबके मुहँ से ऐसी हाय निकली कि बेचारी का बचा खुचा रंग भी जल गया, पर जाने क्या सोच उसकी माँ ने उसका नाम बाँसुरी रखा!! बचपन में छुटकी का खाने से विशेष बैर था,उसे दाल या तरी में रोटी को तोड़ के डुबोना और फिर मुहँ में ले जाकर रखना बहुत बड़ा काम लगता,उसकी माँ सदा इसी जतन में रहती की उनकी लाड़ो कुछ खा ले,ऐसे हालात में जब बच्चा सही भोजन नही करता तब आस पड़ोस के सभी महिला पुरूष एक साथ डॉक्टर बन जाते हैं,तरह तरह की नसीहतें कि ये खिलाओ तो बच्चा सही बढ़ेगा,वो खिलाओ तो बच्चे को पोषण मिलेगा इसी तरह का बहुत कुछ माँ को सिखाया जाता है।।।

           जो आता है वही  कोई नया नुस्खा पकड़ा के चला जाता है, बान्सूरी के मामले में एक बात और जुड़ गई,लोग प्रमिला को ऐसा भोजन खिलाने की भी नसीहत दे जाते जिससे लड़की का रंग खुल जाये,कोई कहता बादाम वाला दूध दो,कोई कहता केसर वाला… कोई दही कोई पनीर,कोई नारियल !! इंन सारी बातों का सार प्रमिला ने ये निकाला कि हर वो खाने की चीज़ जो सफेद है बिटिया को खिलाने से रंग साफ होगा, अब वो बेचारी दिन भर बिटिया के पीछे तरह तरह के पकवान लिये घूमती नतीजा ये हुआ कि दस बरस की होते होते बाँसुरी पूरी तबला बन गई ,उसे खाने की ऐसी लत लगी कि क्या सफेद क्या काला उसे हर खाने की वस्तु में स्वाद मिलने लगा,खाने को लेकर उसकी ऐसी श्रद्धा जगी कि बाहर गली के नुक्कड़ के खोमचे वाले से चाहे दो प्लेट चाट चटकारे लेकर टिका आये तब भी माँ के हाथों बने दाल चावल वो त्याग नही पाती ,हाँ चाट के बाद दाल का फीकापन दूर करने आम के अचार की बड़ी सी फाँक ले वो उस नीरस भोजन में भी रस ढूँढ लेती।।।
     बाँसुरी के जीवन के दो ही मुख्य उउद्देश्य हो गये,एक खाना और दूजा पढ़ना ।।।

    दिन दिन भर अपने कमरे में बैठी लड़की कुछ ना कुछ पढ़ती रहती और ठूँसती रहती इसका असर ये हुआ की शरीर और दिमाग दोनों ही ज़बरदस्त तरक्की कर गये,पर इस बात का बाँसुरी को कोई घमंड ना था।।।

    बाँसुरी के पड़ोस में पांच  घर छोड़ के छठा घर था राजा भैय्या का।।
      राजा भैया का पूरा नाम था राजकुमार अवस्थी!
भैय्या जी थे भी पूरे राजकुमार!!
     चाल ढाल चेहरे मोहरे से बिल्कुल कहीं के नवाब शहंशाह लगते।।
  गोरे चिकने उंचे पूरे राजा भैय्या का रुआब भी कम नही था,घर हो चाहे बाहर सब उनके पीछे हाथ बांधे घूमते,भैय्या जी दिखने में जहां पिघला  सोना थे वही मन के सुच्चे मोती ।।
     “दुनिया की सारी अच्छाई एक तरफ ,और पढ़ाई एक तरफ” राजा भैय्या के बेइंतिहा सद्गुणों के ऊपर उनका एक अदद दुर्गण भारी पड़ जाता,जब जब उनके इम्तिहान का रिजल्ट उनके पिता श्री के हाथ आता,पिता जी इतने शानदार रिजल्ट के बदले अपनी चप्पल से राजा भैय्या की आरती उतारते और वो बेचारे इधर से उधर कूदते फांदते दौड़ के छत की सीढिय़ां चढ़ भाग निकलते,और फिर रात में पिता जी के सोने के बाद ही उनकी घर वापसी होती।।।

    राजा भैय्या का पसंदीदा काम था वर्जिश करना और कराना,उन्होनें अपने आप में ही एक प्रण ले रखा था सारे संसार को सही स्वास्थ्य का मह्त्व समझाना और अपने शरीर सौष्ठव को बनाये रखना।। राजा भैय्या के इन्हीं रुचिकर गुणों के कारण उनके चेले चपाटे भी बहुत थे,उनके जिस मित्र को जब कभी उनकी ज़रूरत होती वो पलक झपकते उसकी सेवा में तत्पर रहते ये और बात थी कि जब कभी वो अपनी समाज सेवा के कामों के लिये अपने पिता की चप्पलें खाते उनकी वानर सेना हमेशा जादुई बौने सी अदृश्य हो जाती।।
     मोहल्ले की छुट पुट नेतागिरी में भी भैय्या जी को बहुत रस  मिलता,चौक की राजनीति निपटाना उनके बाएँ हाथ का खेल था,ऐसे ही उनके मोहल्ले का पार्षद जब जीतने के बाद पहली बार मोहल्ले वासीयों को धन्यवाद ज्ञापित करने आया तब अपनी बातों मे उसे उलझा कर मोहल्ले मे जिम खुलवाने के लिये उन्होनें राज़ी कर लिया,और उसके दफ्तर के चक्कर काट काट कर और नव युवकों के जोश की खबरों से उसे डरा डरा कर सिर्फ छै महीने में अपने मोहल्ले मे नव युवक जागरण समिति का जिम खुलवा लिया,जिसके एक अदद ट्रेनर वो स्वयं बने और पूरे मोहल्ले की फिटनेस का भार उनके चौडे कन्धों पर आ गया।।।

   हँसी मजाक में एक बार राजा भैय्या के परम मित्र प्रेम ने उनसे कहा भी-“भैय्या जी बड़ा शौक है आपको लोगों को पतला करने का,ज़रा एक बार अपनी कृपा दृष्टी मोहल्ले की टुनटुन पर भी फिरैये, बेचारी गंगा नहा आयेगी।”

  राजा भैय्या औरतों की जबरदस्त इज्जत करते थे, और कहीं वो औरत पढ़ने लिखने वाली हुई तब तो उनकी नजरों में उसकी इज्जत सौ गुना बढ़ जाती थी।।। उनके घर की औरतों चाहे वो उनकी माँ हो काकी हो दादी हो भाभी हो किसी को भी उन्होनें पढ़ते लिखते नही देखा था,सभी सारा दिन चूल्हे में खट खटा के अपना दिन पूरा करती और रात मे कमरे में अपने पति से घर की बाकी औरतों की बुराइयाँ निकालती,यही सब देख के राजा भैय्या के पिता झुंझलाते और हमेशा राजा भैय्या को पढ़ाई की अति आवश्यकता पे लेक्चर देते जिसका सार भैय्या जी ने निकाला कि उन्हें एक पढ़ी लिखी लड़की से ही शादी करनी है।।।

   बाँसुरी के लिये प्रेम के सद्विचारों को सुन राजा भैय्या को गुस्सा आ गया,और उन्होनें उसे धुनने को हाथ उठाया पर कुछ सोच कर शान्त हो गये।।

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“देखो भैय्या हमने बचपन में देखा था,तब दो चोटी कर के अपनी साईकल पे यहाँ से स्कूल जाती थी, फिर अब क्या पढ़ रही,क्या कर रही हमें नही पता,और प्रेम सच बोलें तो हमें लड़कियो का ऐसे मजाक उड़ाना पसंद भी नही भाई।।”

“हाँ,यहाँ से साईकल में गुजरती थी,और अक्सर उसके वजन से साईकल पंचर हो जाती थी,तब तुम्ही तो उसकी साईकल पंचर वाले तक खींच के ले जाते थे,याद है कि नहीं ।”

“नही भाई, सच कहूँ तो मुझे तो उसकी शकल भी याद नही।”

“भैय्या जी आप शकल याद रखें ऐसी हूर परी भी नही वो” भैय्या जी के एक चेले ने कह दिया,और भैय्या जी ने उसे एक लप्पड़ लगा ही दिया….

क्रमश:

aparna…

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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