शादी.कॉम-2

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           भैय्या जी के लिये औरतें सिर्फ और सिर्फ आदर की वस्तु थीं।
   
             अपनी उबलती हुई उमर में भी आज तक किसी कंचन कामिनी की छाया उन्होनें अपने हृदय पे पड़ने नही दी थी,कहीं ना कहीं इसका कारण उनका स्कूल भी रहा होगा।।
      राधेश्याम  जी पक्के जनसंघी थे, जब तक जा पाये हर रविवार गोशाला में होने वाली शाखा का हिस्सा बनते रहे,फिर पिता की असामयिक मृत्यु के बाद मिली अनुकम्पा नियुक्ति में एक सरकारी दफ्तर की बाबूगिरी निभाने और घर की जिम्मेदारियां उठाने में बेचारे धीरे धीरे गोशाला भूलने लगे,पर उनका शाखा प्रेम बना रहा।।अपने पिता के बाद उन्होनें सारे उत्तरदायित्वों को बखूबी निभाया,अपनी बड़ी बहन की शादी की,अपनी बुआ की जचकी उठवाई,अपनी माँ को तीरथ कराये, अपने फेरे फिराये और छोटे भाई को भी ठिकाने लगाया,इन सब में बेचारे राधेश्याम जी की उमर ही निकल गई,पर उनका शाखा प्रेम नही चूका ,इसीसे जब धर्मपत्नी सुशीला ने बड़े होते लड़कों की तरफ इशारा किया कि अब इनका स्कूल भेजने का समय हो चला तो तिवारी जी ने  बिना आगा पीछा देखे दोनो लड़कों को सरस्वती विद्या मन्दिर में डाल  दिया।।
     दोनों सुंदर सजीले बालक जब सुबह नहा धो कर बालों में खूब सारा तेल डाल भली प्रकार चपटा कर स्कूल बैग को कंधे पे टाँगे भूरी निकर घुटनों तक झुलाये स्कूल को निकलते तिवारी जी के कंधे अभिमान से चौड़े हो जाते।।

   विद्या मन्दिर में पढ़ने वाले बालकों में संस्कार कूट कूट कर भरे होतें हैं,पर शहर के बाकी स्कूल के बच्चों का यही मानना है कि पढ़ाई लिखाई के लिये तो स्कूल अच्छा है,पर सबसे मनभावन उमर में उमड़ने घुमड़ने वाली भावनाओं का कचरा कर देता है,सीधे शब्दों में ये स्कूल रोमांस को पनपने ही नही देता,एक तो सभी सहपाठीयों को एक दूसरे को दीदी भैय्या बोलना पड़ता है, दूसरे ये लोग हर त्योहार स्कूल मे मनाते हैं,और सबसे ज्यादा हर्षोल्लास से रक्षाबंधन का पवित्र त्योहार मनाया जाता है…..अब ऐसे में किसी बालक के मन में किसी सुन्दर सहपाठिनी  के लिये कोई कोमल भावना पैदा हो भी गई तो ये स्कूल वाले राखी बंधवा के सब गुड़ गोबर कर डालते हैं ।।

    भैय्या जी जब नौवीं में पहुँचे तब उनके बड़े भैय्या बारहवीं पास कर स्कूल से निकल चुके थे,इसिलिए राजा भैय्या ने आज़ादी की सांस ली,और अपने आप में अपने मन में कुछ कोमल बदलाव भी महसूस किये,अभी तक जितने आराम से कक्षा की लडकियों को दीदी कह लेते थे,अब ऐसा कहने में थोड़ा संकोच होने लगा,उसी समय उनकी बैंच पे उनके साथ बैठने वाले जयेश ने उन्हें एक अद्भुत खेल सिखा दिया….. एक ऐसा अनोखा खेल जिसे अब वो अक्सर कक्षा में सबसे पीछे की बैंच पे बैठे अकेले ही खेलते खोये रहते,उस खेल का नाम था -“FLEMS “
F- friend , L- love, E- enemy,  M-marriage ,  S- sister..
  इस खेल मे लड़की के नाम की स्पेलिंग और खुद के नाम की स्पेलिंग लिख के जितने कॉमन अल्फ़ाबेट कट सकते उन्हें काट कर बचे हुए जोड़ कर flems को काटना होता ,और अंत में जो आखिरी बचा अल्फ़ाबेट होगा,वो आपका भविश्य तय करता।।।

   राजा भैय्या कक्षा में बैठे इधर उधर नज़र फिराते और जो सुन्दरी भाती उसके साथ FLEMSकाटते।।
कभी किसी के साथ फ्रेंड आता तो खुश,किसी के साथ लव आ जाता तो बहुत खुश,पर जिस किसी के नाम के साथ सिस्टर आता उससे वो पूरी शिद्दत से सिस्टर का रिश्ता निभाते,तो इसी तरह फ्लेम में डूबे भैय्या जी नौवीं में लुढ़क गये।।
       दूसरे साल होम एग्ज़ाम होने के कारण आचार्य जी लोगों ने उन्हें किसी तरह पास कर दिया।।

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    दसवीं कक्षा में भैय्या जी की रूचि गुल्ली-डंडा और क्रिकेट में भी जाग गई ….कक्षा में तो टाईम पास करने के लिये फ्लेम्स और दोस्त थे,कक्षा के बाहर क्रिकेट था,जीवन सहज और सुन्दर था, पर पढ़ाई कठिन थी,भैय्या जी दसवीं में भी लुढ़क गये।।दो बार में किसी तरह आगे पीछे बैठे दोस्तों की मदद से दसवीं पार लगी।।

ग्यारहवीं आचार्य जी लोगों की कृपा से एक बार मे पास कर भैय्या जी बारहवीं में पहुंच गये,और इन पांच सालों में उनके बड़े भैय्या यानी युवराज अवस्थी कहाँ से कहाँ पहुंच गये।।
      स्कूल की पढ़ाई के बाद बड़के भैय्या ग्रैजुएशन के साथ साथ अपने चाचा जी के काम मे उनका हाथ बंटाने लगे,चाचा जी का पुश्तैनी धंधा ब्याज पे पैसे देने का था,चाचा जी उतने में ही संतुष्ट थे पर बड़के भैय्या ने अपना दिमाग दौड़ाया और ब्याज के सारे काले धन को श्वेत दिखाने सिटी कॉलेज के बाहर दो मंजिला आर्चीस का शो रुम डाल लिया, जवान लड़के लडकियों ने और पूरे सात दिन तक मनाये जाने वाले प्रेम पर्व वैलेंटाइन डे ने उनके बिजनेस को 3साल में ही चमका दिया।।
       राधेश्याम तिवारी के पुण्य प्रताप का असर था या उनकी धर्मपत्नी के निरंतर व्रत पूजन का कि धन की देवी माता लक्ष्मी को तिवारी जी की देहरी और उनकी तिजोरी से प्रेम हो गया,और सदा की चंचला माता लक्ष्मी अपने वाहन के साथ उनके घर पे जम के बैठ गई,माता लक्ष्मी के आगमन का संकेत देते बड़के भैय्या के काम और माता के वाहन का संकेत देते राजा भैय्या के काम।।।

   इसके बाद बड़के भैय्या ने इंडेन की गैस एजेंसी ले ली,उसके अगले साल रिलांयस का पैट्रोल पम्प, बड़के भैय्या की जय हो!! जल्दी ही गिरिधर शास्त्री जी की कन्या रूपा से उनका ब्याह हो गया,और बड़के भैय्या का जीवन खुशहाल गृहस्थी का विज्ञापन हो गया,पर इधर छुटके भैय्या यानी राजकुमार अवस्थी! यानी राजा भैय्या अब तक स्कूल में बारहवीं में ही अटके थे।।

    जिस साल राजा भैय्या बारहवीं दुसरी बार कर रहे थे,उस साल किसी ट्रांसफर केस में एक नई कन्या ने बारहवीं जीव विज्ञान में प्रवेश लिया,सुबह प्रार्थना कक्ष में सबको विश्राम सावधान कराते राजा भैय्या ने जब दो चोटी को जुही चावला(गज़ब का है दिन देखो ज़रा) स्टाइल में आगे पीछे करते बला की खूबसूरत लड़की को देखा तो उनका दिल  शताब्दी एक्सप्रेस से टक्कर लेता धड़कने लगा,,जैसे तैसे प्रार्थना समाप्त कर दोस्तों के साथ उसका नाम पता करने का प्रयास करने लगे,बहुत जद्दोजहद के बाद उस कन्या का नाम पता चला रानी !!!

     राजा भैय्या ने तुरंत अपने पर्सनल भविष्यवक्ता से जानना चाहा अपना और रानी का भविष्य़ ।। फ्लेम्स मे कट पिट के भविष्य आया M याने मैरिज।
राजा भैय्या का दिल प्रफुल्लित हो उठा,अब तो सुबह शाम जीवविज्ञान की कक्षा के चक्कर लगने लगे,कला संकाय का बंदा रसायन शास्त्र की लैब में क्लोराइड के नारंगी छल्ले उड़ाती अपनी लैला को खिड़की से देख देख के मोहित होने लगा।।

“दिल क्या करे जब किसी से,किसी को प्यार हो जाये….जाने कहाँ कब किसी को किसी से प्यार हो जाये।।””

             अब सारा समय भैय्या जी का दिल यही गुनगुनाता, वो वैसे भी दुनिया भर की ऊंची-ऊंची रस्मे मानने वालों में से थे नही…..आखिर दोस्तों के बहुत समझाने पे और कुछ रानी के इकरार भरी आंखों के इशारे ने उन्हें हिम्मत दी और उन्होनें अपने जीवन का पहला प्रेमपत्र लिख डाला।।

   रानी,
    हमको तुम बहुत अच्छी लगती हो,जब प्रार्थना के समय सामने खड़े होकर सबको सावधान कराते हैं,तुम्ही को देखते रहते हैं,और क्या कहें,आगे तुम खुद समझदार हो तभी तो जीव विज्ञान ली हो।।
   हमसे दोस्ती करोगी।

            राजा।।

राजा भैय्या के चेले गुड्डू ने रानी की सहेली को चिट्ठी पकड़ा दी और भाग गया,चिट्ठी पढ़ कर आधी छुट्टी में रानी राजा भैय्या की कक्षा में आई और इशारे से राजा को बाहर बुला लिया।।

“ए सुनो!! तुमसे कुछ कहना है,वहाँ इमली के पेड़ के पास चल के बैठो,हम आ रहे।”

धड़कते दिल को समेटे राजा भैय्या इमली के चबूतरे पे जा बैठे तभी रानी भी आ गई ।

“राजा सुनो! हम पढ़ने लिखने वाली लड़की हैं, ये सब प्यार मोहब्बत के चक्कर मे हमारा फ्यूचर खराब हो जायेगा,हमारा सपना डॉक्टर बनने का है,और इसके लिये हमको बहुत पढ़ना है, अभी भी रात दिन सुबह शाम पढ़ाई करते हैं,ट्यूशन जातें हैं कोचिंग जाते हैं,हमारी माँ डॉक्टर नही बन पाई थी,नाना जी के पास पैसे नही थे ना,इसिलिए माँ हमे डॉक्टर बनाना चाहती हैं,राजा तुम हमें भी अच्छे लगते हो,पर तुम से प्यार कर बैठे तो हम अपने और माँ के सपने को भूल जायेंगे,तुम समझ रहे हो ना,हम क्या कह रहे?? देखो अभी हमारी सिर्फ पढ़ने लिखने की उमर है,प्यार मोहब्बत के लिये पूरी जिंदगी पड़ी है,हो सके तो हमे भूल जाना,तुम बहुत अच्छे लड़के हो राजा।।
    इतनी सारी ज्ञान भरी बातें सुन सचमुच राजा भैय्या के ज्ञान चक्षु खुल गये,कुछ देर पहले की प्रेयसी में उन्हें माता सरस्वती के दर्शन होने लगे, उनकी आत्मा भी इस पवित्रता से जगमगा उठी और बहुत श्रद्धा से उन्होनें अपनी आंखें बन्द कर ली,तभी अचानक ऐसा लगा जैसे ज़ोर का भूचाल आया….धड़ाम की आवाज़ के साथ भैय्या जी चबूतरे से नीचे गिर पड़े,उन्होनें आंखें मलते देखा तो बाजू में उनके बाँसुरी गिरी पड़ी थी।।

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    असल में हर खाने योग्य वस्तु पर अपना एकाधिकार समझने वाली बाँसुरी उस समय दसवीं की छात्रा थी,और बाकी छोटे बच्चों को पीछे धकेल धकेल के वो इमली की पकी पकी फलियां जमा करने में लगी थी,तो उससे बदला लेने तीन चार बच्चों ने एक साथ मिल कर “ज़ोर लगा के हाइशा” का नारा लगाते हुए उसे ऐसा धक्का दिया कि वो सामने बैठे अपने सीनियर राजा भैय्या के ऊपर से होती हुई चबूतरे के नीचे गिर पड़ी , दोनों की नजरें मिली,बांसुरी की आंखों की आंच बड़ी तेज़ थी,जाने अपनी गलती पर भी वो भैय्या जी को क्यों खा जाने वाली नजरों से घूर रही थी,जब भैय्या जी ने ये जानने के लिये आंखों से ही बाँसुरी से सवाल किया तो बाँसुरी ने भी आंखों से ही जवाब देते हुए उनके जूतों की तरफ इशारा कर दिया,भैय्या जी ने झुक कर अपने पैरों की तरफ देखा ,वहाँ उनके निहायत ही गंदे कीचड़ मिट्टी से सने जूतों के नीचे बाँसुरी की कमाई बिखरी चपटी पड़ी थी,सारी इमली जूतों में दब कर बुरी तरह से कुचला चुकी थी,भैय्या जी एकदम से हड़बड़ा कर बाँसुरी से माफी मांगते वहाँ से जान बचा के भागे,इस सब में अपने प्रथम प्रेम और प्रथम सन्गिनी को बेचारे भूल ही गये…. और बस उस दिन रानी की कही बातों का ये असर हुआ कि राजा भैय्या के मन में सदा सदा के लिये औरतों के प्रति बेइन्तिहा इज्जत आ गई,और उन्होंने जाने अनजाने एक कसम उठा ली कि किसी लड़के को कभी किसी लड़की का अपमान करने नही देंगे।।
    अपने बड़े भैय्या की तरह वो भी अपनी माँ की पसंद की लड़की से ही ब्याह करेंगे ,और अपना पूरा जीवन समाज की सेवा में लगायेंगे।।
       फिर उसी साल रानी का पी,एम टी में सलेक्शन हो गया और वो उस शहर को छोड़ कर मेडीकल कॉलेज पढ़ने चली गई,पर राजा भैय्या का अपने स्कूल और इमली के पेड़ से लगाव बना रहा,और वो बारहवीं में ही जमे रहे।।
     
     अब तो ऐसा था कि बाँसुरी भी बारहवीं गणित से कर कॉलेज के दूसरे साल में पढ़ाई के साथ साथ बैंक के एग्ज़ाम की तैय्यारी कर रही थी….पर अब राजा भैय्या इतने सारे समाज के कामों मे संलग्न हो  चुके थे कि उन्होंने स्कूल जाना लगभग बन्द कर दिया था ।।वो कभी कहीं मुफ्त रक्तदान शिविर का आयोजन करते,कभी रेल्वे स्टेशन के भिखारियों के लिये मुफ्त में खिचड़ी भोग बँटवाते।।

    उनका ठिकाना था उनके मोहल्ले के बाहर के चौक पर की पान की गुमटी,,पर मजाल जो सारा दिन पान की गुमटी में बिताने के बाद भी राजा भैय्या एक सिगरेट तो पी लें,उनमें ऐसा कोई राजसी ऐब नही था,पान गुटका बीड़ी सिगरेट शराब ठर्रा सब से दूर भोले भंडारी के भक्त राजा भैय्या हर सावन कांवर उठा कर भोले नाथ को जल चढ़ाने भी जाते।।

   राजा भैय्या के भलमनसाहत के किस्से जितने फेमस थे उससे कहीं ज्यादा भैय्या जी के कातिल रंग रूप के चर्चे थे मोहल्ले की लडकियों के बीच।।।।
      क्या कुंवारी कन्यायें और क्या शादीशुदा ,सभी सुबह सुबह भैय्या जी एक झलक पाने को किसी ना किसी बहाने अपने द्वारे खिंची चली आती,कोई खिड़की से झांक लेती कोई छत से,कोई उसी समय अपने कुत्ते को टहलाती ,कोई अपनी गाय का सानी भूसा करती, सब चोर नजरों से राजा भैय्या को एक झलक देख कर ही तृप्त हो जाती,और भोले भंडारी राजा भैय्या इन सब बातों से बेखबर सुबह सुबह अपने जिम पहुंच जाते।।

     नीले रंग का  ट्रैक सूट पहने  अपनी रेशमी ज़ुल्फे उड़ाते राजा भैय्या जॉगिन्ग ट्रैक पे दौड़ते हुए जाने कितने कन्या रत्नों का हृदय अपनी मुट्ठी में भींचे दूर तक दौडे चले जाते….. और पीछे रह जातीं उनकी अनन्य प्रशंसिकायें।।।

क्रमशः

aparna..

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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