शादी.कॉम -5

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  “अम्मा जी खीर बना के रख दिये हैं,और कद्दू भी छौंक दियें हैं,ये देख लिजिये पूड़ी का आटा,इत्ता हो जायेगा कि और ले लें ।।”

  रूपा यानी युवराज अवस्थी की दुल्हनीया और राजा भैय्या की भाभी आज बड़ी प्रसन्न हैं,हो भी क्यों ना !! आज उनके पिता और भाई शाम के भोजन पर उन सब से मिलने आ रहे हैं ।।
    गिरिधर शास्त्री यानी रुपा के पिता कभी कोई काम निराधार नही  करते ,,उनके हर कार्य के पीछे लम्बी चौडी योजना होती है।।
      गिरिधर शास्त्री का भी शहर में अच्छा खासा नाम है,उस ज़माने के वकालत पढ़े हैं,भले ही प्रैक्टिस ना करें पर मोहल्ले भर के फ़्री के पटवारी हैं,किस की ज़मीन कहाँ अटकी भटकी पड़ी है,उसे कैसे पार लगाना है आदि आदि के आँकड़े उनके जिव्हाग्र पे हमेशा अंकित रहते हैं ।।
     किसी के मिट्टी के मोल बिकती जमीन पे उन्होनें करोडों का नफ़ा करवाया है तो किसी के सदियों से फंसे वकालती विरासत के मामले को चुटकियों मे यूँ सुलझा के रख दिया,जैसे कोई मसला था ही नही।।

  पहले पहले तो कुछ लोगों ने उनपे तंज कसने ही उन्हें वकील बाबु कहना शुरु किया पर धीरे धीरे बच्चे बूढ़े सभी के लिये वो वकील बाबु बन गये,यहाँ तक की उनकी अपनी खुद की सगी बीवी भी उन्हें वकील बाबु ही बुलाती है।।
     और जब जब वो अपने पल्लू के ओट से उन्हें मीठी सी झिड़की के साथ ‘ओकील बाबू’ बुलाती ,वकील बाबू खुद को कहीं का मजिस्ट्रेट समझने लगते ,और इसी समझने समझाने में तीन तीन लड़कों के साथ दो दो बिटिया भी घर के आंगन को निहाल करने लगीं ।।
   दो बड़े भाईयों के बाद रुपा फिर रेखा और फिर एक छोटा भाई नाहर।।

    राधेश्याम अवस्थी के बड़े पुत्र युवराज को एक बार उन्होनें पटवारी कार्यालय में अपने पैट्रोल पम्प के कागजों के लिये माथा पच्ची करते देखा था,और वो गोरा चिट्टा उंचा नौजवान उन्हें अपनी बड़ी के लिये भा गया था,बस उन्होनें पूरे परिवार की जन्मकुण्डली बांची और चट मंगनी पट ब्याह निबटा दिया।।
      इधर कुछ दिनों से वो रेखा के ब्याह के लिये घर वर ढूँढ रहे थे।।ऐसे ही कभी मायके आई रुपा ने अपनी माँ के कान मे रेखा और राजा भैय्या के रिश्ते की बात डाली थी…
     जब पति को रात दिन एक ही उलझन मे परेशान देखा तो एक रात श्रीमती जी ने खाने की थाली में आलू मेथी के साथ अपना आइडिया भी परोस दिया-
  “ए जी सुनो!! हम का कह रहे,ई बिटिया का देवर है ना ,राजा!! हमरी रेखा के लिये उसका रिस्ता काहे नई देखते,घर का घर में ही रिस्ता हो जायेगा, वैसने पहली बार में इत्ता सारा दे चुके हैं अब दुसरी में थोड़ा राहत हो जायेगा।।””

   गिरिधर शास्त्री बाहरी बातों में औरतों का हस्तक्षेप अच्छा नही मानते थे,पर इस बात में उन्हें थोड़ा दम लगा।।

“राहत हो जायेगा से मतलब का है तुम्हरा।”

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“अरे रूपा के टाईम जो सोफा आलमारी फिज टीवी दिये रहे ,ऊ अब रेखा के टाईम देने की का ज़रूरत।
एकै घर मा दू दू ठो सोफा दू दू फ्रिज का करेंगे समधि ।”

“अच्छा ऐसा बोल रही हो,हां पर गहना उहना तो देबै पड़ी ।”

“तो हम कब मना किये,गहना तो हम बनबा रख्खे हैं,पर तुम एक बार बात तो करो समधि जी से।”

“ठीक बोल रही हो गुड्डू की अम्मा ,हम कलै फ़ोन करते हैं अवस्थी जी को,,उनका छुटका देखा भाला है,अच्छा लड़का है।।”

  अगले दिन शास्त्री जी के फ़ोन से अवस्थी जी की बांछे खिल गई,उन्हें मन मांगी मुराद मिल गई,इत्ते बड़े आदमी की दोनो बेटियाँ उनके घर आ जायेंगी तो समझो उनकी वसीयत का 2 बटा 5भाग उनका हुआ,हालांकी वो जानते थे,शास्त्री पुरानी रीति का आदमी है ,वो लडकियों को जितना देना है शादी मे दे दुआ के खतम करने वालों मे से है,और लडकियों का वसीयत पे कोई अधिकार हो सकता है ये वो कभी नही मान सकता,पर अपनी लड़ाकू फूलन देवी सरीखी बहु रूपा पे उन्हें पूरा विश्वास था,80 एकड़ खेती का ज़मीन नही भी दिये तो 40 एकड़ का आम का बगैचा तो बिटिया लोगों के नाम कर ही देगा गिरिधर  शास्त्री!!
       उन्होनें युवराज के ब्याह मे रेखा को देखा था, लड़की ऐसी बुरी भी नही थी,कॉलेज तक की पढ़ाई कर चुकी थी,और अभी कोई फैसन वाला कोई कोर्स कर रही थी,उन्होनें इस बारे में अपनी श्रीमती जी से बात की-
        “अरे का कह रहे आप,ऊ सिडबिल्ली को हम अपनी बहु ना बनाएँगे, रुपा तो चलो कम से कम काम भी कर लेती है,ज़बान चलाने के साथ,पर ऊ लड़की का तो लक्षनै ठीक नई लगता,जब देखो अन्ग्रेजी मा गिटर पिटर करती रहती है।।”

    “अरे तुम कहाँ से कहाँ पहुंच जाती हो,देखो हमरा राजा भी तो पढ़ लिख नही पा रहा,उसके लिये कहाँ से कलक्टरनी लायोगी खोज के, औ ई सोचो दुनो बहन एक ही घर मे रहेंगी तो झगड़ा फसाद भी नई होगा,बांट बखरा का झमेला से मुक्ति,भई हमरा तो दुई ठो लड़का है,दुनो एक संग निभा लेंगे।।”

   “अरे तो लडकियों का अकाल पड़ गया है का,,जो इक्के घर की दुनो को बहू बनाना चाह रहे।”

  “अब तुमसे बहस नही करना चाहते कल शास्त्री आ रहा अपने लड़का के साथ,इहै बातचीत करने,अच्छा से खान पान की तैय्यारी कर लेना, हम जा रहे ठीका में देखने,बहुत दिन से उधर गये नही।

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   राधेश्याम ज्यादा औरतों के पर्पंच में पड़ने वाले आदमी नही थे,सीधे और शान्त स्वभाव के थे,अपनी बात रखने के बाद एक बार ज़रूर पत्नि का पक्ष सुनते पर जब उसे अपने पक्ष मे नही पाते तो बिना मतलब की बहस करने की जगह एक बार मे अपना निर्णय सुना कर निकल लेते थे,,कम उम्र से उठाई जिम्मेदारियों के कारण पैसों के थोड़े लालची थे,कहीं से मुफ्त में आ रही लक्ष्मी से उन्हें कोई वैराग्य नही था,हालांकी उनकी दिली ख्वाहिश हमेशा ही थी कि उनके दोनो लड़कों की शादी पढ़ी लिखी लड़कियों से हो,पर जब युव के लिये रूपा का रिश्ता आया तो बारहवीं पास रूपा में उन्हें सुलक्षणी बहु का रूप दिखा या सरस्वती मैय्या पे लक्ष्मी मैय्या भारी पड़ गई,पर जो भी हो उन्होनें सहर्ष उस रिश्ते को स्वीकार लिया था,अबकी बार रेखा थी सामने,जो कि अपने पूरे घर परिवार में अकेली थी जिसने अन्ग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करी थी,तो उस अंग्रेज़ी माध्यम का मोह भी अवस्थी जी संवरण नही कर पा रहे थे।।

   रेखा शास्त्री!! रूपा की छोटी बहन ,अपने पूरे कुनबे में सबसे ज्यादा लिखी पढ़ी मानी जाती थी,एक तो इनकी शिक्षा ‘कार्मल कॉन्वेन्ट ‘ से हुई थी, इन्होनें स्कूल में अपने बाकी भाई बहनों के जैसे सरस्वती वन्दना की जगह प्लेज किया था,,जहां इनके भाई बहन बचपन में किसी भी मेहमान के आने पर समवेत स्वर में “हम होंगे कामयाब एक दिन “गाया करते थे,वही घर की छुटकी बिटिया रेखा उसकी जगह अकेले पूरे गर्व से “we shall overcome ,one day..” गाया करती थी।।
    बचपन से इस भेद भाव का असर हुआ कि रेखा के मन में ये पैठ गया कि वो कुछ विशेष है,क्योंकि वो इंग्लिश मीडियम से पढ़ी है,,उसके इंग्लिश मीडियम में पढ़ने का श्रेय जाता था उसकी मासी को,शादी के चार सालों में भी जब हीरा व्यापारी तिलोकचंद त्रिपाठी के घर बाल ग्वाल नही विराजे तो उनकी धर्मपत्नी सुलोचना ने अपनी बड़ी बहन की छोटी लड़की रेखा को गोद लेने की सोची।।
     इस सोच-सोच में ही उन्होनें उसे ढेरों कपड़े दिलवाये,विदेशी गुड़िया दिलवाई,चॉकलेट खिलवाई और शहर के सबसे बड़े इंग्लिश मीडियम स्कूल में उसे भर्ती कराया….पर विधाता के खेल!!! जिस दिन से गोद लेने का कानूनी तीन पांच शुरु होना  था उसी दिन सुबह नाश्ते की टेबल पर नाश्ता  देख कर ही सुलोचना का जी मचल गया,डॉक्टर ने आते ही हाथ की नब्ज थाम कर हीरा व्यापारी को बधाई दे डाली,,आनन फानन घर में उत्सव का माहौल बन गया,और इस सब में उलझे त्रिपाठी दंपति गोद लेंने लिवाने की रस्म भूल गये….
      सब छूट गया,सभी का जीवन खुद मे व्यस्त हो गया पर रेखा का स्कूल नही छूटा,,बीच बीच में जब भी हीरों से लदी फदी मासी अपने बाल गोपाल को कमर पे टिकाई बड़ी बहन से मिलने आती अपनी प्यारी रेखा की इंग्लिश मीडियम बातें सुन खुशी से चौडी हो जाती,और इन्ही सब बातों का धीमा धीमा ज़हर रेखा के खून मे घुलता चला गया।।

    दिखने में ठीक ठाक परन्तु कपडों जूतों से बेहद स्टाईलिश रेखा ने जब अपनी दीदी की शादी में अपने दीदी के लुभावने देवर को देखा तो पहली ही नज़र में अपना दिल हार गई,उसे पूरी शादी में अपने खुद के अन्दर माधुरी और राजा भैय्या के अन्दर सलमान खान दिखता रहा।।
      उसने बड़ी नज़ाकत से जूते भी चुराये और जूतों के बदले पैसों की गुहार भी लगाई,पर उधर सलमान खान नही था,जो ‘ जूते दो पैसे लो ‘की गुजारिश करता,उधर तो राजा भैय्या थे,उन्होनें साफ साफ पूछ लिया”कितने चाहिये??”
       अब इधर रेखा के पहले ही किसी एक नाज़नीँ ने लपक के -“पूरा पांच हज़ार एक रुपैय्या चाहिये भैय्या जी” बोल दिया।।
   
    भैय्या जी हो हो कर हँस दिये-” बस इत्ता ही चाहिये,अरे हमरे बड़के भैय्या का जूता ही ग्यारह हज़ार का है,ई लो रख लो,और ला दो हमरे भैय्या का जूता।।”

   अब बेचारी रेखा जब तक बाकी सखियों को जूते और पैसों के लिये लड़ने का मह्त्व सिखाती बताती तब तक में  लाली दौड़ कर जूते का डिब्बा उठा लायी,भैय्या जी नये करारे नोट गिन के लाली के हाथ में रख दिये और जूते का डिब्बा उठाये बिना अपनी माधुरी दीक्षित को देखे ही चल दिये।।

     बेचारी रेखा मन मसोस के रह गई ।।

दुसरी बार आस जगी जब उसकी बड़ी बहन रूपा ने उसे कुछ दिन अपने पास रहने को बुलाया,किसी दूर की रिश्तेदारी में होने वाली शादी में पूरा अवस्थी परिवार जाने वाला था,बस राजा भैय्या और रूपा ही नही जाने वाले थे।।
    बिल्कुल माधुरी जैसी कातिल रेड ड्रेस पहन के रेखा अपने सलमान के इंतज़ार मे पलक पांवडे बिछाए बैठी थी कि अब राजा आयेगा और उसकी खुली जिप्सी में जाते समय वो भी मन भर के गायेगी-” फूलों कलियों की बहारें,चंचल ये हवाओं की पुकारें…..ये मौसम का जादू है मितवा “

   पर एक बार फिर भगवान ने उसकी इच्छाओं पे घडों पानी फेर दिया।।राजा भैय्या तो आये,जिप्सी में ही आये ,पर भाभी को साथ लिये आये, वहाँ घर में कोई बड़ा ना होने के कारण रुपा को कुछ दो चार दिन के लिये मायके भेज दिया गया।।

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    मायके के नाम पे खिली रूपा दौड़ी चली आई,दोपहर का भोजन खा कर सलमान खान अपने घर मोहल्ले को निकल गया और माधुरी अकेली विरह अग्नि में जलती रही,और बैकग्राउंड में गाना बजता रहा- “सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नही।”

  रुपा कुछ चार दिन रह कर,अपनी सास को मन भर गालियाँ देकर चली गई,पर जाते जाते अपनी माँ के कान में अपनी छुटकी बहना और राजा की शादी का मन्त्र भी फूंक गई।।
    ना ना ऐसा बिल्कुल भी नही था कि रुपा की सास दुष्ट थी,जालिम थी,बहुओं पर अत्याचार करने वाली शशिकला और बिंदू टाईप की सास थी,अरे ऐसा होता तो ऐसे नर्क में रूपा अपनी बहन को झोंकने क्यों तैय्यार हो जाती???
    पर मायके आ कर अपनी माँ बहन के सामने दुखड़ा रोना भी एक कला है,इसका अपना अलग एक मज़ा है,और पकौड़ी की प्लेट के साथ वो मज़ा दुगुना हो जाता है।।

माँ और दीदी को बात करते सुन रेखा खुशी से बावली हो गई,,उसकी मन मांगी मुराद ऐसे टप से उसकी गोद में आ गिरेगी ,इसका उसे भान भी नही था।।
    कहाँ वो “हम आपके हैं कौन “के सपने देख रही थी और कहाँ उसे “हम साथ साथ हैं “मिल गई ।।

  इन चार दिनों में रेखा ने अपनी बड़ी बहन की खूब सेवा की,बिल्कुल सगी जेठानी मान के।।
    उसकी बिदाई के एक दिन पहले उसे अपने साथ शॉपिंग पर ले गई,उसकी साड़ी से मैचींग नेल पॉलिश दिलाई,क्लचर दिलाया,एक छोटा पर्स दिलाया और ब्लू लेडी का पर्फ्यूम भी दिलाया,बड़ी बहन निहाल हो गई,जाते जाते रेखा के गले लग खूब रोयी(रोने का नेग भी ज़रूरी होता है)और चुपके से बोली”अब अगली बार तुम्हें अपने देवर के लिये बिदा करा ले जायेंगे।।”

  दीदी के रवाना होते ही रेखा अपने कमरे में जाकर राजा की यादों में खोने जा ही रही थी कि फ़ोन पे मैसेज आ गया__
             “कैसी हो जान?? दीदी गई? अब तो हमारे लिये समय निकाल लो।”

उफ्फ ये वॉट्सएप्प भी ना,जब ज़रूरत ना हो तभी घि घि बजने लगेगा,रेखा मेसेज चेक कर चुकी थी, अब जवाब ना देना मतलब आधे घन्टे का सर फुटौव्वल,इसिलिए बेचारी ने जवाब दिया-

  “मैं ठीक हूं बेबी,अभी मम्मी काम से बुला रही, बाद में बात करती हूं ।”

  असल में दीदी की शादी और बाद में भी राजा ने कभी रेखा  में कोई विशेष दिलचस्पी नही दिखाई थी।उसी समय फैशन डिज़ाइनिंग का शार्ट टर्म कोर्स करने रेखा दिल्ली गई,जहां उसकी मुलाकात रोहित से हो गई,वो भी वहाँ किसी शार्ट टर्म कोर्स के लिये आया था,दोनो अपने अपने शहर से निकल कर इतने बड़े अंजान शहर में अकेले थे सो दोस्ती हो गई पर नही वो दोस्ती वहाँ प्यार में नही बदली,वहाँ दोनो सिर्फ दोस्त ही थे,साथ साथ टपरी में चाय पीना, सैंडविच खाना,और अपनी अपनी क्लास के बारे में चर्चा करना,बस इतना ही!! यहाँ तक की दोनों ने अपने घर परिवार और शहर की भी बात नही की।।
  इस पन्द्रह दिन की दोस्ती के बाद दोनो मोबाईल नम्बर एक्सचेंज कर अपने अपने शहर चले गये।।
   
   शुरुवात हुई रोज सुबह की good morning और रात की good night से…फिर धीरे धीरे क्या कर रहे हो??
खाना खाया? क्या खाया?क्या पहना ? वगैरह वगैरह से होते हुए दिन भर की लम्बी चैट में बदल गई ,और आखिर एक दिन दोनो को समझ आ गया कि दोनो प्यार में हैं…..प्यार का इजहार हुआ और दोनो की दुनिया बदल गई ।।
     अब तो दोनो को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण काम मिल गया “चैटींग “और बाकी सारे काम इस काम के सामने निरे नीरस और बेवजह हो गये।।
      रोहित कुछ ज्यादा ही सीरियस होने लगा इसलिए धीरे से अपने परिवार के बारे में बताना शुरु किया….पापा अधिकारी है,बड़ा भाई भी अधिकारी ,दीदी टीचर ,रेखा ने पूछा और तुम??
  “मैं तुम्हारा आशिक” इस खुशनुमा रंगीन चैटींग में पहला रोड़ा बनके आयी जात पात की दीवार
    बातों बातों में जब रोहित ने बताया कि उसका नाम है रोहित सूर्यवंशी!!!! हाय राम !! सूर्यवंशी !!
     रेखा का कलेजा मुहँ को आ गया,अब क्या करूं?? पापा तो नही मानेंगे!! दिखने में इतना साफ सुन्दर चिट्टा लड़का ,उसने तो देख कर by defalut सोच लिया था कि कोई दुबे चौबे तिवारी त्रिपाठी उपाध्याय ही होगा बंदा,पर अब क्या करे…..
     इतनी गहरी उलझन में डूबी लैला को और डुबाने उसकी बड़ी बहन धमक पड़ी और ये आ गया प्रेम कहानी में दूसरा रोड़ा ।।
    जब रूपा ने माँ से रेखा और राजा की बात की तो रेखा को वापस “हम आपके हैं कौन “वाले दिन याद आ गये और आज के ज़माने की लैला ने अपने सपनों को नई दिशा में मोड़ लिया….पर बेचारी अपनी सपनों की ज़मीन पे राजा के प्यार की फसल बो पाती उसके पहले ही 3 दिन से वैराग्य धारण किये रोहित का उबलता खनकता हुआ मेसेज आ गया….
   माँ किसी काम से बुला रही है,बोलकर किसी तरह रेखा ने जान बचाई और इसी सोच में डूब गई कि आगे रोहित को क्या और कैसे बोलना है,ऐसा नही था कि उसे रोहित पसंद नही था,या उसे राजा अधिक पसंद था,,असल मे उसे इन दोनो से कही ज्यादा पसंद था शादी का उत्सव उत्साह!!
    उसे भी बाकी लडकियों की तरह 3महीने का bridal course करना था,हर मौके के लिये अलग अलग थीम में सजे लहन्गे लेने थे,खूब सारे जेवर लेने थे,कपड़े लेने थे,इतनी महत्वपूर्ण विमर्श वाली चीज़ों के मध्य कोई इनसे कमतर (दूल्हा) के बारे में सोच के क्यों मगजमारी करे।।
    इसिलिए अपने मन को समझा कर रेखा अब रोहित को समझाने की तैय्यारी करने लगी।।

क्रमश:

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aparna..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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