जीवनसाथी -116

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   जीवनसाथी – 116

        कोर्ट से मिले 2 दिन पलक झपकते कब बीत गए समर को पता ही नहीं चल पाया केस से संबंधित कागजों की तैयारी में ही उसके दिन और रात निकल गए।
         अगले दिन सुबह की तारीख उन्हें कोर्ट की तरफ से मिली हुई थी। अगले दिन ही जज साहब बचाव पक्ष के वकील द्वारा प्रस्तुत सबूतों को देखने वाले थे। हालांकि समर इस बात से परिचित था कि उस लिफाफे में सबूत नहीं होंगे, फिर भी वह अपनी तरफ से कोई पेंच खाली नहीं छोड़ना चाहता था। उसने अपने वाद और सबूतों को एक साथ कर रखा था।
     अगले दिन केस की सारी तैयारी करने के बाद उसने दून की हवेली के नंबर से किसी को फोन किया…-” ध्यान रहे ये बात इस तरह से उनके कान में पड़नी चाहिए कि वो खुद कोर्ट के लिए रवाना हो जाएं, उन्हें हरगिज़ ये पता न चल पाये की तुम मेरे लिए काम कर रहे हो । “

  इतना कहकर समर ने फोन रख दिया और राजा से मिलने उसके कक्ष की ओर चला गया।

********

   पिया की मां ने पिया से अगले दिन ही उसके पास पहुंचने का वादा जरूर किया था लेकिन  उन्हें टिकट नहीं मिल पाने के कारण उनका आना दो दिन बाद का तय हुआ था…
    इसी बीच बाँसुरी अपने रूटीन चेकअप के लिए पिया के पास आ गयी…-“कैसी हो पिया?”

पिया ने मुस्कुरा कर हाँ में सिर हिला दिया और बाँसुरी का बीपी जांचने लगी।
बाकी जांचों के बाद उसे बांसुरी पूरी तरह सामान्य लग रही थी…-“आप पूरी तरह से फिट हैं रानी साहेब, और अब बस कुछ ही दिनों में आप खुशखबरी दे सकती हैं।”

” वो तो ठीक है पर तुम्हारे चेहरे पर ऐसे बारह क्यों बजे हैं? सब ठीक है ना? “

” हाँ सब ठीक है! आपके लिए कुछ मंगवाऊँ? चाय कॉफी या ज्यूस? “

” नही ! तुम्हारे घर पर थोड़े न आई हूँ। ये अस्पताल है यहाँ मेहमाननवाजी की ज़रूरत नही है। घर भी तो तुम्हारा यहीं कहीं पास ही है ना? “

” हां जी !” उदास सी पिया ज्यादा कुछ बोल नही रही थी, और उसे ऐसे देख बाँसुरी को समझ में आ गया था कि पिया अंदर ही अंदर परेशान है , पर कुछ कहेगी नही। उसी वक्त पिया का फ़ोन घनघना उठा, फोन उसकी माँ का था….
    पिया अपनी माँ को अपना हालचाल बता रही थी कि उसके केबिन पर किसी ने दस्तक दी और दरवाज़ा हल्का सा खुल गया, पिया की माँ उसकी मासी , उनके बच्चे सब धड़धड़ाते हुए अंदर घुसते चले आये… पीछे पिया के पापा और बाकी लोग थे। उन सब को एक साथ देख पिया आश्चर्य में डूबी अपनी जगह पर खड़ी रह गयी कि उसकी माँ ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया…-” कैसा लगा हमारा सरप्राइज? हम सारे लोग एक साथ चले आये। “

  पिया कुछ कह पाती की मौसी ,फूफी सारे बच्चे उसके गले से लग उसे बधाइयाँ देने लगे, और वो हड़बड़ाई सी कभी किसी को तो कभी किसी को देख मुस्कुराती रही…-” एक बार बताना तो था मम्मी कि आप इतने लोग आ रहे हो। मेरा सिर्फ दो कमरों का घर है, सब के बैठने पर ही भर जाएगा। सब सोएंगे कहाँ?”

” अरे तू उसकी चिंता मत कर। जिस होटल में तेरी सगाई होनी है ना वहीं हम सब के लिए कमरे भी बुक हैं। और फिर ज्यादा रुकने भी कौन वाला है। कल शाम सगाई निपटेगी ,परसों आस पास थोड़ा घूम लेंगे और उसके अगले दिन ही हम सब की वापसी की फ्लाइट है।”

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शाम ढलती देख बाँसुरी भी वापसी के लिए उठ खड़ी हुई…-“बधाई हो पिया! वैसे तुमने बताया नही सगाई के बारे में।”

  पिया ने बाँसुरी की तरफ देखा और फिर अपनी माँ की तरफ देखने लगी…..-“जी संकोची बहुत है हमारी पिया। वैसे आप…

  माँ कुछ और कह पाती इसके पहले ही पिया ने उन्हें टोक दिया…-“मम्मी ये रानी बाँसुरी साहेब हैं। ये अस्पताल इन्हीं का बनाया हुआ है। “

” अरे मेरा बनवाया नही है, मेरे साहब का है। ” बाँसुरी ने पिया की माँ के सामने हाथ जोड़ दिये, बाँसुरी वहाँ की रानी है ये सुनते ही पिया की माँ के चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान चली आयी…

” माफ कीजियेगा मैं आप को पहचान नही पायी। आप भी सादर आमंत्रित है पिया की सगाई में। “

” जी !तबियत सही रही तो ज़रूर आऊंगी, और अगर कल शाम तक केस का निपटारा हो गया तब तो साहब भी वापस लौट चुके होंगे, उन्ही के साथ आ जाऊंगी।”

  पिया हां में सिर हिला कर एक तरफ खड़ी रह गयी, बाँसुरी ने पिया को देखा और मुस्कुरा कर वापस कहने लगी…-” राजा साहेब एक केस के सिलसिले में दून गए हुए हैं। समर सा भी साथ है। ” समर का नाम आते ही पिया बाँसुरी की ओर देखने लगी….-” ये लोग काम में ऐसे व्यस्त हैं कि किसी को अपने फ़ोन तक का होश नही है। साहब का फोन बंद आ रहा था तो मैंने समर के फोन पर कॉल किया,पता चला उसके दोनों ही नम्बर बंद आ रहे हैं। काम के चक्कर में भूख प्यास भूल जातें हैं ये लोग, फोन क्या चीज़ है।”

  पिया को अब तक समर यहाँ नही है ये बात पता ही नही थी। वो किसी ज़रूरी काम से बाहर गया है और इसी कारण उसका फोन भी बंद आ रहा है। मतलब ये भी तो हो सकता है कि उसने पिया के मैसेज देखे ही न हों।
   पिया के मन में घबराहट सी होने लगी कि काश किसी तरह एक बार समर से बात हो जाती। वो अपनी सोच में थी कि बाँसुरी ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा और बाहर निकल गयी…

   उसके जाते ही पिया ने अपने घर वालों की तरफ देखा,सभी अति उत्साहित थे। सब उसे घेर घार कर अपने साथ घर ले गए।
       घर पर त्योहार जैसा माहौल हो गया था। पिया को एकांत ही नही मिल पा रहा था कि वो वापस समर को फ़ोन लगा सके। दूसरी बात वो ये भी जान चुकी थी कि उसका फोन बंद आ रहा है। उससे कैसे सम्पर्क करें पिया अभी यही सोच रही थी कि दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी….
   वो दरवाज़े तक जाती कि उसके पहले ही उसकी मौसी की बेटी ने जाकर दरवाज़ा खोल दिया…-“अरे जीजू आप यहाँ? आइये आइये। ” 
    पिया की जिससे अगले दिन सगाई होनी थी,वो लड़का और उसकी बड़ी बहन और जीजा दरवाज़े पर खड़े मुस्कुरा रहे थे।
   पिया ने मन ही मन अपना सिर पीट लिया। वैसे ही भीड़ भाड़ कम थी क्या उसके छोटे से घर में जो ये लोग भी चले आये।
  वो अपनी माँ से बात करने की भी सोच रही थी कि सगाई करने की इतनी क्या जल्दी है? लेकिन इन लोगों के आ जाने से अब वो बात भी टल गई थी।
    वैसे उसने खुद ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी, बल्कि कहा जाए कि रखी कुल्हाड़ी पर जाकर पैर ही दे मारा था तो और सही होता।
   ” आप क्या सोचती खड़ी हैं पिया जी। इनसे मिलिए ये मेरी दीदी और ये जीज़ हैं!”
   लड़के ने आंखों से पिया को दीदी के पैर छूने का इशारा किया जिसे समझते हुए भी पिया नासमझ बनी रही…-“जीज़? “उसके सवाल पर लड़का और भी चहक कर उसे समझाने लगा…-“जीजा जी साउंड्स प्रिटी ओल्ड नो? इसलिए जीज़ बोलता हूँ। “
   धीमे से सिर हिला कर पिया अंदर जाने लगी कि लड़के की दीदी ने टोक दिया…-” कहाँ जा रहीं हो पिया? आओ हमारे साथ बैठो!”
” जी दीदी ! आप लोगों के लिए चाय बनाने जा रही थी, आप सब आराम से बैठ कर बातें कीजिये मैं चाय लेकर आती हूँ।”
    रसोई में जाते जाते पिया ने एक नज़र अपनी माँ पर डाली की वो भी उसके साथ रसोई में चली आएं तो वो उनसे खुल कर सगाई की डेट आगे बढ़ाने को कह सकें, लेक़िन वो भी पिया के इशारे समझे बिना वहीं लोगों की भीड़भाड़ में बैठी हंसी मजाक में उलझी रहीं!

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    चाय के साथ ही सबने बाहर खाने जाने का कार्यक्रम भी बना लिया। पिया की माँ ने उसे तैयार होने अंदर भेज दिया और खुद मेहमानों के साथ बैठी रही। मन ही मन खीझती पिया के पास चुपचाप तैयार होने के अलावा और कोई चारा नही था।
   अब उसे हर किसी पर गुस्सा आ रहा था,माँ पर मौसी पर, उस लड़के पर और सबसे ज्यादा समर पर। हद से ज्यादा खड़ूस है, एक बार बता कर भी तो जा सकता था, पर नही अपनी राजशाही दिखानी है ना। इतना घमंडी लड़का उसने अपने जीवन में कभी नही देखा था, हद दर्जे का अकड़ू,घमंडी, सिरफिरा और महा बदतमीज।
   लेकिन इतनी सारी बुराइयों के बाद भी क्यों पिया का दिल उसी पर अटका जा रहा था ये उसकी समझ से परे था।
   पिया का एक मन बोलता..-” हां है अकड़ू, और थोड़ा बहुत नही बल्कि बहुत ज्यादा है। ऐसे लड़कों के साथ निभाना आसान नही होता। कोई बात हुई पहले ही मुहँ फुला लेगा फिर मनाते रहना ज़िन्दगी भर। इससे अच्छा है ऐसे लड़के को उसकी अकड़ और ज़िद के साथ छोड़ दो और उसे चुन लो जो तुम्हें ज़िन्दगी भर खुश रख सके। तुमसे प्यार कर सके, तुम्हारे गुस्से को झेल कर ज़िन्दगी भर तुम्हें मनाने की चाह रखे। भूल जा पिया उस सनकी सम्राट को और आगे बढ़ जा।
   मम्मी का चुना लड़का डॉक्टर है, ज़िन्दगी सेट हो जाएगी। जमा जमाया अस्पताल मिलेगा, वेल ट्रेंड स्टाफ मिलेगा, जमे जमाये मरीज़ होंगे और ज़िन्दगी बेहद आसान हो जाएगी…
….. इतना सब सोचते ही पिया का दूसरा मन बगावत पर उतर आता…-इतना सब तो रहेगा मगर दिल का चैन, सुकून वो सब कहाँ से खरीद पाओगी पिया मैडम। समर से अगर शादी नही हुई तो क्या इतनी आसानी से उसे भूल पाओगी।
   और मान लो कहीं नही भूल पायीं तो??

  ये “तो” उसे चैन नही लेने दे रहा था कि मम्मी आ गयी…-” बेटा तैयार हो गयी, चल बाहर सब इंतेज़ार कर रहें हैं। अरे ये क्या जीन्स पहनी है तूने। ” पिया की माँ ने अपने माथे पर हाथ मारा और आलमारी से एक हरी सी लहरिया निकाल उसके हाथ में रख दी…
…-“ससुराल वालों के साथ डिनर पर पहली बार जा रही है बेटा! साड़ी पहन कर चल, उन्हें भी अच्छा लगेगा।”
    पिया ने मुहँ बनाकर साड़ी ली और बदलने चली गयी…

******

   अगले दिन सुबह कोर्ट के समय से कुछ पहले ही समर राजा और आदित्य कोर्ट में पहुंच चुके थे। कुछ देर में ही ठाकुर साहब के वकील भी अपने लाव लश्कर के साथ वहां पहुंचकर समर की ओर देखते हुए उन्होंने एक अजीब सी मुस्कान उसे दी और अपने कागज पत्तर सही करने लग गए।
   न्यायाधीश महोदय के आते ही न्यायालय की कार्य प्रक्रिया शुरू हो गई। आज सबसे पहले ठाकुर साहब के वकील के द्वारा जमा किए गए सबूतों को कोर्ट द्वारा अवलोकन करना था।
    न्यायाधीश महोदय के सामने जैसे ही सबूतों को रखा गया उन्होंने देखा कि वह लिफाफा पूरी तरह से खाली था। न्यायाधीश महोदय ने सवालिया नजरों से ठाकुर साहब के वकील की तरफ देखा ठाकुर साहब के वकील पहले ही इस बात के लिए तैयार बैठे थे….-” देख लिया न्यायाधीश महोदय मैंने पहले ही कह रखा था ठाकुर साहब के खिलाफ वाद दायर करने वाली पार्टी कोई ऐसी वैसी पार्टी नहीं है। राजा अजातशत्रु का नाम यूं ही नहीं लिया जाता, इन्होंने एक बार फिर अपनी चाल चली और उनके वकील ने मेरे द्वारा जमा किए सारे सबूतों को गायब करवा दिया है।”

समर इस बात के लिए पहले ही तैयार बैठा था उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट खिल गई।

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ठाकुर साहब के वकील अपनी रौ में बोलते चले गए…..-” हुजूर मैं बचाव पक्ष का वकील हूं इसलिए आपकी और मेरे अजीज दोस्त समर की नजरें मुझ पर गड़ी हुई हैं, कि मैं किस तरह से अपने मुवक्किल ठाकुर साहब का बचाव करता हूं। लेकिन इसके पहले मैं यही कहना चाहूंगा कि हम जिनके खिलाफ खड़े हैं वह काफी मजबूत पक्ष है। ठाकुर साहब जैसे व्यक्तित्व को डिगाने के लिए उन्हें गिराने के लिए किसी बहुत मजबूत इंसान का उनके सामने खड़ा होना बहुत जरूरी है। जैसा कि आप जानते हैं ठाकुर साहब एक इमानदार और कर्मठ व्यक्तित्व हैं इसलिए उनके समक्ष खड़े होने के लिए समर और उनके मुवक्किल राजा अजातशत्रु सिंह और रानी बांसुरी अजातशत्रु सिंह को इस हद तक नीचे गिरना पड़ा कि मेरे द्वारा लाए सबूतों को भी उन लोगों ने गायब कर दिया। अब इसी से आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि राजा अजातशत्रु के मन में हार का कितना भय हैं । उन्हें लगा कि इन्होंने जो भी एलिगेशन मेरे मुवक्किल ठाकुर साहब पर लगाए हैं वह सत्य तो प्रमाणित हो नहीं पाएंगे उल्टा रानी बांसुरी पर मैंने प्रतिवाद दायर कर दिया, जिसका अब तक इनकी तरफ से कोई भी सही जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है। अब ऐसे में इन लोगों का डर कर मेरे द्वारा दाखिल किए गए सबूतों को गायब कर देना यही दिखाता है कि हमारी जीत पक्की है हुजूर। मैं आपसे गुजारिश करता हूं कि  मुझे सबूत इकट्ठा करने में कुछ और वक्त लगेगा इसलिए केस की अगली तारीख को कुछ महीनों के लिए मुल्तवी कर दिया जाए।”

  समर जानता था कि ठाकुर साहब के वकील का मुख्य उद्देश्य सिर्फ केस को जितना हो सके उतना लंबा खींचना था जिससे कि केस लंबा चलता रहे और ठाकुर साहब आराम से बाहर तफरीह कर सकें….
  समर अपनी जगह से उठ कर खड़ा हो गया..-” माननीय न्यायाधीश महोदय अब मैं अपने विचार आपके सम्मुख रखना चाहता हूं। हमारी वकालत के भी कुछ नियम होते हैं वैसे वकील साहब का अनुभव मेरी उम्र से भी कहीं ज्यादा है तो यह मुझसे कहीं ज्यादा इस बात को समझते होंगे कि जब हम न्यायालय में सबूत प्रस्तुत करते हैं तब उन साक्ष्य की दो से तीन प्रतियां बनवाई जाती हैं। एक प्रति हम अपने पास सुरक्षित रखते हैं एक प्रति अपने मुवक्किल के मार्गदर्शन में उनके ऑफिस में जमा की जाती है। एक प्रति हमारे खुद के ऑफिस में जमा होती है। और इसके साथ ही 2 प्रतियां न्यायालय में हम जमा करते हैं । ऐसा करने का कोई स्थिर प्रोटोकॉल हमें नहीं दिया जाता यह हम करते हैं सिर्फ अपनी सुविधा के लिए।
    ऐसा हम इसीलिए करते हैं जिससे अगर कोई भी प्रति कहीं गुम हो जाए तो बाकी प्रतियों के सहायता से कोर्ट में केस आगे बढ़ाया जा सके और कोर्ट का समय खराब ना हो। इसी बाबत मैं वकील साहब से जानना चाहता हूं कि उन्होंने अगर एक प्रति न्यायालय में जमा की थी तो बाकी की प्रतियां उनके पास मौजूद होनी चाहिए तो ऐसे में वह अपनी बाकी की प्रतियों को यहां जमा कर सकते हैं जिससे कि माननीय न्यायालय का समय खराब ना हो और कोर्ट केस को आगे बढ़ाया जा सके।
    लेकिन अगर इस वक्त वही कहते हैं कि उनके पास सबूतों और साक्ष्यों की एक ही प्रति मौजूद थी जो उन्होंने न्यायालय में जमा कर दी थी तो इसे उनकी गैर जिम्मेदाराना हरकत मानते हुए कोर्ट उन पर भी सवाल लगा सकता है।
          जहां तक यह बार-बार ठाकुर साहब को एक कर्मठ और इमानदार व्यक्तित्व बता रहे हैं, तो इस हिसाब से हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया के वह सारे खूनी हत्यारे ड्रग डीलर और गुनाहगार बेगुनाह साबित हो जाते हैं और ईमानदार और कर्मठ साबित हो जाते हैं ,क्योंकि उन लोगों ने भी हत्याएं जरूर की चोरी डकैती जरूर किए गुनाह जरूर किए लेकिन वह अपने स्वयं के लिए तो इमानदार ही थे। उन्होंने अपने आप से तो कभी कोई बेईमानी नहीं की। अपने परिवार के लिए वो सदा कर्मठ रहे और इसीलिए पैसे कमाने की ललक और जुनून ने उन्हें गुनाहों के दलदल में धंसा दिया ।
     तो इस तरह से ठाकुर साहब वाकई एक कर्मठ और इमानदार व्यक्तित्व हैं। उन्होंने भले ही कितनी भी नृशंस हत्याएं की  लेकिन यह खून उन्होंने अपने खुद के व्यापार को बढ़ाने के लिए किए। उन्होंने जहरीली शराब  जरूर बनाकर बेची लेकिन इसे बेचने के पीछे उनका उद्देश्य था पैसों की कमाई और पैसों की कमाई इसलिए जरूरी थी कि उन्हें अपने घर परिवार को पालना था।
  उन्होंने गैर कानूनी ढंग से हथियारों को खरीदा और बेचा लेकिन यह भी उनके व्यापार का एक हिस्सा था और अपने व्यापार को चलाने के लिए व्यापारी किसी भी हद तक बेईमानी कर सकता है और इस तरह की बेईमानी बेईमानी नहीं मानी जाती बल्कि ठाकुर साहब तो एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व बनकर उभरे।
    उनका साथ देने वाले जिन व्यापारियों की फौज वकील साहब ने खड़ी की है वह सारे के सारे ठाकुर साहब की ही तरह ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति हैं। न्यायाधीश महोदय मैं आपसे बताना चाहता हूं कि शहर और आसपास के इलाकों में जितनी भी गुंडागर्दी गैरकानूनी ढंग से हथियारों और ड्रग्स की सप्लाई आदि इत्यादि के काम फैले हुए हैं इन सब के पीछे ठाकुर साहब और इनकी सेना का ही नाम है। मैं यह लिखित में साक्ष्य आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं । जिन्हें पढ़कर आप मेरी बात को और भी अच्छे से समझ सकते हैं। इन सभी में ठाकुर साहब के किए कानूनी गैरकानूनी धंधों का कच्चा चिट्ठा तो है ही लेकिन इसके साथ ही वह सारे व्यापारी जो रानी बांसुरी के खिलाफ एकजुट होकर ठाकुर साहब के पास मदद मांगने गए थे उनके भी कारोबार का कच्चा चिट्ठा लिखा हुआ है। रानी बांसुरी जब दून में एडिशनल कलेक्टर बनकर आई तो उन्होंने आते ही पूरे जिले की बागडोर संभाल ली । यहां आते ही जैसे ही उन्हें इन व्यापारियों के गैरकानूनी धंधों के बारे में पता चला उन्होंने सभी के सब को एक साथ नोटिस जारी कर दिया।
   एक औरत जैसे ही कानून का सहारा लेकर इन सभी के गैरकानूनी कामों के सामने आकर खड़ी हुई तो वह इन सब की आंखों में चुभने लगी, वह रोड़ा बन गई इन लोगों के कामों के लिए और इसीलिए उन्हें फंसाने के लिए यह लोग एक पर एक चाल चलने लगे। रानी बांसुरी का कार्यकाल इतना साफ और सफेद था कि उन पर दाग लगाना इतना आसान भी नहीं था। और इसीलिए यह सब मिलकर ठाकुर साहब को साथ ले रानी बांसुरी के खिलाफ जंग लड़ने को निकल पड़े। यह लोग इतने गिरे हुए हैं न्यायाधीश महोदय कि इन्होंने रानी बांसुरी पर जानलेवा हमला करने से पहले भी नहीं सोचा कि वह एक औरत को उसके कर्तव्यों से डिगाने के लिए उसकी जान भी ले सकते हैं ।
    लगभग दो तीन बार रानी बांसुरी पर ऑफिस आते और जाते समय प्राणघातक हमला ठाकुर साहब द्वारा करवाया गया  और इस दौरान ठाकुर साहब खुद वहाँ मौजूद थे जिसके सबूत मेरे पास हैं।

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   समर ने एक और लिफाफा न्यायाधीश महोदय की ओर बढ़ा दिया लेकिन उसके ऐसा करते  ही कोर्ट में पीछे कहीं बैठे ठाकुर साहब अपना कंबल हटा कर जोर से चिल्ला उठे….-” इसकी बातों में कोई सच्चाई नहीं है हुजूर। इसकी सारी बातें गलत है । झूठ है, यह ना जाने कहां से फर्जी और झूठे सबूत उठाकर ले आया है। मैंने आज तक ऑफिस से आते और जाते वक्त बांसुरी पर जानलेवा हमला नहीं करवाया। समर मेरे केस को कमजोर करने के लिए सिर्फ मनगढ़ंत बातें कर रहा है और आपके सामने नकली सबूत पेश कर रहा है मैं जानता हूं अच्छे से…

अपनी बात पूरी करते हुए अचानक ठाकुर साहब चुप हो गए।उन्हें  समझ आ गया था कि उनसे बहुत बड़ी गलती हो गयी है।अब तक उनके पीछे से उनकी पीठ पर पुलिस वाले अपनी गन तान चुके थे। और उन्हें हाथ से पकड़ कर कोर्ट के सामने  लाकर खड़ा कर चुके थे।
    ठाकुर साहब के वकील ने ठाकुर साहब को इस तरह कोर्ट की कार्यवाही के बीच कूदते देखा और अपने सर पर हाथ मार कर एक तरफ बैठ गया। उसे महसूस हो गया था कि वो समर के जाल में फंस चुके है। ठाकुर साहब की अनुपस्थिति को वह अब तक राजा अजातशत्रु पर इल्जाम के रूप में लगाते आये थे,अब ठाकुर साहब के अचानक इस तरह यहाँ प्रस्तुत हो जाने से उन्हें इस केस से बचाने का उसका काम अधूरा रह जाने वाला था। उसने समर की ओर देखा, समर ने उन्हें देख कर अपने हाथ जोड़ दिये और धीमे से गुनगुना कर कुछ कह गया…-” वो क्या है ना आपका अनुभव कहीं अधिक है मेरी उम्र से लेकिन मेरी उम्र कमबख्त बावली और सिरफिरी है।”
वकील साहब भी उसे देख मुस्कुरा उठे…-” आज के पहले तो ये यहाँ नही आये, आज इन्हें यहाँ तक कैसे पहुंचा दिया? “
               उनके सवाल पर समर एक किनारे खड़ा मुस्कुराता रहा… उसने पीछे देखा, कोर्ट रूम के दरवाजे पर एक आदमी अपना चेहरा आधा ढके खड़ा था उसने आंखों ही आंखों में समर को अभिवादन किया समर ने भी धीरे से बाकियों की नजर बचाकर उसके अभिवादन को स्वीकार किया और मुस्कुराकर ठाकुर साहब की तरफ देखने लगा।
   यह वही आदमी था जिसे समर ने 1 दिन पहले फोन करके ठाकुर साहब को कोर्ट तक पहुंचाने की बात कही थी……
….

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क्रमशः

aparna….
    

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

54 विचार “जीवनसाथी -116” पर

  1. अकड़ू ,सड़ू और हद दर्जे का बद्तमीज है पर समर इकलौता समर है। तभी तो आज तक जो कोई ना कर सका वो समर ने कर दिखाया यानि जिसने पिया का दिल धड़काया। मन तो कर रहा कि समर को उठाकर हॉस्पिटल में या फिर पिया को ही दून पहुंचा दूं। दोनों केस एकसाथ ही निपट जाएं। ….समर ने केस का पूरी तरह पासा पलट दिया ठाकुर और उसके गुर्गों का कोई भरोसा भी नहीं है कि कब क्या कर बैठें। मज़ा आ गया आज के भाग में तो। ये सिरफिरा लड़का मन मोह रहा है हर भाग में 😅❣️❣️

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  2. जबरदस्त भाग। समर जी के तो कहने ही क्या वो तो राजाजी के नवरत्नों में महारत्न है, तो फिर उनके दांव पेंच कोई इतनी आसानी से समझ ही नही सकता।
    वैसे ये पीया ने क्या कर दिया खुद से ही गड्ढा खोद लिया अब इनकी प्रेमकहानी कैसे आगे बढ़ेगी

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