समिधा-28

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      ससुराल में पारो का समय कैसे बीत रहा था उसे खुद ख्याल नही था। इसी बीच एक बार लाली भी उससे मिलने आई। लाली पेट से थी और इसी कारण उसे पहले आने नही दिया गया था।
   मांग भर लाल सिंदूर हाथ में शाखा पोला पहनी लाली पारो को अति सौभाग्यशाली दिख रही थी। उसके सामने पारो अपनी किस्मत का रोना लेकर नही बैठना चाहती थी। इसलिए उसे अपने कमरे में बैठा कर उसके लिए वो मुस्कुराती उसके सामने बैठ गयी। कुछ देर इधर उधर की बातों के बाद आनन्दी उन दोनों के लिये कुछ खाने पीने का सामना लिए ऊपर ही चली आयीं।
   बहुत दिनों बाद पारो के चेहरे पर मुस्कान आई थी , लाली को देख कर।
  जाने क्यों उसे लाली में देव नज़र आ रहा था। देव अपनी भतीजी पर जान भी तो छिड़कता था।।
  लाली भी पारो से मिल कर प्रसन्न थी, उसे पारो में उसके देव काका दिखाई दे रहे थे…-” पारो एक बात पूछूं”

” हाँ पूछ ना? “

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” तुम वापस पढ़ाई क्यों नही शुरू कर देती? “

पारो अनमनी सी लाली को देखने लगी..-” अपने घर के रीति रिवाजों से तो परीचित हो भली तरह। जब तक देव बाबू थे फिर भी किसी तरह सम्भव था लेकिन अब पारो का पढना एक तरह से असंभव है!”
   जवाब आनन्दी ने दिया । जवाब कड़वा ज़रूर था पर सत्य था। घर में पहले भी देव ने चोरी छिपे ही पारो को पढ़ने में मदद की थी और अब उसके जाने के बाद पारो में भी वो उत्साह कम दिख रहा था।

” आप कह तो सहीं रहीं हैं बऊ दी , लेकिन पढेंगी लिखेगी तो मन लगा रहेगा। वरना करेगी क्या दिन भर?”..

  लाली की बात सुन पारो की आंखों में पानी भर आया। आनन्दी भी पारो को देख दुख में डूब गई। तीनों औरतें कुछ पलों को चुप रह गईं की क्या किया जाए क्या नही… उसी वक्त कहीं से घूम घाम कर लौटा दर्शन भी ऊपर ही चला आया…-” ये लो दर्शन चला आया। सुन तू ही पारो की मदद क्यों नही कर देता पढ़ने लिखने में। थोड़ा उसका भी मन लगा रहेगा।”

” तो मैंने कब मना किया ? बऊ दी जब चाहें पढ़ लें। मैं इन्हें पढ़ाने में पूरी मदद कर दूंगा।”

“पर मदद सबसे छिप कर करनी होगी दर्शन बाबू। अगर घर भर को पता चल गया तो एक और नई मुसीबत हो जाएगी।”
  आनन्दी की बात पर दर्शन ने भी हामी भर दी….
पारो का अब किसी काम में मन नही लगता था। न रसोई में न पढ़ाई में। उसे अब सारा सारा दिन देव के बारे में सोचना ही बस भाता था। खिड़की की बल्लियां पकड़े खड़े वो देव में खोई रहती।
  पर घर की बाकी औरतों को ये कैसे सहन होता। आखिर उनके भी अपने दुख थे। तो अकेली पारो को ही गमगीन रहने का अवसर क्यों मिले भला? जब बेटा खो कर भी माँ कामधाम में लगी है?
  आखिर देव की माँ ने पारो को भी गृहस्थी के जंजाल में वापस बुला लिया। अब सुबह उठ कर आंगन को पानी से धो कर पारो घर भर के लिए चाय चढ़ा कर फिर नहाने चली जाती। नहा कर आने के बाद ठाकुर माँ  के पूजा पाठ का सरंजाम जुटाने के बाद एक बार फिर रसोई बनाने में डूब जाती। दोपहर सबके खाने पीने के बाद ही उसे छुट्टी मिलती। तब कुछ देर को अपने कमरे में आराम करने का मौका उसे मिल पाता। हालांकि दोपहर सोने की आदत न होने से वो दर्शन की दी हुई किताबें पढ़ने लगती।
  अक्सर किताब के सबसे रस भरे अध्याय में डूबी होती कि नीचे से शाम की चाय बना लेने की पुकार चली आती और वो अपनी किताब बंद कर नीचे भाग जाती।
  वो इतना काम करते हुए भी नही थकती क्योंकि अब उसे देव की माँ में अपनी सास कम और देव की माँ का अंश अधिक नज़र आने लगा था। अब उसे उस सारे घर से प्यार हो गया था। वो प्यार जिसका अधिकारी जा चुका था उसके उस अधिकार को उसके प्यार को अब पारो उसके घर और सम्बन्धों पर लुटा देना चाहती थी। वैसे भी अब इसके अलावा उसके जीवन में और बचा क्या था?
   देव के बाबा का अब वो और ज्यादा खयाल रखती। बिल्कुल जैसे वो सुबह नाश्ते के बाद और रात खाने के बाद कि गोलियां उन्हें निकाल कर दिया करता वैसे ही वो गोलियां निकाल उनकी टेबल पर पानी के गिलास के साथ रख आती।
   और वो धीमे से अपने चश्मे पर चढ़ आई भाप को चुपके से साफ कर लेते।
  ठाकुर माँ को शाम में बैठ कर सुखसागर पढ़ कर सुनाती बिल्कुल जैसे वो सुनाया करता था। माँ की कही हर बात वैसे ही जी जान से लग कर पूरा करती जैसे वो किया करता था लेकिन बस एक ही जगह वो चूक जाती…
   जहाँ खुद से प्यार करने की बारी आती वो लाचारगी से खिड़की पर खड़ी खुद पर तरस खा कर रह जाती। उसे तो वो टूट कर चाहता था, उसका प्यार जब तब वो महसूस कर पाती थी लेकिन न कभी उसने खुल कर कहा और न पारो ने ही उससे खुल कर कहने कहा लेकिन समझते तो दोनो ही थे।
  कितनी कोमलता थी देव के प्यार में। उसे छूता भी ऐसे था कि कहीं वो मैली न हो जाये और आज उसे इस अनजान सी दुनिया में अनछुआ अकेला तड़पता छोड़ गया था।
अब जब उसे शादी प्यार पति पत्नी के सम्बन्धो के बारे में थोड़ा बहुत मालूम चलने लगा तब वो ही चला गया।
  यही सोचती कभी कभी वो एकदम गुमसुम रह जाती तो कभी रोते रोते उसकी हिचकियाँ बंध जाती।
    लेकिन अब उसे सासु माँ अधिकतर समय काम में भिड़ाये रखती जिससे वो सुकून से कमरे में बैठ रो भी नही पाती थी।
  ऐसे ही एक शाम वो अपनी खिड़की पर खड़ी बाहर डूबते सूरज को देख रही थी कि उसकी सास और बड़ी बुआ अंदर चली आयी…-” क्या देख रही है पारो? “वो चौन्क कर मुड़ी और माँ के साथ बड़ी माँ और बुआ को भी आया देख चुप खड़ी रह गयी।
“दिन भर ऊपर अकेली पड़ी पड़ी उकता नही जाती हो? नीचे चली आया करो। हम सब के साथ बैठोगी तो अच्छा लगेगा न। “
  हाँ में सिर हिला कर वो ज़मीन पर अपने पैर के अंगूठे से गुणा भाग के चिह्न बनाती रही।
  वो तीनों एक साथ उसके कमरे में क्या सचमुच उसकी चिंता में ही चली आयीं थीं ? पारो सोच नही पा रही थी। पर जाने क्यों आज इतने दिनों में पहली बार उसे उसकी सास के चेहरे पर खुद के लिए एक अलग सी ममता दिखी थी। फिर भी वो उस वक्त उनके भावों का अर्थ नही जान पायी…
   बड़ी बुआ ने बोलना जारी रखा…-”  बेटा पारो ! तुझे ऐसे अकेले ऊपर अब छोड़ा नही जाता। वैसे भी इतने बड़े कमरे में अकेले घबराहट सी होती होगी न। ऐसा करना अपना सामान कल नीचे ठाकुर माँ के कमरे में रख लेना।
   उनका कमरा बड़ा भी बहुत है। उसी में एक ओर तेरे लिए खाट भी पड़ जाएगी, और तेरी ठाकुर माँ के साथ रहने पर तुझे अकेले डर भी न लगेगा।”
  पारो का जी किया कि चिल्ला के कह दे कि मुझे अभी भी किसी से डर नही लगता। और मैं ये कमरा छोड़ कही नही जाऊंगी। लेकिन देव जाते जाते उसकी ज़बान उसकी बोली भी अपने साथ ले गया था।
  वो चुप खड़ी रही।

” क्यों बऊ दी मैं गलत कह रही हूँ क्या? इतने बड़े पलंग का और इतने बड़े कमरे का अब इसे क्या काम?वैसे भी अब इसे पलंग पर नही खाट पर सोना चाहिए। पुराने लोग तो ज़मीन पर सोने कहते थे, पर चलो हम लोग वैसे पुराने खयालों वाले नही हैं। दूसरी बात यह नीचे माँ के साथ रहेगी तो उन्हें भी आसरा हो जाएगा। रात बरात कभी पानी पीना है कभी बाथरूम जाना है आखिर कोई तो साथ रहेगा। और फिर बऊ दी तुम्हें माँ के लिए नर्स रखने की भी ज़रूरत न होगी। अरे जब घर की बहु नहला धुला सकती है तो इसी काम के लिए पैसे बहाने की क्या ज़रूरत?”

पारो ने बड़ी मुश्किल से आँख उठा कर अपनी सास को देखा उन्होंने उससे नज़रे चुरा लीं। पारो समझ गयी देव के न रहने पर शोक जताने आयी बड़ी बुआ इसी घर में अपना पक्का आवास बनाना चाह रहीं थीं। एक ही लड़का था उनका, जो पढ़ लिख नही पाया था। वो पहले भी एक बार देव से उसे अपने साथ काम सिखाने कह चुकी थी लेकिन अब तो लग रहा था वो उसे देव की दुकान पर ही बैठाने के मंसूबे लिए आयीं थीं। क्योंकि सारे काज निपटने के बाद जब उनके पतिदेव ने उनसे भी वापस चलने की बात कही तो उन्होंने कुछ दिन बाद आने की बात कह कर उन्हें अकेले ही भेज दिया था। उनके पति पोस्टमास्टर रह कर रिटायर हुए थे इसी से कुछ खास आमद थी नही पर मायके की सम्पन्नता उनकी आंखें चौन्धिया जाती थी।

  जबसे वो यहाँ आई थी कोई न कोई तिकतिक लगाये ही रहतीं। कभी उन्हें माछ में सरसों की झाल कम लगती तो कभी मिष्टी दोई में मीठा। कुल मिलाकर वो किसी से संतुष्ट नही थीं। पारो से तो कतई नही।
  अब आज वो एक तरह से पारो का कमरा हथियाने चली आयी थीं। पारो ने एक नज़र सासु माँ पर डाली उनके चेहरे पर कष्ट की हल्की सी छाया आकर गुज़र गयी, अपनी भावनाओं पर अपने गुस्से को जबरदस्ती लादती वो भी अपनी ननंद के सुरों में सुर मिलाने लगी…-“ठीक ही तो कह रहीं है दीदी। तुम इतने बड़े कमरे में घबराओगी ही,इससे अच्छा है वहीं नीचे रहोगी तो माँ को वक्त पर कुछ ज़रूरत हो तो तुम कर सकोगी। वैसे भी अब तुम्हारे जीवन में और बचा ही क्या है? “

  ” ऐसा क्यों बोल रहीं है काकी माँ! उसका पूरा जीवन बचा है और जीवन से अनमोल क्या है भला? वो भी अपने जीवन को किसी सुंदर और सार्थक कार्य में लगा सकती है। अपने जीवन को एक सुंदर आकार दे सकती हैं। आखिर भगवान ने तो हमें अकेला ही पैदा किया है,रिश्ते नाते तो हम जोड़ते चले जातें हैं। और फिर उन्हीं नातों में अपना जीवन ढूंढने लगते हैं ये सोचे बिना की उस ऊपर वाले ने हमें क्यों पैदा किया…”


  
    आनन्दी अपनी लय में बोलती चली जा रही थी, की उसकी सास ने उसे टोक दिया…-“तुम्हारे जितना दिमाग हम लोगों के पास तो है नही बऊ माँ! कनकलता दीदी घर पर सबसे बड़ी हैं, ये अपना घर छोड़ हमारे यहाँ दुख के समय में खड़ी हैं, हम सब के साथ। इनका सम्मान करना भी हमारा ही धर्म है। नीचे उनके लिए अलग से कोई कमरा नही है। माँ और बेटा दो लोग हैं। इस इतने बड़े कमरे में आराम से रह सकतें हैं। पारो का क्या है कुछ दिन ठाकुर माँ के कमरे में रह जायेगी तो क्या बिगड़ जायेगा। नीचे हम सब भी तो साथ होंगे।
   और फिर दीदी के जाने के बाद तो कमरा देव का ही है, पारो को मिल ही जायेगा।”

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  अपनी सास के सामने आनन्दी कम ही बोलती थी, लेकिन आज उसका धैर्य चूक गया था। उसे बुआ जी के वहाँ रहने से कोई परेशानी नही थी, लेकिन उनका बात-बात पर घर परिवार के मामले में दखल देना उसे अखर जाता था।
   पर अब सासु माँ की तीखी आँखों के चाबुक ने उसे एक किनारे चुप खड़ा रहने की ताकीद कर दी थी। वो चुप खड़ी पारो को देख रही थी…-” जी ठीक है, मैं रात तक अपनी जरूरत का सामना लेकर नीचे चली जाऊंगी। ” पारो ने कह तो दिया लेकिन वो उन सब से और क्या कहती कि जब वो अपनी सास तक में अपने पति को देख पा रही थी तो इस कमरे में तो कितनी अनगिनत यादें गुंथी पड़ी थी। इसी खिड़की की बल्लियों पर उसके हाथों के निशान थे, जिन्हें पकड़ कर खड़ी वो यही महसूस करती की उसका हाथ देव के हाथों पर हैं। जिस तकिए पर वो सिर रखता था, जिस चादर को वो ओढता था, जिस तौलिए को काम में लाता था, वो सारी अनमोल धरोहरों को साथ ले पारो नीचे चली गयी। ठाकुर माँ के कमरे में एक ओर उसके लिए एक पुरानी चारपाई डाल दी गयी।
   उसमें एक पतले से रुई के गद्दे पर तकिया डाले जब वो रात में लेटी तो उसकी आंखें झर झर बहने लगीं… कहाँ देव के सामने वो अकेले उस हिंडोले से पलंग पर अकेली सोती थी। उन रेशमी चादरों मखमली तकियों के बाद आज ये पतला गद्दा उतना नही चुभ रहा था जितना देव का ऐसे चला जाना।
   किसी एक व्यक्ति के चले जाने से संसार कैसा वीरान और सूना हो जाता है, पारो महसूस कर रही थी। और सोचते सोचते अचानक एक बात उसके दिमाग में आई की क्या अगर वो देव की जगह मर जाती तो देव का जीवन भी ऐसा ही कठिन हो जाता? या उसके जीवन में कुछ और तरह की बातें होतीं।
  सभी तरह की बातें सोचती वो सो गई।
       रात उसे ऐसा लगा जैसे देव की उंगलियां उस पर चल रहीं हैं। चेहरे पर से फिसलती उंगलियां गले से नीचे उतरने को थीं कि नींद में भी उसे याद आ गया कि देव तो अब है नही फिर ये कौन था। वो चौन्क कर उठ बैठी। खिड़की पर कुछ सरसराहट सी हुई और सब कुछ एकदम शांत हो गया।
  उसकी खाट खिड़की से लगी हुई थी, उसने बैठे बैठे ही बाहर झांक कर देखा, बाहर कोई नज़र नही आया। तब क्या वो सच में सपने में देव को ही महसूस कर रही थी, या फिर खिड़की से किसी ने अपना हाथ अंदर डाल रखा था?
  पर कौन हो सकता था वहाँ इस वक्त? उसके बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी… उसके बाद वो रात उसकी आँखों ही आंखों में कट गई…रात बीत गयी, सुबह हो गयी लेकिन वो रात की बात किसी से कह न सकी।

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   दिन बीत रहे थे। लाली भी कुछ दिन मायके रह कर वापस चली गयी थी। अब घर भर में दो ही लोग थे जिन्हें पारो की चिंता थी, एक आनन्दी और दूसरी ठाकुर माँ। उन्हें हमेशा पारो को देख कर यही लगता कि उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वो खुद हैं। ना वो देव को अपने साथ लेकर जाती और न देव के साथ ये हादसा होता।
   पर घर भर की सबसे बुज़ुर्ग होने पर भी कई बातों में उनकी भी नही चलती थी। जो नियम थे वो तो थे ही।
   आनन्दी ने दर्शन से कह कर पारो को पढ़ने के लिए किताबें दिलवानी शुरू कर दी थीं। अब दोपहर में पारो ठाकुर माँ के कमरे में एक किनारे बैठी किताबें पढ़ती रहती।
   और कभी जब दर्शन उससे किसी पढ़े गए पद की व्याख्या पूछता या उसे गलत बताता तो वो उसे सहीं कर देती।
  एक शाम वो बाहर से आते हुए ढेर सारे अमरूद ले आया। नीचे आंगन में बैठी पारो कोई काम कर रही थी कि पीछे से आकर उसने उसकी झोली में अमरूद डाल दिए। चौन्क कर दर्शन को देख पारो मुस्कुरा उठी। उसके मन के अंदर कहीं छिपी बैठी लड़की मुस्कुरा उठी। वो सारे अमरूद समेट कर रसोई की तरफ जाने लगी…-” अरे कहाँ चल दीं सारे अमरूद समेट कर? क्या हम लोगों को एक भी न दोगी? “
  दर्शन के सवाल पर वो पलट कर थम गई…-“सारे ही तुम्हारे हैं। मैं तो अंदर धोने लेकर जा रही थी। “
   ” मैं क्या जानूं? मुझे तो लगा तुम अकेली ही खा लोगी!”
   ” इतनी भुक्खड़ लगती हूँ तुम्हें”  हँस कर उसे घूरती पारो आगे बढ़ने लगी कि उसके सिर पर पीछे से एक टपली मार दर्शन सीढ़ियों पर भागता हुआ चढ़ गया, और उसकी टपली का जवाब देने आँचल से सारे अमरूद फेंक कर पारो उसके पीछे दौड़ पड़ी। बड़े दिनों बाद पारो ने जतन से जिस बावली सी लड़की को अपने भीतर छिपा रखा था बाहर आ गयी।
  ” अरे सम्भल के ! फिसल न जाना तुम दोनों। ” आनन्दी दोनो की चुलहबाज़ी देखती मुस्कुराती हुई अपने आँचल से अपना हाथ पोंछती रसोई में चली गयी, और उसकी बात पर वहीं आंगन में बैठी बुआ जी ज़हर बुझा तीर छोड़ गई…-” समय रहते इन्हें न रोका तो फिसल ही तो जाएंगे। “
   वही बैठ कर चांवल चुनती पारो की सास का जी धक से रह गया, उन्होंने साथ बैठी अपनी जेठानी की ओर देखा, उनकी अनुभवी आंखों में भी चिंता की रेखाएं नज़र आने लगीं थीं…..

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क्रमशः

aparna…..

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दिल से …..

     समाज के कायदे कौन बनाता है? कौन हैं वो समाज के ठेकेदार जिन्होंने औरतों के लिए अलग और मर्दों के लिए अलग नियम बना रखें हैं।
  हम कितना भी लिख पढ़ जाएं , कितने भी आगे निकल जाएं लेकिन अब भी बिना पति के एक औरत का जीवन उतना सुगम और सहज नही हो पाया है। दुर्भाग्यवश अगर जीवनसाथी बिछड़ जाएं या अलग हो जाएं तो इसमें किसी का कोई दोष तो नही फिर क्यों उसके साथ ऐसा सुलूक किया जाता है कि उसका दुख कम होने की जगह और बढ़ता चला जाता है।


   काश लोग फ़िज़ूल नियमों की जगह एक ही नियम प्रेम का नियम मान लें तो किसी का दुख समाप्त भले न कर सकें कुछ हद तक कम तो ज़रूर कर पाएंगे।
  
     आगे के भाग हो सकता है पढ़ने में थोड़े और तकलीफदेह हों लेकिन अगर कृष्ण दुख देते हैं तो उससे उबारने वाले भी वहीं हैं।

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  आपका सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ। आप मुझे पढ़ते हैं सराहतें हैं, दिल से शुक्रिया नवाज़िश!!!

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aparna…


 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

28 विचार “समिधा-28” पर

  1. चाहे कुछ भी हो जाए तब भी ये भेदभाव कहीं न कहीं से आकर अपने पैर पसार ही लेता है।अंदेशा है कि अभी तो शुरुआत हुई है, बहुत कुछ झेलने की,ये समय की तपिश ही पारो को सोना बनाएगी।बहुत खूबसूरत भाग👌💞💞💐।।

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  2. बाहरवाले या समाज तो बाद में पहुंचते हैं उससे पहले घरवाले ही नियम कायदों से औरत के पैर बांध देते हैं। यही सासू मां और बुआ पारो के साथ कुछ होने पर देव को आगे बढ़ने और पारों को भूल जाने के लिए कहती वहीं अब ये सब देव के ना होने पर पारों की नौकरों जैसी हालत कर रहें हैं।

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