समिधा-29

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समिधा- 29

    कितनी अजीब बात है! वही संसार है, वही हवा वही पानी सब कुछ भगवान में एक सा दिया है! सबको वही समय दिया है, लेकिन किसी का समय तो पंख लगाकर उड़ जाता है और किसी का काटे नहीं कटता।
पारो के साथ भी यही हो रहा था। चाहे वह दिन दिन भर अपने आपको काम में व्यस्त रखें लेकिन रात उसकी आंखों ही आंखों में कट जाती थी। वो दिन भर इतना सारा काम इसीलिए करती थी कि थक कर ऐसी चूर हो जाए कि पलंग पर लेटते ही उसे नींद आ जाये। वो सो जाए। लेकिन आंखें बंद करते ही देव का मुस्कुराता चेहरा उसके सामने झिलमिलाने लगता, और वह अपनी खाट पर पड़े-पड़े खिड़की से बाहर चांद को देखती आंखों ही आंखों में रात काट जाती थी।
    ******

   वहीं ऐसी ही कुछ बेचैनी वरुण के मन में भी उथल- पुथल मचाये थी! वह भी अपने काम में व्यस्त था। उसका सारा दिन मंदिर के कामकाज करने में निकल जाता था। वेद अध्ययन करने के समय के बाद भी वो रात में अपनी किताब  लिए पढ़ता रहता । लेकिन मंदिर के नियम थे कि रात्रि नौ के बाद विद्या अध्ययन नहीं किया जा सकता। मजबूरी में अपने तखत पर लेटा वह भी खिड़की से बाहर चमकते चांद को देखता रहता था।
   उसके मन में कुछ अलग ही तूफान चलता रहता था। वह अक्सर यह सोचता कि जब उसका एक मन वैराग्य की ओर अग्रसर है, तो क्यों उसका दिल चांद पर ऐसे लट्टू हुआ जा रहा है। आखिर चांद को देखते हुए वह किसे देखना चाह रहा है? अपने मन के सवालों का जवाब उसके पास नहीं था! पर फिर भी रात में लेटे-लेटे खिड़की पर से चांद को ताकते रहना उसे एक अलग सा सुकून देता था।

      ऐसा लगता था उस चांद के दूसरी तरफ कोई है जो उसे देख रहा है।

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   इधर पारो की मुसीबतें खत्म होने की जगह बढ़ती जा रही थी। जैसे-जैसे समय बीत रहा था, पारो के लिए उसके घर के सदस्यों की सहानुभूति कम होती जा रही थी। और उसकी जगह गुस्सा बढ़ता जा रहा था। इन बातों में आग में घी का काम बुआ जी कर रही थी।
बुआ जी का मुख्य उद्देश्य था कि किसी भी तरीके से देव की दुकान उनके बेटे को मिल जाए । उनका बेटा भी देव की ही उम्र का था लेकिन वह अब तक उसकी शादी नहीं कर पाई थी। कारण उम्र हो जाने पर भी वो अब तक कोई काम धाम नहीं कर पाया था।
      वो अक्सर अपनी दोनो भाभियों के पास बैठी कुछ न कुछ इधर उधर की बातों में लगी रहतीं। उनकी सबसे छोटी भाभी यानी देव की काकी अक्सर कोई न कोई काम का बहाना बना कर इस गोष्ठी से उठ कर निकल जातीं। उन्हें बुआ जी की बातों में कोई मज़ा नही मिलता था।
    ऐसी ही एक दोपहर सभी औरतें चौका चूल्हा निपटा कर खा पीकर एक-एक झपकी लेकर फिर आंगन में बैठी थी। छोटी काकी चाय चढ़ाने के बहाने रसोई में ही थी। बाकी सारी बहुएं अपने कमरों में आराम कर रहीं थीं।
  आंगन में बुआ जी देव की माँ और बड़ी माँ के साथ बैठी अपनी ससुराल का कोई किस्सा सुना रहीं थीं कि ठाकुर माँ के कमरे से दर्शन भागता हुआ निकला और सीढ़ी चढ़ता ऊपर की ओर भागा!
  ” अरे ठहर तो जा! कहाँ भाग रहा है? ” ठाकुर माँ की आवाज़ के साथ-साथ ताल मिलाती उसके पीछे हाथ में पेंसिल लिए पारो भी बाहर भागती चली आयी। आखिर उसे सीढ़ियों पर चढ़ा देख पारो ने वहीं से पेंसिल उस पर फेंक कर मार दी…-“, ये क्या कर रही है? अगर उसे पेंसिल चुभ गयी तो? “देव की माँ चिल्ला उठी। सहम कर पारो वापस कमरे में जाने लगी कि रसोई से चाय लिए काकी बाहर चली आयीं। वहाँ बैठी औरतों को चाय देते उन्होंने एक कप पारो को थमा दिया…-” पारो जा ये कप ऊपर दर्शन को दे आ!” “
   देव की माँ नाराज़गी से खड़ी हो गयी और पारो के हाथ से कप ले लिया, और तेज़ी से ऊपर सीढियां चढ़ गयीं। काकी को इसका कारण समझ नही आया। उन्होंने दो कप उठा कर वापस पारो के हाथ में रख दिये…-” जा ठाकुर माँ और अपनी चाय ले जा, वहीं पी लेना। “
   हाँ में सिर हिलाती वो चाय लिए अंदर चली गयी। उसके अंदर जाते ही पैर पटकती देव की माँ वापस चली आयीं…-“मति मारी गयी है क्या तेरी छोटी बहू। उसके हाथ से दर्शन को चाय क्यों भिजवा रही थी? “
” क्यों क्या हुआ दीदी?”
उन्होंने अपने माथे पर हाथ मार लिया…-” अरे कैसे समझाऊं , मैं नही चाहती कि ये दोनों ज्यादा घुले मिलें। उसका हाथ अच्छा नही है। मैं नही चाहती दर्शन के किसी भी खाने पीने को ये हाथ लगाए, ज़हर हो जाएगा सब ज़हर।”
  सब कुछ सुनती बैठी बुआ जी को इस सारी बातचीत में बहुत रस मिल रहा था…-” ये सब क्या सोचने लगी बऊ दी? ऐसा भी होता है कभी। उसके हाथ में कौन सा ज़हर होगा? तुम भी कुछ भी सोचती हो। मैं तो बस इसलिए दोनो को दूर रखने कहती हूँ कि दोनो की उम्र ही ऐसी है कि बहक सकतें हैं।
   फिर रिश्ता भी वैसा ही है। आग और घी को साथ रखोगी तो आग तो भड़केगी ना। तुम खुद अनुभवी हो, सब जानती समझती हो। और कितना खुल कर कहूँ, हमारे मुहल्ले में ऐसा ही कुछ हुआ भी।”
   बुआ जी की बातों से देव की माँ का खून खौल रहा था, लेकिन कुछ कह नही पा रही थी कि साथ बैठी काकी ने धीरे से कुछ कहना शुरू किया…-“आप सभी मुझसे बड़े हैं ,अधिक ज्ञान है आपको। लेकिन मैं मेरे मन की बात आप सबके सामने रखना चाहती हूँ। क्या हम पारो और दर्शन की शादी नही करवा सकते?”
    बुआ जी ने ये बात सुनते ही देव की माँ की ओर देखा, उनकी आंखें आग उगल रही थी…-“वाह वाह छोटी बहू। तुम ऐसा भी सोच सकती हो मैंने कभी नही सोचा था। एक लड़के को तो वो खा गई अब दूसरे को भी जानबूझ कर उसी कुंए में धकेल दूँ, इतनी अंधी नही हूँ मैं? क्या तुम्हारा लड़का अभी ब्याह लायक होता तो उसका ब्याह कर देती तुम उससे। “
   देव की काकी को नही लगा था कि उसकी बात देव की माँ को इतनी खल जाएगी..
..” शांत हो जाओ , तुम दोनो आपस में ये सब क्या लेकर बैठ गईं। छोटी बहु , इसके मन की हालत समझो तुम लोग। अभी अभी इसने अपने बेटे को खोया है। इससे बड़ा दुख संसार में दूसरा नही है कि अपनी संतान को ऐसे ….
   देव की बड़ी माँ अपनी बात पूरी भी नही कर पायीं और सुबकने लगी।
  उनकी पीठ पर हाथ फेरती बुआ जी उन्हें और देव की माँ को सांत्वना देती बैठी थी कि उसी वक्त कहीं से धूल फांक कर उनका बेटा सतीश वापस लौट आया…-” माँ एक कप चाय बना देना।”अपनी माँ को आदेश देता वो सीधा सीढ़ी चढ़ ऊपर देव के कमरे में चला गया…-” एक ये हैं हमारे राजकुमार। दिखने सुनने में इतने सुंदर की लगता है कहीं के राजकुमार हैं और लक्षण देखो। न काम काज में मन लगता न पढ़ने लिखने में। पता नही क्या करेगा ये लड़का। ” अपने बेटे का गुणगान कर उन्होंने झूठ मूठ के दो ऑंसू बहा दिए।
   लोगों का दुख दूर करने का सबसे सुंदर उपाय है कि उनके सामने अपना दुखड़ा रो लो। बुआ जी को ऐसा कोई कष्ट नही था अपने बेटे से, लेकिन यहाँ बस अपनी भाभियों के सामने उन्होंने यूँ ही कह दिया।      उसी समय चाय के कप रसोई में रखने पारो चली आयी। उसे देखते ही उन्होंने उसे आवाज़ लगा दी…-” पारो ज़रा एक कप चाय बना कर ऊपर सतीश भैया को दे आ।”
   उसके पीछे कौन क्या कह रहा इन सब बातों से पारो भी पूरी तरह अनजान थी ऐसा नही था। लेकिन वो जानबूझ कर इन बातों में ध्यान नही दिया करती थी। वो जानबूझ कर खुद को किसी न किसी काम में उलझाए रखती।
   रसोई में चाय बना कर वो बाहर बुआ जी के पास कप ले आयी…-” जा ना ! ऊपर कमरे में हैं सतीश भैया उसे दे आ। देव से चार महीने बड़ा है तो तेरा भैया हुआ ना! “
   वो कप लिए ऊपर चली गयी। पलंग पर आराम से लेटा सतीश अपने फ़ोन पर कुछ देख रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक दे पारो अंदर चली आयी। टेबल पर कप रख वो लौट रही थी कि सतीश ने उसे आवाज़ लगा दी…-” ज़रा यहीं ले आइये। अगर आपको तकलीफ न हो तो।”
पारो ने कप पलंग के पास वाले टेबल पर रखना चाहा कि सतीश ने हाथ बढ़ा दिया। पारो ने उसकी तरफ कप बढ़ाया और सतीश ने एक हाथ से कप थामते हुए दूसरे हाथ से उसके हाथ पर हाथ रख दिया।

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पारो ने चिहुंक कर अपना हाथ पीछे खींच लिया…-” अरे मुझसे डरने की ज़रूरत नही है आपको। और न ही इस कमरे में आने के लिए सोचने की ज़रूरत है। आप ही कमरा है। आप ही का पलंग है। जब जी चाहें आ जाया करें।”
   पारो को जाने क्यों ये आदमी कभी नही सुहाता था। वो पलट कर बाहर जाने को हुई कि उसने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया…-“आपको किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो आप बेझिझक मुझसे कह सकती हैं। मैं समझता हूँ आपकी भी तो अपनी ज़रूरतें होंगी। “
  कंधो पर से फिसलती उसकी उंगलियां गर्दन से होती हुई पीठ तक आने लगी कि पारो को लगा वो पलट कर उसे एक झापड़ धर दे। लेकिन बिना कुछ कहे वो बाहर भाग गई। सीढ़ी से नीचे उतरते ही आंगन में सारी औरतें बैठी थीं। उनके सामने से अपनी रुलाई रोकते हुए निकल पाना मुश्किल जान वो छत के दूसरी तरफ बढ़ गयी। इतनी देर से रोकी हुई रुलाई आखिर फूट पड़ी और वो सिसक सिसक कर देव को याद करती रोने लगी।
    उसे मालूम नही था कि छत के उसी दूसरे किनारे में दर्शन बैठा कोई किताब पढ़ रहा था । पारो को ऐसे धार रोते देख वो उठ कर उसके पास चला आया…-” क्या हुआ बऊ दी ? आप अचानक इतना क्यों रोने लगी? सब ठीक तो है ना?
” अब क्या ठीक हो सकता है दर्शन? मेरा जीवन ही खत्म हो गया है समझो।”
” ऐसा क्यों कह रही हैं बऊ दी। अब देखिए परीक्षाएं भी पास आ रहीं हैं। अब बाकी बातों से मन हटा कर पढ़ने में लगा दीजिये। बाकी बातें कुछ समय के लिए भूल जाइए ना।”
  उसे बेचारे को सांत्वना के शब्द नही मिल पा रहे थे। वो जितना जैसा बन पड़ रहा था समझाने की कोशिश में था कि पारो सुबक उठी…-“मैं कुछ दिनों के लिए माँ के घर जाना चाहती हूँ।”
“हाँ बिल्कुल चली जाना आप। किसने रोका है, पर अभी शांत हो जाइए, देखिए आप को रोते देख फिर माँ भी रोने लगती है।”
  दर्शन और वो बात कर ही रहे थे कि देव की काकी पारो की माँ के साथ वहीं चली आई।
मां को देखते हैं पारो भाव विह्वल हो उनके गले से लग गई….-” मां! अच्छा हुआ तुम आ गईं। मैं अभी तुम्हें ही याद कर रही थी। मैं यही कह रही थी दर्शन से कि मुझे तुम्हारे पास जाना है।”
मां उसे सीने से लगाए चुप कराते हुए अपने साथ ले चली।
     वही सीढ़ियों पर दोनों मां बेटी बैठ गई काकी उन दोनों को वहीं छोड़कर नीचे रसोई में चली गई। दर्शन दूर छत की दीवार से टीका हाथ बांधे उन दोनों को एक दूसरे के दुख से दुखी होता देखता रहा । छुपकर उसने भी अपने आंखों से बहने वाले आंसुओं को पोंछ लिया।
“मुझे अपने साथ ले जाने आई हो ना माँ?”
“नहीं ! मेरी बेटी तुझे कैसे ले जा सकती हूं ? तू तो घर का हाल जानती ही है। तेरी मां का ही वहाँ कोई ठिकाना नहीं है । ऐसे में तुझे और साथ ले जाऊं।
     और वहां  जाकर तू अपने ही भाई भाभी और उनके बच्चों की गुलामी करें यह मैं कैसे देख पाऊंगी?  बोल तो।
अच्छा एक बात बता, क्या यहां तुझे कोई कष्ट है ? तेरी सास तो देवी स्वरूप है क्या तुझे प्यार से नहीं रखती?”

पारो अपनी मां से क्या कहती? उसने नीचे सिर झुका लिया और अपने आंसू पोंछ लिये।
“यहां घर पर सभी बहुत अच्छे हैं मां। मुझे किसी से कोई परेशानी नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि मुझे बहुत ज्यादा काम करना पड़ता है, लेकिन फिर भी तुम्हारी बहुत याद आती है। मन करता है कुछ दिन तुम्हारे साथ रह सकूं।”

“इतनी ही अच्छी किस्मत होती, तो अपने पति को थोड़े ही गंवा देती  बेटी? अगर तेरा पति होता तो तू भी शान से अपने मायके में आकर रह सकती थी। उतनी ही शान से मैं तेरे ससुराल में आकर रह सकती थी।
मेरी ही तरह तेरी किस्मत भी फूटी हुई है तो क्या किया जाये? पति से ही सारे सुख हैं। पति के बिना सिर्फ श्रृंगार नही छूटता, बल्कि छूट जाता है एक औरत का आत्मसम्मान, उसके होंठो की हंसी, उसके जीने की ललक….”
“अगर आप इसे अपने साथ नहीं रखना चाहती हैं, तो इसमें आपका कोई दोष नहीं है। ब्याह के बाद लड़की का घर उसका ससुराल ही होता है। “काकी ये कहती पारो की माँ के लिए कुछ खाने का सामना लिए ऊपर चली आयीं। उनके पीछे ही बुआ जी और देव की बड़ी माँ और माँ भी आ गईं।

  ” देखिए बहन जी बुरा मत मानियेगा। मेरी एक जान पहचान वाली हैं उन्होंने बताया था कि मथुरा में एक आश्रम है जो खास ऐसी औरतों के लिए ही बना है। “

  पारो की माँ की आंखें भीगने लगी..
और पारो के दुख की अब कोई सीमा नही रह गयी थी। वो सोचने लगी, यही वो औरतें थी जो देव के सामने उसे हाथों हाथ लिए रहती थीं और आज उसके जाते ही क्या सास और क्या माँ दोनो ही समाज का सोच सोच कर इतनी बदल गईं।
     क्या इन लोगों के लिए अपनी बेटी अपनी बहु का दुख समाज से ऊपर नही है?
   एक अपनी बेटी को नौकर बने नही देखना चाहती तो दूसरी को  ये डर सता रहा कि उनके दूसरे बेटे पर वो डोरे न डालने लगे।

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” आप दुख क्यों करती हैं। अगर भगवान दुख देते हैं तो निवारण भी वही करते हैं। वहाँ मथुरा आश्रम की बहुत तारीफ सुन रखी है मैंने। अच्छा खाना, पहनना और सारा दिन कृष्ण भक्ति। अब इससे ज्यादा सुख और क्या होगा? ” बुआ जी अपनी तीखी ज़बान से ज़हर बरसाए जा रहीं थीं और बाकी औरतें गुमसुम बैठी सुन रही थीं!

  ” अरे कोई मुझे भी बताओ ऊपर क्या चर्चा चल रही है। अब मरी बुड्ढी हड्डियों में ताकत नहीं कि मैं सीढ़ियां चढ़कर उपर आ सकूं, तो कम से कम तुम ही लोग नीचे आ कर बात कर लो।”
  ठाकुर मां की आवाज सुन बुआ जी मुंह बनाकर एक और देखने लगी…-” इनके सामने तो कुछ भी कहना व्यर्थ है! अब इस बुढ़ौती में इन्हें कुछ समझ में तो आता नहीं है। अपनी अलग ही रट लगाए बैठी रहती हैं। अगर इनके सामने बातचीत हुई तो यह पारो को कभी आश्रम नहीं जाने देंगी। पर आप सब से मैं एक बार फिर कहती हूं, कि उस आश्रम से बढ़कर सुंदर जगह पारो के लिए और कोई नहीं है। वही उसका भविष्य है आप लोग मेरी बात मानें और इसे जल्द से जल्द मथुरा के आश्रम भेजने की तैयारी कीजिये। “

  ऑंसू भारी आंखों से पारो की माँ ने अपनी लाडली को देखा। इन कुछ ही महीनों में चेहरा कैसा बुझ गया था। चेहरे पर बहुत पीलापन आ गया था। जैसे किसी ने शरीर का सारा रक्त निचोड़ लिया हो। सफेद साड़ी में में लिपटा चेहरा और सफेद लग रहा था। कितनी कमज़ोर हो गयी थी पारो।
    सोलह सत्रह की उम्र में उनकी बेटी का ये क्या हाल हो गया था।
” मैं पारो को अपने साथ ले जाना चाहती हूँ। “
   आखिर पारो की माँ ने हिम्मत कर ही ली, वहाँ बैठी बाकी औरतों के दिल से जैसे कोई बोझ उतर गया…
” नही माँ ! मैं तुम्हारे साथ नही जाऊंगी। ” पारो ने दृढ़ता से अपनी बात रखी और एक बार फिर वहाँ बैठी सभी औरतों का जी कसमसा गया!
“माँ ! मुझे मथुरा आश्रम पहुंचाने की व्यवस्था करवा दीजिये। “अपनी सास की ओर मुड़ कर पारो ने कहा और नीचे  उतर गई।
   उसके पीछे बैठी सभी औरतों के चेहरों पर रंग आते जाते रह गए…..

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क्रमशः

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aparna ….


  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

40 विचार “समिधा-29” पर

  1. बहुत ही दुखी भाग था बहू की मृत्यु हो जाती है तब भी बेटे को रखते ही है ना पास मे बेटे को आश्रम कयु नही भेजते यही आश्रम पारो और वरुण की ज़िन्दगी मे नया मोड़ लेकर आयेगा

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  2. किसी ने बेटा ,किसी ने भाई तो किसी ने पति खोया है ,जब सभी का दुःख बराबर है शायद पारो और मां का अधिक तो कैसे कोई पारो के लिए कठोर हो सकता है। पता नहीं बुआ जैसी औरतें दिल और जबान में इतना जहर लिए कैसे रहती हैं। ईश्वर सब देखता है शायद पारो की नियति वहीं उसका इंतजार कर रही हो पर बुआ जी का जहर उन्हें खुद किसी दिन जरूर नुकसान पहुंचाएगा।❣️❣️

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