शादी.कॉम-19

             “अरे ए फूलमनी जा तो ओ रखिया को घीस घास के रख !! राजा के बाऊजी भी ,बस काम फैलाना जानते है,इत्ता बड़ा पेठा उठा लाये,अब इसकी बरी तोड़ने के लिये उत्ता सारा उरद भी तो पीसे पड़ी,का का देखें हम,अब हमारा भी उत्ता जी नही चलता।।”

  “हो जायेगा अम्मा जी ,सब काम हो जायेगा,काहे इत्ता परेसान हुई जा रही हैं।”

  ” काहे ना हो !! हम तो अपना किस्मत मे लिखा के लाये हैं परेसान होना,,पन्द्रह के हुए थे कि सादी हो गयी उसके बाद मजाल है ये घर के लोगो की, कि  कभी हमको चैन से अपना मायका में चार दिन रुकने दिये हों,जैसी महतारी वैसने लड़का!!
    भगवान झूठ ना बुलवाये,,बड़के की जचकी में अम्मा जी भेजी रही तब भी एक महीना नही पूरा की वापिस बुला ली,वही हाल राजा के मे रहा,अब का- का बताएं,अच्छा भी नही लगता ,सब सोचेंगे अपनी सास की बुराई गा रही ,पर हम जितना झेले हैं ना कोई ना झेल सकता,,ये आज कल की लड़कियाँ जरा सा कुछ बोल भर दो इत्ता बड़ा मुहँ फूला लेंगी।”

स्वगत भाषण में आकन्ठ डूबी सुशीला बीच बीच मे कनखियों से देखती भी जाती कि कहीं उसकी अग्निगर्भा बहु रसोई से आंगन में टपक तो नही पड़ी।।
    
        शन्नो मौसी और प्रेमा बुआ का इन सब बतकही में खूब मनोरंजन होता था।।सुशीला की सास जीवित थी और अभी भी अपने सास वाले पूरे रूतबे के साथ मौजुद थी,हालांकि वो पुराने ज़माने की न्यायप्रिय महिला थी फिर भी थी तो सुशीला की सास ही।।
     अपने जमाने में उन्होनें ढेरों दुख देखे थे।। छोटी उमर में वैधव्य का दंश और अकेले बच्चों का पालन पोषण वो भी सिर्फ खेती खार के भरोसे उन्होने किया था,इसीसे हर छोटी से छोटी वस्तु पे उनकी अपार ममता थी जो स्वाभाविक भी थी पर सुशीला को यही उनकी कंजूसाई लगा करती थी।
    
   सुशीला ठीक ठाक खाते पीते घर की नौ भाई बहनों में सबसे बड़ी बहन थी,जब ब्याह के आयी तब भले ही उमर से कम परन्तु सीख समझ में चतुर थी,बनाने खिलाने में उसकी अटूट भक्ति थी,कोई मेहमान घर से बिना मीठा खारा लिये निकल नही सकता था,यही यजमानी सास को कष्ट दे देती थी,वो अक्सर बहु  को उसके खुले हाथ घर लुटाने की आदत पे खरी खरी सुनाती रहती थी,पर इतने साल बीत गये …..कल की नवेली बहु आज खुद सास बन गयी पर अपने खिलाने पिलाने के रुचिकर गुणों को आज भी त्याग नही पायीं ।।

   इतने सालों में रुपया पैसा भी जम गया पर सुशीला की सास नही बदली, और ना बदली सुशीला ।।
      वो प्रारम्भ से ही अपनी सास की अनुपस्थिती में उन्हें पानी पी पी के कोसा करती थी,वही आदत आज तक उसमें शुमार थी,हालांकि खुद की बहु आने के बाद शुरु शुरु में उसने सोचा भी कि मैं ऐसा करूंगी तो मेरी बहु क्या सीखेगी पर ये विचार बिल्कुल ‘ चार दिन की चान्दनी‘ साबित हुआ,और वो वापस अपने ढर्रे पे आ गयी।।

    सुशीला के साथ यही होता था,बात कोई भी हो वो घूम फिर के अपने प्रारब्ध को कोसती हुई अपनी सास की बुराई पे उतर आती थी ,और यही सुनना शन्नो मौसी जैसों के लिये अति रुचिकर होता था, ऐसे लोग अपने साथ एक अदृश्य दिया सलाई लेकर बैठते हैं और जब जैसे मौका मिलता है तीली लगाने से पीछे नही हटते।।
  
   शन्नो मौसी की संगत के लिये प्रेमा बुआ भी तैयार बैठी होती थी,प्रेमा राधेश्याम जी की दूर की बहन की बेटी थी,उन्हें भी अपनी मामी की बुराई का रस गुदगुदा जाता था।।

   ‘ तुमको बुलाऊं के पलकें बिछाऊँ,कदम तुम जहां-जहां रखो,ज़मीन को आस्माँ बनाऊं सितारों से सजाऊँ,अगर तुम कहो..…’

      राजा अपनी धुन में गुन गुनाता जा रहा था कि उसकी अम्मा ने आवाज़ लगा दी__
       ” अरे कुछ काम का भी काम कर लिया कर लल्ला!!! जब देखो मरे जिम में मूसल बेलन उठा उठा के वर्जिश करता फिरे है।”

    ” बोलो ना कुछ काम है तो कर के ही जायेंगे।”

   ” मेरा कोई काम ना है!!! अब कल रात इत्ती अबेर हो गयी वापस आते आते ,का ज़रूरत सुबह सबेरे उठ के जिम निकलने की।”

” अम्मा तुम भी तो लग गयी हो सुबह सुबह अपने काम में! फिर !! हम भी तुम्हारे ही बेटा हैं ।” हँसता हुआ राजा निकल गया और सुशीला वापस अपनी रामकथा में लग गयी।।

          ***************************

        दोपहर राजा की अम्मा खाना पीना निपटा कर अपने कमरे में ऊन और सलाई लिये बैठी स्वेटर बुन रही थी कि राजा पहुंच गया,उसे जितना कठिन बांसुरी से बात करना नही लगा था उससे कहीं अधिक कठिन अपनी अम्मा से बात करना लग रहा था……” अम्मा !!! क्या कर रही हो।”

   ” का करेंगें,तुम्हारे लिये स्वेटर बुन रहें हैं,बस पूरा होने को है उसके बाद तुम्हारे बाऊजी के लिये शुरु करेंगे।।”

    ” सारा दिन काम मे लगी रहती हो,थोड़ा तो अपने आपको भी आराम दिया करो,बस घर भर की चिंता में दुबला रही हो।”

    ” कहाँ से दुबला रहें हैं,अच्छे खासे तो हैं ।” सुशीला को ज़ोर की हँसी आ गयी…..अम्मा को हँसते देख राजा को भी थोड़ी हिम्मत आ गयी वो आगे बढ अम्मा के पैरों के पास ज़मीन में ही आलथी पालथी मार बैठ गया।।

     अम्मा की गोद में सर रखे राजा अपनी बात की भूमिका बना रहा था कि सुशीला का चचेरा भाई धर्मेश दौड़ा दौड़ा आया __

    ” जिज्जी बाबू( पिता जी) को फालिज मार गया है अभी अस्पताल ले जा रहे हैं,जल्दी चलो ।।”

   सुशीला हड़बड़ा कर उठ बैठी,और जल्दी जल्दी सीधी उल्टी चप्पल पैरों में डाल धर्मेश के साथ अस्पताल निकल गयी ,जाते जाते राजा को ताकीद कर गयी

   ” राजा अपने बाऊजी को फोन लगा दो,और बोलो तुरंत अस्पताल पहुँचे।”

    सुशीला के मायके में संयुक्त परिवार था,उसके पिता और चाचा दोनो ही के परिवार एक साथ ही रहा करते थे,बचपन से सब को साथ देखते सुशीला के मन में अपने चचेरे भाई बहनों के लिये भी अपने सगे भाई बहनों सा ही प्रेम अनुराग था,घर में सबसे बड़ी होने के कारण सारे छोटे भाई बहन हर बात में सुशीला जिज्जी की सहमती अवश्य लेते थे।और सुशीला भी पूरे मन से सबके सहयोग को सदा तैयार रहती थी।।
     
            कुछ आठ दस साल पहले सुशीला के पिता का निधन हुआ था इसीसे उसके चाचा ही अब उसके लिये पिता समान थे,चाचा की ऐसी नाज़ुक हालत सुन वो अपने भाई के साथ दौड़ पड़ी,उसके पीछे राजा भी भागा।।

      वो पूरा दिन दोनो माँ बेटे का अस्पताल में ही बीत गया,आई सी यू में भर्ती सुशीला के चाचा शाम होते तक खतरे से बाहर आ चुके थे……भाई भावज को सारी देखभाल के नुस्खे थमा के सुशीला राजा के साथ रात नौ बजते बजते घर पहुंची,,रूपा दोनो का रास्ता देखती भीतर वाले आंगन में बैठी कोई काम निपटा रही थी,जैसे ही सास को आते देखा झट घूंघट सर में खींच उठ कर चली आयी__

    ” कैसी तबीयत है अब चच्चू नाना की अम्मा जी।”

   रूपा भले ही ज़बान की तेज़ और कड़वी थी,पर मन ही मन अपनी सास का सम्मान करती थी,, और राजा के लिये तो उसे सच में ममता थी, इसिलिए दोनो को खाने के समय पर घर पहुंचा देख उसे संतुष्टी मिली, वो फौरन दौड़ कर चाय चढ़ा आयी और दोनो के लिये पानी लेती आयी।।

   राजा तो पानी पीकर अपने कमरे में चला गया पर सुशीला वही बैठी चाय पीते हुए अस्पताल का सब हाल समाचार रूपा को सुनाती रही।।।

   रात खाना पीना निपटने के बाद राजा एक बार फिर अम्मा के पास चला आया,उसे पता था बाऊजी रात के खाने के बाद चहलकदमी करते चौक के पान वाले तक चले जाते हैं,यही सुयोग उसे अपनी बात रखने के लिये उचित जान पड़ा __

    ” अम्मा!! सुनो तुमसे कुछ बात करनी थी।”

   ” हाँ कहो!! क्या हुआ बिटवा??”

    ” देखो पहले हमारी बात ध्यान से सुनना ,और पूरी बात सुनना ,उसके बाद अपनी राय देना।।”

” हां भई !! पर का बात हो गयी?? वो भी तो बताओ?”

   ” अम्मा !!! हमारी दोस्त है ना बांसुरी,तुम जानती हो उसे ,पिछली गली वाले तिवारी जी ,उनकी लड़की है।।”

” हाँ !! तो ??”

  सुशीला ने चेहरे पर एकदम ऐसे भाव रखे जैसे उसे बांसुरी या किसी भी अन्य से कोई फर्क नही पड़ता।।

   ” अम्मा वो हमारी बहुते अच्छी दोस्त बन गयी है, और ….और हम दोनों सोच रहे कि अगर तुम हाँ बोलो तो,,तो …..
        
  ” तो क्या??”सुशीला के कठोर शब्दों ने अचानक से राजा में हिम्मत भर दी

  ” हम बांसुरी से शादी कर सकते हैं क्या अम्मा??”

  सुशीला के चेहरे का रंग उड़ गया,आखिर इतने दिन से जिस बात का डर सता रहा था वही हुआ….. सुशीला इस बात से बेखबर तो नही थी पर एकाएक इतनी जल्दी राजा उससे बात करने आ जायेगा ऐसा भी नही सोचा था उसने,सामने सर झुकाये बैठे लाड़ले पर एकदम से ममता उमड़ आयी पर अपने आप को यथासम्भव कठोर कर उसने अपनी बात रखी__

    ” नही !!! तुम्हारे बाऊजी कभी नही मानेंगे।”

   ” अम्मा पहले तुम तो मान जाओ,फिर बाऊजी भी मान जायेंगे।।सुनो ना अम्मा,हम दोनो बहुत अच्छे दोस्त हैं,बांसुरी बहुत अच्छी लड़की है अम्मा।”

  ” राजा,अब क्या समझायें तुमको,यही तो करते हैं आजकल के लड़के लड़कियाँ,सब कुछ अपने मन का ।।अब हम का बोलें,जब सोच ही लिये तो जाओ कर आओ तुम दोनो भी किसी मन्दिर में सादी।”

  ” अम्मा ऐसे ही करना होता तो हम तुमसे काहे बात करते,विश्वास करो अम्मा,हम कुछ भी गलत नही किये,,आज तक हम उसे छुए तक नही।।”

  ” बहुत अच्छा किये,और छूना भी नही,बेटा तुम्हरी अम्मा है,अच्छे से जानते है हमारा लड़का कभी कोई गलत काम कर ही नही सकता ,पर बस एक बात पूछना चाहते हैं,ऐसा का दिख गया उस लड़की में,इससे कही सुन्दर लडकियों की लाइन लगा देंगे राजा,पर इस लड़की को भूल जाओ।”

” काहे ऐसा बोल रही अम्मा,तुम जानती हो तुम्हरी मर्ज़ी के बिना हम कुछ नही करेंगे।”

” उसी हक से बोल रहे बेटा,,समझा दो उसे वो भी अपने घर वालों के हिसाब से कर ले सादी ब्याह और तुम्हें भी करने दे,,कुछ नही रखा ये सब प्यार व्यार के चक्कर में,,एक बार सादी हो जाये फिर सब बराबर हो जाता है।।”

  ” मान जाओ अम्मा ,,काहे मना कर रही ,आखिर वो भी तो ब्राम्हण है।।

  ” कहाँ की बाम्हन?? सरजूपारिन है …..और हम कनौजिये कान्यकुब्ज ,,बीस बीसंवा है लल्ला हम लोग, ऐसे सरजुपारिन को ब्याह लाएंगे तो पूरा समाज पूछेगा नही कि हमारे “के के” में लड़की नही मिली का।।तुम्हारे बाऊजी किस किस को जवाब देंगे बेटा,इस बुढऊती में काहे उनका पगड़ी उछाल रहे हो।।

   ” अब आजकल ये सब कौन मानता है अम्मा,हम तो नही मानते।।”

” ना मानो!! हम तो पहले ही कहे रहे कि जाओ कर लो किसी मन्दिर मे सादी।।”

” तुम तो नाराज हो गयी अम्मा,अरे एक बार हमारे लिये उससे मिल तो लो!!”

” मिल तो चुके हैं,दो तीन बार !! हमें तो बिलकुले पसंद नही आयी,ना सकल ना सूरत ,रंग भी साँवला।

  ” अरे वो तो तुम इतनी ज्यादा गोरी हो ना इसिलिए सब तुम्हारे सामने सांवले ही लगते हैं,,वैसे दिखने में तो ठीक ठाक है अम्मा।।”

  ” हम अपने राजकुमार की सादी दिखने में  बस ठीके ठाक लड़की से काहे करें,इससे तो शन्नो जो रिस्ता बताई रही तुम्हारे लाने वही अच्छा है,और रूपा के बाबूजी भी बताये रहे ,,दुनो लड़की गोरी सुन्दर हैं और तुम्हे पसंद आ रही ये कलूटी।।”

   ” राजा अब हमें कोई बहस बात नही सुननी ना करनी,तुमने पहले ही कहा था कि तुम हम से पूछ कर करोगे,जो भी करोगे तो हम यही कह रहे लल्ला जाओ और उसे समझा दो कि हमारे घर में कोई उसके लिये तैयार नही है, जाओ मना कर दो उसे। जाओ बेटा हम थक गये हैं बहुत,सोने दो अब।।”

  ” अम्मा !!! काहे इत्ता गुस्सा रही हो ,सच में बहुत अच्छी लड़की है बांसुरी ।।”

  ” होगी लल्ला!! पर हमे नही पसंद ।।हम एक बिदेसिनी को अपन बहु ना बनाई, जो समझ आ गयी हमारी बात तो जाओ ,नही पड़े रहो ।।हम सोने जा रहे।।”

  सुशीला बिना काम के भी निरर्थक चप्पल पट पट कर बजाती कमरे से बाहर निकल गयी।
    कमरे में अकेले बैठे राजा का दिल कराह उठा, वो चुपचाप उठा और ऊपर अपने कमरे में चला गया, सीढिय़ां चढ़ रहा था कि रूपा ने आवाज़ लगायी

  ” लल्ला जी ये दूध लेते जाइये,पी लीजियेगा।”

  ” हमें नही पीना भाभी।।” बिना रुके राजा अपने कमरे में चला गया,पर उसकी आवाज़ सुशीला के कानों तक पहुंच गयी,उसने छिप कर अपने आंचल से अपनी आंखों की कोर पोंछ ली।।

    कितनी शालीनता से उसने बांसुरी को कहा था_” अगर अम्मा नही मानी तो हम पहले जैसे ही दोस्त बने रहेंगे।”
      अम्मा तो नही मानी और क्या अब उसका खुद का दिल वापस बांसुरी को सिर्फ दोस्त मानने को कर रहा?? 
     क्या कोई भी ऐसी बात है जो उसके और बांसुरी के बीच की जो वो भूल पा रहा है??
    चाहे बांसुरी का पूरी तन्मयता से उसे पढाना हो या उसके जिम के सारे लेखे जोखे को सहेजना हो,कहीं भी तो बांसुरी ने उसे अकेले नही छोड़ा,अपनी इतनी बुरी आदत डाल दी कि अब यही सोच सोच के कलेजा मुहँ को आ रहा कि यदि बांसुरी की कहीं और शादी हो गयी तो वो क्या करेगा??

      हर शाम आंखों पर तेरा आंचल लहराए
       हर रात यादों की बारात ले आये,
       मैं सांस लेता हूँ तेरी खुशबू  आती है
       इक महका महका सा पैगाम लाती है
       मेरे दिल की धड़कन भी तेरे गीत गाती है
       पल पल दिल के पास तुम रहती हो।।।

  ये गाना कहीं दूर किसी के रेडियो पे बज रहा था जिसे सुन राजा को अपनी और बांसुरी की प्रथम औपचारिक मुलाकात याद आ गयी,उस दिन भी जिम में यही गाना बज रहा था जब बांसुरी निरमा के साथ पहली बार जिम मे आयी थी।।

   अपनी पहली मुलाकात याद कर अचानक राजा के चेहरे पे मुस्कान आ गयी,कैसे उसे धडाधड़ गधा बुला रही थी …..और खुद कितनी गोल मटोल सी थी,अब तो आधी रह गयी बाँसुरी ।।और अब वो खुद भी कहाँ गधा रह गया।।

   एक बार फिर उसे ज़ोर की हँसी आ गयी,अचानक ध्यान आया कि कमरे में अकेले बैठा हँस रहा है,कहीं किसी ने देख लिया तो सोचेगा ,पागल हो गया है लड़का!!
     क्या सभी के साथ ऐसा ही होता होगा ,जैसा उसके साथ हो रहा है।।उसे खुद अपने ऊपर आश्चर्य हो रहा था,आज तक अम्मा की कोई बात कभी ना काटने वाला लड़का आज कैसे अपनी बात पे अड़ा रह गया…..वाकई ऐसा क्या जादू किया बांसुरी ने कि अम्मा के मना करने के बाद भी वो अम्मा को मनाने की कोशिश करता रहा….पर अब उसके सामने एक और कठिन चुनौती खड़ी थी,बाँसुरी को मना करने की।।

   उसने बहुत सोचा,,,सोचना कभी भी राजा का काम नही था!! बचपन से भले ही वो मनमौजी था पर घर पर किसी बड़े की बात उसने कभी नही काटी थी,इसीसे शायद उसकी मन की हर बात सभी मन मे आने से पहले ही पूरी कर जाते थे,अम्मा दादी बाऊजी चाचा जी, पिंकी ,बुआ जी मौसियां ,मामा लोग और इन सब के ऊपर बड़के भैय्या हर कोई उसे बच्चा ही समझते आये थे,जिद क्या होती है राजा ने जाना ही नही थी।।आज तक जो मांगा तुरंत ही मिल गया …..इसी से आज पहली बार मांगी हुई चीज़ ना मिलने की पीड़ा चेहरे पे छलक आयी।।

     बांसुरी के साथ समय कैसे पंख लगा कर उड़ जाता था,और बीच में जब उसने जिम आना बन्द कर दिया था,तब तो एक एक पल काटना मुश्किल हो गया था,कैसे कहे कि बांसुरी हमें भूल जाओ, हमारे घर वाले नही मानेंगे।।

  अपनी सारी हिम्मत जुटा के आखिर राजा ने अपना फोन उठाया और बाँसुरी को लिख भेजा__

   ” बंसी !!! अम्मा ने मना कर दिया,अभी और कोई बात नही कर पायेंगे ,बस यही कहना चाहतें हैं कि हमें भूल जाओ।।”

” ठीक है” ।।  बांसुरी का तुरंत ही जवाब आ गया,ऐसा ठंडा और थका सा जवाब देख कर राजा ने उसे फ़ोन लगा लिया।।

” क्या हुआ बांसुरी ( बांसुरी के त्वरित सन्देश से राजा की उसे बंसी पुकारने की हिम्मत नही हुई) कुछ नाराज़ हो गयी क्या??”

” नही,काहे की नाराजगी?? तुमने तो पहले ही कह दिया था कि अगर अम्मा मना करेंगी तो बात आगे नही बढ़ाएँगे।।”

” तो फिर ऐसा रुखा रुखा काहे बोल रहीं।”

” हे भगवान तो अब हम कैसे बोले कैसे बतियाएं ये भी तुमसे पूछना पड़ेगा।।”

” अरे यार!! तुम पूरा लड़ने की तैयारी से ही बैठी हो, हम क्या बोल रहे, तुम क्या समझ रही,,ऐसे ही वाद विवाद होता है,रहने दो हम रखते हैं फोन।

” हाँ रख दो,अब बात भी क्या बची ?? “

दोनों बात कर ही रहे थे कि बाँसुरी की अम्मा की आवाज़ राजा को सुनाई पड़ी,वो बांसुरी से खाने को पूछ रही थी जिसे बांसुरी ने नकार दिया,ये कह कर की सर मे दर्द है अम्मा आज नही खायेंगे।।

” अब खाना काहे नही खा रही?? ये अच्छा नौटंकी है ,हमसे शादी नही होगी तो जीवन भर नही खाओगी क्या।।”

  ” नही खायेंगे!! ऐसे ही भूखे मर जायेंगे,तुम्हे इससे क्या??”

” पगला गयी हो क्या?? कोई ऐसे करता है,,??फिर हम अभी तुम्हारे घर आ जायेंगे।”

” आ जाओ ,हम कब मना किये….ले जाओ हमे घर से भगा कर….

   ” बंसी कैसी बातें कर रही हो तुम?? जानती हो कि हम कभी ऐसा नही करेंगे,,अपने अम्मा बाऊजी को कभी दुखी नही कर सकते।”

  ” जानतें हैं राजा,सब जानतें हैं हम!! पर हम भी क्या करें,,।।हम भी तो अपने मम्मी पापा को दुखी नही देख सकते,पर तुम्हारे बिना भी तो नही जी सकते,,तुम हमारे लिये चिंता मत करो,ये सब हमारा थोड़ी देर का गुस्सा है,अभी सो जायेंगे सुबह तक ठीक हो जायेंगे।।”

  राजा का दिल कसमसा के रह गया,उसे उसी वक्त बांसुरी से मिलने उसे एक झलक देखने का मन करने लगा__

   ” बंसी !! सुनो तुमसे मिलना है।।”

   ” कल जिम आयेंगे ना तब मिल लेना।”

   ” नही अभी मिलना है,तुम्हें देखने का मन कर रहा है।”

  ” अब तुम पगला गये हो,रात के दस बजे तुमको हमे देखने का मन कर रहा,,हमारे बाहर वाले दरवाजे पे पापा ताला भी डाल दिये हैं,पीछे आंगन वाला दरवाजा भी बन्द हो गया है, घर में सब सो चुके हैं,ऐसे में कैसे आओगे??”

  ” तुम तो ऐसे मना कर रही कि लग रहा चोरी से बुला रही हो,कि सब सो गये हैं,अब आ जाओ।”

  ऐसे बोलते ही राजा को हँसी आ गयी ,उसकी हँसी सुन बांसुरी भी खिलखिला उठी….दोनो को बातें करते दो घन्टे से ज्यादा बीत चुके थे,,राजा का मन बांसुरी को देखे बिना मानने को तैयार ही नही था, आखिरकार सबकी नज़रे बचाता राजा चोरी छिपे धीमे धीमे कदम बढ़ाता घर से बाहर निकला,अपने घर का ताला खोलते हुए उसे एक बार खटका सा लगा कि दादी जाग गयी,पर वो उसका अन्देशा ही था,,अपनी बुलेट को खींचते हुए गेट से बाहर निकाला और उसपे सवार राजा बांसुरी के घर उड़ चला

  मासूम चेहरा नीची निगाहें भोली सी लड़की भोली अदायें
  ना अप्सरा है,ना वो परी है,लेकिन ये उसकी जादुगरी है
  दीवाना कर दे वो,एक रंग भर दे वो,शरमा के देखे जिधर
घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही रास्ते में है उसका घर।।

   मोबाईल पे गाने सुनता राजा बांसुरी के घर के सामने वाले रास्ते पे पहुंच गया,अपनी रॉयल एनफील्ड से उतर उसके सहारे खड़े होकर उसने बांसुरी को मेसेज भेजा__

  ” आ गये हैं !!!,तुम्हारी खिड़की के सामने वाली सड़क पे खड़े हैं ।”

राजा ने मेसेज पे नज़र जमाई हुई थी,पहले एक राइट का निशान हुआ,फिर दो हुए और तुरंत ही दोनो निशान नीले हो गये,राजा के चेहरे पे एक मुस्कान उभर आयी ,मतलब उसने मेसेज पढ़ लिया,तभी राजा के पैर के पास कुछ आ कर गिरा,नीचे देखा तो बालों में लगाने वाला क्लचर था,जिधर से आकर गिरा उधर राजा ने सर उठाया तो सामने छत पर बांसुरी खड़ी मुस्कुरा रही थी।।

  दोनो एक दूसरे को कुछ देर तक देखते रह गये…. फिर राजा ने इशारे से बांसुरी को हाथ हिला के कहा कि वो जा रहा है,बांसुरी ने ना में सर हिला दिया।।

   राजा देख ही रहा था कि बांसुरी छत पर से अपने कमरे में चली गयी,राजा इधर उधर झांकता रहा,ताकता रहा कि अब आयेगी छत पर,,अपनी आंखे छत पे जमाये राजा टकटकी लगाये खड़ा था कि बाँसुरी उसके सामने आ कर खड़ी हो गयी।।

   दोनो एक दूसरे की आंखों में देखते रह गये,,दोनो को ही ऐसा लग रहा था जैसे आज ही पहली बार एक दूजे को देखा है …….
   
      ….सही कहा है किसी ने, अगर किसी बात के लिये टोका जाये रोका जाये तो दिल ही क्या शरीर का हर हिस्सा उस चीज़ को पाने तरसने लगता है,और ये अनुभव सर्वाधिक होता है प्रेमियों के साथ।।
     अगर लैला मजनूँ,हीर राँझा के घर वाले एक बार में ही उनके प्यार को कबूल लेते तो शायद ही ऐसी सफल प्रेम कहानियाँ रची जातीं।।

   अम्मा की ना ने दोनो के मन में छिपा रहा सहा संकोच भी समाप्त कर दिया,दोनो को ही समझ आ गया कि एक दूसरे के बिना जीना व्यर्थ है,और अब वो दोनों सिर्फ दोस्त से कहीं आगे निकल चुके हैं ।।

  ” राजा!! ऐसे क्यों देख रहे ,जैसे पहली बार देखा हो।।”

बांसुरी की बात पर राजा मुस्कुराने लगा।।।

” सुनो !! हम तुम्हें छूना चाहते हैं,तुम्हें छू कर तसल्ली करनी है कि हम सपना नही देख रहे,राजा बाबू सच में हमारे घर के सामने खड़े हैं ।

” अच्छा!! सच में ??” और मुस्कुराते हुए राजा ने बांसुरी को अपनी तरफ खींच कर गले से लगा लिया।।

क्रमशः

aparna..
   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

8 विचार “शादी.कॉम-19” पर

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