समिधा-30

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   समिधा – 30

    वरुण को मठ में आए लगभग आठ 9 महीने बीत चुके थे और अब उसका काम बदल चुका था। मठ में किस व्यक्ति को कितना समय हुआ है उसकी शिक्षा-दीक्षा क्या है इसके आधार पर कार्य विभाजित है बावजूद मठ में शुरुआती दिनों में हर एक व्यक्ति को सारे जरूरी काम करने पड़ते थे।
    वेद अध्ययन के लिए जितना समय निश्चित था वरुण ने उस समय से पहले ही सारी किताबें पढ़ ली थी उसका अध्ययन पुख्ता था।
    उसके मन में ढेर सारे प्रश्न थे और उन्हीं प्रश्नों का उत्तर ढूंढने ही तो वो कृष्ण आश्रम आया था। आखिर जीवन क्या है ? इसे किसने रचा है ? अगर इसे रचने वाला भगवान है तो उसने इस जीवन में इतनी मुश्किलें क्यों डाली है? रोग जरा और मृत्यु सदैव स्वाभाविक क्यों नहीं हो सकते? अगर जीवन देने वाला परमात्मा है तो उसने इस जीवन में रोगों की सृष्टि क्यों की?  आखिर क्यों इंसान यह समझता है कि अगर इनका जवाब यह है कि भगवान ऐसे दुख देकर अपने प्रति आस्था जगाने का काम करते हैं तो फिर हम उस ईश्वर को पिता क्यों मानते हैं?

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    क्या कोई पिता अपना महत्व दिखाने के लिए अपने पुत्र को दुख और दर्द दे सकता है?
   
     इसी तरह के कई सवाल थे जो वरुण के मन को मथते रहते थे और जिनके कोई जवाब उसे नहीं मिल पाते थे। अक्सर जब प्रभकराचार्य स्वामी प्रवचन दिया करते तब वरुण अपना कोई ना कोई सवाल उनके समक्ष प्रस्तुत कर दिया करता। अमृतानंद स्वामी पहले तो कोशिश करते कि उसकी समस्या का कोई समाधान उसे बता सकें लेकिन जब वह नहीं बता पाते तो सब कुछ ईश्वर इच्छा कहकर शांत हो जाया करते। लेकिन उनके शांत हो जाने पर भी वरुण के मन का कौतूहल शांत नहीं हो पाता था। और इसी उधेड़बुन में वह अपने प्रश्नों के साथ रात रात भर जागता चला जाता था। और फिर सुबह की पहली किरण के साथ ही वह वेद पुस्तिकाओं को खोलें अपने प्रश्न उनमें ढूंढने लगता था।
     अध्ययन करते करते धीरे-धीरे एक समय ऐसा आने लगा कि वरुण को स्वतः ही अपने मन में चलते सारे सवालों के जवाब मिलने लगे और इसके साथ ही उसे यह भी समझ में आने लग गया कि मठ में उसके ऊपर जितनी भी आचार्य बैठे हैं, यह आवश्यक नहीं कि उन्होंने भी वेद अध्ययन किया हो। या उन्हें वाकई इतना ज्ञान हो कि वह प्रवचन दे सकें। बावजूद वरुण उम्र में छोटा होने के कारण और अनुभव की कमी के कारण किसी को भी रोक टोक नहीं पाता था।

    यह सत्य भी है । धर्म और आस्था से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जिन्हें अनजाने ही सामान्य लोगों पर थोप दिया जाता है बिना किसी कारण को जाने। लेकिन जो सच्चे अर्थों में वेदों का अध्ययन करते हैं वह जानते हैं कि हर एक चीज के पीछे कोई ना कोई वैज्ञानिक तथ्य जरूर है।
     अब यही वरुण के साथ होने लगा उसका विज्ञानी दिमाग जब वेदों के अध्ययन के साथ उलझा तो उसमें से जुड़कर जो नया दर्शन निकला उसने वरुण के ज्ञान चक्षु खोल दिये।

       आश्रम में आचार्यों के अलग-अलग पद  सुनिश्चित थे। वेद अध्ययन के समय तक सभी सामान्य व्यक्ति शिष्यों की श्रेणी में आते थे। लेकिन छह महीनों के कठिन तप के बाद वरुण को आचार्य पद पर पहुंचने की पहली सीढ़ी प्राप्त हो चुकी थी। और अब वह अपने से ऊपर के गुरु प्रभाकर आचार्य के प्रवचन के बाद जनसमूह को सामान्य बोलचाल की भाषा में श्रीकृष्ण से जुडी कथाएं सुनाने लगा था।
    जनसमूह के सामने श्री कृष्ण कथा कहते हुए वरुण खुद श्री कृष्ण के अमृत में ऐसा डूबा रहता था कि उसके मन को अपरूप शांति मिलने लगी थी।
       आश्रम बहुत बड़ा था जहां अलग-अलग स्तर पर गुरु और आचार्य उपस्थित थे सभी के काम बटे हुए थे। लेकिन इतने महीने होने पर भी उस आश्रम के मुख्य और सर्व प्रमुख आचार्य श्री अमृताचार्य स्वामी जी से अब तक वरुण की भेंट नहीं हो पाई थी।
  
   स्वामी अमृत आचार्य के बारे में कई कहानियां आश्रम में सुप्रसिद्ध थीं। कहानियों के नायक पद से निकलकर अब वह किवदंती बन चुके थे । अपने धर्म के प्रचार को लेकर उनकी आस्था इतनी सुदृढ़ थी कि वह जगह-जगह घूमकर कृष्ण पर प्रवचन देते लोगों को कृष्ण भक्ति के मार्ग से जुड़ते चले जा रहे थे। और अब उनका सारा जीवन पूरी तरह से सिर्फ कृष्ण को समर्पित हो गया था। वरुण का उनसे मिलने का सबसे बड़ा लालच यही था कि उन आचार्य की कहानी बहुत कुछ वरुण को उस की कहानी से मिलती सी लगती थी। लेकिन शायद अब तक वरुण की किस्मत में उनसे मिलना नहीं लिखा था इसीलिए यह सुयोग उसके जीवन में अब तक नहीं आ पाया था।

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    भक्ति मार्ग पर प्रवचन देने के बाद शाम का कार्य समाप्त हो चुका था। वरुण अपनी किताबों को समेट एक तरफ रख मंदिर परिसर की आरती के बाद बाहर निकल रहा था कि तभी एक ओर बैठी आश्रम की महिलाओं ने भजन कीर्तन शुरू कर दिए।
   उन महिलाओं पर नजर पड़ते हैं वरुण ने अपने साथ चल रहे अपने मित्र से उनके बारे में पूछना शुरु कर दिया…- ” कौन है यह सब और कहां से आई हैं!”

   वरुण के सवाल का जवाब उस की जगह उदयाचार्य जी ने दिया।
    उदयाचार्य जी आश्रम में रहने वालों के रहने और खाने की व्यवस्था देखा करते थे। इसीलिए परिसर में पीछे स्थित भगिनी आश्रम की व्यवस्था का भार भी इनके कंधों पर ही था….-” दुनिया की सताई औरतें हैं। जिन्हें कहीं आसरा नही मिलता वो बेचरियाँ यहाँ आश्रम आ जाती हैं।
   कम से कम दोनों समय का खाना तो मिल ही जाता है।”

” ऐसा क्यों कह रहें हैं , गुरुवर? देखा जाए तो बेचारा  इस संसार में कोई नही, क्योंकि उस पालनहार ने पैदा किया है तो व्यवस्था भी वहीं करेंगे। और दूसरी तरफ देखें तो सभी बेचारे क्योंकि अब तक उस पालनहार के श्रीचरणों से दूर है।”

” अरे बाबा वरुणानँद स्वामी जी आप ये प्रवचन जन मानस के लिए ही बचाये रखिये। हम खुद स्वामी हैं और आपसे कहीं अधिक ये सब जानते समझतें हैं।”

” गुरुवर आपको उपदेश दे सकूं इतना ज्ञानी मैं नही हुआ अभी और न कभी हो पाऊंगा । मैं तो बस ये कहना चाहता हूँ कि अगर ये सभी महिलाएं अपने सभी अंगों से सक्षम है , दिव्यांग नही हैं तो इन्हें सिर्फ परिवार के ठुकराए जाने के कारण बेचारी कह देना तो इनका अपमान हुआ न।”

“हां दिव्यांग नही है इसलिए ही तो इनसे मंदिर परिसर की साफसफाई और रसोई का काम लिया जाता है। वरना क्या सिर्फ मुफ्त की रोटियां तोड़ने के लिए हैं ये?”

” ऐसा मत कहिये गुरु जी। मैं शायद अपनी बात आपको समझा नही पाया। इसलिए आप ज़रा नाराज़ से हो गए। मैं बस ये कहना चाहता था कि ये सब भी अगर सिलाई कढ़ाई बुनाई जैसे कार्य कर के अपना समय किन्हीं सकारात्मक कार्यो में लगा सकें तो इनके मन को भी एक आत्मसंतुष्टि तो मिलेगी। “

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     उदयाचार्य जाने क्यों वरुण से ज़रा रूष्ट ही रहा करते थे, कारण किसी को स्पष्ट ना था। शायद वरुण के उच्च शिक्षित होने से बाकी शिष्यों और प्रधान गुरुवर में उसका मान सम्मान था, उसने अपने व्यवहार से भी जल्दी ही अपने लिए एक जगह बना ली थी या और जो कोई भी कारण हो, और इसलिए वो अक्सर वरुण के सवालों के ऐसे ही उल्टे जवाब दिया करते।
    वो उससे बातों में उलझे ही थे कि एक शिष्य भागा हुआ सा उन तक आ पहुंचा…

” गुरु जी ! बाहर एक बहन आयीं हैं, आश्रम में जगह चाहिए उन्हें! चारु दीदी की चिट्ठी भी है उनके पास।”

  उदयाचार्य ने उस शिष्य की तरफ देख मुहँ टेढ़ा सा कर लिया…-“आश्रम में जगह कहाँ बची है, ये सारे संसार की दुखियारी यहीं क्यों चली आती हैं, मथुरा में और भी तो आश्रम हैं। वृंदावन चलीं जाएं पर नही सबको यहीं आकर मरना है।”
   बड़बड़ाते हुए उदयाचार्य बाहर की ओर निकल गए, और उनकी इस बिना वजह की चिड़चिड़ाहट से स्तब्ध वरुण अपने कमरे की ओर चल गया।
    
     उदयाचार्य ने बाहर आकर मंदिर परिसर के एक ओर स्थित कार्यालय में आगंतुकों को बैठाया और एक मोटा सा रजिस्टर अलमारी से निकाल कर उनके सामने बैठ गए।
   ” नाम बताइये ?”
   ” पारोमिता !”
   ” पूरा नाम , पति या पिता का नाम, अपने घर का पता, शहर । सब कुछ बताइये।”
  ” पूरे नाम का जब कोई अस्तित्व ही नही बचा तो उस नाम को लिख कर क्या फायदा। नाम पारोमिता ही लिखिए। पति और पिता दोनों ही नही हैं, इसलिए उनके नाम बताने से क्या प्रयोजन। और आपका तीसरा प्रश्न था घर का पता? तो अगर मेरे पास मेरे घर का पता होता तो मैं यहाँ क्यों आती? “
   पारो की बातें सुन उदयाचार्य ने रजिस्टर से तुरन्त अपना चेहरा ऊपर उठाया और ऐसी मोटी बातें बोलने वाली के चेहरे पर गड़ा दी।
   चेहरे से बाल विधवा ही लग रही थी। ऐसी परम सुंदरी और विधवा? विधाता के लिखे लेख कोई नही समझ सकता… उनके मुहँ से एक आह निकल गयी…” बेचारी!” और ये शब्द बोलते ही उन्हें वरुण याद आ गया। वो लपक के अपने इधर उधर देखने लगे, किसी ओने कोने से टपक पड़ा तो फिर एक बार बखिया उधेड़ना शुरू कर देगा।
   सामने बैठी पारो को स्वयं के लिए ये सम्बोधन बहुत चुभता था, लेकिन अब उसके पास सुनने के अलावा चारा भी क्या था?

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  “पता तो लिखवाना ही पड़ता है? देखिए भविष्य में कभी ये बीमार पड़तीं हैं, या इनकी मृत्यु हो जाती हैं तो संस्कार के लिए घर वालों को तो बुलाना ही पड़ेगा ना?”
   उदयाचार्य ने पारो के साथ बैठी महिला को देख कर अपनी बात समझानी चाही।
   ” क्या कृष्णभूमि में मेरा अंतिम संस्कार करने वाला भी कोई न होगा? जहाँ जीवित व्यक्ति की पूछ परख नही वहाँ उसके मरने से किसी को क्या दुःख होगा, उल्टा सभी प्रसन्न ही होंगे। “
   पारो की माँ ने उसकी बात सुन उसे अपने अंक में भर लिया…-“ऐसा मत बोल लाड़ो। मेरा दर्द तुझे कैसे समझाऊँ। तुझे अपने साथ ले भी जाऊंगी तो किस किस से तेरी रक्षा कर पाऊँगी बेटी। तेरी जो उम्र है तेरा जो रूप है ,अपने ही घर में भेड़िये पैदा हो जाएंगे। घर की औरतें तानों से तुझे छलनी करेंगी और पुरुष अपनी आंखों से!
   स्वयं भुक्तभोगी न होती तो क्या अपने कलेजे के टुकड़े को ऐसे किसी मंदिर में छोड़ देती? ये कृष्ण का स्थान है बेटी यहाँ हर कदम पर कृष्ण तेरे साथ होंगे और मुझे पूरा विश्वास है वो सदा तेरी रक्षा करेंगे। “

” क्यों क्या कृष्ण सिर्फ मंदिरों में रहतें हैं। और अगर तुम्हारे भगवान मंदिरों में रहतें हैं तो केदारनाथ में क्या वो आंखें मूंदे बैठे थे जो इतना बड़ा प्रलय उन्हें नही दिखा। मुझे मत बहलाओ माँ! तुम्हारे कृष्ण भी अपने रचे संसार की तरह ढोंगी हैं। जहाँ सब अच्छा होता है श्रेय लेने दौड़े चले आतें हैं और जहाँ कुछ गलत हुआ उसे मानव पर थोप देतें हैं। “

   रोते रोते पारो की माँ ने उसे गले से लगा लिया…. पारो की आंखें भी बरसने को थी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। वो अपनी माँ का दुख समझ पा रही थी लेकिन अब उसके मन में हर किसी के प्रति नाराज़गी ने घर कर लिया था। इसलिए जब ससुराल में उससे मिल कर उसकी माँ लौटने लगी तब उसने उन्हें पकड़ कर ज़िद कर ली कि वो उसी वक्त उसे आश्रम छोड़ दें।
   ससुराल में सास, ठाकुर माँ सब उसे समझा समझा कर हार गए कि वो लोग उसकी तैयारी करवा कर उसे कुछ दिनों में आश्रम छोड़ आएंगे पर वो राजी नही हुई। और उसकी ज़िद के आगे हारकर उसकी माँ को।लेने आये बाली दादा ने वहीं से मथुरा की टिकट निकाली और पारो और उसकी माँ को साथ लिए मथुरा निकल गए।
    ससुराल छोड़ने की ज़िद भले ही पारो ने पकड़ ली थी लेकिन देव से जुड़ी यादों से किनारा करना ऐसा भी आसान नही था। उस घर का आंगन जहाँ बैठ कर वो अपने बही खाते सहीं किया करता था, वहाँ की रसोई जहाँ उसने पहली बार खीर बना कर उसे खिलाई थी और उसने प्यार से पारो की उंगलियां चूम ली थी। ऊपर कमरे की ओर जाती सीढ़ियां जिन पर बैठे वो अक्सर उसे छेड़ता रहता था और उसका कमरा। वहाँ तो जगह जगह वो समाया हुआ था।
    सब कुछ याद करती वो ससुराल की दहलीज पर खड़ी फफक पड़ी थी। ये कैसा निर्वासन था उसका, जिसमें अब वापसी की कोई गुंजाइश नही बची थी। ये ऐसी घड़ी थी कि उसे अपनी सास, ठाकुर माँ और बाकियों के लिए भी कलेजे में ममता उमड़ घुमड़ रही थी। यूँ लग रहा था उसकी सास ही उसे अपने कलेजे से लगाये रोक ले।
   पर तभी उसकी नज़र सबसे पीछे खड़े उस नीच पर पड़ गयी जिसकी दृष्टि पड़ने से ही वो मैली हुई जा रही थी।

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    सौभाग्य कहा जाए या दुर्भाग्य कि उस समय दर्शन भी अपने पिता के साथ पास के गांव गया हुआ था वरना देव का वो छोटा भाई अपनी बऊ दी को शायद ऐसे वहाँ से कभी नही जाने देता।
   आनन्दी का अंदर रो रोकर बुरा हाल था। चलती बेला उसने पारो से छिपाकर उसके बैग में कुछ रुपये और लडडू डाल दिए थे। उससे अधिक करने की शायद उसकी भी हिम्मत नही थी।
  एक आनन्दी से ही वो जाकर खुद से उसके पैरों पर गिर कर आशीर्वाद ले आयी थी। और उसने उसे उठा कर आने सीने से लगा लिया था।
   बाकियों के पैर छूना तो औपचारिकता मात्र रह गयी थी।
      नही अब इस घर में उसका दाना पानी नही रहा था। अगर मोह माया में पड़कर वो यहाँ रुक भी गयी तो कब तक खुद को बचा कर रख पाएगी। उसका बुरा करने के बाद इल्जाम भी न हो उसी पर डाल दिया तो मरने के सिवा क्या बचेगा।
   वो भारी कदमों से उस चौखट को एक आखिरी प्रणाम कर वहाँ से निकल गयी।
    अपनी माँ के साथ गाड़ी में बैठते ही फिर उसके लिए खुद को संभालना मुश्किल हो गया था। लगातार रोती पारो को देख उसके बाली दादा ने एक बार उसकी माँ से उसे घर ले चलने की बात भी कही लेकिन माँ बेटी दोनों ही इस बात पर चुप लगा गयीं थीं।

    आश्रम पहुंच कर बाहर से उसका वृहदाकार रूप देख कर और बाहरी लोगों से उसके बारे में पूछ ताछ कर पारो की माँ और दादा आश्वस्त हो गए थे। बाहरी लोगों के अनुसार ये आश्रम सच्चे अर्थों में स्वर्ग था। वहाँ रहने वाली महिलाओं को ससम्मान वहाँ स्थान दिया जाता था। भगिनी आश्रम की संचालिका चारुलता दीदी असल में किसी एन जी ओ को चलाती थीं जिसके अंतर्गत वो महिलाओं और बालिकाओं के लिए ढेर सारे काम करतीं थीं। उनका बाहर शहर में ही एक अनाथ बालिका आश्रम भी था। विधवा महिलाओं के रहने आदि के लिए उन्होंने आश्रम के साथ मिलकर काम करना शुरू किया था तथा अपनी संस्था की महिलाओं के रहने की व्यवस्था आश्रम में करवाने की अर्जी दी थी जिसे मान लिया गया था और उसके बाद ही इस कृष्ण आश्रम में भगिनी आश्रम खुला था और उसके बाद से ही दुनिया भर की सताई हुई महिलाओं का ये ठिकाना हो गया था।
  बीच बीच में आश्रम संचालिका चारुलता दीदी भी आया करतीं थीं। भगिनी आश्रम में रहने वाली महिलाओं को सिर्फ पूरे आश्रम के लिए भोजन पकाने का ही काम था। इनमें से जिन्हें वहाँ रहते आठ दस साल व्यतीत हो चुके थे ऐसी महिलाओं को चारु दीदी अपने अनाथ आश्रमों और बाक़ी कामों में सहायता के लिए साथ ले जातीं थीं।
   यहीं सब जान कर पारो की माँ आश्वस्त सी हो गईं थीं।
 
  ” अब जो है जैसा है यही तेरा घर है लाड़ो!” पारो को खुद से अलग कर उन्होंने उसका सामान उसके हाथ में दिया और आँसू पोंछती बाहर निकल गईं। बाहर निकलते हुए बाली दादा उसकी माँ को उसके वहाँ रहने के लाभ समझाते जा रहें थे।

    उदयाचार्य जी ने वहीं  से गुज़रती एक महिला को आवाज़ लगा दी…-“सरिता ये नई आयीं है आश्रम में , इन्हें अपने साथ ले जाओ। इनके सोने आदि की व्यवस्था देख लेना और आश्रम के नियम आदि इन्हें समझा देना।”
” जी आचार्य जी! आओ बहन!”
  पारो अपना सामान लिए सिर झुकाए उस औरत के साथ चली गयी।

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   दोनों आगे बढ़ रहीं थीं बगीचे के बीच से गुजरते हुए उन्हें किसी की आवाज़ कानों में पड़ी। कोई  सामने खड़े बच्चे से कह रहा था…-“एकदम ताजे खिले फूलों को रहने दो। जो फूल अब तब में झरने को हैं उन्हें ही पूजा के लिए तोड़ लो।”
” पर गुरुवर पूजा में तो ताज़े फूल ही चढतें हैं।”
” हाँ तो पेड़ पौधों से तुरंत तोड़े फूल ताज़े ही तो हैं। उन नए खिलें फूलों को कुछ दिन तो ताज़ी हवा में सुकून की सांस भर लेने दो। ये फूल वैसे भी कल तक झर जाएंगे इसी से आज इनसे गोपाल जी का श्रृंगार करने से ये फूल भी चमक जाएंगे और हमारे गोपाल ज्यू तो सबको महका ही देते हैं।”
    वरुण उस बालक को यह सब कह कर पलटा ही था कि सामने पारो से टकराते बचा…-” थोड़ा ऊपर देख कर चलो बहन। वरना टकरा जाओगी। “
  पारो के साथ चलने वाली सरिता ने वरुण को प्रणाम किया तो उसे देख पारो ने भी हाथ जोड़ दिए। सरिता को प्रणाम का जवाब देने के बाद पारो को देख जाने क्यों वरुण कोई जवाब नही दे पाया। और जाती हुई पारो के पीछे दूर तक उसकी आंखें पारो को उसके आश्रम तक छोड़ आयीं….

क्रमशः

aparna…

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

31 विचार “समिधा-30” पर

  1. जिस स्थिति से बचने के लिए वरुण यहां आया था….वो अब यहां आ गई…क्या अब वरुण मुंह मोड़ पायेगा….अपने मन में जो भाव चल रहे थे…उनसे….इतने महीनो से शायद दिल को समझा ही लिया था….या यूं कहे…खुद को किताबो को समर्पित कर दिया था…लेकिन अब सामने देख कर क्या करेगा….वरुण….और शरीर जरूर वरुण का है….लेकिन आत्मा तो देव की है…क्या अब समझा पायेगा अपने दिल…रोज रोज कैसे ना कैसे तो टक्कर होगी ही….
    बहुत डर लगता है अब तो पढ़ते समय क्या होगा आगे….
    Waiting for next part…..

    Liked by 1 व्यक्ति

  2. काफी देर से बैठी हुई थी, सोच रही हुं क्या लिखुं, कई बार हम मन की भावनाओं को कह नहीं पाते। मेरे साथ भी आजकल यही हो रहा है, कहना तो बहुत कुछ है पर शब्द नहीं मिल रहे।

    वरूण ने तो पारो को देख लिया, पर पारो ने वरूण को पहले भी शायद ढंग से नही देखा था और आज भी । पारो वरूण को देख भी नही पाएगी, क्योंकि वो शायद अब वरूण में बसे देव को ही देखेगी, उसे ही महसुस करेगी। मुझे इस बात का डर है कि जब इन दोनों को अपने रिश्ते का एहसास होगा तब आश्रम में क्या होगा।

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