जीवनसाथी-121

विराज की गाड़ी में कौन था। क्या भगवान उसे उसकी गुनाहों की सज़ा दी रहे

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   जीवनसाथी -121

         आदित्य पिंकी के बेटे को बाहों में लिए बगीचे में घूम रहा था कि ऊपर खड़ी केसर पर उसकी नज़र पड़ गयी। केसर उसे ही देख रही थी। आदित्य ने उसे भी इशारे से नीचे बुला लिया लेकिन केसर ने ना में सिर हिला दिया।
   कुछ समय बाद केसर अपना फ़ोन लिए उसमें कुछ करने लगी कि आदित्य के फ़ोन पर मैसेज की बीप आयीं।
   उसने तुरंत फ़ोन निकाला, मेसेज देखा… केसर का ही था…-“तुमसे कुछ बेहद ज़रूरी बात करनी है। कुछ देर के लिए हमारे कमरे में आ सकते हो?”
   आदित्य ने ऊपर देख कर हां में सिर हिला दिया। कमरे में वापस जाकर उसने बच्चे को पिंकी को थमाया और उल्टे पैरों वापस लौट रहा था कि पिंकी ने उसे टोक दिया…-“आदित्य भैया हमारे साथ चाय ले लीजिए।”
  आदित्य मना नही कर पाया, आखिर पिंकी ने पहली बार उससे कुछ मांगा था। वो वहीं उन लोगों के साथ बैठ गया।
   काकी सा और पिंकी के साथ बैठ आदित्य चाय तो पी रहा था लेकिन उसका दिमाग केसर की तरफ ही था।
  इधर काकी सा ये सोच कर की आदित्य उन सब के साथ सहज हो जाए उससे  बातें किये जा रहीं थीं। पिंकी के बचपन की बातों से लेकर, अपने जोड़ों की तकलीफ अपनी वेनिस की यात्रा तक सब कुछ उसे सुना दिया।
    बातों ही बातों में वक्त बीतता जा रहा था, आखिर आदित्य अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ।

  ” काकी सा हमें ज़रा कुछ काम है , हमें निकलना होगा।”
” हॉं ठीक है आप निकल जाये आदित्य लेकिन अब अगर आप हमें काकी सा की जगह  माँ बुलाएंगे तो हमें ज्यादा खुशी होगी।”
  आदित्य ने मुस्कुरा कर उनके पैर छू लिए…-“आप वाकई हमारी माँ ही तो हैं। हमने उनकी सिर्फ तस्वीर ही देखी है। रोज़ हमारी सुबह उनकी तस्वीर से ही हुआ करती थी, लेकिन अब से आप भी हैं जो हमारी सुबह को रोशन बना देंगी। “

  काकी सा ने उसके सिर पर हाथ फेरा और वो बाहर निकल गया। तेज़ कदमों से चलते हुए वो केसर के कमरे तक पहुंच गया…
… लेकिन केसर वहाँ नही थी। रेखा उसके कमरे में  आँसू बहाती खड़ी खिड़की से पार कुछ देख रही थी।
” रेखा  क्या हुआ ? केसर कहाँ है?”
रेखा ने आदित्य को देखा और वापस रोने लगी। रोते रोते उसने एक चिट्ठी आदित्य की ओर बढ़ा दी…

  आदित्य ने धीरे से चिट्ठी खोली चिट्ठी केसर की ही थी जो उसने आदित्य के लिए लिख छोड़ी थी…

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   आदित्य,

  वैसे तो हमने सोचा था तुमसे मिलकर हर एक बात तुमसे सामने बैठकर कहेंगे लेकिन जाने क्यों हमारी हिम्मत ही नहीं हुई और इसीलिए हमने कल रात ही ये चिट्ठी लिखी।
   सोचा था तुम्हें अपने हाथ से यह चिट्ठी दे देंगे और तुम अपने कमरे में जाकर तफसील से इसे पढ़ कर इस चिट्ठी का जवाब दे देना।
   हमने जिंदगी में बहुत सारे गलत काम किए हैं बल्कि अगर हम यह कहें कि हमने सिर्फ गलत काम किए हैं तो भी गलत नहीं होगा। लेकिन तुमने हमेशा हमारा साथ दिया।  उस वक्त जब तुम और हम दोनों किसी के हाथ का मोहरा थे तब भी तुमसे जब बन पड़ता था हमारी मदद किया करते थे। और बाद में जब हम इस बात को जान गए कि हम किसी के हाथों का मोहरा है उस वक्त भी तुमने हमारा साथ नहीं छोड़ा।
  ठाकुर साहब के आदमी जब हमारी जान के पीछे पड़े हुए थे। उस वक्त एक तुम ही थे, जो हमें उन सब से बचाकर सुरक्षित महल तक ले आए। हम यह बिल्कुल नहीं कहेंगे कि इसमें तुम्हारा कोई स्वार्थ था क्योंकि भले ही हम ठाकुर साहब के गुनाहों का सबूत थे लेकिन हम जानते हैं तुम ने हमें बचाया है तुम्हारे दिल में छिपी इंसानियत के कारण। तुम वाकई दिल का हीरा हो।
   हम भी औरों की तरह राजा अजातशत्रु से बहुत प्रभावित थे, लेकिन हमारे मन में उनके लिए जो झूठी कड़वाहट भरी गई थी उसके कारण कुछ समय के लिए ही सही हमें उनसे नफरत हो गई और उनसे और उनकी बीवी से बदला लेने के लिए हम इस हद तक नीचे गिर गए कि हमने कुछ हत्याएं भी की ।
      इतने बड़े गुनाहों की सजा इतनी आसानी से नहीं मिलती आदित्य।
     हम मानते हैं कि राजा अजातशत्रु और बांसुरी ने हमें माफ कर दिया। हम यह भी जानते हैं कि तुम भी हमें माफ कर चुके हो लेकिन हमारा जमीर हमारी आत्मा हमें माफ नहीं कर रही।
   जिस वक्त हम राजा अजातशत्रु को धोखा दे रहे ,थे उस वक्त भी वह हमारे पिता के स्वास्थ्य के लिए, उनकी जिंदगी के लिए चिंतित थे। वो हर पल हमारी खुशी के लिए दुआएं मांग रहे थे, और ऐसे भले इंसान को हमने धोखा दिया है।
    कभी-कभी यही सब सोचकर हमारा ज़मीर हमें कचोटने लगता है कि आज भी हम उन्हीं लोगों के महल में पड़े हैं , कभी जिनकी जिंदगी हम छीन लेना चाहते थे।
   आदित्य हमारे गुनाहों की सजा यह नहीं है, कि हमें माफ कर दिया जाए। क्योंकि आप लोगों की माफी हमारे दिल को अंदर तक और ज्यादा मरोड़ उठती है।
हमें माफ करने की जगह अगर राजा अजातशत्रु और तुमने हमें कोई सजा दी होती ना, तो हमारी आत्मा का बोझ शायद उतर गया होता । लेकिन तुम लोगों ने हमारे हर गुनाह बख्श दिये और हमें गले से लगा कर माफ कर दिया।
    जिस वक्त हम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे तुमने इतने प्यार ,इतनी शिद्दत से हमारी सेवा की, कि हम उसका एहसान अपनी सारी जिंदगी नहीं उतार पाएंगे। हमारे साथ कुछ वक्त बिताने के बाद तुम्हें मालूम चल ही गया होगा कि लड़कियों वाला कोई अच्छा गुण हममें मौजूद नहीं है। बावजूद तुमने कदम कदम पर हमारी मदद की। चाहे रसोई में  रोटियां सेकने की बात हो या सब्जी बनाने की। चाहे घर की सफाई हो या कपड़े धोने की। हर काम हम बिगाड़ कर रख देते थे, और तुम उसे वापस तरतीब से सही कर दिया करते थे।
    आखिर क्या क्या करोगे आदित्य हमारे लिए और क्यों किया इतना सब हमारे लिए?
           हम इस लायक नहीं है। बिल्कुल भी नही।
   देखा जाए तो हम इस लायक कभी थे ही नहीं और ना अब है।
   हम जानते हैं हमारी जगह कोई और लड़की होती तब भी आप उसकी ऐसे ही मदद करते, क्योंकि यह मदद का जज्बा आपके खून में है। आखिर आप राजा अजातशत्रु के ही तो भाई है ना । आप सभी भाइयों में चाहे युवराज सा हों, या अजातशत्रु, आप हो या विराट आप सभी में आप लोगों का राजसी खून नजर आता है।
    आप सभी वाकई राजपूतों की शान है, और आप सभी की यह शान हमेशा बरकरार रहे। हम जिंदगी भर भी आप लोगों के लिए दुआ करेंगे तो भी वह कम ही होगा । जिस ढंग से आप लोगों ने हमारे पापा साहेब को बीमारी में मदद की, उनकी सेवा का इंतजाम करवाया, उसके लिए हम दिल से आप सब के आभारी रहेंगे।
   विराज और रेखा एक ऐसा जोड़ा है आप के महल में जो कभी एक साथ सुखी नहीं रह सकता। अभी भी जब से हम इस महल में आए हैं रेखा को हमेशा परेशान ही देखते आ रहें हैं। हमारी छोटी बहन है।  उसकी चिंता हमें लगी ही रहती है। जब से हम यहां महल में आए हमने रेखा को हमेशा हमारे पिता साहब की सेवा करते पाया। उसे भी तो अभी-अभी ही मालूम हुआ है कि उसके जीवन की कड़वी सच्चाई क्या है? पर फिर भी रेखा अपनी परिस्थितियों से समझौता करने में हम से कहीं ज्यादा कुशल है हम शायद अब थकने लगे हैं।
   आप लोगों ने विराज और रेखा के मामले में भी हमेशा रेखा का साथ दिया। और विराज को सही रास्ते पर लाने के लिए राजा अजातशत्रु आज भी प्रयासरत हैं। विराज का स्वभाव चाहे कितना भी कसैला क्यों ना हो लेकिन राजा अजातशत्रु इतने मीठे हैं कि वह एक ना एक दिन विराज को भी सुधार ही लेंगे । हमें पूरा विश्वास है। और इसी विश्वास के कारण हम अपनी बहन रेखा को आप लोगों के पास छोड़े जा रहे हैं।
    हम अपने पिता को अपने साथ लिए जा रहे हैं।  क्योंकि पहले तो ऐसा लगा था कि हम उन्हें भी रेखा के साथ आप लोगों के पास, आप लोगों के सहारे ही छोड़ कर आप सब की दुनिया से कहीं दूर चले जाएंगे। लेकिन फिर लगा कि उनकी सेवा करने का सौभाग्य हमें मिला है, और उस सौभाग्य को हम आप लोगों को सौंप देंगे तो आप लोगों के हम पर और भी एहसान चढ़ते चले जाएंगे ।
     यही सोचकर हम अपने पिता साहब को अपने साथ लेकर जा रहे हैं। आप लोगों ने हमारे बुरे कामों के बावजूद हम पर जो एहसान किए हैं और जो एहसान लगातार करते चले जा रहे हैं, उसके लिए हम आप सभी के शुक्रगुजार हैं। लेकिन अब इन एहसानों का बोझ हम पर भारी होने लग गया है। अगर हम यही महल में रुक गए तो कहीं इन एहसानों के बोझ तले दबकर मर ना जाए, इसलिए आप सब को छोड़कर जा रहे हैं। हमारा खुद का जमा जमाया बिजनेस है हमें उसे भी देखना है ।
  भले ही आज तक हम ठाकुर साहब के हाथ की कठपुतली थे, लेकिन हमारा एक छोटा सा ही सही अपना व्यक्तित्व था जो कहीं दबा छुपा सा रह गया था।

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    हमें मालूम है हमारा खत पढ़ते वक्त आपको शायद ऐसा लगा हो कि हम अपनी जिंदगी से बेज़ार होकर अपने आप को खत्म करने ना चले जाएं, लेकिन नहीं आदित्य।
     आपके साथ रहकर हमने इतना तो समझ लिया है कि कोई इंसान अंदर से कितना भी टूटा हुआ हो, जिंदगी हमेशा उसे जुड़ने का मौका जरूर देती है।
अगर हमने हमारी जिंदगी में बेइंतिहा दुख देखे हैं तो आपने कौन सा कम देखें । आपका टूटा हुआ बचपन बिखरी हुई जवानी सभी को समेटकर आज भी आप जिंदगी से जूझ रहे हैं , लड़ रहे हैं। जिंदगी को जी रहे हैं। आप देखिएगा आदित्य एक दिन खुशियां आप के गले लग जाएंगी।
    आप जो चाहते हैं अपनी जिंदगी में, आपको वह सब मिलेगा। आपका परिवार आपके पिता साहब आपकी छोटी बहन पिंकी सब कुछ।
  हम सिर्फ इन बातों की दुआ कर सकते हैं और हमेशा करते रहेंगे आपके लिए।
     हम जितना राजा अजातशत्रु से प्रभावित थे कहीं उतना ही आपसे भी प्रभावित हो चुके हैं ।आप पहली नजर में जितने संगदिल और गुस्सैल नजर आते थे आप अंदर से वैसे बिल्कुल भी नहीं है।
   आप सब ने तो अपने आप को दुनिया के सामने साबित कर दिया है पर हमें आज तक मौका नहीं मिला। अब हम भी जा रहे हैं खुद को साबित करने, लेकिन दुनिया के सामने नहीं अपने आप के सामने।
    आज तक हम जो करते आ रहे थे किसी और के लिए करते आ रहे थे और इसीलिए शायद सही और गलत का फर्क नहीं समझ पा रहे थे लेकिन अब हम जो करेंगे अपने लिए करेंगे अपनी बहन के लिए करेंगे।

   इतने दिन महल में रहते हुए हमने एक निर्णय लिया था जिसके बारे में हम आपसे चर्चा करना चाहते थे। लेकिन वक्त ही कुछ ऐसा चल रहा था कि हमारा कुछ ज्यादा बोलने का मन ही नहीं किया करता था हमने एक निर्णय लिया है आदित्य।
   हम हमारे जैसे बेचारे बच्चों के लिए एक बाल आश्रम खोलने की सोच रहे हैं।
   हमारे पास तो फिर भी हमारे पिता साहब थे बावजूद हम भटक गए। लेकिन बहुत से ऐसे बच्चे होते हैं जो अच्छी परवरिश ना मिल पाने के कारण कम उम्र में भटक जाते हैं। गलतियां करने लगते हैं। और बाद में उनके पास पछताने या आत्महत्या करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचता।
    जिन बच्चों के पास उनके मां बाप नहीं है , उनके लिए तो फिर भी ढेर सारे आश्रम खुले हुए हैं लेकिन कई बच्चे ऐसे भी होते हैं जो मां बाप के होते हुए भी उनकी कमी महसूस करते हैं। हम ऐसा ही एक आश्रम बनाएंगे जहां ऐसे बच्चों की काउंसलिंग के लिए डॉक्टर मौजूद रहेंगे।
   किशोरवय के वह बच्चे जो किन्हीं भी कारणों से भटक गए हैं । कम उम्र में ड्रग्स लेने लग गए हैं, या बुरी आदतों के शिकार हो गए हैं। उनके लिए हमारा यह आश्रम होगा। , जहां अनुभवी चिकित्सकों की देखरेख में इन बच्चों को उनकी नशे की नशे की लत और बाकी बुरी लतों से निजात दिलाई जाएगी।
   हम जब से आप के साथ थे इसी प्रोजेक्ट को करने में व्यस्त होते थे। अब जाकर हमारा सोचा हुआ प्रोजेक्ट पूरा हुआ है । कुछ 2-4 में प्रायोजकों से भी बात चल रही थी जिन्होंने अपनी सहमति दे दी है। बाकी तो हमारा खुद का बिजनेस भी है। जिसका एक मोटा पैसा हम यहां पर लगाएंगे हमारे पिता साहब और रेखा भी इस प्रोजेक्ट में हमारा साथ देने तैयार है।
     तो अब तुम समझ ही गए होंगे कि हमने अपनी जिंदगी ढूंढ ली है अब हम यह खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है ।
  लेकिन क्या करें बातें भी तो इतनी ढेर सारी थी।
हम तुम्हारे सामने ज्यादा कुछ बोल नहीं पाते हैं। लोगों को लगता है हम बहुत गुस्सैल हैं, घमंडी हैं, बदतमीज है । हो सकता है लोगों को सही लगता हो। शायद हम ऐसे ही हैं लेकिन हम जो भी हैं अपने आप में खुश हैं। और अब अपने इस काम के साथ  हम नई शुरुआत करने के लिए अपने पिता साहब को लेकर निकलने की सोच चुके हैं। हमारा इस शहर में भी बंगला है और दून में भी। आप जहां भी चाहे आकर हमसे मिल सकते हैं फिलहाल हम आपके ही शहर में यानी यही रहेंगे।
    आप जब हमारी जरूरत महसूस करें हम बस एक फोन कॉल की दूरी पर ही है। वैसे तो आप के आस पास आपके अपने मौजूद हैं। तो जाहिर है आपको हमारी कमी नहीं खलेगी, लेकिन कभी अगर किसी भी मौके पर आपको यह लगे कि हम आपकी मदद कर सकते हैं , तो प्लीज हमें याद करने में गुरेज मत कीजिएगा।बिना कोई दूसरा विचार मन में लाए सीधे हमें बुला लीजिएगा हम तुरंत आपके पास मौजूद रहेंगे।
   हमारी एक छोटी सी जिम्मेदारी रेखा को हम आपके पास छोड़ कर आए हैं। उसका ध्यान रखिएगा आदित्य। अब खत लिखना बंद करते हैं कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया।

  केसर !!!

   केसर के खत को पढ़ने के बाद आदित्य ने मोड़ कर अपनी जेब में रख लिया। वह खत पढ़ते-पढ़ते कमरे से जरा बाहर आ गया था उसने मुड़कर देखा दरवाजे पर खड़ी रेखा ने अपने आंसू पोंछ लिए…-” आप जाएंगे क्या दीदी से मिलने?”

” जरूर जाऊंगा! आपकी दीदी से मिलने भी और उन्हें वापस लेकर आने भी।”

रेखा ने हां में सर हिलाया और वापस अंदर चली गई। उसे उस वक्त जाने क्यों बांसुरी के पास बैठने का मन कर रहा था, अंदर से निकल अपने बेटे का हाथ थामे वह बांसुरी के कमरे की तरफ चली गई।

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  रेखा बांसुरी के कमरे में पहुंची तो उसने देखा वहाँ निरमा पहले ही मीठी को साथ लिए बैठी थी। दोनों सखियों को साथ देख रेखा वापस मुड़कर जाने लगी कि बांसुरी ने उसे आवाज देकर अंदर बुला लिया।

“अंदर आ जाओ रेखा बाहर से क्यों जा रही हो।”

सकुचाती हुई वह भीतर चली आई निरमा ने भी आगे बढ़कर रेखा का अभिवादन किया।

   बांसुरी के बच्चे को गोद में लिए रेखा प्यार से देखने लगी…-‘ कितना मिलता है ना इसका चेहरा हुकुम से!”

” सही कहा बच्चे अधिकतर अपने पिता की ही तो परछाई होते हैं ।कहा जाता है ना कि गर्भावस्था में मां जिसका चेहरा सबसे ज्यादा देखती है, उसी की छाप बच्चे पर पड़ती है। और जाहिर है एक पत्नी अपने पति को ही तो सबसे ज्यादा देखती है । और दिल से चाहती है कि उसी की परछाई उनकी संतान बने। “

निरमा की बात पर रेखा ने मुस्कुराकर हामी भर दी…-” लेकिन निरमा तुम्हारी मीठी प्रेम भैया जैसी बिल्कुल नहीं लगती। “

  कुछ पलों को निरमा हड़बड़ा कर चौन्क गयी कि तभी बांसुरी ने मुस्कुराकर बात ही बदल दी।

” हां भई कुछ बच्चे मां पर भी तो पड़ेंगे वरना औरतें नाराज़गी में मां बनने से इस्तीफा नहीं दे देंगी। “

  तीनों सखियां हंसती खिलखिलाती बातचीत में लग गई । बच्चे भी आपस में खेल रहे थे। बांसुरी का बेटा उसकी गोद में ही था कि कुछ देर में ही रेखा के फोन की घंटी बजने लगी….

रेखा ने फोन उठाया, दूसरी तरफ से जाने किसका फोन था लेकिन रेखा फोन में बात करते हुए काफी घबरा गई….” क्या लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं ऐसा नहीं हो सकता वह किसी और की गाड़ी होगी। अभी कुछ देर पहले ही तो ….” अपनी बात पूरी करने से पहले ही वो फफक पड़ी।

  “क्या हुआ रेखा किसका फोन था? “

बांसुरी के सवाल पर रेखा जोर से रोने लगी।  रोते रोते ही उसने फोन पर हुई बातचीत बांसुरी और निरमा को बता दी फोन पुलिस चौकी से किन्ही पुलिस वाले का था।
   शहर से बाहर जाने वाले हाईवे पर एक एक्सीडेंट हुआ था।  गाड़ी पलट कर नीचे खाई में गिर गई थी। गाड़ी को ऊपर निकालने की कोशिश की जा रही थी। ऊपर से देखने पर गाड़ी का जो नंबर समझ में आया उसको ट्रैक करने पर मालूम चला कि गाड़ी महल की ही थी और विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी।
      महल की गाड़ी जो विराज के नाम से रजिस्टर्ड थी, इतना  पता चलने पर पुलिस वालों ने विराज के नंबर पर कॉल लगाया लेकिन विराज का नंबर लगातार बंद आ रहा था इसलिए पुलिस वाले ने रेखा के नंबर पर फोन लगा लिया था।
    बांसुरी और निरमा को यह सब बताते हुए रेखा की हिचकियां बंध गई।
    बांसुरी ने तुरंत अपना फोन उठाया और समर को फोन लगा दिया उधर निरमा भी अब तक प्रेम को फोन लगा चुकी थी।
    अपने आंसू पूछती खुद को संभालती रेखा भी विराज को फोन लगाने कांपते हाथों से उसका नंबर डायल करने लगी……

क्रमशः

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

38 विचार “जीवनसाथी-121” पर

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