समिधा -31

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     समिधा – 31

      भगिनी आश्रम एक तीन मंजिला आश्रम था, जिसमें बहुत बड़े बड़े हॉल एक ऊपर एक बने हुए थे। इनमें सबसे ऊपरी मंजिल पर कुछ कमरे और खुली छत थी। ये कमरे भगिनी आश्रम के सामान रखने के लिए उपयोग में लाइ जाती थीं। इन्हीं में एक कमरा चारु दीदी को मिला था,जिसमें वो जब कभी आकर आश्रम की लिखा पढ़ी भी जांच लिया करती थीं।
    एक कमरे में आश्रम की महिलाओं के उपयोग के लिए दानदाताओं द्वारा मिली सामग्री रखी थी तो दूसरे कमरे में पहले कभी सन्यासिनों द्वारा बुने कपडे चटाइयां आदि पड़े थे।
    एक दो कमरे खाली पड़े थे लेकिन बाहर से उन पर ताला पड़ा था। उसकी निचली मंज़िल पर बड़े से हॉल में पारो को साथ लिए सरिता खड़ी थी और उसे सबसे पीछे की तरफ खाली पड़े एक पलंग को दिखा कर इशारा कर दिया, कि वही पलंग उसका है।
    लंबे चौड़े से हॉल में आमने सामने दोनो तरफ दीवार से लग कर पलंग बिछे थे, और हर एक पलंग के पीछे खिड़की खुलती थी। पलंग के बाजू से एक छोटी अलमीरा बनी थी जिसमें साध्वियां अपना सामना, पानी का बर्तन चंदन माला आदि रखा करती थीं।
     उस पूरे हॉल में लगभग बाइस पलंग बिछे थे। हर पलंग के पीछे खिड़की होने से कमरा बहुत ही ज्यादा खुला और हवादार लग रहा था। हॉल के एक तरफ सामने बड़ा सा दरवाजा था जिस के ठीक सामने ही नीचे जाने और ऊपर जाने की सीढ़ियां बनी हुई थी। हॉल के दूसरी तरफ जो दरवाजा खुलता था उसके पीछे  गुसल खाने बने हुए थे।
     ” सुबह उठने के बाद हमें अपनी अपनी जगह की सफाई करने के साथ ही नीचे के हॉल की सफाई करनी होगी। सबसे नीचे खाने का कमरा बना हुआ है। वहां झाड़ू पोछा करने के बाद हमें बाथरूम आदि धोना होता है। और उसके बाद नहा कर हम भजन के लिए मंदिर पहुंच जाते हैं।
      वहां का पूजा पाठ भजन आरती होने के बाद हमें पीछे बनी रसोई की तरफ जाना होता है ।वहां पर दोपहर के खाने की तैयारी करनी होती है। दोपहर का खाना बनने के बाद जब गुरु आचार्य और सभी संतो के लिए भोजन चला जाता है, तब हम सभी बहने अपने हिस्से का भोजन लेकर अपने आश्रम में आ जाती हैं।  वहां सबसे नीचे जो हॉल बना हुआ है वही बैठकर हम सब एक साथ भोजन करते हैं।
    उसके बाद चाहो तो दोपहर में अपने कक्ष में आकर आराम कर सकती हो । शाम को होने वाली संध्या आरती के पहले एक बार फिर हमें फूल तोड़कर उन्हें धोकर मंदिर में पहुंचाना होता है।”

” फूलों की माला नहीं बनानी होती?”

” नहीं फूलों की माला हम नहीं बनाते! फूलों की माला वहीं रहने वाले आचार्य या गुरुवर ही बनाते हैं। क्योंकि फूलों की माला तो सीधे गोपाल जी को चढ़ाई जाती है ना हमारी बनाई माला कैसे चढ़ेगी वहां?”

जाने क्यों पारो का चेहरा कसैला सा हो गया वह चुपचाप सरिता के दिखाए पलंग की तरफ आगे बढ़ गई उसके हाथ में एक ही बैग था। उसने उस बैग को नीचे रखा और उसमें से सामान निकाल कर उस छोटी सी अलमारी में जमाने लग गई।

   ******

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      पारो को आश्रम में आए 2 दिन ही हुए थे कि एक दोपहर जब रसोई में मदद कर रही थी कि तभी ऑफिस से एक लड़का उसे ढूंढता हुआ वहां चला आया….-” पारोमिता दीदी कौन है? “

  वहां काम करती सभी औरतों की आंखें उसकी तरफ उठ गई। आश्रम में मौजूद औरतों के लिए यह बहुत बड़ी बात होती थी, कि बाहर से उनसे कोई मिलने आया है। क्योंकि उनमें से अधिकतर के परिजनों ने तो उन्हें यहां छोड़ने के बाद शायद यह मान लिया था कि वह सब अब उनके लिए हमेशा हमेशा के लिए मर चुकीं हैं। एक बार यहां छोड़कर जाने के बाद ना कोई परिजन मिलने आते थे और ना ही इनमें से कभी किसी को घर बुलाया जाता था।
     उसकी बात सुन पारोमिता धीरे से खड़ी हो गई…-” जी मैं हूँ पारोमिता!”
” दीदी आपको उधर ऑफिस में बुलाया जा रहा है।”
    पारो ने एक नज़र सरिता पर डाली और उन सभी की प्रवर सुलोचना दीदी से आंखों ही आंखों में बाहर जाने की आज्ञा ले बाहर निकल गयी। सरिता ने भी दीदी की तरफ एक बारगी देखा, उन्होंने आंखों से ही उसे भी साथ जाने की इजाज़त दे दी।
   वो खुशी से पारो के साथ हो ली।

   उदयाचार्य जी के साथ ऑफिस में सिर झुकाए दर्शन बैठा था। पारो के वहाँ पहुंचते ही वो झट से खड़ा हो गया…
“कैसी हो बऊ दी!”
   दर्शन को देख पारो की आंखें भर आई उससे एकाएक कुछ कहते नहीं बना उसने अपना सिर झुका लिया। और “हां” में सर हिला दिया।  उसे देखकर दर्शन की भी आंखे भर रही थी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। उसने मुड़कर एक बार सामने बैठे उदयाचार्य जी की तरफ देखा उन्होंने शायद दर्शन का इशारा समझ लिया…-” हां हां आप बिल्कुल आश्रम घूम सकते हैं। सरिता इन्हें और पारो बहन को ले जाओ बाहर हमारी वाटिका और आश्रम घुमा दो।”

    दर्शन ने अपने हाथ में थाम रखी बैग को कस कर पकड़ा और धीमे से बाहर निकल गया । उसके पीछे पारो भी बाहर चली गई । सरिता ने मुड़कर एक बार उदयाचार्य जी को प्रणाम किया और वहां से बाहर निकल गई। उदयाचार्य अजीब सा मुहँ बनाकर वापस अपने रजिस्टर में गड़ गए। उन्हें हमेशा यही लगता कि आश्रम की सबसे मोटी जिम्मेदारियां उन्हीं के कंधों पर हैं और इसीलिए जब भी बाहर से कोई मिलने आता तो उनका सिर दर्द और बढ़ जाता ,क्योंकि आने वाले की पूरी जीवन कुंडली उन्हें एक अलग रजिस्टर में लिखनी पड़ती। कि वह किस से मिलने आया है? जिससे मिलने आया है उनसे वह कैसे परिचित है ?किस समय आया? किस शहर से आया ?कितनी देर यहां रहा? उसने आश्रम में क्या-क्या देखा? आश्रम के किन-किन कमरों में वह गया? और कब वापस लौटा? उसके साथ कोई सामान तो नहीं था? आदि इत्यादि।
    इतनी सारी लिखा पढ़ी का काम करने में अक्सर आचार्य झल्लाते रहते थे।

    उस ऑफिस से निकल कर वह लोग एक तरफ बने रास्ते से चलते हुए आश्रम की वाटिका में पहुंच गए। वहाँ ढेर सारे पेड़ों के बीच कुछ बड़े-बड़े पेड़ भी लगे हुए थे उन बड़े पेड़ों के चारों तरफ गोलाकार चबूतरे बने हुए थे जो साफ-सुथरे उजले थे । वही चबूतरे पर जाकर दर्शन बैठ गया, पारो उसके पास ही खड़ी रही।  सरिता ने दर्शन की तरफ देखा…-” आप आश्रम नहीं देखना चाहते? “
    सरिता भी पारो से कुछ दो-तीन साल ही बड़ी थी और उसकी भी किस्मत काफी कुछ पारो से मिलती जुलती थी। दर्शन ने उसे देखकर “ना” में सर हिला दिया और पारो की तरफ देखने लगा पारो उसके पास ही सर झुकाए खड़ी थी।

“बैठो ना बाउदी। “

  पारो वही चबूतरे पर दर्शन से जरा हट कर बैठ गई।

“क्या हुआ अचानक तुम यहां क्यों चली आई? मैं बस 1 दिन के लिए ही तो दूसरे गांव गया था,बाबा के साथ! और वापसी पर पता चला कि तुम्हारी मां आई थी और उसके बाद तुमने यहां आश्रम आने की जिद पकड़ ली। आखिर ऐसा क्या हुआ बाउदी जो तुम घर छोड़ कर हम सब को छोड़ कर यहां चली आई?

पारो समझ गई थी कि उसके आने का असली कारण किसी ने भी दर्शन को और उसके बाबा को नहीं बताया होगा। सब ने इस बार भी उसके आश्रम आने की जिम्मेदार उसी को ठहरा दिया होगा। वह अपनी किस्मत पर मुस्कुरा कर रह गई।

“बस ऐसे ही दर्शन अब वहां मन नहीं लग रहा था!”

“तो क्या यहां लग रहा है? यहां कैसे रह पाओगी बऊ दी? यहां इतने परायों के बीच जहाँ ना अपनी जमीन है ना अपनी मिट्टी ना ही अपनी बोली ना अपना खान-पान । इन सबके बीच रहना मुश्किल नहीं लग रहा तुम्हें। “

अपनों की आंखों में अपने लिए पारो इतना सारा पराया पन देख चुकी थी कि अब उसके मन ने अपना और पराया सोचना ही छोड़ दिया था।

“ऐसा क्यों सोचते हो दर्शन कि यहां मिट्टी अपनी नहीं है! लोग अपने नहीं हैं ! यह सब हमारी सोच पर ही तो निर्भर करता है, बल्कि यहां तो भगिनी आश्रम में सब मेरे जैसी ही किस्मत की मारी हैं। और हम एक दूसरे के साथ सब अपना दुख भुला लेते हैं, बांट लेते हैं। कुछ अपने आंसू बहा लेते हैं तो कुछ सामने वाले के आंसू पोंछ लेते हैं। मुझे तो यहां अच्छा लग रहा है दर्शन।”

“तुम्हारे चेहरे से तो नहीं दिख रहा कि तुम्हें अच्छा लग रहा है। बउ दी एक बात बोलूं मेरे साथ वापस चलो कम से कम तुम्हें देखकर लगता है, कि  मेरे देव दादा…”

इसके आगे दर्शन कुछ नहीं बोल पाया लेकिन पारो समझ गई कि वह क्या कहना चाहता है।

“नहीं दर्शन अब वापस नहीं जाऊंगी। अब मेरे हिस्से जितनी भी सांसे बची हैं ,वह मुझे यही इसी आश्रम में लेनी है । अब यहां से कहीं नहीं जाऊंगी। एक बात बताओ क्या तुम अकेले आए हो?”

“हां बउ दी , और मेरे साथ कौन आता अकेला ही आया हूं।

पारो के चेहरे पर एक मुस्कान खेल गई।  वह समझ गई कि दर्शन घर पर बिना किसी से कुछ बोले आया है।

“घर पर बिना बताए मुझसे मिलने चले आए हो फिर किसके सहारे मुझे वापस लेकर जाना चाहते हो दर्शन?”

दर्शन पारो की बात पर इधर-उधर देखने लगा। सच ही तो कह रही थी पारो अब इतने दिन में वह भी घर वालों को अच्छे से जानने लग गई थी। जब यहां आने से पहले उसके घर पर बात करने की हिम्मत नहीं हुई तो आखिर किस आधार पर वो पारो को वापस लेकर जाना चाहता है।
   हालांकि वह यही सोच कर आया था कि किसी भी तरीके से पारो को घर वापसी के लिए मना लेगा लेकिन उसके मन में एक शंका यह भी था कि पता नहीं पारो उसके साथ वापस जाना चाहेगी या नहीं और इस लिए….

“मेरे बारे में सोच सोच कर दुखी मत हो दर्शन। मैं यहां बड़े सुख से हूं।”

“हां वह तो देख पा रहा हूं। पहले ही इतनी दुबली थी अब तो ऐसा लगता है जैसे हड्डियां उभर आई हैं।”

उसकी बात सुन पारो खिलखिला कर हंस पड़ी।

“ठीक है अब से खा पीकर थोड़ी मोटी हो जाऊंगी! अगली बार मिलने आओगे तो इससे बेहतर पाओगे मुझे।”

दर्शन ने अपने धोखेबाज आंसुओं को जो उसकी बिना मर्जी के भी उसके गालों पर लुढ़क आये, उन्हें पोंछ लिया और खड़े होकर पारो का हाथ पकड़ लिया।
” बउ दी आपके लिए कुछ सामान लेकर आया हूं मना मत करना।”

“क्या है दिखाओ तो सही।”

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दर्शन ने इतनी देर से अपने कंधे पर टांग रखे बैग को अपनी गोद में रखकर उसकी चेन खोल दी उसमें पारो के लिए किताबें रखी थी।
     घर पर किसी तरह से जुगत लगा कर आखिर दर्शन और आनंदी के जोर देने पर पारो को 11वीं की परीक्षा देने का मौका मिल चुका था।
    पारो के आश्रम आने के बाद ही उसका परीक्षा फल भी आ गया था। और वो अच्छे नंबरों से पास हो चुकी थी।
     दर्शन को जब पारो के परीक्षाफल का पता चला तब वो बाहर ही था, वो खुशी से बांवरा मिठाई लिए जब घर पहुंचा तब उसकी प्यारी बऊ दी उसे घर भर में कहीं नही नज़र आई ।
   जब माँ से उसने पूछा तो माँ ने उसकी पूछताछ से परेशान हो कह दिया…-“मर गयी तेरी बऊ दी” और वो नाराज़ हो घर से बाहर चला गया था।
    गुस्सा उतरने के बाद जब आधी रात वो घर लौटा तब आनन्दी बऊ दी ने खाना परोसते हुए उसे पारो के जाने की सारी बात सिलसिले वार बता दी।
    और अगले ही दिन घर पर बिना किसी से कुछ कहे वो उससे मिलने निकल गया।
    पर जाने क्यों अपनी माँ की बात सुन उसका मन कड़वाहट से भर गया था। बऊ दी से ऐसी भी क्या नाराज़गी। उनकी तकलीफ समझने की जगह हर कोई उनकी तकलीफ बढ़ाने में लगा था।
   रास्ते भर सोच सोच कर उसका सिर फटने लगा था। उसे पारो की घर वापसी का कोई मार्ग दिखाई नही दे रहा था, फिर भी मन ही मन वो उसे वापस ले जाने को मना लेने का एक प्रयास तो करना ही चाहता था।
       पारो के लिए क्या लेकर जाना चाहिए  उसे नही सूझ रहा था कि एकदम से उसे लगा अगर पारो उसके साथ नही भी आई तो कम से कम जहाँ हैं वहीं से अपनी आगे की पढ़ाई ही कर ले। और इसलिए उसने उसके लिए किताबें रख ली थीं, वो भी अगली कक्षा की।
   बैग खोलते ही पारो की नज़र किताबों पर गयी और उसकी आंखें भर आयीं।

“अब इन किताबों का क्या करूँगी ? “

“पढना ! किताबों का भला और क्या किया जाता है? “

   वो दोनों बातें कर रहे थे कि उनके पास से होकर वरुण किसी अन्य आचार्य से बात करता निकल गया। और उसे पीछे से देख दर्शन के मुहँ से बेसाख्ता “देव दादा”निकल गया।
     दर्शन की आवाज़ पर वरुण चौन्क कर पलट गया।

   वरुण ने दर्शन को देखा और दर्शन ने वरुण में छिपे देव को।
   वरुण को देखते ही जाने क्यों दर्शन के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट चली आई वरुण ने भी दर्शन को पहचान लिया वरुण कदम बढ़ाता दर्शन तक चला आया।

  ” आप तो हमारे घर आये थे ना…?

  ” कैसे पहचान लिया मुझे ?”
वरुण के सवाल पर दर्शन के मुहँ से उसके बिना चाहे भी वो बात निकल गयी जो सुन वहीं खड़ी पारो भी चौन्क गयी
   ” आपको देख बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मेरे देव भैया वापस आ गए। बऊ दी ये वहीं तो हैं जो उस वक्त हमारे घर आये थे, जब…। “

  पारो ने बिना वरुण का चेहरा देखे ही उसकी ओर हाथ जोड़ दिए, और इतनी देर में वरुण पारो की सारी आपबीती समझ गया।
   उस दिन पहली बार आश्रम में उसे देखने के बाद एकाएक वो उसे नही पहचान पाया था लेकिन जाने क्यों जब तक वो नज़र आती रही थी उस पर से नज़रे नही हटा पा रहा था।
   बादबाकी उस रात वो अपने इस कृत्य पर बेहद शर्मिंदा भी हुआ था।
   आश्रम में होते हुए वो ऐसे कैसे किसी औरत को अपलक देख सकता था?
आश्रम आने के बाद से ही उसने डॉक्टर की बताई दवाएं भी लेनी छोड़ दी थीं……
   यही सब सोचते सोचते जाने रात की किस पहर उसकी नींद लग गयी थी, सुबह भोर की पहली किरण से जब उसकी नींद खुली तब उसे एहसास हुआ कि कल रात वो जाने कितनी जागती रातों के बाद चैन की नींद सो पाया था….

क्रमशः

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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