समिधा- 32

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  समिधा -32

    ‘”कृष्ण क्या है? एक विचार! एक चिंतन! या एक संपूर्ण युगपुरुष! जिसने युगों के विचारों को बदल दिया। श्री कृष्ण के जीवन में जन्म से लेकर उनके जीवन काल तक हर पल कुछ न कुछ घटता रहा और वह जो भी घटता रहा वह श्री कृष्ण का स्वयं रचित कार्य था । यानी अपने प्रारब्ध को समझकर उन्होंने उसके लिए प्रयास किया।
     उनकी यह जीवनशैली हमें भी यह समझाती है कि अगर अपने भविष्य को सुनियोजित-सुनिश्चित करना है तो अपने वर्तमान पर कार्य करना होगा।
    मैं कभी-कभी सोचता हूं कि इतनी सारी किताबें पढ़ने के बाद मैं श्रीकृष्ण को समझ गया हूं। जान गया हूं। उनका जीवन दर्शन पा चुका हूं । और जिस घड़ी मुझे यह महसूस होता है, कि मैं श्रीकृष्ण के करीब हूं उसी क्षण वह मुझसे दूर चले जाते हैं। मेरे और उनके बीच एक लंबा फासला बन जाता है। और उस फासले को पाटने के लिए मुझे एक बार फिर उनके जीवन चक्र को पढ़ना और समझना पड़ता है।
     मैं जानता हूं जब तक मैं उनकी लीलाओं को पूरी तरह समझ कर अपने आप में व्याप्त नहीं करूंगा। तब तक वह इसी तरह मुझ से दूर भागते रहेंगे । और उन्हें पाने की लालसा में मैं उनके पीछे भागता रहूंगा इसी भागा दौड़ी का नाम ही तो भक्ति है।

   हां, मैं कृष्ण भक्त हूं! पूरी तरह से कृष्ण की भक्ति में लीन उनका एक साधक उनका पुजारी जिन्हें उनका नाम लेना पसंद है! उनका श्रृंगार करना, उन्हें भोग लगाना और उनकी भोग की थाली उनके सामने रखकर करबद्ध निवेदन करना कि आओ मेरे कृष्ण और यह भोग ग्रहण करो! पसन्द है। मैं भी बहुत बार चाहता हूं उस बच्चे की तरह जिद पर अड़ जाऊं कि जब तक तुम नहीं खाओगे मैं यहां से नही हिलूंगा । और एक सुटियाँ लेकर मैं भी बैठ जाऊं उस मूर्ति के सामने। इस ज़िद को पकड़कर कि, तुम आओ और यह भोग खा कर ही जाओ।
      आप सब मेरा विश्वास नहीं करेंगे लेकिन ऐसा करने का मैंने कई बार प्रयास किया। और हर बार वह छलिया मुझे छल ही जाता है। कभी मुझे गुरुवर का बुलावा आ जाता है तो कभी किसी और कारणवश मुझे उस भोग की थाली के सामने से हटना ही पड़ता है। और मैं जब तक वापस आता हूं उसमें से एक कोई ना कोई हिस्सा खत्म हो चुका होता है। और मैं मुस्कुरा कर उस छलिया के सामने हाथ जोड़ देता हूं कि आखिर तुमने मुझे ठग ही लिया।
    मैंने आज तक द्वारिकाधीश को प्रकट होकर मेरे सामने बैठकर भोग की थाली में भोग लगाते नहीं देखा। लेकिन यह भी सच है कि हर बार उस भोग की थाली का कोई एक हिस्सा अपने आप गायब हो चुका होता है। मैं यह नहीं कहता कि मूर्ति उस भोग को ग्रहण कर लेती है लेकिन वह किसी ना किसी रूप में उस भोजन को प्राप्त जरूर कर लेती है।

    यहां आने से पहले मेरा मन बहुत अशांत था। शारीरिक रूप से भी और मानसिक भी।
     अपनी उसी अशांतता को अस्थिरता को दूर करने के लिए मैं आश्रम आया था। यहां आते  साथ मुझे अच्छा लगने लगा ऐसा भी नहीं था।
     मुझे समय लगा यहां ढलने में। यहां की जीवन चर्या को अपनाने में। लेकिन हर एक आगे बढ़ते समय के साथ मैं भी आगे बढ़ता गया और कृष्ण लीला में डूब कर रह गया।
   और आज मैं गर्व से कहता हूं कि मैं कृष्ण भक्त हूं। भक्त होने और अंधभक्त होने में बहुत महीन सा अंतर होता है ।
   भक्ति आपके अंदर पौरुष को जगाती है । आपकी ताकत को कई गुना बढ़ा देती है। जब आप किसी की भक्ति करते हैं तो वह भक्ति आपके अंदर  एक विश्वास पैदा करती है, कि आपके साथ जो भी होगा उचित होगा। वही अंधभक्ति आप को कमजोर कर जाती है। जब आप किसी के अंधभक्त हो जाते हैं तब आप बिना कुछ सोचे आंख मूंद कर उस पर भरोसा कर लेते हैं।
     वैसे कृष्ण की लीला ऐसी है कि अगर आप उनके अंधभक्त होते हैं तब भी वह आपको अंधे होकर आगे गिरने नहीं देंगे । वह हर कठिन समय पर आपको थामे रहेंगे।
कृष्ण लीला के वर्णन में जो अनिर्वचनीय सुख है, वह और कहीं नहीं। यह रस बोलने वाले को भी उतना ही सिक्त करता है जितना सुनने वाले को।
    अगली बार मैं कुछ कृष्ण लीलाओं का वर्णन करूंगा लेकिन वैसे नहीं जैसे आप आज तक सुनते आये हैं।
     कृष्ण चरित्र पर आज तक हमारे कवियों ने साहित्यकारों ने रचनाकारों में बहुत कुछ लिखा है। और कृष्ण को महिमामंडित कर के चमत्कार करने वाले पुरुष के रूप में वर्णित किया है। जिससे हम साधारण जनमानस उनसे एक दूरी महसूस करते हैं। हमें लगता है हमारी सारी समस्याओं को किसी चमत्कार के माध्यम से कृष्ण सुलझा देंगे लेकिन अब इतनी सारी किताबें पढ़ने के बाद मुझे यह जाकर समझ में आया कि राम और कृष्ण ने अपना जीवन बहुत साधारण तरीके से जिया । राजा होते हुए भी वह दोनों सदा एक आम व्यक्ति की तरह अपना जीवन यापन करते रहे । अपने जीवन में आने वाली हर कठिनाई  का उन्होंने खुलकर सामना किया। सिर्फ चमत्कार दिखाकर किसी कठिनाई को पार नहीं लगाया।
    मेरे विचार से उन दोनों ने ऐसा इसलिए किया जिससे हम साधारण जनमानस उन के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को भी सार्थक कर सकें।
श्री कृष्ण ने जीवन में चमत्कार किए लेकिन उन चमत्कारों के पीछे भी हमेशा कोई ना कोई लक्ष्य या कारण मौजूद था। अगली चर्चा में हम आपस में ऐसे ही कुछ विषयों का उल्लेख करेंगे। और आपस में परिचर्चा करेंगे, उम्मीद करता हूँ कि हमारी अगली परिचर्चा सफल सिद्ध होगी।”

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     अपनी बात समाप्त कर वरुण ने सामने बैठे श्रोताओं की तरफ देख कर अपने हाथ जोड़ दिए। सामने बैठे लोगों में अधिकतर लोग मंदिर से बाहर से आए दर्शनार्थी थे, जो वरुण के प्रवचन को सुनने के लिए दर्शनों के बाद बैठ जाया करते थे। उसके अलावा मंदिर परिसर में कार्य करने वाले कुछ एक लड़के थे और भगिनी आश्रम की कुछ महिलाएं भी एक तरफ बैठी हुई थी पारोमिता भी उन्हीं में से एक थी।
     भगिनी आश्रम की महिलाओं की पंक्ति में सबसे सामने बैठी पारोमिता की आंखें पूरी तरह वरुण पर केंद्रित थी।  उसे जाने क्यों वरुण को देख देख कर उसके चेहरे में बीच-बीच में देव की झलक मिल जाया करती थी और उस समय वह अपने मन को मार कर इधर-उधर देखने लगती थी।
     उसे इस तरह खुद का किसी पराए पुरुष की तरफ देखना अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन वह अपने मन को उसके चेहरे से अपनी आंखें हटाने के लिए मना भी नहीं पा रही थी। प्रवचन के बीच से उठकर जाना मंदिर के नियमों के विरुद्ध था इसलिए प्रवचन समाप्त होने तक उसे वहां बैठना ही था और उसकी मर्जी से अलग जाकर उसकी आंखें घूम फिर कर वरुण के चेहरे पर केंद्रित हो ही जा रही थी।

  ” गुरुवर आपकी बातें हमें भी कृष्ण सागर में डूबा ले जाती हैं”  एक महिला के ऐसा कहते हैं वरुण ने अपनी बाईं तरफ बैठी महिलाओं की तरफ दृष्टिपात किया और मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए। कि तभी उसकी नजर सामने बैठे पारोमिता पर चली गई।
    और वह खुद कुछ देर के लिए उसे देखता रह गया। अंदर से उसके मन में अचानक ही तरंगे बहने लगी। उसे खुशी का आभास होने लगा, उसे अच्छा लगा कि पारोमिता भी उसे सुनने बैठी है।
    उसका मन किया कि वो कहता रहे और सामने बैठी पारो सुनती रहे। वो उसकी तरफ देख रहा था कि पारो की भी नज़र वरुण पर पड़ गयी..
   वरुण को एकाएक कुछ सूझा ही नही और उसने यूँ ही बिना कुछ सोचे कह दिया…-” आप लोगों के मन में अगर कोई शंका है तो आप पूछ सकती हैं। “
    पारो ने न में सिर हिला कर सिर नीचे कर लिया।

  लोग उठ कर जाने लगे थे। आश्रम की महिलाएं उसी जगह पर गोल घेरा बनाये बैठ गईं और ढोलक मंजीरा बजा बजा कर भजन गाने लगीं।
   उन्हें भजन करते देख पारो ने साथ बैठी सरिता से पूछा और अपनी जगह पर खड़ी हो गयी…-” ए ऐसे भजन बीच में छोड़ कर नही जाते।” उन्हीं महिलाओं में से एक कि कड़वी सी आवाज़ पारो के कान में पड़ी और पारो ने हाथ जोड़ कर बाहर निकलने की अनुमति मांग ली।
     वरुण का मन भी अब तक वहाँ से उठने का नही हो रहा था। वरना बाकी दिनों में प्रवचन के बाद वो उठ कर चला जाया करता था। पर आज दो चार लोगों के बुलाने पर भी वो किसी किताब को खोले वहीं बैठा रहा।
   की उसी वक्त पारो उठ कर बाहर निकल गयी। उसके वहाँ से निकलते ही वरुण का मन भी वहाँ से जाने का करने लगा। कुछ देर अपने मन को मना कर वो कुछ एक दो पन्ने पलटने के बाद आखिर वो भी उठ ही गया।

   परिसर से बाहर निकल इधर उधर देखता वो आगे बढ़ रहा था कि उसके साथ हमेशा बने रहने वाले स्वामी प्रशांत ने उसे टोक दिया…-“क्या हुआ वरुण ?”
   प्रशांत और वरुण ने कृष्ण आश्रम में अपनी यात्रा साथ ही शुरू की थी। कलकत्ता से जिन चार लड़कों की टोली केदारनाथ भेजी गई थी उनमें भी प्रशांत शामिल था। यहाँ तक कि केदारनाथ से वापसी के बाद जब वरुण देव के घर गया था तब भी प्रशांत उसके साथ देव के घर के बाहर तक गया था।
   वो बाहर ही गाड़ी में बैठा वरुण का इंतेज़ार कर रहा था। शुरू से ही साथ होने के कारण दोनो के बीच फ़िज़ूल औपचारिकता की कोई दीवार नही थी, इसी से  दोनों एक दूसरे का नाम ही लिया करते थे।

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   प्रशांत के द्वारा उसे पुकारे जाने पर जैसे वो यथार्थ में लौट आया…-“नही कुछ भी तो नही।”
” किसी को ढूंढ रहे हो क्या?” वरुण के चेहरे पर अपनी आंखें गड़ाए प्रशांत ने सवाल किया और उसकी आंखें देख वरुण खुद में ही झेंप कर रह गया।
   वाकई आश्रम में आकर रहते हुए वो आज कर क्या रहा था। जब से उस लड़की को देखा था जैसे उसका खुद पर से अधिकार ही खत्म हो गया था। जब तक वो वहाँ बैठी थी अच्छा लग रहा था, जैसे ही उठ कर गयी उसका मन भी उसके पीछे जाने को बावला होने लगा।
  पर ये तो गलत था!!! अब प्रशांत को क्या जवाब दे यही सोच रहा था कि प्रशांत ने ही उसकी बेचैनी का जवाब दे दिया…-“वो मंदिर के पीछे तरफ निकली है, शायद वाटिका के पीछे बनी झील पर चली गयी है।”
   वरुण प्रशांत की बात सुन एक बार फिर झेंप गया। अपनी झेंप मिटाने उसने एकदम ही निरर्थक सा सवाल कर दिया…-“कौन ?”
  और प्रशांत ने उसे ऐसी नज़रों से देखा कि वरुण फिर बिना प्रशांत की ओर देखे ही अपने अध्ययन कक्ष की तरफ बढ़ गया…
    प्रशांत भी उसके पीछे चल ही रह था की आश्रम के कुछ लड़के उन दोनों की तरफ चले आये…-” गुरुवर ! आप दोनों को भी गुरु उदयाचार्य अपने कमरे में अभी बुला रहें हैं।”
     सुबह के इस समय पर उदयाचार्य जी अधिकतर आश्रम की ज़रूरतों पर काम किया करते थे। आश्रम से सम्बंधित मीटिंग्स के लिए वो अक्सर दोपहर के खाने के बाद ही सबको बुलाया करते थे। आज अचानक क्या हो गया ये सोचते वरुण और प्रशांत भी तेज कदमों से उनके कमरे की ओर बढ़ चले।
    आश्रम के मुख्य संचालक, अन्य आचार्य और गुरुओं को मिलाकर लगभग ग्यारह बारह लोग  उस आश्रम के प्रमुख लोगों में थे जिनमें वरुण और प्रशांत भी शामिल थे।
   सभी के वहाँ पहुंचते ही उदयाचार्य जी ने अपनी बात कहनी शुरू की…. -” आप सभी को ये बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि हर वर्ष की तरह इस बार भी आश्रम का स्थापना दिवस मनाया जाना है। आज से ठीक तीसरे दिन ये शुभ तिथि पड़ेगी और उस दिन पूरे हर्षोल्लास के साथ हम अपने मंदिर आश्रम का स्थापना दिवस मनाएंगे। वैसे तो हर साल श्री श्री गुरुवर अमृताचार्य जी ही यहाँ आते थे लेकिन इस बार वो अमेरिका में स्थित मंदिर के विशेष कार्यक्रम में सम्मिलित होने जा रहे हैं।
  लेकिन इस बात से दुखी होने की आवश्यकता नही है क्योंकि उनकी जगह  इस बार श्री गुरुवर प्रबोध आचार्य हमारे बीच उपस्थित रहेंगे।
    वो अपने ऑस्ट्रेलिया प्रवास से कल ही वापस लौटे हैं और कल शाम तक वो हमारे आश्रम पहुंच जाएंगे। तब तक आश्रम की साफ सफाई और बाकी तैयारियां आप सभी को मिलजुल कर देखना है।
    ये हमने सूची तैयार कर रखी है। आप लोगों के नाम के सामने आपके काम लिखें हैं। अभी हमें थोड़ा बाज़ार का भी काम है तो हम अब निकलेंगे। आप लोग अपने काम के अनुसार अगर आश्रम में किसी प्रकार की कमी देखते हैं या कोई आवश्यकता लगती है तो उसे सूचीबद्ध कर के आज शाम तक हमें दे दीजिएगा। जिससे गुरुवर के आने पर उन्हें आश्रम में कोई कमी न लगे।”

   सूची उन्होंने सामने बैठे एक गुरुजी के हाथ में थमा दी और बाकी काम समेटने लगे।
   अपने नाम के आगे लिखा काम देखते वो लोग सूची आगे बढ़ाते जा रहे थे। 
प्रशांत ने अपना काम देख वरुण की ओर सूची बढ़ा दी। उसके नाम के सामने भगिनी आश्रम की महिलाओं की सहायता से पूरे मंदिर परिसर और आश्रम की पुष्प सज्जा के साथ ही गोपाल जी के वस्त्रो आदि की तैयारी लिखी थी।
  अपना अपना काम देख सभी लोग वहां से निकल गए।
  ” चलो फटाफट खाना खा कर अपना अपना काम देखना होगा। अब समय ही कहाँ बचा है। कल तक तो गुरुवर आ जाएंगे।”
  ” हाँ ! लेकिन प्रशांत ये बताओ कि ये गुरुवर हैं कौन?”
   ” ये श्री श्री स्वामी जी के परम शिष्य हैं। कहा जाता है बचपन में एक बार ये अपनी कक्षा में फेल हो गए, तब ये  नौ दस साल के रहे होंगे। इनके पिता ने क्रोधित हो इन्हें घर के बाहर निकाल कर दरवाज़ा बंद कर दिया। कुछ समय बाद जब पिता जी का गुस्सा शांत हुआ तब उन्होंने दरवाज़ा खोला तो ये वहां से गायब थे। अब इनकी ढूंढ मची तो पता चला ये गांव के बाहर की चौपाल पर अपना आसन जमाये बैठे थे। माता पिता सबने विनती चिरौरी कर ली लेकिन फिर ये लौट कर घर वापस नही गए। इनकीं माँ इनका खाना पीना सब वहीं ले आती। ये कभी खाते, कभी चार पांच दिन बिना खाये पड़े रहते। माँ रो रोकर आधी हो गईं पर ये घर वापस नही लौटे। एक सुबह जब इनके माता पिता रोज़ की तरह इनका भोजन लेकर वहाँ पहुंचे तो ये अपनी जगह नही थे। बाद में पता चला कि श्री स्वामी अमृताचार्य जी की गाड़ी उधर से निकली थी और स्वामी जी ने इनसे रुक कर कुछ बातचीत की और इनकी विद्वत्ता से इतने प्रभावित हुए कि इन्हें अपने साथ ले लिया। एक पत्र इनके माता पिता के नाम छोड़ गए जिसमें अपना पता ठिकाना सब लिख गए थे।
   इनके माता पिता कई बार इनसे मिलने आये लेकिन ये फिर कभी वापस नही लौटे। हालांकि इनकीं नाराज़गी तो बहुत पहले ही दूर हो गयी थी। कहा जाता है श्री श्री स्वामी जी ने इन्हें खूब शिक्षा दिलवाई और अब ये देश विदेश में घूम घूम कर प्रवचन देते हैं। उम्र तो यही कोई अट्ठाईस उनतीस के लगभग होगी पर अपने ज्ञान से ये हर तरफ छा गए हैं।
   मेरा इनसे मिलने का बहुत मन था, अब कल उनके दर्शन कर धन्य हो जाऊंगा। “

” अब तुमसे इतनी तारीफ सुन कर मेरा भी मन इनके दर्शन करने का होने लगा है।

” तुम्हें तो भई चुन कर भगिनी आश्रम मिला है। काम करते हुए उसे भी ढूंढ लेना, कुछ देर पहले जिसके पीछे जाते हुए कमरे का रास्ता भूल गए थे। “

” क्या कह रहे हो प्रशांत। मंदिर है ये और हम इसे अपवित्र नही कर सकते। “

” माफ करो दोस्त। मैं सिर्फ मज़ाक कर रहा था। चलों अपना काम धाम देखें। “

  प्रशांत ने उस वक्त बात बदल ज़रूर दी लेकिन वरुण के मन में ये बात रह गयी। क्या उसका बर्ताव वाकई पारोमिता के लिए अलग से दिखाई दे गया था। ऐसा हुआ तब तो आज प्रशांत ने उसे पकड़ा कल कोई और पकड़ लेगा।
   ऐसा होना तो ठीक नही है। अब उसे अपने मन को।कड़ा कर रखना होगा। चाहे कुछ भी हो जाये वो अब उस लड़की की तरफ आंख उठा कर भी नही देखेगा।

अपने संकल्प को मन ही मन दुहराते  वो अपने कमरे की ओर बढ़ रहा था कि सामने से तेज़ी से आती पारो ठीक उसके सामने तक आकर रुक गयी। अगर नही रुकती तो ज़रूर वरुण से टकरा चुकी होती। वरुण अपने दोनो हाथों को खड़ा कर ज़रा पीछे हो सतर खड़ा हो गया..-” माफ कीजियेगा ।” कह कर वो एक ओर से होकर आगे निकल गयी, और एक बार फिर उसका पीछा करती वरुण की आंखें दूर तक पारो के पीछे चलती चली गईं।

क्रमशः

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

23 विचार “समिधा- 32” पर

  1. Mam Krishna ke chamtkaro k bare me or unki bhakti k bare me jo apne smjhaya h wo kabile tarif h.. Aisa lag raha tha jaise hum koi dharmik kitaab padh rahe ho.. Ab paro ki taraf se bhi tension nhi ho rahi h.. Mam apki hi tarha mujhe bhi padhne ka bhut shok raha h. Jaise wo news pepper wali baat. mai bhi aise hi kiya karti thi… thank u so much mam itni acchi story ke liye

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