शादी.कॉम-25

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शादी डॉट कॉम-25

     दो दिन कब पलक झपकते बीत गये बांसुरी को पता भी नही चला,तीसरे दिन से टीम द्वारा एक ट्रेनिंग सेशन का आयोजन किया जाना था जिसमें
टीम के अलग अलग सदस्यों द्वारा विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिया जाना था,हालांकि बैंक के रूटीन कार्य में व्यवधान ना हो इसलिये कुछ चुने हुए बैंक कर्मियों को ही इस ट्रेनिंग सेशन का हिस्सा बनाया जाना था।
      बांसुरी बस इसी चिंता में थी कि उसे इसका हिस्सा बनने मिलेगा या नही।।

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टीम के द्वारा बैंक के सीनियर कर्मचारियों की लिस्ट तैयार कर सिद्धार्थ को दे दी गयी थी जिनमें बांसुरी का नाम नही था ,,पर सिद्धार्थ चाहता था कि बांसुरी भी इस प्रशिक्षण का हिस्सा बने।।बाकी तीन मेंबर्स काफी सीनियर थे इसलिये उसने राजा से ही बात करने की सोची__

” सर आपकी लिस्ट से मेरी सबसे अच्छी एम्प्लायी का नाम गायब है,,,आप एक बार फिर से देख लेते तो अच्छा रहता।।”

” सिद्धार्थ साहब!! ये लिस्ट नायर सर ने बनाई है और मैं उनके निर्णय के खिलाफ नही जा सकता , हमसे काफी सीनियर हैं वो।।”

” मैं समझ सकता हूँ,,पर क्या आप एक बार ट्राई कर सकते हैं प्लीज़,असल मे बांसुरी बहुत कुशल कर्मी है,उसे ये ट्रेनिंग मिलेगी तो वो और चमक जायेगी।

राजा– समझा सकता हूँ,लेकिन……

राजा ने अपनी बात पूरी भी नही की थी कि सिद्धार्थ फिर शुरु हो गया।।

सिद्धार्थ– वो सर बात दरअसल ये है,  की असल में हम शादी करने वाले हैं,,क्या है उसकी भी ट्रेनिंग हो जाये तो हम दोनो के लिये ही अच्छा रहेगा।।

   राजा के हाथ से चाय उसके कपडों पर छलक गयी,उसने सिद्धार्थ की तरफ देखा__

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राजा — कब ?? I mean कब करने वालें  हैं??

सिद्धार्थ- बस जल्दी ही!! हमारी तरफ से तो सब ओके ही है,मेरी माँ को तो बांसुरी बहुत पसंद भी है, जल्दी ही वो शुभ दिन भी आ जायेगा।।

     गलतफहमी!!!ऐसी ही जटिल वस्तु होती है,जिसे हो जाती है वो फिर सामने वाले की प्रत्येक बात को अपने विशिष्ट चश्में से देखने लगता है।।
    हमारी तरफ से सब ओके है में सिद्धार्थ का तात्पर्य उसके और उसकी माँ की तरफ से था,पर राजा ने सोच लिया बाँसुरी और सिद्धार्थ की तरफ से।।
     इस चर्चा के बाद उसे सिद्धार्थ से कोई बात करने का मन नही किया।।

   क्या क्या नही किया था उसने बांसुरी के लिये…..
उस शाम के बाद पलट के देखा भी नही बांसुरी ने , कितनी देर वहाँ बैठा रह गया था,वो तो बाद में बन्टी जबर्दस्ती उठा कर घर ले गया,,पूरे दो दिन ना कुछ खाया ना पिया।।
    तीसरे दिन कैसा तेज़ बुखार आ गया था उसे… सारा सारा दिन एक ही बात तो दिमाग मे चल रही थी,माँ को समझाए या बांसुरी को!!
    दोनो में से एक ने भी उसका साथ दे दिया होता तो क्या ऐसे घुल घुल के रोग पाल लिया होता उसने।।
     इसके बावजूद उसने बांसुरी के इम्तिहान वाले दिन एक चिट्ठी देकर प्रेम को उसके पास भेजा था, फोन करने का तो सवाल ही नही था,ऐसे बुखार मे तप रहा था कि माँ सारा समय उसके सर के पास ही बैठी थी।।।

      प्रेम को कैसा खोटे सिक्के सा फिरा दिया था बांसुरी ने,ना ही उसके खत को पढ़ा और ना जवाब ही भेजा।।
     
     वो तो उसे खुद को पता भी नही चल पाया था कि ज्वर की तीव्र पीड़ा में वो रात भर बाँसुरी का नाम जपता रहा था,और उसकी उसी तड़प ने आखिर अम्मा का कलेजा भी मरोड़ के रख दिया था।।

     बेचारी दिन निकलते ही बन्टी को साथ लिये अपने सारे मान को ताक पर रख बांसुरी के घर भी पहुंच गयी,पर क्या लाभ हुआ आखिर??
     वहाँ उसकी बुआ ने क्या क्या नही सुनाया था अम्मा को___
        ” माफ करना दुल्हीन हमरी बांसुरी की तो नौकरी लग गयी, पढ़ी लिखी जो ठहरी।।देखो बुरा ना मान जाना पर सिर्फ सकल सूरत ही सब कुछ ना होवे है,सोने की प्रतिमा को घर मे सजाया जा सकता है पेट की आग नही बुझाई जा सकती।।छोरी ने तो कह दिया है…सादी करेगी तो अपने जैसे पढ़े लिखे लड़के से वर्ना कन्वारी रह जायेगी।।

अम्मा– क्या सच!! उसने खुद ऐसा कहा??

बुआ– हाँ तो,जो हम झूठ बोलेंगी तो जे जीभ अभी के अभी गल के गिर जाये…..
     जाते जाते एक बात और सुन लो दुल्हीन ,जितना दहेज का लिस्ट तुमने हमे थमाया था ना उतना तो छोरी दो साल में कमा के तुम्हारे चरणों में डाल देती पर सबर कहाँ था तुममें,जाओ अब सम्भालो अपने लल्ला को,कहीं ज़हर वहर ना खा ले।।

    ये सारी बातें और किसी ने कही होती,तो एक बार को राजा अविश्वास कर भी लेता पर वापस लौटने के बाद अम्मा ने ही बन्टी के सामने हर एक बात उसे बता दी थी,,कितना रोयी थी अम्मा उसे गले से लगा के……
      जिस लाड़ले के लिये अम्मा ने अपने स्वाभिमान को नही देखा उस माँ के लिये फिर बेटा कैसे इतना निष्ठुर हो सकता था।।

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    उसे भी समझ आ गया था,बांसुरी कभी उसके जैसे अनपढ़ गंवार से ब्याह नही कर सकती।।
    बांसुरी से ब्याह का उसे भी कहाँ कोई उत्साह रह गया था,बस उसके पीछे से रह गयी थी अम्मा के अपमान की कड़वी घूंट।।
    वो भी पढ़ा लिखा होता बड़के भैया की तरह तो मजाल थी कि बुआ उसकी अम्मा पर इतना कीचड़ उछाल पाती।।

     ठीक है बुआ जी ने जो कहा वो उनकी बुद्धि के हिसाब से कहा __ पर पढ़ी लिखी समझदार बांसुरी को क्या हो गया था,मान लिया की जब बुआ और अम्मा की भेंट हुई तब वो वहाँ नही थी,नौकरी करने दूसरे शहर चली गयी थी,पर क्या उसकी मां या दीदी ने उसे इस बार में कुछ भी नही बताया,, और अगर बता दिया तो क्या दोस्ती के नाते भी एक बार बांसुरी का फर्ज नही बनता था कि हमें फोन कर ले,अम्मा के अपमान के लिये माफी मांग ले।।
    कौन सा पहाड़ टूट जाता,इसे स्वाभिमान नही अभिमान कहा जाता है।।
   ये भी मान लिया कि हो सकता है उसकी माँ और बहन ने ना बताया हो,तो क्या इतना प्रेम भी दोनो के बीच नही था कभी,कि एक बार खुद ही हाल चाल पूछ ले।।

     उसने बांसुरी से जुड़ी किस वस्तु को खुद से अलग किया था ….ना उसने अलग होने की कोशिश की और ना हो पाया।।

    उसे पढाते समय के सारे छोटे छोटे नोट्स जो बांसुरी ने अपनी लेखनी से उकेरे थे,आज भी उसकी कॉपी में वैसे के वैसे दबे पड़े थे।।
     उसे याद है बांसुरी हर दिन पढ़ाना शुरु करने के पहले पन्ने पर सबसे ऊपर ‘राम ‘ लिखा करती थी, क्या उसकी वही आदत आज राजा के जीवन का हिस्सा नही हो गयी थी।।
      उसे खुद को चाय कभी पसंद नही थी,वो तो घर पे हमेशा दूध लस्सी या छांछ ही पिया करता था,वो तो बांसुरी की संगत में चाय की ऐसी लत लगी कि आज तक नही छूटी  और ना वो छोड़ना चाहता है।।

   उसे आज भी याद है ,जब पहली बार बांसुरी को अपनी बुलेट पे बैठाए वो हनुमान जी के मन्दिर गया था,,वहाँ मन्दिर से बाहर निकलते समय एक बूढ़ी अम्मा ने कुछ प्रसाद और फूल के साथ एक रक्षा सूत्र भी उसके हाथ में रख दिया था,उस रक्षासूत्र को बांसुरी ने उसकी कलाई पर बड़े प्यार से बांध दिया था…..
      आज इतने सालों में भी रोज़ रोज़ अपने खुशबूदार साबुन से उसे सुवासित कर उसके जीर्ण शीर्ण कलेवर के बावजूद अपने हाथ में बांधे रखा है।
एक से एक महंगी ब्रांडेड कमीज़ों से होड़ लगाता वह धागा आज भी उसके हाथ में वैसे ही बंधा है जैसा वो बांध गयी थी।।

    उस शाम के बाद सिर्फ उसी के बारे में सोच सोच के कैसा भयानक राज रोग पाल लिया था उसने…..
    दस दिन के ज्वर ने बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया था,जब कुछ स्वस्थ अनुभव हुआ तो धीरे धीरे उसने अपने आसपास की दुनिया पर गौर करना शुरु किया,वापस अपना काम शुरु किया ,हालांकि मन तो किसी काम में नही लग रहा था,उस पर सदा सर्वदा बने रहने वाला गरदन का दर्द….
        पूरे छह महिनों तक उसने अपने दर्द को नज़र अंदाज कर दिया था…..
      नज़र अंदाज किया या शायद समझ ही नही पाया कि दर्द शारीरिक अधिक है या मानसिक!! उस पर उसके जाने के बाद किताबों से मोहब्बत सी हो गयी थी,,हर किताब में वही तो नज़र आने लगी थी, चाहे इतिहास हो या भूगोल,उससे इतर कुछ भी कहाँ दिखता था….
     पता नही उसे भूलने के लिये या उसकी यादों में और ज्यादा डूब जाने के लिये वो किताबों में समाता चला गया।।
   
     ऐसी ही एक दोपहर अपने कमरे में एक किताब में सर झुकाये पढ़ते में ऐसी तीव्र पीड़ा उठी की कराह के रह गया,बड़े भैय्या परेशान से उसे लिये डॉक्टर के पास भागे भागे गये थे।।
     सी टी स्कैन,एम आर आई और भी जाने कितनी जांचे हुई थी,और डॉक्टर साहब की बात ने घर भर को कितना डरा दिया था__सर्वाइकल में ब्लैक पैच दिख रहे हैं,या तो टी बी हो सकता है या फिर….. कैन्सर!!!

       अम्मा तो सुनते ही महामृत्युन्जय जाप मे बैठ गयी थी,दादी का रो रो के बुरा हाल था,भैया रात दिन एक कर मुम्बई के सबसे बड़े अस्पताल का अपोइंटमेंट जुगाड लिये थे …..
      कैसा बुरा समय था,जैसे हर तरफ सिर्फ और सिर्फ अन्धेरा ही अन्धेरा छा गया था।।
     उस समय भी एक मन कहता था कि काश बांसुरी वापस आ जाये पर दूसरा मन कहता कि अच्छा ही हुआ जो वो पहले ही चली गयी क्योंकि अगर जिंदगी इतनी छोटी ही थी तो उसके साथ गुजारने के बाद उसे छोड़ कर मरना भी कहाँ आसान होता।।

    ऐसे ही बुरे वक्त में तो लोगों की पहचान होती है, कोई ऐसा दोस्त नही बचा था,जो गले लग के ना रोया हो,वो तो बड़े भैया ने डपट के रोक दिया था वरना प्रेम प्रिंस के साथ साथ लगभग मोहल्ले के 40 लड़के खड़े थे मुम्बई तक साथ जाने के लिये।।
     इतना सब होने पर भी क्या बांसुरी के घर वालों को कोई खबर नही पहुंची थी,और अगर पहुंची भी तो क्या वो लोग इतने निर्दयी थे कि उसे कुछ बताया तक नही!! और अगर इस सब के बाद उन लोगों ने उसे सब बता दिया तो फिर वो इतनी निष्ठुर कैसे हो गयी।।

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     तीन दिन की लगातार एक के पीछे एक हो रही जांचों ने कितना थका दिया था उसे,पर बड़े भैय्या किसी पहाड़ की तरह अडिग उसे संभाले खड़े रहे थे, हर जांच की रिपोर्ट के लिये एक जगह से दूसरी जगह भागते भैया का खुद का वजन एक हफ्ते में गिर गया था,पर उनके चेहरे पे उसने कोई खीज कोई झुन्झलाहट नही देखी थी।।
       कहीं जांच में कैन्सर आ गया तो इस बात से वो खुद कांप रहा था पर भैया का चेहरा आत्मविश्वास से दमक रहा था जैसे उसे बार बार आंखो ही आंखो मे दिलासा दे रहे हों__” छोटे तुझे कुछ नही होने दूंगा, यमराज की गोद से भी तुझे संजीवनी चखा के खींच लाऊँगा।।”
     आखिर भैया के विश्वास की ही जीत हुई,रिपोर्ट्स में बोन टी बी ही निकला।।घर के लोगों ने राहत की सांस ली….
     डॉक्टर की छै महीने की दवा के साथ ही अम्मा जाने कहाँ कहाँ के मन्नत के धागे भभूत क्या क्या नही ले आयी।।
     ऐसा लगने लगा था घर का बेटा नही पूरा घर बीमार है।।
      सभी की साधना सफल हुई,छै महीने की दवा के बाद एक बार फिर सारी जांच हुई और सब कुछ सामान्य आ गया।।
   पर इस पूरे समय अन्तराल में क्या कोई भी एक दिन एक क्षण ऐसा गया जब उसने बांसुरी को याद ना किया हो,,घर वालों के अपार प्रेम के सामने वैसे बांसुरी का कोई मह्त्व नही बचता था पर पागल मन को ये छोटी सी बात सम्झानी बड़ी मुश्किल थी,वो तो अपने पर ही अड़ा था।।

     पढ़ाई और किताबों में उसे दिन रात घुसे देख युवराज भैया ने ही बैंक की तैयारी को कहा और फॉर्म भी भर डाला ।।
     पता नही बांसुरी के जाने के बाद ऐसा क्या हुआ जो वो जब कभी कोई भी इम्तहान देने बैठता ऐसा लगता जैसे बांसुरी का साया उसके ऊपर सवार है, पेपर हाथ में आते ही बांसुरी की आत्मा जैसे उसके अन्दर समा जाती और वो सारे प्रश्न बड़ी आसानी से हल कर जाता,पूरे आत्मविश्वास के साथ।।

     ये आत्मविश्वास असल मे बांसुरी का नही उसका खुद का था,उसके प्रेम का था।।

    उसे खुद को भी नही पता था की अपने आप को रात दिन किताबों में डूबा कर उसने अपने लिये प्रतियोगी परीक्षाओं को कितना आसान कर लिया था।
     ग्रेड बी निकालने के बाद उसे युवराज भैया से उसके मह्त्व का पता चला था।।

  अपनी बिमारी से उठने के बाद उसने कभी बांसुरी के बारे मे पता करने की ज़रूरत नही समझी थी,।।
  बस उसे इतना ही पता था की वो महाराष्ट्र मे कहीं रहती है।।

    पुणे के लिये निकलते समय उसे भैया ने एक बार याद भी दिलाया था__ ” राजा तुम्हारी बिमारी के समय सिद्धिविनायक मन्दिर में नारियल रख आये थे हम कि अब जब भी इधर आयेंगे उनके दर्शन को ज़रूर जायेंगे,अब जब पुणे तक जा ही रहे हो तो एक बार मुम्बई जाकर गणपति बप्पा को धन्यवाद भी बोलते आना।।”

    भैया की बात पहले भी उसके लिये पत्थर की लकीर थी पर अब जैसे उन्होनें उसे अपने बेटे की तरह संभाला था उनकी किसी बात को काटने का सवाल ही नही उठता था।।
     वैसे भी 5 दिन की कार्यशाला में दो दिन ऑडिट और तीन दिन ट्रेनिंग के थे,उसके बाद अगले दिन मुम्बई मे दर्शन कर वही से लौटने के लिये फ्लाईट की टिकट उसने करा रखी थी।।

****

   आज सिद्धार्थ के मुहँ से उसके और बांसुरी के रिश्ते के बारे में सुन अनजाने ही उसे अपने बीते साल याद हो आये थे ।।
      भले ही बांसुरी उसे छोड़ कर बहुत आगे बढ़ गयी थी पर क्या आज भी वो वहीं उसी मोड़ पर खड़ा उसका इन्तजार नही कर रहा था।।

       ये साथ गुज़ारे हुए लम्हात की दौलत
    जज़्बात की दौलत ये ख़यालात की दौलत
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी…..

यही गाना तो था जो जब कभी रेडियो पर बजता झट अम्मा आकर बन्द कर दिया करती थी,जैसे इस गाने को बन्द कर देने से राजा उन सभी लम्हों से बाहर निकल आयेगा।।

   खैर उसके नौकरी में आते ही घर वालों को लगने लगा था कि वो सामान्य होने लगा है…..
    उनका सोचना किसी हद तक सही भी था,वो सामान्य हो चला था ऐसा तो उसे खुद को तब तक लगता रहा जब तक उसने बांसुरी को देखा नही था।

  पहले दिन जब वो दरवाजा खोल के अन्दर आकर खड़ी हुई,उसे देखने के बाद क्या चाह कर भी वो उससे नजरें हटा पा रहा था…..
     उसे देखते ही सारी रंजिशे कैसे छू मंतर हो चली थी,अपना खुद का हृदय भी अदृश्य रूप से उसीके चरणों में जा बैठा था,,कितनी प्यारी लग रही थी और उतनी ही मासूम!! उसे देख लगा ही नही कि राजा की कोई भी तकलीफ उसे पता थी,क्योंकि अगर उसकी एक भी तकलीफ का पता बांसुरी को होता तो वो कभी उसे छोड़ कर नही जाती ।।

     लंच में उसे दूर अपने दोस्तों के साथ बैठा देख कैसे मन मसोस के रह गया था,कैसी जलन सी उठ रही थी हृदय मे,लग रहा था एक बार गले से लगा लूँ तो सारी जलन दूर हो जाये,ठन्डक पड़ जाये कलेजे में ।।
      पर हाय रे मन!!!होता भले अपना है पर सोचता दुनिया के बारे मे है।।
     अगर मैंने ऐसा किया तो लोग क्या सोचेंगे ,दुनिया क्या सोचेगी ।।और हम रह जाते हैं अपने विचारों के साथ अकेले,एक शून्य में!!
      जिस शून्य से हमें उबारने उसी दुनिया से कोई नही आता जिसके बारे में सोच कर हम अकेले पड़  जाते हैं।

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  सिद्धार्थ के जाते ही नायर सर से बात कर उसने बांसुरी का नाम भी लिस्ट में जोड़ दिया।।
    ट्रेनिंग शुरु हुई,,नारायण सर के लेक्चर के बाद उसे ही वैश्विक अर्थव्यवस्था और मुद्रा के स्थिरीकरण के बारे में बोलना था।।

    बोलना शुरु करने के पहले उसने अपनी वॉलेट में एक बार झांक के उसमें लगी तस्वीर को देखा और राजा से वापस आर के बन अपनी स्पीच बोलने में लग गया।।

     लगातार 3 घन्टे बोलने के बाद वो वापस अपनी सीट पर आ गया,लंच के बाद के सेशन में लोग अपनी क़्वेरीस पूछने वाले थे।।

    लंच में कैन्टीन में माला और राहुल के साथ बैठी बांसुरी  की निगाहें दरवाजे पर ही टिकी थी कि कब राजा आयेगा,,,उसकी टीम  के सद्स्य एक एक कर आते गये,पर वो नही आया।

   क्रमशः

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aparna…

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

“शादी.कॉम-25” पर एक विचार

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