जीवनसाथी -123

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  जीवनसाथी -123

     अस्पताल से लौटने के बाद भी आदित्य को जाने क्यों इस बात पर यकीन नही हो रहा था कि वो बॉडी केसर की थी।
    वो बिना किसी से कहे चुपचाप अपने कमरे में चला गया। ये पूरा दिन महल के लिए कठिनता भरा रहा था। केसर का इस तरह महल से गायब होने के बाद उसकी लाश मिलने के साथ ही “मायानगरी” मेडिकल छात्रा की आत्महत्या ने भी महल को एकबारगी हिला कर रख दिया था।
   अपने कमरे में नाराज़ युवराज  विराज को बुला कर यूनिवर्सिटी के बारे में पूछताछ करना चाहता था। उनका और राजा का देखा सपना  ये तो नही था फिर कैसे उनकी बनाई यूनिवर्सिटी में ये सब हो रहा था। युवराज यही सोच रहा था कि यूनिवर्सिटी का पूरा दारोमदार विराज के कंधों पर सौंप कर उन्होंने और राजा ने सही किया या नही। उन्होंने सभी से कह कर अभी उस लड़की की आत्महत्या वाली बात राजा तक पहुंचने नही दी थी। 
 
        वैसे भी राजा की परेशानी के और भी कई कारण थे।

   युवराज ने किसी काम से समर को बुलाया और उसके बुलावे पर समर तुरंत चला आया।
   यूनिवर्सिटी सुसाइड केस पर कुछ देर बातचीत करने के बाद वो राजा के कमरे की तरफ चला गया।

    अगले दिन की रूपरेखा उसे बताने के बाद राजा से आराम करने कहा और खुद किसी बेहद ज़रूरी काम से निकलने लगा कि राजा ने उसे रोक लिया …-” सच सच बताओ समर ! तुम कहाँ व्यस्त हो? कल चुनाव के नतीजे भी आ रहें हैं। मैं जानता हूँ तुम्हारे दिमाग में कुछ न कुछ तो चल रहा है।”
  समर ने मुस्कुरा कर ना में सिर हिलाया..-” नही हुकुम अभी इस वक्त कुछ नही चल रहा है। बस कल सुबह हमें शहर ज़रा जल्दी निकलना होगा,वही सोच कर आपको आराम करने कह रहा था।”  

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   राजा ने समर को देखा वो उसे एक बार झुक कर प्रणाम कर बाहर निकल गया। राजा भी समझता था कि उसे जिताने को समर ने रात दिन एक कर रखा था।

****

अगली सुबह राजा समर के साथ निकल गया । युवराज आदित्य और प्रेम भी उनके साथ थे लेकिन विराज उन लोगों के साथ नहीं गया।
      परिणाम पहले ही सभी लोगों को पता था राजा और उसके साथ के लोग भारी मतों के साथ विजयी हुए थे।  पक्ष और विपक्ष दोनों ही राजा को अपनी और मिलाने के लिए आतुर थे और जिसके लिए उन लोगों की बात समर से चल भी रही थी।
    विराज ने वही किया जिसका समर को डर था।  विराज अपने दो लोगों के साथ राजा को छोड़ एक दूसरी पार्टी में जाकर मिल गया और अपना विश्वास मत उस पार्टी को सौंप दिया।
     राजा वैसे तो किसी भी पार्टी के साथ हाथ नहीं मिलाना चाहता था लेकिन उनमें से एक पार्टी ऐसी थी जिसे कुछ हद तक राजा सपोर्ट कर रहा था। यह बात अच्छे से जानते हुए भी विराज ने दूसरी पार्टी के पक्ष में जाकर अपना विश्वास मत प्रस्तुत कर दिया था।
     समर के द्वारा रखी शर्त कि राजा को मुख्यमंत्री बनाया जाए तभी राजा अपने लोगों के साथ उस पार्टी को अपना बहुमत देगा इस बात पर राजा ने सहमति नहीं जताई।
   समर में राजा को समझाने की कोशिश भी की। युवराज प्रेम सभी लोग समर की तरफ से राजा को समझाने खड़े हो गए….

” तुम समझ नहीं रहे हो कुमार तुम्हारा एक ऊंचे पद पर होना बहुत जरूरी है। अगर तुम मुख्यमंत्री बनते हो तो यह पूरा राज्य तुम्हारा होगा और तब तुम इस पूरे राज्य के लिए कार्य कर सकते हो। “

” मैं आपकी बात समझता हूं भाई साहब। लेकिन इस बार अगर मेरे लोग सिर्फ इतनी ही सीटों पर विजेता रहे हैं तो मुझे सिर्फ विधायक बन कर भी खुशी है। और मैं विधायक बनके भी अपने सारे कार्यों को अंजाम दे सकूंगा आप चिंता ना करें। “

” हमें चिंता तुम्हारे मिलने वाले पद की नहीं तुम्हारी कार्यक्षमता की है। अभी सिर्फ तुम एक शहर के लिए कार्य कर सकते हो लेकिन अगर तुम मुख्यमंत्री बनते हो तो तुम्हें पूरे राज्य के लिए कार्य करने का अवसर मिलेगा। तो तुम पांच सालों के लिए इस अवसर को क्यों गंवाना चाहते हो? यह हमारी समझ से परे है।”

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” भाई साहब मैं अपनी पार्टी छोड़कर और किसी की पार्टी में नहीं मिलना चाहता हूं। मुझे मुख्यमंत्री का पद तभी मिलेगा जब मैं अपने साथियों को लेकर उस पार्टी के साथ हाथ मिला लूँ। संभावना यह भी है कि वह लोग अभी हमें यह लालच दे कि वह मुझे मुख्यमंत्री का पद देंगे लेकिन अंदर ही अंदर वह लोग क्या तय करते हैं, यह हम अभी नहीं समझ सकते। राजनीति बहुत कठिन कार्य है यहां लोग हमारे सामने कुछ नजर आते हैं लेकिन हो कुछ और जाते हैं। इसलिए मैं मुझे जो पद मिल रहा है उसी में खुश हूं ,संतुष्ट हूं । हां पांच सालों में अपनी पार्टी पर इतना कार्य अवश्य करूंगा कि मेरी पार्टी इतनी बड़ी हो जाए कि मैं अपनी जीत के बलबूते किसी और के विधायक चुराए बिना मुख्यमंत्री पद पर काम कर सकूं। “

” जैसी तुम्हारी मर्जी कुमार! वैसे हमें हमारे छोटे भाई पर बेहद गर्व है और हमें पूरा विश्वास है कि इन पांच सालों में तुम अपनी मेहनत से वह पद पा ही लोगे जिसके तुम हकदार हो। “

     भवन का कार्यक्रम शुरु हो चुका था स्पीकर के आते ही सभी अपनी अपनी जगह पर खड़े गए।
  राज दल पार्टी और जन जागरण पार्टी में कड़ी टक्कर थी। दोनों में से किसी भी पार्टी ने इतनी बड़ी जीत हासिल नहीं की थी कि उनमें से चुनकर मुख्यमंत्री का पद दिया जा सके। सारा दारोमदार राजा की पार्टी पर था।
    माननीय स्पीकर महोदय ने भी राजा की पार्टी से सवाल किया कि वह अपने जीते हुए लोगों को लेकर किस पार्टी का सहयोग करना चाहते हैं? और किस पार्टी को सहमति देते हैं?
   अब तक राजा युवराज प्रेम विराज आदि बाकी लोगों को यही लग रहा था कि समर की बात राज दल पार्टी से चल रही है।
    और सिर्फ राजा की खिलाफत करने के लिए ही विराज ने जन जागरण पार्टी के साथ हाथ मिला लिया था। राजा के कुल जीते हुए लोगों में से विराज दो लोगों को लेकर जन जागरण दल से हाथ मिला चुका था।
  स्पिकर महोदय के कहने पर कि किसी एक पार्टी से ही नेता चुना जाएगा आप सभी आपस में मिलकर यह निर्णय ले लीजिए।
   दोनों पार्टी के लोगों के आरोप प्रत्यारोप शुरू हो गए। लेकिन इसी सबके बीच कुछ ऐसा हुआ कि वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई।
  जन जागरण पार्टी के जीते हुए लोग एक-एक करके राजा की पार्टी की तरफ आने लग गए। यह देखकर राज दल पार्टी वाले भी चौक कर रह गए।
  यहां तक कि जन जागरण दल के मुखिया राजेश्वर सिंह भी इस बात से अनजान थे, कि उनके ही दल के लोग राजा की टीम से जाकर हाथ  मिला रहे हैं।
    कुछ दस मिनट ही बीते होंगे कि अब उस सभागार का सीन बदल चुका था। जहां पहले दो मुख्य दल जन जागरण पार्टी और राज दल प्रमुखता से एक दूसरे के सामने खड़े थे। और राजा की पार्टी एक छोटी सहयोगी पार्टी के रूप में नजर आ रही थी। वही जन जागरण दल के लगभग 80% लोगों के राजा की पार्टी में आकर मिल जाने से राजा की पार्टी अपने आप वहां सबसे बड़ी और प्रमुख पार्टी के रूप में नजर आने लग गई थी।
    इस बारे में राजा अजातशत्रु को स्वयं कोई खबर नहीं थी उन्होंने आश्चर्य से समर की तरफ देखा समर होंठो ही होठों में धीमे से मुस्कुराता स्पीकर महोदय की तरफ मुंह करके खड़ा हो गया। उसने उनसे कुछ कहने की आंखों ही आंखों में इजाजत मांगी।
  स्पीकर महोदय की सहमति मिलते ही समर ने अपनी बात रखनी शुरू की…-” जैसा कि आप सभी जानते हैं बहुमत मिलने वाली पार्टी ही विजेता पार्टी होती है। और फिर उस पार्टी में से चुना गया नेता मुख्यमंत्री का पद संभालता है । वैसा ही कुछ अभी इस सभा भवन में देखने को मिल रहा है। अब तक दो विजेता पार्टियों में से एक पार्टी जन जागरण दल के 80% लोग राजा अजातशत्रु सा  की पार्टी का समर्थन करने चले आए हैं। और अब इस प्रकार यहां मौजूद सभी राजनीतिक पार्टियों में राजा अजातशत्रु सिंह की पार्टी सबसे अधिक बहुमत के साथ बनी विजेता पार्टी के रूप में उभर कर आ रही है। तो अब ऐसे में स्पीकर महोदय से प्रार्थना है कि कि वह एक बार फिर अपने शब्दों में विजेता पार्टी का नाम संबोधित करें। “

   सुबह से चल रहा वहां का सारा फसाद एकाएक शांत हो गया सबके देखते ही देखते सारा सब बदल गया।
     राजा अजातशत्रु की वह छोटी सी पार्टी जिस में से कुल 11- 12 लोग ही चुनाव में खड़े हुए थे। हालांकि ये और बात थी कि निर्विवाद रूप से यह सभी खड़े हुए प्रत्याशी भारी बहुमत से विजेता हुए थे । लेकिन यह पार्टी इतनी छोटी थी कि किसी अन्य पार्टी को सपोर्ट करके ही अपना पद विधानसभा में पा सकती थी।
     पहली बार शायद इतिहास में ऐसी कोई घटना घटी थी कि एक सहयोग कर सकने वाली छोटी पार्टी में अचानक से बड़ी पार्टी के इतने सारे विजई प्रत्याशी शामिल होकर उस छोटी पार्टी को एक बड़ी पार्टी में रूपांतरित कर गए थे।
     जन जागरण दल के मुखिया के पास अब कोई चारा नहीं बचा था। गिने-चुने प्रत्याशियों के साथ वह सरकार बनाने में असमर्थ थे। और अगर वह अपने इन गिने  चुने प्रत्याशियों को लेकर राजा के खिलाफ जाकर राज दल पार्टी से हाथ भी मिला लेते, तब भी यह जाहिर था की राजा की पार्टी ही सरकार बनाती और ऐसी स्थिति में अपने दुश्मन टीम के साथ हाथ मिलाकर विपक्ष में बैठने का कोई खास लाभ नहीं था।
   जन जागरण दल के नेता राजेश्वर सिंह जी के चेहरे का रंग उड़ चुका था । लेकिन वह जानते थे कि अब उनके पास राजा को पूरी तरह से समर्थन देने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था। क्योंकि राजा से हाथ मिलाने का मतलब था सरकार बनाना और अगर सरकार बनती है तो भले ही मुख्यमंत्री का पद ना मिले लेकिन कैबिनेट में कोई एक सशक्त पद के दावेदार तो वह बन ही सकते थे। इतनी तो उम्मीद वो राजा अजातशत्रु से कर ही सकते थे। हालांकि उनके मंत्री यानी समर पर उन्हें अब रत्ती भर भी भरोसा नहीं रह गया था।
    उन्हें कितने दिनों में कभी भी समर पर जरा सा भी अविश्वास नहीं हुआ था। वह लड़का जो बार-बार उन्हें यह आश्वासन दे रहा था कि राजा अजातशत्रु अपनी टीम के साथ उन्हें ही सहयोग और समर्थन देंगे बस बदले में उन्हें राजा अजातशत्रु को मुख्यमंत्री का पद देना होगा।
    वह आज तक समर को कम उम्र का अनुभवहीन लड़का समझ कर उसके ऊपर रौब ऐंठते आ रहे थे। उसका फोन रखने के बाद अक्सर वह अपने चमचों के सामने समर का मजाक उड़ाया करते थे, कि बताओ सिर्फ दस  लोगों की जीती हुई टीम को लेकर यह लड़का अपने राजा साहब को मुख्यमंत्री बनाने के सपने देख रहा है।
    उसका इस तरह मजाक उड़ाते समय उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि यह लड़का अचानक इस सभा भवन में इस ढंग से उनका मजाक बना जाएगा। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनकी नाक के नीचे से उनके इतने सारे विधायकों को यह लड़का इस तरह ले उड़ेगा।
    सभी तरफ से निरुपाय हो उन्होंने अपने बाकी बचे प्रत्याशियों के साथ जाकर राजा अजातशत्रु से हाथ मिला लिया।


   
       भारी जोश खरोश से और भारी बहुमत से राजा अजातशत्रु की पार्टी विजेता घोषित कर दी गई। यह ऐलान होते ही कि राजा अजातशत्रु की टीम सरकार बनाएगी बाहर खड़े उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। टीवी पर अलग-अलग चैनलों में दो दिन से चलती वाद विवाद की लहर एकाएक उस समय थम कर रह गई जब एक छोटी और नई बनी राजा अजातशत्रु की पार्टी को सरकार बनाने के लिए मौका दिया गया।
     जहां एक तरफ लोग राजा अजातशत्रु की भलमनसाहत के किस्से गा रहे थे, तो वही कुछ उनके विरोध में भी बोल रहे थे कि उन्होंने अपने राजा होने का लाभ उठाते हुए खूब रुपए पैसे देकर जन जागरण दल के लोगों को अपनी तरफ मिला लिया। लोगों के बोलने से ना समर का कुछ बिगड़ना था और ना राजा अजातशत्रु का।

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     वैसे तो विजेता दल का चुनाव होने के बाद सरकार बनाने को लेकर विजेता दल को समय दिया जाता है। लेकिन यहां पर राजा अजातशत्रु के दल में इतना उत्साह था कि निर्विवाद रूप से वहां उसी समय राजा अजातशत्रु को भावी मुख्यमंत्री के पद के लिए चुन लिया गया।
      अब यह पार्टी उनकी थी आलाकमान भी वह स्वयं थे और मुख्यमंत्री के दावेदार भी।
    स्पीकर महोदय के द्वारा राजा अजातशत्रु को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करते ही पूरे सभा भवन में करतल ध्वनि गूंज उठी। राजा अजातशत्रु का प्रभाव ही ऐसा था कि विपक्षी टीम के भी सारे सदस्यों ने टेबल बजाकर राजा अजातशत्रु के मुख्यमंत्री पद को स्वीकारने के लिए सहमति जताई।
    स्पीकर महोदय द्वारा राजा अजातशत्रु को एक हफ्ते का समय दिया गया। जिसमें राजा अजातशत्रु अपनी कैबिनेट के मंत्रियों का चुनाव कर सकें। लगभग हफ्ते भर बाद की तारीख शपथ ग्रहण के लिए सुनिश्चित करने के बाद सभा स्थगित कर दी गई।

    इस सारे हो हल्ले में पूरा दिन निकल गया। सभा विसर्जित होने के बावजूद राजा अजातशत्रु से व्यक्तिगत रूप से मिलकर सभी उन्हें बधाइयां देने में लगे रहे बधाइयों का भार ग्रहण करते-करते राजा अजातशत्रु थक कर चूर होने लगे थे।
   शाम ढल चुकी थी। और उन सभी को अभी महल पहुंचने में घंटे भर का और समय लगना था। विराज एक बार फिर मुंह की खा चुका था उसने जो सोचा उसका बिल्कुल उलट हुआ था।
   उसने सोचा था वो राजा अजातशत्रु के विपरीत जाकर उस पार्टी से हाथ मिलाएगा जिससे राजा अजातशत्रु का बैर है लेकिन उसे नहीं मालूम था कि यह बैर सिर्फ उसे दिखाने के लिए ही समर ने रचा था असल में अंदरूनी तौर पर समर पहले ही जन जागरण दल के प्रत्याशियों को अपनी तरफ मिलाने का काम शुरू कर चुका था।
    समर जानता था राजनीति ऐसी दलदल है जहां पर कमल खिलाने के लिए उस दलदल में स्वयं गहरे तक उतरना पड़ता है। और उसी गहराई में उतरने के लिए उसे उस दलदल का एक हिस्सा बनना पड़ा था। विराज को धोखा देने के लिए उसने विराज की ही तरह झूठी चाल चली थी।
    वह शुरू से विराज के सामने इसी तरह दिखाता रहा जैसे वह राज दल पार्टी की तरफ है। क्योंकि समर का यह मानना था कि अगर लोगों के सामने यह बात जाती है कि महल के राजा अजातशत्रु और उनका भाई विराज एक दूसरे के खिलाफ हैं, तो उससे राजा अजातशत्रु की राजनीतिक छवि पर असर पड़ सकता है । और उस छवि को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि लोगों के सामने यह नजर आए कि विराज राजा अजातशत्रु के समर्थन में खड़ा है। इसीलिए जैसे ही विराज अपने लोगों को लेकर जन जागरण दल की तरफ गया। वहां के सारे लोग विराज और उसके लोगों को लेकर राजा अजातशत्रु की तरफ चले आए । विराज को यही लगता रहा कि वह जन जागरण दल की तरफ है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से वह राजा के ही दल का सदस्य हो गया था।
     और अब जब राजा अजातशत्रु का दल सरकार बनाने जा रहा था तब ऐसे में राजा को छोड़कर विपक्ष से हाथ मिलाने की हिम्मत विराज में नहीं थी।
    खून के घूंट पीकर आखिर विराज भी राजा को बधाई देने चला आया…-“बधाई हो अजातशत्रु! आखिर जीत ही गए तुम!”
” मेरी यह जीत मेरी अकेले की नहीं है विराज इसमें तुम और तुम्हारे साथियों का भी अभूतपूर्व योगदान है जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।”
  राजा ने आगे बढ़कर विराज को गले से लगा लिया।
युवराज ने भी विराज के कंधे थपथपाये…-” तुम दोनों भाइयों को मिलकर सरकार चलाना है। कैबिनेट में कौन सा स्थान तुम्हारे लिए सही रहेगा पहले ही तय करके कुमार को बता देना कहीं ऐसा ना हो बाद में इसी बात पर तुम दोनों में कोई कलह क्लेश हो जाए। अब हम नहीं चाहते कि हमारे भाइयों के बीच किसी भी तरह की कोई गलतफहमी हो।”

” जी भाई साहब जैसी आपकी आज्ञा।” ऐसा कहकर विराज ने युवराज के पैर छू लिये।

    सारे के सारे लोग एक साथ महल की तरफ निकल पड़े।
    लगभग 10 गाड़ियों में अपने अपने बॉडीगार्ड के साथ वो लोग महल की ओर आगे बढ़ रहे थे कि प्रेम के पास  निरमा का फोन आने लगा…-“कहाँ है आप ? अभी घर पहुंचने में और कितना वक़्त लगेगा?”
” अभी तो निकलें ही हैं। अभी तो वक्त लगेगा। हुकुम की मुख्यमंत्री की सीट पक्की हो चुकी है। बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं से भी मिलते हुए आना होगा ना। “.
” ये तो बहुत खुशी की बात है कि राजा भैया जीत गए। खैर उन्हें ही जीतना भी था। “
” तुम बताओ,फ़ोन कैसे किया? कोई ज़रूरी खबर ?”
” हम्म ! है तो ज़रूरी बात,लेकिन वापस आ जाओ फिर बताती हूँ।”
” क्या हुआ है ? कुछ परेशान लग रही हो।  “
” वही मायानगरी के केस के बारे में बताना था। जिस लड़की ने सुसाइड किया था, उसके बारे में मालूम चल चुका है। आप आ जाओ फिर बात करतें हैं। मैं सोच रही कि अभी ये बात राजा भैया तक न पहुंचे तो अच्छा है।”
” हम्म ! ठीक है।” प्रेम ने फ़ोन रख तो दिया लेकिन उसके दिमाग में वही केस चक्कर काटने लगा। अभी तक इस बात को यूनिवर्सिटी से बाहर नही जाने दिया गया था।”

  महल पहुँचने से पहले समर ने गाड़ियां पार्टी कार्यालय की तरफ मुड़वा ली थीं।  वहाँ राजा के समर्थक उसका इंतजार कर रहे थे। बाजे गाजों और ढेर सारी आतिशबाजी के साथ राजा का धूमधाम से स्वागत करने के बाद कार्यकर्ताओं ने पारी पारी से सभी का सम्मान किया और सभी अंदर चले गए…
   राजा  समर को देख मुस्कुरा उठा…-” आखिर कर के ही मानते हो अपने मन की। मैंने तो कहा था मैं इस साल विधायक बन कर भी खुश हूं। पर तुमने ठान रखी थी कि मुझे मुख्यमंत्री बना कर ही मानोगे।”
राजा की बात पर युवराज ने भी मुहर लगा दी…-“बिल्कुल सही! हमें भी जिस ढंग से समर ने बताया था हम यही सोच रहे थे कि तुम कभी मुख्यमंत्री बनने के लिए अपनी पार्टी जनजागरण पार्टी से मिलवाने के पक्ष में नही रहोगे। और तब हमने भी यही कहा था  समर से कि अपनी पार्टी का विलय करके जीत हासिल करने वालों में तुम नही हो!”
” बस आपकी इसी बात के बाद मैंने ये दूसरा तरीका अपनाया हुकुम!”
” तुम तो हो ही पैन्तरेबाज़। कोई वहाँ सोच भी नही सका होगा कि एकदम अंत में जाकर ऐसा कुछ हो जाएगा। पर जो भी हो समर तुमने जो किया वो और कोई नही कर सकता था।”
   प्रेम की इस बात के बाद राजा एक एक कर के सभी कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत रूप से मिलने के बाद वहां से वापस महल के लिए निकल गया।

******

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       प्रेम को घर पहुंचने में रात हो गयी थी। मीठी को सुला कर निरमा बाहर हॉल में बैठी उसका रास्ता देख रही थी, इसके साथ ही वो कुछ कागज़ हाथों में थामें पढ़ भी रही थी।
   प्रेम की गाड़ी आ कर रुकते ही वो दरवाज़े पर भाग कर चली आयी..
   प्रेम ने अंदर आकर निरमा को देखा..-“अरे अब तक जाग रही हो। रात के ढाई बज गए हैं। तुम्हें सो जाना चाहिए था न। फिर सुबह सुबह तुम्हें काम पर भी जाना होता है। “
   निरमा मुस्कुरा कर रसोई से पानी ले आयी। प्रेम के हाथ में गिलास थमा कर वो कहने लगी…-“आप अच्छे से जानतें हैं जब तक आप आ नही जाते मुझे नींद नही आती है। और फिर आज थोड़ा कुछ काम भी था। इसलिए काम निपटा रही थी। “
” अच्छा हाँ! तुमने फ़ोन भी तो किया था? क्या थी वो ज़रूरी बात?”
“अभी आप थक कर आएं हैं मैं सुबह बताती हूँ। आप जाइये फ्रेश हो लीजिये ,मैं खाना गरम कर लूं। “
” नही खाना नही खाऊंगा।” कहता प्रेम नहाने चला गया। उसके बाथरूम से बाहर आने पर भी निरमा किसी काम में लगी थी। उसे इतना व्यस्त देख वो भी परेशान हो उठा…-“क्या बात है निरमा? तुम अब भी सोने नही आ रही।”
उसके हाथ मे दूध का गिलास थमा कर उसने अपने कागज़ समेट लिए।।
” बताओ न क्या बात है? “
” मुझे लगता है , मेडिकल में कुछ गड़बड़ चल रही है। यूनिवर्सिटी इतनी बड़ी है कि हर वक्त सभी तरफ ध्यान देना मुश्किल होता है।  दूसरी बात अभी यूनिवर्सिटी अपने स्थापना के दौर में ही तो है, इस समय हम सबका काम वैसे भी बढ़ा हुआ है। “
” क्या हुआ , काम का तनाव ज्यादा लग रहा है क्या? “
” नही! ऐसी बात नही है। असल में मेरे नीचे और ऊपर भी कई लोग काम करते हैं तो बस वही समझ से बाहर हो रहा है कि कहां पर गड़बड़ हो रही है।
   पहले ही इतने सारे मामले होते हैं उस पर ये आत्महत्या का मामला आ गया। उस लड़की और उसके घर वालों के लिए बहुत दुख हो रहा है। मैंने उसके घरवालों को कल बुलवाया है। उनसे मिल कर उसके बारे में और भी बातें पता चलेगी की आखिर माज़रा क्या था? क्यों उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा। “
” कहीं कोई रैगिंग का चक्कर तो नही है ना? और वैसे भी ये राजा अजातशत्रु की बनाई यूनिवर्सिटी है । यहाँ तो रैगिंग होनी ही नही चाहिए। “
” आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि एक आदर्श यूनिवर्सिटी में सिर्फ सीधे सच्चे लोग पढ़ें। कोई रैगिंग न हो ,सब शराफत से साथ चलें तभी वो एक आदर्श विश्वविद्यालय होगा। ऐसा नही है प्रेम बाबू। रैगिंग भी कॉलेज की पढ़ाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए मैं रैगिंग के पूरी तरह खिलाफ भी नही हूँ। बस किसी तरह का शारीरिक उत्पीड़न न हो।
  आपको मालूम है ये बच्चे जब स्कूल की पढ़ाई पूरी कर के हमारे पास पढ़ने आते हैं तब इन्हें किसी तरह का सामाजिक व्यवहारिक ज्ञान नही होता। इनके साथ होने वाली छोटी मोटी रैगिंग इन्हें उस व्यवहारिक ज्ञान को सिखाने का माध्यम है।
   बच्चे मानसिक रूप से भी स्ट्रांग होतें है और प्रैक्टिकल नॉलेज में भी।
  पर ये लड़की वाला मुझे रैगिंग का मामला नही लग रहा। अब कल सुबह ही मालूम चलेगा कि सारा मुद्दा क्या है आखिर। आप भी स्पोर्ट्स फैकल्टी इंचार्ज हैं तो कल आपको भी मीटिंग में आना होगा।”
” जो हुकुम आपका। वैसे कितने बजे तक पहुंचना होगा। “
” लंच के बाद ही मीटिंग रखी जायेगी। मैं आपको समय मेसेज कर दूँगी। हमारी कोशिश तो यही है कि ये बात राजा भैया तक  न जाये।”
” इतनी बड़ी बात हुई है। ये उनसे छिपाई नही जा सकती। उन्हें बता देना ही सही रहेगा। “
” हम्म !”
   खिड़की पर खड़ी निरमा अपनी सोच में गुम हो गयी। रह रह कर उसकी आंखों में उस बच्ची का चेहरा और बेजान शरीर तैरता जा रहा था….
   और वो और अधिक उदासी में डूबती जा रही थी।

क्रमशः

दिल से…

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       ढेर सारी मतलब, वाकई ढेर सारी बातें हैं दिल से कहने के लिए बस समझ में नहीं आ रहा कहां से शुरू करूं ।
    
        सबसे पहले तो असत्य पर सत्य की विजय का अनूठा पर्व विजयादशमी  हम सब मना चुके हैं और आप सभी को इस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
  
      श्री राम तो मन प्राण में बसे हुए हैं और उनका नाम ही पर्याप्त है अपने पाप काटने के लिए।

    अब बात करते हैं कहानी की। जैसा कि मैंने पहले कहा था जीवनसाथी समाप्त होने के बाद भी माया नगरी के साथ चलती रहेगी लेकिन इसी बीच मायानगरी शुरू कर दी। अब मायानगरी में मैंने 5 साल का लेग दिखाया था।
   लेकिन ये लैग, जेटलैग में बदल गया ।
  खैर !!
   
   तो हुआ ये की जीवनसाथी में भी मुझे ये पांच साल का गैप दिखाना था। लेकिन कहानी मर्ज करने के चक्कर में बिना टाइम गैप के कहानी मिल गयी।
   आप लोगों को भी नज़र आ रहा है कि मैं कितनी फुर्ती से जीवनसाथी समेटने में लगी हूँ बस इसलिए गलती से मिस्टेक वाली सिचुएशन तैयार हो गयी।

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  तो साथियों अब यहाँ से दोनो कहानियों को बिना टाइम ट्रेवल किये ही हम साथ में लेते चलेंगे। दिमाग में कोई डाउट आये तो आप बेशक पूछ लीजियेगा अगर मुझे जवाब समझ आ गया तो मैं ज़रूर आपकी शंका का समाधान करूँगी।
   
  आपमें से बहुत से लोग प्रेम और निरमा की कहानी भी अलग से पढना चाहते थे। तो मैं वो भी लिखने की सोच रहीं हूँ। हालांकि अब जब तक पुरानी कहानियां नही खत्म होंगी। कोई नई कहानी नही शुरू करूँगी।
  जैसे शादी.कॉम शुरू की थी जीवनसाथी के रूप में कुछ अलग फ्लेवर और अलग कलेवर में । बस ऐसे ही प्रेम निरमा की नई कहानी भी काफी अलग सी होगी। प्लॉट वही होगा लेकिन इस बार फ्लेवर और कलेवर फिर से अलग होंगे। तो अगर पढना चाहतें है तो समीक्षा में हाँ ज़रूर लिखियेगा । अगर सौ लोगों ने भी हामी भर दी तभी इस कहानी पर काम शुरू करूँगी वरना कुछ दूसरा भी चल रहा है दिमाग में।
   
    लेखकों के साथ बड़ी मुसीबत होती है। सामने कोई बैठा आपसे अपना दुख दर्द बांट रहा होता है और आप उसमें छिपा अपना किरदार तलाश रहे होते हैं।
    वो तो अच्छी बात है कि मेरे बहुत कम रिश्तेदार मुझे पढ़ते हैं वरना मेरी जो खबर ली जाती कि क्या कहूँ।
    हालांकि अब कुछ बेहद करीबी रिश्तों में भनक लगने लगी है।
   अभी कुछ दिन पहले ही मेरी एक जेठानी सा का फ़ोन आया। कुछ इधर उधर की बातों के बाद उन्होंने मुझे पूछा कि ” देवरानी जी! तुम डॉक्टरी के अलावा भी कुछ करती हो क्या?” मैंने कहा – नही तो। तब उन्होंने वापस पूछा -“हमारा मतलब है कुछ कहानियां भी लिखती हो क्या? “
मन ही मन सोचा – “गए बेटा । पकड़ी गई। मैंने कहा हाँ जीजी लिखती हूँ। बस ऐसे ही थोड़ा बहुत।”
उन्होंने कहा-“हम सारी बहने प्रतिलीपी पर हैं। मेरी दीदी शायद तुम्हें ही पढ़ती हैं। तुमने जीवनसाथी के नाम से कुछ लिखा है क्या? “
मैंने कहा -“हाँ दी ! लिखा है बल्कि अब भी लिख रहीं हूँ।”
उन्होंने तुरंत कहा-“यार ये तो बता दो की बाँसुरी कैसे इतनी केयरलेस हो गयी। उसने अपना फोन कहाँ गंवा दिया। तो मतलब बाँसुरी और राजा वाली अपर्णा तुम ही हो। “
मैंने कहा – ” हाँ दी ! मैं ही हूँ।” और दिल में आ रहा था, हे भगवान मैंने कुछ ऐसा वैसा न लिख दिया हो कि अपनी प्यारी जेठानी से नज़रे न मिला पाऊं।
  लेकिन उसके बाद उन्होंने फ़ोन पर इतना सारा प्यार बरसाया की क्या कहूँ।
” अब तो भई जल्दी ही तुमसे मिलने आएंगे। अपनी देवरानी से नही राजा और बांसुरी वाली अपर्णा से।”
   मैंने भी सहर्ष स्वीकृति दे दी। बातें तो फिर ढ़ेर सारी हुई, लेकिन सब बताने बैठी तो आप बोर हो जाएंगे जैसे अभी हो रहे।
   वैसे इतना तो बनता है।

      अभी पुरानी कहानियों को खत्म करने के बाद ही कुछ नया लिखूंगी प्रतिलीपी पर।

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   बाकी किस्से शुरू हो जाएंगे दीवाली के बाद से।
दो नए रूपों में…. वापसी और … एक सरप्राइज!

आजकल कुछ ज्यादा ही पहेलियों में बात करने लगीं हूँ शायद। पर सच कहूं तो मुझे खुद कोई और पूछे तो पहेलियों के जवाब मालूम नही होते।
 
   मेरे दिमाग के घोड़े दौड़ते कम हैं, ज्यादातर एक ही जगह खड़े खड़े सोचते रहतें हैं, मेरी तरह ।
  और दौड़ना भूल जातें हैं।

  आज तो ढ़ेर गपशप हो गयी। अब जल्दी ही मिलतें हैं बाकी कहानियों के साथ।
  पढ़तें रहिये, खुश रहिये…

मुझे पढ़ने और सराहने के लिए हॄदयतल से आभार आप सभी का।
  आपकी मुहब्बत है कि लिख रही हूँ।।

aparna..

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

59 विचार “जीवनसाथी -123” पर

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