समिधा -33

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  समिधा – 33

       वरुण अपनी तैयारियों के लिए खाना निपटने के साथ ही भगिनी आश्रम की तरफ निकल गया।
  आश्रम की महिलाएं खाने बैठीं थी । वहाँ की वरिष्ठ महिलाओं की खाने की पारी थी। पारो और बाकी कम उम्र की लड़कियां और महिलाएं खाना परोस रहीं थीं।
  भोजन कक्ष के बाहर ही एक छोटा कमरा और था, जहाँ वरुण पहुंच कर बैठ गया था। वो उस आश्रम की देखभाल करने वाली पद्मजा दीदी का इंतज़ार करने लगा।
  वो जहाँ बैठा था वहाँ से लगी खिड़की से वो बड़े आराम से अंदर देख सकता था पर मारे संकोच के वो अंदर नही देख रहा था।
   भोजन कक्ष में उसी समय अंदर से पारोमिता एक साथ चार पांच गिलास में पानी ले आयी। पद्मजा दीदी के इशारे पर एक गिलास पानी बाहर बैठे वरुण के लिए भी वो लेती गयी।
   उसने वरुण की तरफ ध्यान से देखे बिना ही उसके सामने गिलास बढ़ा दिया। वरुण ने एक नज़र पारो को देख नज़रें नीचे की और गिलास की तरफ हाथ बढ़ा दिया।

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  पारो की कंपकपाती उंगलियों के ठीक ऊपर वरुण की तपती उंगलियां छू गयीं।
    दोनों के ही शरीर में उन उंगलियों से गुज़रती तरंगे बहती चली गईं।
  घबराहट में पारो के हाथ से गिलास छूट गया। और वो हड़बड़ाती  सी अंदर चली गयी। गिलास की आवाज़ पर खिड़की से कई जोड़ी आंखें उन दोनों की तरफ उठ गई होंगी यही सोच वरुण ने शर्मिंदा होकर गिलास उठाया और खिड़की पर रखने को हुआ कि उसकी नज़र अंदर कक्ष में बैठी औरतों पर चली गयी। कुछ दो एक  उसे अब भी देख रहीं थी बाकियों का ध्यान अपनी थालियों पर ही था।
   वरुण की न चाहते हुए भी नज़र उनकी थालियों पर चली गई। और उससे कुछ देर पहले का अपना खाया भोजन याद आ गया।
  मंदिर में वैसे भी तामसिक भोजन तो नहीं बनता था लेकिन मंदिर के आचार्य गुरुवर उनके लिए बनाए जाने वाले भोजन में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि उनकी थाली हर तरह के पोषक आहार से बनी हो।
   वरुण की थाली में  मिलने वाली भोज्य सामग्री यहां अंदर आश्रम की महिलाओं की थाली में से गायब थी।  वह कुछ क्षणों के लिए चौक गया क्योंकि उसे यह मालूम था कि आश्रम की यही महिलाएं एक साथ मिलजुल कर पूरे आश्रम का खाना तैयार करती हैं। तो फिर खाने में यह भेदभाव कैसे? वहां बैठी महिलाओं में  किसी की भी थाली संपूर्ण नहीं थी बल्कि सभी के थाली में जरा जरा सी खिचड़ी ही परोसी हुई नजर आ रही थी।
    वह अभी इस भेदभाव के बारे में सोच ही रहा था कि अंदर से पद्मजा दीदी बाहर निकल आई….-” जय श्री कृष्णा वरुण जी आइए बैठिए। “

” जय श्री कृष्णा दीदी कैसी हैं आप।”
” हम ठीक हैं आप बताइए हम लोगों के लायक क्या सेवा है? हमें भी जानकारी मिल चुकी है के आश्रम के कार्यक्रम के लिए श्री प्रबोध आचार्य जी का आना तय हो चुका है।”
” जी दीदी आपने सही कहा! मुझे भगिनी आश्रम के साज संभाल का काम दिया गया है। आप सभी के साथ मिलकर मुझे पूरे आश्रम परिसर में फूलों की सज्जा देखनी है। इसके साथ ही गोपाल जी के लिए भी पुष्प वस्त्रों का निर्माण करना है। यह काम भी आप सभी के सुपुर्द किया गया है।
   हवन की तैयारी के लिए भी आप में से कुछ दो चार महिलाओं की आवश्यकता होगी। क्योंकि लगभग 21 हवन वेदियाँ तैयार होंगी, जिनके चारों तरफ अल्पना बनानी होगी। इसके लिए आप अपने आश्रम में से चुनकर कुछ महिलाओं का एक समूह तैयार कर दीजिएगा। मेरा इस सब में यही कार्य है कि आप लोगों को अपने कामों के लिए जितनी वस्तुओं की आवश्यकता होगी, आप मुझे एक लिस्ट तैयार करके दे दीजिएगा। मैं सारी सामग्री आप लोगों तक पहुंचा दूंगा। इसके साथ ही बीच बीच में आकर मैं कार्य की रूपरेखा देखता रहूंगा वैसे अब हमारे पास सिर्फ दो दिन ही बचे हैं कल और परसो दो दिन में यह सारी तैयारियां हो जाए तो बहुत अच्छा है। “

” जी आप सही कह रहे हैं वरुण जी वैसे हमारे आश्रम में जितनी महिलाएं हैं सभी अल्पना बनाने में फूलों के वस्त्र बनाने में पारंगत हैं तो हम चुन कर दो अलग-अलग समूह तैयार कर देते हैं। जिससे सारे काम सही समय पर निपट जाए हम अभी सबका भोजन निपटते ही सब से बात करके किन वस्तुओं की आवश्यकता होगी इसकी सूची तैयार करके आपके कक्ष में भिजवा देंगे। “

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” नहीं ! नहीं ! आप यहां से किसे हमारे कक्ष में भेजेंगी। यहां तो सभी महिलाएं हैं। आप शाम तक तैयार करके रखें। आरती के बाद मैं खुद आकर आप से ले लूंगा। “

  पद्मजा दीदी ने मुस्कुराकर वरुण के सामने हाथ जोड़ दिये। उनकी मुस्कान के बावजूद वरुण नहीं मुस्कुरा पाया उसने एक नजर खिड़की से अंदर की ओर देखा। अब आश्रम की बाकी बची महिलाएं भोजन के लिए बैठ चुकी थी।
   यह इत्तेफाक था या ईश्वर की इच्छा कि वह जहां बैठा था वहां से ठीक सामने उसे पारो बैठी नजर आ रही थी। उसकी थाली में तो और भी कम खिचड़ी थी। मुश्किल से दो से तीन  निवालों का भोजन सामने रखे वह धीरे-धीरे एक-एक दाना चुग रही थी। जैसे अपने भोजन को निगलने से पहले वह उससे माफी मांग रही हो।
    वरुण का ह्रदय कसमसा कर रह गया उसने पद्मजा दीदी की तरफ देखा…-” अगर आप बुरा ना माने तो क्या मैं आपसे कुछ सवाल पूछ सकता हूं। “
” जी बिल्कुल पूछिए। “
” सारे मंदिर परिसर में यहां रहने वाले सभी लोगों का भोजन आप लोग ही तो बनाते हैं ना। “
” हां हम ही लोग यह भोजन बनाते हैं।
” तो क्या आश्रम में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग भोजन तैयार होता है। “
   पद्मजा दीदी एकाएक यह सवाल सुनकर चौन्क गयी क्योंकि आज तक यहां के किसी अन्य पुरुष ने उन लोगों के खाने के बारे में कभी कोई सवाल नही किया था।
” आप ऐसा सवाल क्यों पूछ रहे हैं वरुण जी?”
” मैं भी नहीं पूछता अगर मैं अपनी आंखों के सामने ऐसा होते नहीं देखता। मैं अभी कुछ देर पहले ही भोजन करके आया हूं और मेरी थाली मैं जो सब था वह यहां नहीं है। “
” आप इस सब में क्यों पड़ रहे हैं। जाने दीजिए यह सब बातें आपके विचार करने योग्य नहीं है!  बल्कि हम तो यह कहेंगे कि भगिनी आश्रम ही आप लोगों के विचार करने योग्य नहीं है! अब जैसा जीवन मिला है वैसा यहां की औरतें काट ही लेंगी।”
” आप उसी जीवन को काटने की बातें कह रही हैं जिस जीवन को उस मुरलीधर ने आपको दिया है।  आपका जीवन उनकी भेंट है जिसे आप इस तरह गंवा रही हैं। और कह रही हैं कि हम किसी भी तरीके से जीवन काट लेंगे। “
” यह बड़ी-बड़ी बातें यहां की इन मूर्ख औरतों की समझ से परे है वरुण जी। “
” यहां कोई मूर्ख नहीं है दीदी और ना ही यह बातें किसी के समझ से परे हैं । यहां सभी का जीवन अनमोल है। क्योंकि हम सब उस मुरलीधर के चरणों में पड़े हैं। हमारे जीवन का रचयिता वही है और जब तक उसने हमारी सांसे लिखी हैं हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उन सांसो का सदुपयोग करें। अब बताइये की ये भेदभाव क्यों ?”
” किसी ने ये भेदभाव नही किया है वरुण जी। हम महिलाओं को खुद के लिए यही खिचड़ी रुचिकर लगती है, इसलिए हम यही बना लेतें हैं। समय भी कम लगता है।”
” तो हम सबके लिए भी खिचड़ी बनाया कीजिए। हमारे लिए तो रोटियां भी बन रही हैं सब्जी बन रही है दाल है चावल भी बनाए जा रहे हैं इतना सारा क्यों? और इन सब के बावजूद हमें सलाद मिठाई और दही भी दी जाती है। जबकि आप लोग सिर्फ खिचड़ी खा रही हैं उसके साथ  आपको न घी परोसा गया  और ना ही दही। यह तो गलत है ना दीदी। “
” वरुण जी ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई भी हमें रोक रहा है इन सब चीजों को खाने से।
  हम लोगों का ही जी नहीं करता इतना सब खाने का। “
” चलिए अच्छी बात है ।लेकिन हो सकता है यह आपका व्यक्तिगत विचार हो, क्या आपने यहां उपस्थित बाकी लोगों से इस बारे में पूछताछ की है कि क्या वह सारी महिलाएं भी सिर्फ खिचड़ी खा कर गुजारा करने को तैयार है। “
” जब घर परिवार पूरा समाज हम से मुंह मोड़ कर खड़ा हो जाता है ना तो एक पेड़ की छांव भी हमें बहुत ममतामई लगने लगती है । फिर यहाँ इस आश्रम में तो हमें रहने को एक छत दी हुई है। खाने को दो वक्त का भोजन मिल ही रहा है। तो क्या हम लोग अपनी तरफ से आश्रम का खर्चा बचाने के लिए इतना भी नहीं कर सकते कि जितना हो सके कम खाएं। हम किसी को भी अनशन करने नहीं कहते। लेकिन हमारा यह कहना है कि शरीर को चलाने के लिए जितना भोजन आवश्यक है उससे अधिक खाकर हमारे शरीर में सिर्फ अनावश्यक चर्बी ही जमेगी आलस्य ही पनपेगा।  तो इसलिए हम सब के लिए यही अच्छा है उचित मात्रा में उचित आहार का ही सेवन करें। “
  वरुण समझ गया था कि बात कुछ और थी और पद्मजा दीदी उसे नहीं बता रही थी। अंदर से किसी के बुलाने पर पद्मजा उठकर अंदर चली गई उसके जाते ही एक बुजुर्ग सी महिला रसोई की तरफ की दीवार की ओर से निकलकर वरुण के सामने चली गई…
” वह कभी सच नहीं बताएगी । वो ही क्या इस आश्रम की कोई भी महिला तुम्हें पूरा सच नहीं बताएगी। “
” लेकिन क्यों ऐसी क्या बात है जो मुझसे छुपाई जा रही है। “
” देख बेटा मैं बहुत बुजुर्ग हो चुकी हूं। अब जाने कितने दिन का मेरा जीवन शेष है। लेकिन इस आश्रम में बहुत समय से हूं। और यहां का सारा कारोबार देखती और समझती हूँ।
   यह लोग कहते हैं औरत का मन बहुत चंचल होता है।  पति के बिना रहती औरत जैसे तैसे करके खुद के मन को संभालने की कोशिश करती है अब ऐसे में अगर वह गरिष्ठ और तामसिक भोजन करेगी तो उसका मन चंचल होकर इधर-उधर भागने को करेगा और ऐसे में कुछ ऊंच-नीच हो गई तो आश्रम का नाम खराब होगा इसीलिए…
    जबकि सच्चाई इन बातों से बहुत अलग है। क्या नहीं होता यहाँ? जितने गहरे में जाओगे उतनी सच्चाइयां जानते जाओगे। अभी तो तुम्हें कुछ भी नही पता…”
” काकी आप वहाँ क्या कर रही हैं?” भीतर से पद्मजा की तीखी पुकार सुन वो वृद्धा कुछ बड़बड़ाती हुई वापस रसोई में घुस गई।
    वरुण उस वृद्धा से इतनी कड़वी सच्चाई सुनकर कांप उठा। यह कैसा न्याय था समाज का भी और आश्रम का भी।  यह लोग इन महिलाओं को क्यों इतना अलग समझते हैं। क्या इन महिलाओं के शरीर में वही रुधिर नहीं बहता जो बाकियों के शरीर में बहता है।
   और बाकी जो भी हो लेकिन अभी आने वाले श्री प्रबोधानन्द से वह इस बारे में बात करके रहेगा। लेकिन ऐसे सीधी प्रबोधानन्द से बात करने पर कहीं उदयचार्य जी नाराज ना हो जाए। तो इसलिए एक बार उसे उनके कान में भी यह बात डालनी पड़ेगी कि आश्रम में सभी के लिए एक समान व्यवस्था होनी चाहिए।
   जब यहां इस आश्रम में किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव, रंग से जुड़ा भेदभाव, अमीरी गरीबी का भेदभाव नहीं देखा जा रहा तो महिला और पुरुष के बीच का भेदभाव क्यों इतना व्यापक रूप से पांव फैलाए बैठा है।
    वहीं महिलाएं जो आश्रम के पुरुषों के लिए इतनी तरह का भोजन बनाती हैं। अपने लिए क्यों फिर खिचड़ी बना लेती हैं। वो यही सोचते हुए आश्रम की तरफ की रसोई के सामने से होकर निकल रहा था तब उसकी नजर भीतर की तरफ पड़ी …. वहाँ आचार्यों के भोजन हो जाने के बाद रसोई में स्थित बड़े-बड़े बर्तनों में जो भोजन बना बचा रह गया  था। उसी भोजन को आपस में मिलाकर खिचड़ी का रूप दे दिया गया था। यानी असल बात तो यह थी कि आश्रम में मौजूद पुरुषों के भोजन कर लेने के बाद जो भी भोजन बच जाता उसमें कमीबेसी को सही करने के लिए वहां की वरिष्ठ महिलाएं उस सारे भोजन को एक साथ मिलाकर गर्म करके महिला आश्रम की औरतों को परोस दिया करती थी।
   वरुण की आंखें छलकने को थी, लेकिन उसने अपने आप को मजबूत कर लिया। पता नहीं केदारनाथ से लौटने के बाद उसके साथ क्या हुआ था, कि जब पाए तब उसकी आंखें छलक उठने को तैयार हो जाती थी। वह अपनी अति भावुकता पर शर्मिंदगी सी महसूस करने लगा था।
 
        वो तेज़ कदमों से आगे बढ़ गया। सामने से आते प्रशांत ने उसे असमंजस से देखा..-“क्या हुआ कुछ परेशान लग रहे हो?”
वरुण कुछ भी कहने की हालत में नही था , वो चुपचाप आगे बढ़ गया।
   प्रशांत किसी काम से दूसरी तरफ जा रहा था,वो वरुण के चेहरे का क्रोध देख उसके पीछे ही हो लिया। वरुण सीधे उदयाचार्य जी के कमरे में पहुंच गया लेकिन वो इस समय किसी बहुत ज़रूरी काम से कहीं बाहर गए हुए थे।
   कुछ देर वहीं बैठा वरुण कुछ सोचता रहा फिर वाटिका की तरफ निकल गया।

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***
  
   अगला दिन बीत गया, और तैयारियों में डूबा आश्रम बाकी सारी बातें बिसरा गया। यही हाल वरुण का हुआ। उस दिन भगिनी आश्रम का भोजन देख
जितनी तेजी से उसका खून जला था, उस खून का उबाल उतनी ही तेज़ी से अगले दिन बैठ भी गया। उसके ऊपर आश्रम की जिम्मेदारियां भी तो थी। उन्हीं सब व्यस्तताओं में वो इस बात को भूल कर रह गया।

   कार्यक्रम के ठीक एक दिन पहले सभी अतिथियों का आना शुरू हो चुका था। स्वामी प्रबोधानन्द जी भी अपने निर्धारित समय पर पहुंच गए।
   स्वामी जी को स्टेशन से आश्रम लेकर आने के लिए आश्रम की सबसे महंगी गाड़ी भेज दी गयी थी।
   प्रबोधानन्द जी के आसन के सामने ही कलश स्थापना होनी थी।
    वाटिका में पीछे बने सरोवर से शुद्ध जल के कलश मंगवाए गए थे।
सीधी सतर पंक्तियों में महिलाएं सिर पर जल से भरा कलश लिए हवन स्थल पर रखने जा रही थीं।
नियमों के अनुसार उन सभी को आकंठ सरोवर में डूब कर ही अपना कलश भरना था। और उन्हीं भीगे वस्त्रों में कलश स्थापित कर वो लोग अपने कमरों में जा सकती थीं।
      महिलाएं कलश रख कर स्वामी प्रबोधानन्द को प्रणाम कर एक तरफ खड़ी होती जा रहीं थीं। पारोमिता भी अपना कलश सिर पर उठाए धीमे कदमों से आगे बढ़ती गयी।
       जल से भीगे श्वेत वस्त्रों में सिर पर पानी का कलश रखे वो स्वर्ग से उतरी मेनका सी लग रही थी। प्रबोधानन्द वैसे तो हवन कुंड की बाकी तैयारियों को देख रहे थे लेकिन जैसे ही उनकी नज़रे पारो पर पड़ी वो चाह कर भी उस पर से अपनी आंखें नही हटा सके।
   पारो के कदमों के साथ साथ उनके हृदय का कंपन भी बढ़ता जा रहा था। माथे पर छलक आई बूंदों को उन्होंने पोंछ लिया।
   उसने ठीक उनके सामने आकर उन्हें प्रणाम किया तब जाकर उन्हें चेत आया और हाथ उठाकर उसे आशीर्वाद दे वो खुद पर लज्जित से दूसरी तरफ देखने लगे।
    पारो धीमे कदमों से अपनी साथियों की तरफ बढ़ गयी। और वहाँ से वो सारी साध्वियां आश्रम की तरफ बढ़ चलीं।
     वहीं खड़े वरुण की कनपटी पर जैसे कोई हथौड़े चलाने लगा था। उसके मन में आ रहा था कि वो उसी वक्त प्रबोधानन्द का गला दबा दे।
   उसकी कामातुर दृष्टि वरुण की आंखों से बच नही पायी थी।
   और उसे ये भी समझ आ गया था कि अब उसे यहाँ आश्रम में हर समय पारो की परछाई बन उसके आसपास रहना होगा।
     आश्रम में धूप गुग्गुल की खुशबू के बीच मंत्रोच्चार प्रारम्भ हो चुका था लेकिन इस सब के बीच अपने अशांत मन को साधने वरुण गोपाल जी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े खड़ा पारो के लिए खुशियों का वरदान मांग रहा था……

क्रमशः

   दिल से ….

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    समिधा सिर्फ एक कहानी है। मैंने समिधा शुरू करने से पहले ही कहा था कि एक अजीबोग़रीब प्रेम कहानी दिल में कुलबुला रही है। और मुझे यकीन नही था कि ये कहानी आप लोगों को पसन्द आएगी।
      
    आजकल लोगों का जीवन व्यस्त से व्यस्ततम होता जा रहा है और साथ ही लोगों की पसन्द भी बदलती जा रही है। थ्रिल इस शब्द ने हमारे समाज में तेज़ी से पांव पसारें हैं।
   और मैं जानती हूँ मेरी कहानियों में थ्रिल नही होता।

  समिधा  वैसे तो बिल्कुल ही सादी सी कहानी है लेकिन आगे कई ऐसे मोड़ आएंगे जिन्हें लिखने पर शायद आप लोग मेरे खिलाफ भी हो सकतें हैं।
   मेरी ये कहानी किसी भी धर्म विशेष, किसी आश्रम विशेष या किसी संत महात्मा का विरोध नही करती। कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। अगर आश्रम का कोई काला हिस्सा मैं लिखतीं हूँ तो ये पूरी तरह मेरी कल्पना की उपज है उसे किसी भी मंदिर ट्रस्ट आदि से जोड़ कर न देखें।
    जहाँ ढेर सारी अच्छाई हैं वहाँ कुछ बुराई भी पनप सकती है।
     इतना सारा मैं इस लिए समझा रही हूँ क्योंकि कई बार आप पाठक पढ़ते हुए नाराज़ भी हो जातें हैं। और आपकी नाराज़गी झेलने की हिम्मत नही है रे बाबा मुझमें।
     
    वैसे मैं हमेशा हल्की फुल्की कहानियां ही लिखती हूँ पता नही इस बार इतना भारी विषय कैसे रास आ गया लिखने को।

   चलिए मेरी पाती बड़ी होती जा रही है। अब लिखना बंद करती हूँ। जल्दी मिलेंगे कहानी के अगले भाग के साथ।
  तब तक पढ़ते रहिये….

(कृष्ण मंदिर या कृष्ण आश्रम का मैं उल्लेख कर रहीं हूँ लेकिन प्लीज़ इसे इस्कॉन ट्रस्ट से जोड़ कर ना देखें ।)

  aparna ….

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

32 विचार “समिधा -33” पर

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