जीवनसाथी-124

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  जीवनसाथी-124

       राजा साहब के कार्यालय में मीटिंग पर मीटिंग चल रही थी अब लगभग उनके मंत्रिमंडल का गठन हो चुका था और शपथ ग्रहण का समय भी आ गया था।

     अगला दिन बहुत महत्वपूर्ण था राजा के लिए। राजनीति में उसकी पारी की शुरुवात होने जा रही थी। आज तक वो अपने महल और रियासत की साज सम्भाल करता आया था लेकिन अब वो सरकार बनाने जा रहा था। अब वो पूरे एक राज्य को संभालने जा रहा था।
    अपने काम समेट कर वो कमरे में पहुंचा तब बाँसुरी बच्चे को गोद में लिए इधर से उधर टहलती उसे सुलाने की कोशिश कर रही थी।
   बाँसुरी ने राजा को देखा और मुस्कुरा उठी…-“आजकल तो राजा साहब के दर्शन मिलने कठिन हो गए हैं। “
  राजा मुस्कुरा कर हाथ मुहँ धोने चला गया… उसके बाहर आते ही बाँसुरी एक बार फिर शुरू हो गयी…
” कल रात आप सोने भी नही आये? कहाँ रह गए थे?

राजा ने अपने बाल पोंछते हुए उसे देखा और फिर बच्चे को गोद में ले लिया…-” कल काम बहुत ज्यादा था। सारा काम निपटाने के बाद आदित्य, रेखा और केसर के पिता से मिलने की ज़िद लिए भी बैठा था तो रात में सारा काम में निपटने के बाद समर और आदित्य के साथ रेखा के पिता से मिलने चला गया था। हालांकि वह खुद भी यही सोच रहे थे कि वह एक-दो दिन में महल आएंगे, लेकिन हम लोगों के जाने से वो खुश नजर आए। वह अपने घर वापस लौटना चाहते थे उन्होंने अपने मन की बात हम लोगों के सामने ही कहीं तो आदित्य ने उसी समय कह दिया कि चले हम आप को छोड़ देते हैं। उसके बाद उन्हें लेकर उनके घर तक गए। वहां पर नौकरों से कहकर सब कुछ ठीक-ठाक करवाया फिर वहां से वापस लौटते में हम लोगों को बहुत देर हो गई थी। रात में दो बजे फिर मैंने सोचा तुम्हें आधी नींद से जगाना सही नही होगा इसलिए ऑफिस में ही सो गया।”

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” हम्म ! मैं परेशान न हो जाऊं इसलिए ऑफिस में ही सो गए! मैं तो इस बात से और ज़्यादा परेशान हो गयी। रात में उठ उठ कर आपको रिंग करती रही। “

राजा को याद आया उसका फ़ोन बंद हो चुका था..-” ओह्ह मेरा तो फ़ोन ही बंद पड़ा था।”
” जी हाँ! अब आप मुझे अपना फ़ोन असिस्टेंट ही बना लीजिए। आपके कॉल्स देखा और संभाला करूँगी। “
” अभी तो बस मुझे संभाल लीजिये हुकुम। उतना ही काफी है।”
  राजा ने सो चुके शौर्य को बिस्तर पर रखा और बाँसुरी को बाहों में भर लिया। दोनों खिड़की पर खड़े बाहर निकलते चांद को देख रहे थे। बाँसुरी की कुछ उलझी सी लटें उसके माथे पर इधर उधर हवा से उड़ कर उसे परेशान कर रहीं थीं। राजा ने उन्हें उंगली से उसके कान के पीछे समेट दिया… उसकी उंगलियां बाँसुरी की गर्दन पर फिसलने लगी कि उनका नन्हा राजकुमार नींद में कोई सपना देख डर के मारे चिल्ला कर रोने लगा, और बाँसुरी राजा को एक तरफ कर बच्चे के पास भाग गई…
” आजकल हमारी हुकुम के पास हमारे लिए वक्त नही है।”
“हाँ जैसे आपके पास ढेर सारा वक्त है।”
” नन्हे नवाब नही चाहते कि प्रोपर्टी में उनका कोई हिस्सेदार आ जाये। बस जैसे ही पापा मम्मी पास आये की बुक्का फाड़ दहाड़ लगातें हैं।”
  राजा की बात सुन बाँसुरी ने मुस्कुरा कर शौर्य को गोद में लिया और वापस उसे सुलाने की कोशिश में लग गयी…-“साहब सो मत जाना। मैं बस इसे सुला कर अभी आयीं।”
   बाँसुरी ने इधर उधर टहलते हुए आखिर बच्चे को सुला ही लिया।
   वो उसे बिस्तर पर रखने आई की देखा राजा गहरी नींद में डूबा किसी मासूम बच्चे सा नज़र आ रहा था। उसका माथा चूम कर वो कमरे की बत्तियां बुझाने चली गयी।

****

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          अगली सुबह राजा का पूरा दिन व्यस्त गुजरना था।
   शपथ ग्रहण होना था। इसी से वो तैयार होकर सुबह ज़रा जल्दी ही निकल रहा था। उसके साथ उसके मंडल के बाकी सदस्य और समर प्रेम भी थे। युवराज और आदित्य भी उनके साथ हो लिए थे।
   विराज के पास भी और कोई चारा नही बचा था।  रूपा ने ही राजा को टीका लगाया,बाँसुरी उसके पास खड़ी मुस्कुरा रही थी।
  रेखा भी वहीं थी…-“तुमसे एक बात पूँछे बाँसुरी?”
” हाँ पूछो रेखा।”
” राजा साहब को तुमने बताया क्यों नही कि आज तुम्हे शौर्य को वैक्सीन लगवानी है? क्या अकेले ही वैक्सीन लगवाने जाओगी। “
“वैसे जाना क्यों पड़ेगा भला ? तुम्हारे बुलाने पर डॉक्टर यहीं आ जाएंगे। “रूपा ने रेखा की बात पर बाँसुरी की तरफ देख कर कहा। अब तक राजा और उसकी सेना वहाँ से निकल चुकी थी।
  ” जी भाभी साहब ! पिया से बात कर लुंगी, वो भेज देगी किसी को। और जहाँ तक साहब को रोकने की बात है रेखा, वो मैंने जानबूझ कर नही किया।
  हम औरतों से यहीं तो गलती हो जाती है। जब हमारे पति हमसे और हमारे बच्चे से अधिक समय अपने काम को देने लगतें हैं तब हम उनकी मजबूरी समझे बिना ज़बरदस्ती उन पर अपने काम लादते चले जाते हैं! बस फ़िज़ूल की अपनी महत्ता दिखाने! और ऐसे में होता कुछ नही बस सामने वाले का तनाव बढ़ता है । हम हमेशा अपने आप को महत्वपूर्ण दिखाने के लिए पतिदेव के कामों को समझे बिना उन पर अपना बोझ भी ला देते हैं और मुझे यह हम औरतों की बेवकूफी लगती है।
   मुझे तो शुरु से पता था कि आज शपथ ग्रहण है । इसलिए साहब के पास वक्त नहीं होगा इत्तेफाक से आज ही शौर्य की वैक्सीनेशन की डेट भी है। अब अगर मैं इस वक्त साहब से यह उम्मीद करूं कि पहले वह मेरे साथ बच्चे को वैक्सीनेट करवाएं और उसके बाद सदन में जाएं तो यह तो गलत उम्मीद है ना।
मैं यह भी जानती हूं कि अगर मैं साहब को बता देती तो उनका मन शपथ ग्रहण में नहीं लगता। और बार-बार उनका मन उनके लाडले की तरफ लगा रहता।  ऐसे में परेशान होकर वह मुझे फोन करते और अपना खुद का वक्त भी बर्बाद करते , इसीलिए मैंने उनसे कुछ कहा ही नहीं। और फिर मेरे साथ रूपा भाभी साहब है, तुम हो, फिर मुझे किस बात की चिंता?”

” तुम्हारी बातें सुनकर हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है बांसुरी! हमने पति पत्नी के रिश्ते को कभी इस नजरिए से देखा ही नहीं। हमने हमेशा यही सोचा कि हमारा सबसे पहला हक है विराज सा पर और बाकियों का हमारे बाद। लेकिन तुमने अपने राजा साहब पर सारी दुनिया को हक जताने दिया, और खुद हर वक्त उनके किनारे खड़ी रही, उनका सहारा बनकर। और इसीलिए तो आज इतनी सारी जिम्मेदारियां होने के बाद भी राजा साहब सब कुछ मुस्कुराते हुए निभा ले जाते हैं।
      तुम दोनों सच्चे अर्थों में “जीवन साथी” हो ! ऐसे साथी जिनके जुड़ने से एक दूसरे का जीवन संवर गया।”

” धन्यवाद रेखा।  ऐसा तुम्हें लगता है कि हम दोनों बहुत परफेक्ट है। पर ऐसा नहीं है । हम दोनों में भी कमियां हैं , और थोड़ी  नहीं बहुत सारी हैं। लेकिन हमने एक दूसरे को एक दूसरे की कमियों के साथ स्वीकार किया है। और मजे की बात यह है कि हम एक दूसरे की कमियों को सुधारने की कोई कोशिश नहीं करते। क्योंकि जब हम सामने वाले की कमियों को सुधारने की कोशिश करने लगते हैं, तो हम उसे बदलने की कोशिश करने लगते हैं। और यहीं पर जाकर बातें बिगड़ जाती हैं । जो जैसा है अगर हम उसे वैसे ही स्वीकार लें, और पूरे मन से स्वीकार लें तो हमारी जिंदगी आसान हो जाती है।
    और दूसरी बात एक दूसरे की कमियां सुधारने की जगह अगर हम अपनी कमियों पर काम करना शुरू कर दें तो जिंदगी और आसान हो जाती है।  मैं तुमसे बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रही थी पता नहीं तुम मेरी बात समझ पाओगी या नहीं।”

“कहो ना बाँसुरी! बेझिझक कहो क्योंकि अब हम देवरानी जेठानी से ज्यादा सहेलियां बन गई हैं।”

” बस उसी सहेली वाले रिश्ते के लिए तुमसे कह रही हूं कि केसर ने तुम्हारे लिए जो सोच रखा है उसे पूरा करने के लिए कोशिश तो करके देखो।

“पर हमने आज तक कोई काम नहीं किया बांसुरी हमें किसी भी चीज का कोई अनुभव नहीं है।”

“अनुभव लेकर कोई भी पैदा नहीं होता रेखा। अनुभव काम करने से आता है , तुम्हें क्या लगता है मुझे कलेक्ट्री का बहुत अनुभव था। कुछ भी नहीं था। मैंने बहुत सारी गलतियां की हैं लेकिन अपने काम में  डटी रही। “

“अरे हां तुम्हारी छुट्टियां कब तक है?”

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“पूरे 6 महीने की छुट्टियां मिली है मुझे! और इन छुट्टियों में यह छोटा सा नन्हा सा राजा साहब भी संभलने लायक तो हो ही जाएगा। उसके बाद देखूंगी अगर यह छोड़कर जाने लायक हुआ तब तो ऑफिस ज्वाइन करूंगी वरना एक दो महीने की और छुट्टियां बढ़ा लूंगी। अब कल से तुम भी एनजीओ का काम देखना शुरू करो। “

  रेखा को खुद के ऊपर इतना भरोसा तो नहीं था लेकिन बांसुरी की बात सुनकर उसे लगा कि उसे वाकई अपने और अपनी केसर दीदी के लिए कुछ करना ही होगा।


*******

दिन बीतते देर नहीं लगती और खासकर जब कोई किसी काम में व्यस्त हो तब तो समय का पता भी नहीं चलता ।
   आदित्य ने केसर की बॉडी के बारे में रेखा से कोई अधिक चर्चा नहीं की थी क्योंकि वह नहीं चाहता था कि वो रेखा को किसी भी तरह की उम्मीद दे । क्योंकि अगर यह वाकई केसर की बॉडी होगी और वह रेखा से यह कह जाएगा कि यह केसर नहीं है तो रेखा फिर से एक उम्मीद में जी उठेगी और कहीं उसकी उम्मीद पूरी नहीं हुई तो वह वापस टूट पड़ेगी इसलिए आदित्य ने इस बारे में रेखा से कुछ भी नहीं कहा।
   
     विराज अपने कामों में व्यस्त था और अब रेखा ने उससे किसी भी तरह की कोई भी उम्मीद रखनी छोड़ दी थी। रेखा का बेटा अब स्कूल जाने लगा था और इसलिए रेखा के पास भी वक्त था और इसलिए उसने केसर के दिए सारे कागजों को सरसरी तौर पर देखना शुरू किया।
      रेखा अक्सर केसर की यादों में डूब जाया करती थी। उसे हमेशा लगता कि केसर दुनिया के लिए बेशक गलत थी लेकिन अपने खुद के परिवार के लिए उसने कितना कुछ किया था। आज तक देखा जाए तो रेखा ने अपने पिता के लिए कुछ भी नहीं किया था। क्योंकि केसर ने उसे करने का कुछ मौका ही नहीं दिया। और अब जब रेखा के पास मौका था कि वह केसर और अपने पिता के लिए कुछ कर सकती थी तब भी केसर उसके लिए ही इतना कुछ छोड़ कर चली गई ।
        ऐसे ही एक शाम जब रेखा केसर को बहुत याद कर रही थी, तब अपने पिता से मिलने चली गई उसके पिता भी रेखा को देखकर खुश हो गए और उन्होंने केसर के सारे बिजनेस के पेपर और एनजीओ के कागज भी रेखा के हवाले कर दिए…;” अब हमसे यह सब संभाला नहीं जाता बेटा, अगर हो सके तो तुम अपना यह बिजनेस ही संभाल लो। हम जानते हैं तुम महलों की रानी हो। तुम्हें काम करने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी घर का बिजनेस है हमसे अब सम्भल नहीं पा रहा।  केसर ने बड़े प्यार से संवारा था इस सारे काम को तो अगर तुम चाहो…

रेखा ने अपने पिता की बात आधे में ही काट दी… “जी पिता साहेब आप चाहते हैं तो हम यह काम कल से ही संभाल लेंगे। बस एक बार घर पर सभी से पूछ लें।”

   रेखा ने वापस लौट कर बांसुरी से इस बारे में बात की। बांसुरी और रूपा यह सुनकर बहुत खुश हुए। वहाँ तो सभी ये चाहते थे कि रेखा अपने खोल से बाहर निकले।
    उसी शाम खाने की मेज पर रेखा ने अपने काम को शुरू करने की बात वहां मौजूद सभी लोगों के सामने रखी और युवराज से आग्रह किया कि वह उसे अपना काम करने की अनुमति दें। युवराज इस बात पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने रेखा  के सिर पर हाथ रख दिया…-” आप हमारी छोटी बहन जैसी है रेखा! आपको कहीं किसी मोड़ पर भी हमारी जरूरत पड़े तो आप बेझिझक कहिएगा ! हम जानते हैं कि केसर ने बहुत मजबूती से अपना बिजनेस खड़ा किया है, आप उस बिजनेस को बहुत आगे ले जाएंगी। हमारा आशीर्वाद आपके साथ है।
   एक तरह से अब उस परिवार में युवराज ही सबसे बड़ा था और उस से अनुमति लेने के बाद ही वहां के सारे कार्य संपन्न होते थे। रानी मां की मौत के बाद महाराजा साहब अब खाने की टेबल पर नहीं आया करते थे। उनका खाना हर वक्त उनके कमरे में पहुंचा दिया जाता था। दादी साहब भी बहुत बुज़ुर्ग हो गई थी। इसलिए उनका भी कमरे से बाहर आना जाना कम ही हुआ करता था। खाने की टेबल पर बाकी सभी लोगों के साथ अब महाराजा साहब की कुर्सी खाली जरूर होती थी लेकिन उनकी बाजू वाली कुर्सी पर युवराज ही बैठा करता था।
   राजा अजातशत्रु अब मुख्यमंत्री बन चुके थे और इसलिए उनकी व्यस्तताएं अलग तरीके से बढ़ गई थी। कई बार कार्य की अधिकता के कारण उन्हें अपने मुख्यमंत्री आवास पर ही रुकना पड़ता था। तब ऐसे में वह अपने ड्राइवर को भेजकर बांसुरी और अपने छोटे नवाब को भी अपने पास बुला लिया करते थे। और दो-चार दिन के काम को निपटाने के बाद उनका परिवार वापस महल आ जाया करता था।
    बहुत बार जब वह दूसरे प्रदेशों के दौरे पर होते थे तब बांसुरी महल में ही रहा करती थी।
  ऐसा ही कोई जरूरी काम था जिसके सिलसिले में राजा अजातशत्रु को दिल्ली के दौरे पर जाना पड़ा था। उन्होंने विराज से भी साथ चलने की गुजारिश की थी लेकिन विराज उनके साथ नहीं गया था। महल में होने के बावजूद वह रात्रि के सह भोज में कभी भी समय पर नहीं पहुंचा करता था जब उसका मन किया करता वह सब के साथ खाने चला आता और कभी अपने कमरे में ही अपना खाना मंगवा लिया करता था।
   आज भी जब रेखा ने सबके सामने अपना काम शुरू करने की बात रखी विराज अपने कमरे में बैठा शराब में डूबा पड़ा था। सब का आशीर्वाद और सहमति देखा प्रसन्नता से विभोर होती वह अपने कमरे में चली गई थी।
 
            विराज को एक तरफ सोफे पर बेसुध पड़ा देख उसका मन वितृष्णा से भर गया।
क्यों उसका मन अपने ही पति के लिए स्नेह से नहीं भर उठता है। उसकी समझ से परे था। ऐसा तो नहीं था कि उन दोनों के बीच हमेशा सिर्फ तकरार और लड़ाई झगड़े ही हुआ करते थे। कुछ प्यार भरे लम्हे भी तो बीते थे उनके बीच, और आज भी बीतते थे।  जब कभी विराज नशे में नहीं होता था तब वह रेखा से बहुत प्यार से पेश आता था।
   तब उसे रेखा बहुत सुंदर भी नजर आती थी। रेखा कि हर बात भी अच्छी लगती थी। लेकिन अक्सर उनके साथ होता था कि जब वह शांत बैठे बातचीत करने लगते थे तो जाने कैसे बातें ऐसा मोड़ ले लेती थी कि दस मिनट में ही उनकी बातों में टकराव आ जाता था कभी रेखा भड़क उठती थी तो कभी विराज।
   शायद इसी को कहते हैं मन का मेल ना हो पाना। तन तन से जुड़ चुके थे। दोनों की अपनी ज़रूरतें थी और उन्हें पूरा भी कर लिया जाता लेकिन मन का मेल कभी नहीं हो पाया था और शायद इस जीवन में अब कभी होना भी नहीं था।
    रेखा की सहायिका उसके बेटे को सुला कर जा चुकी थी। विराज की बोतल एक तरफ लुढ़की पड़ी थी। उसकी आधी खाई प्लेट भी एक ओर पड़ी थी। रेखा ने सहायिका से कह वो सब साफ करवा दिया। विराज सोफे पर ही सो चुका था।
   रेखा भी कपड़े बदल कर सोने चली गयी। अगले दिन से उसका काम शुरू होना था।

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*****

  
     बड़े दिनों के बाद समर को फुरसत मिली थी उसने पिया को कॉल लगा लिया…-“क्या बात है? आज मंत्री जी ने खुद फ़ोन किया है? कुछ तो गड़बड़ है।”
” क्या यार शर्मिंदा मत करो। मैं तो हमेशा कॉल करना चाहता हूँ,मिलना चाहता हूँ पर जानती तो हो वक्त की कितनी कमी है।”
“जानती हूँ तभी तो मैं भी सुबह शाम फोन कर कर के परेशान नही करती। वरना मन तो मेरा भी करता है कि मैं अपने क्यूट बेबी से रोज़ पूंछू ” मेरे शोना बाबू ने खाना खाया!”
” ओह्ह रियली ! तुम्हें ऐसा बोलना अच्छा लगता है?”
” ऑफकोर्स ! गलत क्या है इसमें। इट्स क्यूट यार। अब आजकल सोशल मीडिया पे बाबू शोना का मज़ाक उड़ाने का ट्रेंड चल रहा है, जिसे देखो वही “बाबू शोना ” जोक्स बना रहा मीम्स बना रहा, इसका मतलब ये थोड़े न हो गया कि मुझे अच्छा नही लगता। और एक मज़े की बात ये जो लोग आज ऐसी बातों का मज़ाक बनाने वाले ही कभी खुद ऐसी बातें करते रहें होंगे। खैर वो छोड़िए मंत्री जी आप बताइए कैसे फ़ोन किया ?”
” मिलना था तुमसे।”


” अरे वाह! तो आ जाइये फिर !”
” अभी तो हॉस्पिटल में होंगी ना?”
” हॉं ! बस दस मिनट में वापस निकलूंगी। किसी कॉफी शॉप में मिल लें।”
” न न ! अकेले मिलना है। तुम्हारे रूम पर आ जाऊँ?”
” बड़े शरारती हो रहें हैं आप। क्या बात है?”
” बस वही, जो तुम समझ रही हो।”
” आज कॉफी शॉप पे मिल लेतें हैं। बहुत दिन से साथ में कोल्ड कॉफी नही पी।”
“मतलब तुम नही चाहती कि मैं तुम्हारे रूम पर आऊं?”
“अरे नही बाबा! ऐसा कुछ नही है, चलिए ठीक है रूम पर ही आ जाइये। कब तक आएंगे।
” दस मिनट में पहुंचता हूँ। आज ज़रा फ्री हूं तो सोचा तुम से ज़रा अच्छे से मिल लिया जाए।
” दस मिनट बस ! नही रुकिए , आप बीस मिनट में आइये। तब तक मैं भी पहुंच जाऊंगी। “
” अरे मैं तुम्हें लेता हुआ चलता हूँ ना। क्या प्रॉब्लम है? “ओके!”
   पिया ने तुरंत फ़ोन रखने के बाद अपनी काम वाली दीदी को फ़ोन लगाया। वो चार दिन से नदारद थी। पिया के अस्पताल की सीनियर डॉक्टर छुट्टी पर गयी थीं, इसी से अस्पताल में भी भारी मगजमारी हो रही थी। और घर की साफ सफाई नही हो पा रही थी।
छोटा सा फ्लैट था। चार दिन से वो खुद बर्तन ज्यादा न निकलें इसलिए कभी मैगी तो कभी सैंडविच पर गुज़ारा कर रही थी। और चारो दिन के बर्तन सिंक पर पड़े अपनी किस्मत को रो रहे थे।
   घर के कामों से उसे वैसे भी मौत आती थी। उसकी मेड ही सुबह उसका बिस्तर ठीक करने से लेकर साफसफाई बर्तन खाना बनाना सब किया करती थीं।
  पिया को घबराहट सी होने लगी। समर ऐसे उसके साथ गया तो उसका कबाड़ घर देख कर क्या सोचेगा? उसे लगेगा छि कितनी गंदी है। जब घर सही नही रख सकती तो शादी क्या निभाएगी।
   मेड को दो बार पूरी रिंग देने पर भी उस नामुराद ने फ़ोन नही उठाया।
  गिरती पड़ती पिया अपना एप्रन उठाये वहाँ से घर के लिए भागी…
   उसका फ्लैट दो गलियों के बाद ही था, वैसे वो कई बार पैदल ही आ जाया करती थी पर अधिकतर स्कूटी से ही आती थी। आज स्कूटी भी उसकी सामने रहने वाली आँटी का बेटा मांग कर ले गया था।
    जान हथेली पर लेकर वो मरती पड़ती अपने फ्लैट की तरफ भागी। जाते जाते ही उसने समर को मैसेज कर दिया कि एक केस आ गया है, आधा घंटा लगेगा।
   भाग कर वो घर पहुंची, दरवाज़ा खोलते ही उसका सिर घूम गया।
   दो दिन के धुले कपड़े सामने काउच पर अंबार लगाए पड़े थे। सामने टेबल पर एक तरफ किताबें, न्यूजपेपर्स,  चिप्स के पैकेट्स, कुछ अधखुली बिस्किट्स के रैपर, कोल्ड ड्रिंक्स के कैन पड़े हुए थे।

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    उसे भी तो अजीबोग़रीब शौक थे। सुबह उठ कर उसे रनिंग भी करनी होती थी लेकिन रातों को उल्लू के समान जाग कर टीवी पर आंखें भी फोड़नी होती थी। और मूवीज़ के साथ उसके मुहँ कान चलते ही रहते थे।  फटाफट खुद पर बड़बड़ाती पिया इधर उधर फैला कबाड़ समेटने में लग गयी कि उसका फ़ोन बजने लगा….-” मैनूं डर जेहा लगदा ए, दिल टूट न जाये वेचारा।” उसने तुरंत कॉल लिया और स्पीकर में डाल दिया।
  ” क्या कर रही थी मेरी बच्ची?”
” मम्मी घर साफ कर रही थी यार, प्लीज़ अभी फ़ोन रखो बिज़ी हूँ।”
” हैं ? तू घर साफ कर रही थी? झूठ मत बोल!”
” सच्ची कह रही हूँ मम्मी।”
” सुन सुन फ़ोन न रखियो ,मैं वीडियो कॉल ट्रांसफर कर रही हूँ। एक बार न तुझे घर साफ करते देखने की बड़ी तमन्ना है।”
” हद करते हो यार मम्मी आप? दुनिया की कौन सी माँ होगी जो अपनी बच्ची को काम करते देख खुश होती है?”
” बेटा जी। ये हम माओं से पूछो, हर माँ के कलेजे में ठंडक पड़ जाती है जब उसकी बेटी अपने हाथ से पानी लेकर पीती है। सच्ची स्वर्ग का सुख मिल जाता है।”
” ओह्ह मेरी फेकता भरपूर माँ! अपने डायलॉग अपने पास संभाले रखो और मुझे काम करने दो।”
” पर ये तो बता आज सूरज पश्चिम से निकला क्या जो तू साफ सफाई में लगी है।अच्छा अब समझी पक्का समर आने वाला होगा मिलने।”
   पिया अपनी जीभ काट कर रह गयी। ये मम्मी हर बात समझ कैसे जाती है।
” अच्छा सुन तू अपना काम निपटा ले , और सिर्फ हॉल की सफाई करके छोड़ न दियो, अपना कमरा रसोई और बाथ रूम भी साफ कर लेना।”
अब यार ये मम्मी ने अलग ही पेंच डाल दिया। अब बाथरूम साफ करने की क्या ज़रूरत?
   इतनी सारी सफाई के बाद उसे खुद भी तैयार होना था और वापस अस्पताल भागना था, जिससे समर के साथ फ्लैट पर वापस आये तो समर भी उसका चमकीला घर देख कर खुश हो जाये, लेकिन अभी तो हॉल भी साफ नही हो पाया था। वो धड़ाधड़ हाथ चला रही थी कि दरवाज़े पर बेल बज गयी और उसका दिल धक से रह गया।
    ” नहीईईई ….  उसे सरप्राइज देने के लिए कहीं मंत्री जी अस्पताल में पता करके उसे ढूंढते यहाँ तो नही चले आये।
   हे भगवान! ऐसे फ़िज़ूल स्यापे उसी की किस्मत में क्यों लिखें हैं।।।
    अब इतना तबाहो बर्बाद घर देख कर समर के दिल का रोमांस हवा न हो जाये।
  वो सोच ही रही थी कि वापस कॉल बेल बज गयी….

क्रमशः

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aparna

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दिल से ……

       कैसे है आप सब दोस्तों!!
  
   कल हमारे  समाज की अंताक्षरी प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिला। और क्या कहूँ इतना मज़ा आया।
    गानों के साथ वैसे भी मेरा कनेक्शन बड़ा पक्का है। बॉलीवुड तो लगता है मेरे खून में घुला है।
    हमारी पांच लोगों की टीम थी, खूब धमाल हुआ खूब मस्ती की। कुल जमा 17 टीम्स थी। एक से एक धुरंधर पुराने गानों के सुर सम्राट टाइप।
  लेकिन  हम दूसरी पोजीशन के साथ जीत गए। इक्कीस सौ रुपये हमने जीते। और सासु माँ ने सभी के सामने बड़े लाड़ से प्यार भरा आशीर्वाद दिया। मौसी सास और मामी सासों ने आकर गले से ही लगा लिया।
    ज़माना बदल गया है भाई, अब बहु को रोटी बनानी न भी आये तो सासु जी बड़े प्यार से सम्भाल लेती हैं। अरे बेचारी को किताबों से फुर्सत मिलती तब तो रोटी बेलना सीखती।
   न ऐसा नही है कि कुछ नही आता।
   लेकिन जिन चीजों पर मास्टरी है वो किसी काम की नही हैं।

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    मेरे साथ अक्सर होता है कि जब तक मैं रसोई पर खड़ी उबलते दूध पर नज़र रखी होतीं हूँ, सीधे सादे बच्चे सा चुपचाप पड़ा रहता है। और जैसे ही फोन की बीप सुन बाहर निकलती हूँ, कमबख्त सुनामी से टक्कर लेता उफान मार मार के गिर पड़ता है।
    क्या आपके साथ भी होता है?

  चलिये जल्दी ही मिलतें है कहानी के अगले भाग के साथ तब तक पढ़ते रहिये ….
 
   मैंने किसी ज़माने में एक फ़िज़ूल सी हॉरर भी लिखी थी ” थैंक यू” अगर आप लोग चाहे तो वो भी पलट सकतें हैं। ( उनके लिए जो मुझसे हॉरर लिखने की गुज़ारिश करतें हैं)

   आपके ढेर सारे प्यार, समीक्षा स्टिकर्स के लिए दिल से आभार , शुक्रिया नवाज़िश

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aparna ….


    

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

29 विचार “जीवनसाथी-124” पर

  1. आज का मेरे लिए हिट प्वाइंट था बांसुरी का रेखा को जवाब 👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻। यह कड़वा सच है कि केवल पति ही अनपेक्षित आकांक्षाएं नहीं रखते, पत्नियां भी इस होड़ में कहीं पीछे नहीं है।👍🏻👍🏻👍🏻
    “दिल से” में आपने दूध की बेवफाई का सही चित्रण किया है। मैने भी दूर नौकरी करते वक्त इसे भुगता है।😂😂😂😂😂

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