समिधा- 34

Advertisements

    समिधा – 34

Advertisements

    अगले दिन से हवन पूजन शुरू हो गया। ढेर सारे आचार्य अलग अलग वेदियों पर बैठे एक साथ हवन कर रहे थे।
   हवन में डालने वाली समिधा और सामग्री की तैयारियों में आश्रम की महिलाएं और लड़के लगे हुए थे।
   एक तरफ मंदिर के प्रमुख आचार्य माइक पर मंत्र बोलते जा रहे थे। इस कार्यक्रम के लिए मंदिर भक्तों के लिए बंद रखा गया था।
   पूरा आश्रम परिसर विशुद्ध घृत और गुग्गुल की मिली जुली खुशबू से गमक रहा था।
  
       प्रबोधानन्द आंखें बंद किये आव्हान कर रहे थे। आचमन के बाद उन्होंने शिखाबन्धन कर भूमि और कलश पूजा सम्पन्न की और हवन शुरू हुआ। वरुण दूसरे कुंड में बैठा था पर उसकी आंखें प्रबोधानन्द पर ही थी।
   महिलाओं को इधर उधर कार्यो में व्यस्त देख प्रबोधानन्द की आंखें कल की दिखी अप्सराओं सी सुंदर कमनीय सी उस लड़की को ढूंढ रहीं थीं कि आखिर उनकी आंखों ने पारो को देख ही लिया।
    बनाने वाले ने कितनी फुरसत से बनाया था। बिना किसी साजश्रृंगार के भी वो अपरूप सुंदरी थी। खुला हुआ सा रंग जो परिश्रम की अधिकता से थोड़ा दबा सा लगने लगा था। लंबे काले बालों को उसने बेतरतीबी से जुड़े का रूप दे रखा था। जिनमें से कुछ ज़िद्दी लटें हवा से इठलाती उसके चेहरे पर उड़ कर आती जा रहीं थी। काली भंवर सी पलकें जो ज़रा ऊपर को घूमी हुई थीं उन्हें वो जब सहम कर झपकाती तो उसे देखने वाला उन्हीं आंखों के भंवर में डूब जाता।
प्रबोधानन्द को भान ही नही रहा की दीन दुनिया से बेखबर वो उसे आंखों ही आंखों में पीते जा रहे थे। परिश्रम की अधिकता से माथे पर चमकती बूंदे उसके चेहरे को एक अलग लुनाई से रंगे थी। वो पद्मजा दीदी की बातें सुनती यहाँ से वहाँ सामान सजाती जा रही थी।
    प्रबोधानन्द ने अपने साथ बैठें आचार्य के कानों में कुछ कहा और उसके बाद उन गुरुवर ने वहाँ कार्यरत महिलाओं को भी हवन में बैठने बुला लिया।
  सभी औरतें इधर उधर बैठने लगी कि प्रबोधानन्द का धैर्य चूक गया और उन्होंने हाथ उठा कर पारो को आवाज़ लगा दी..-“आप यहाँ आ जाइये। ” पारो ने चौन्क कर उनकी तरफ देखा और आगे बढ़ने लगी। प्रबोधानन्द हवन पर सामने की तरफ बैठे थे। उन्होंने अपने ठीक बाजू में बैठे युवक को कुछ लेने उसी समय भेज दिया जब पारो उनके पास पहुंची और पारो को हाथ के इशारे से अपने ठीक पास में स्थित खाली जगह की ओर इशारा कर दिया।
   पारो सकुचाती सी आगे बढ़ी, और झुक कर बैठने को थी कि लपक कर वरुण वहाँ बैठ गया। वरुण के पास ही एक और गुरुवर थे उन्होंने वरुण के बैठते ही ज़रा सरक कर पारो के लिए जगह बना दी…;” आओ बहन ! यहाँ बैठ जाओ।”
   उन गुरुवर की बात सुन पारो वरुण और उनके बीच की जगह पर सिमट कर बैठ गयी।
  गुरुवर और वरुण ने पारो से उचित दूरी बनाए रखी थी,लेकिन वरुण के कारण पारो प्रबोधानन्द के पास नही बैठ पायी थी और इस बात से नाराज़ प्रबोधानन्द ने एक नज़र वरुण पर डाली और फिर अग्नि से उठती लपटें देखने लगे।
  पारो के वहाँ बैठते ही तीन चार महिलाएँ भी उसके पास आ बैठी ।
     लपटों के बीच रह रह कर प्रबोधानन्द की आंखें उन लपटों के ठीक पीछे बैठी पारो पर फिसलती चली जा रही थी।
    अग्नि की चंचलता

प्रबोधानन्द के अंदर एक तृष्णा को जगाती चली गयी….

हवन सम्पन्न होने के साथ बाकी कार्यक्रम शुरू हो गए। मंदिर दर्शनार्थियो के लिए खुल गया।लोगों की आवाजाही बढ़ने से मंदिर में एकाएक भीड़ बढ़ गयी।
   दोपहर बाद प्रसाद वितरण होने के साथ ही आचार्यों और गुरुजनों का भोजन प्रारम्भ हो गया।
    कुछ महिलाएं जहाँ रसोई में लगातार भोजन पकाने में लगीं थीं वहीं नई उम्र की लड़कियों को दौडाभागी वाला काम सौंपा गया था। वो लोग भोजन परोसने में लगी थीं।
   पारो भी यहाँ से वहाँ भोजन परोस रही थी। प्रबोधानन्द ने अपने कमरे में ही खाने की इच्छा जताई और अपने कक्ष की ओर बढ़ गए। उन्होंने अपने कमरे में जाने से पहले जिन आचार्य से बात की थी वो पारो के पास चले आये…-” बहन जी आप ये फल और दूध प्रबोधानन्द जी के कमरे में पहुंचा दें, उनका आदेश है कि आप ही लेकर जाएं।”
” लेकिन मैं ही क्यों?”
” बस जाते हुए उनकी दृष्टि आप पर ही पड़ी होगी इसलिए आपका नाम ले लिया। बड़े लोग हर कार्य प्रयोजन से करतें हैं बहन। आपको गुरुवर की सेवा का मौका मिला है मत छोड़िए। उनकी सेवा साक्षात गोपाल जी की सेवा है।”
   नही कभी नही, किसी इंसान की सेवा गोपाल जी की सेवा कैसे हो सकती है जब तक वो व्यक्ति रोग ज़रा या आयु से पीड़ित न हो।
  मन में उफनते विचारों को विराम दे पारो फल और दूध हाथ में लिए आगे बढ़ गयी।
वो कमरे में दाखिल होने वाली थी कि वरुण बाहर दरवाज़े पर ही उससे टकरा गया…-” ज़रा रुकिए।”
  पारो ने आँख उठा कर उसे देखा और जैसे चौन्क उठी।
  इन भावपूर्ण आंखों को, इस लजीली सी चितवन को कहीं देखा है। पर कहाँ? वो सोच में पड़ गयी कि आखिर कहां देखा है उसने। यह तो याद आ रहा था कि उसने वरुण को कहीं देखा है लेकिन बहुत जोर देने पर भी वह वरुण के चेहरे को याद नहीं कर पा रही थी।  या शायद मन से इतना दुखी थी कि उसका दिमाग उस तरफ काम ही नहीं कर पा रहा था।
  वरुण ने उसके हाथ से फलों की तश्तरी ले ली… “आप मेरे पीछे अंदर आइएगा, और सुनिए आप आगे अपने स्कूल की पढ़ाई पढ़ना चाहती है ना?”
पारो आश्चर्य से वरुण का चेहरा देखने लगी उसे अचानक से समझ में नहीं आया कि आश्रम के यह गुरुवर उससे उसकी पढ़ाई लिखाई के बारे में क्यों पूछ रहे हैं?  तभी उसे याद आया कि उस दिन दर्शन जब उसे किताबें देने आया था तब यह वहां से निकल रहे थे और दर्शन को देख कर रुक गए थे।
   पारो एक बार फिर सोच में पड़ गई कि शायद उसी समय उसने इन्हें देखा था और इसीलिए यह चेहरा उसे इतना पहचाना हुआ सा लग रहा था। लेकिन उस दिन तो इन्हें उसने शरमाते हुए नहीं देखा था , तो फिर क्यों उसे बार-बार इस चेहरे में एक शर्मिला सा प्रेमी नजर आ रहा था। वह अपनी सोच पर ही लजा गयी और वापस नीचे देखने लगी।
” आप मेरी बात सुन रही है ना मैं यह पूछ रहा हूं कि क्या आप अपनी आगे की पढ़ाई करना चाहती हैं? हां या ना में मुझे तुरंत जवाब दीजिए।”
” हां करना तो चाहती हूं लेकिन…
बहुत संकोच से पारो अपनी बात कहना शुरू कर ही रही थी कि वरुण ने उसकी बात आधे में ही काट दी…-” लेकिन किंतु परंतु कि अब कोई चर्चा नहीं होगी। आप पढ़ना चाहती हैं, यही बहुत है। आपकी तरह इस आश्रम में और भी औरतें होंगी जो पढ़ना लिखना या और भी कुछ सीखना चाहती होंगी। मैं आप सभी के लिए प्रबोधानंद जी से बात करना चाहता हूं। और इसके लिए आपको मेरा साथ देना होगा मेरे साथ साथ ही आप अंदर आइएगा।”
  “हां” में सिर हिला कर पारो वरुण के पीछे हो गई! वरुण ने कमरे के बाहर से पारो को आवाज लगाने को कहा और चुप खड़ा हो गया पारो ने अपनी मीठी सी आवाज में अंदर आने की अनुमति मांगी।
    अंदर बैठे प्रबोधानन्द की बांछे खिल उठी…
” आओ निसंकोच भीतर चली आओ।”
  प्रबोधानंद जी का आग्रह सुनते ही वरुण मुस्कुराते हुए भीतर दाखिल हो गया।
   अपने आसन पर अधलेटे से प्रबोधानंद वरुण को अचानक कमरे में आया देख चौंक कर सीधे बैठ गए। और आंखें फाड़े उसे देखने लगे। वह अभी उससे कुछ कहते कि तभी वरुण के पीछे उसकी अनुगामिनी सी पारो भी चली आई।
    पारो को देख उनकी आंखों में कुछ ठंडक जागी की तभी वरुण की गहरी सी आवाज़ उनके कानों को चीरती उनके सुकून को छीन गयी…-“गुरुवर आपकी आज्ञा हो तो ये आपसे कुछ कहना चाहती हैं।”
” हॉं हाँ ! क्यों नही, कहिये आप क्या कहना चाहती हैं?”
पारो के मन में वैसे तो कभी कोई डर या संशय नही रहा था लेकिन देव का अचानक उसकी जिंदगी में आना और फिर अचानक ही चले जाना उसे इस कदर भीतर से तोड़ गया था, कि उसका पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया था। पहले की स्पष्टवादी पारो अब शांत और गंभीर हो गई थी। वरुण के इस तरह अचानक कह देने से उसे कुछ समझ नहीं आया और वह हड़बड़ा गई।
  उसके भोलेपन को देख प्रबोधानंद का हृदय एक बार फिर उछल कर उनके मुंह तक आ गया….-” आप यहां आ जाइए। यहां बैठिये और आराम से बताइए कि आप क्या चाहती हैं?”
   एक बार फिर उन्होंने पारो के लिए अपने बहुत पास का आसन दिखाया। पारो संकोच से गड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी कि वरुण फिर जाकर वहां बैठ गया। और पारो के लिए एक दूसरा आसन दिखा दिया। प्रबोधानंद कुछ समझ कर वरुण से बोल पाते कि उसके पहले ही वरुण ने बोलना शुरू कर दिया…-” गुरुवर इनके साथ नियति ने बहुत गलत किया है। यह हमेशा से शिक्षा प्राप्त करना चाहती थी, लेकिन भाग्य ने कुछ ऐसा पलटा खाया कि यह अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाई।

Advertisements


  यहां आश्रम के नियमों से आप भी भलीभांति परिचित हैं यहां सदियों से जो नियम बन चुके हैं उन्हें बदलना आसान नहीं है। यहां पर जितनी भी महिलाएं उपस्थित हैं उनकी आजीविका के लिए या उनके समय काटने के लिए किसी भी तरह का कोई प्रबंध नहीं है। मेरा बस यह मानना है गुरुदेव की यह सब भी तो हमारी तरह ही कृष्ण भक्त हैं। तो जब हम पुरुषों को वेद अध्ययन करने का अवसर दिया जाता है, तो इन महिलाओं को उसी अवसर से वंचित क्यों रखा जाता है? आप ज्ञानी हैं! आप स्वामी हैं! आचार्य हैं ! आचार्य शिरोमणि है।
   अगर आप चाहें तो हर असंभव कार्य को संभव कर सकते हैं। मुझे आपको देखते ही यह अनुभूति होने लगी थी कि आप सब कुछ संभव करने योग्य हैं।
   यह बालिका अंतर्मन से शिक्षा के लिए इच्छित है।
  गुरुवर ऐसी एकाध बालिका या महिला नहीं है इनकी संख्या बहुत है जो आश्रम से बाहर निकल कर भी कार्य करना चाहती हैं। कुछ जो कम उम्र की बालिकाएं हैं उन्हें स्कूल की शिक्षा फिर आगे कॉलेज की शिक्षा अगर हमारा आश्रम दिलवा सके, तो यह बहुत बड़ी कृपा होगी आपकी इन सभी पर।
  इसके अलावा जो ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें सिलाई कढ़ाई बुनाई आदि कार्यों में रुचि है उनके लिए अगर हम आश्रम में ही किन्ही विशेषज्ञों की नियुक्ति करके उन्हें इन कार्यों में पारंगत कर सकें तो वे आपका आभार जीवन भर नहीं भूल सकेंगी।
   मैं यह नहीं कह रहा कि हमारे आश्रम के गुरुवर या आचार्य वर महिलाओं के लिए सचेत नहीं है या उनके लिए नहीं सोचते लेकिन शायद हमारे यहां का नियम है ऐसा है कि भगिनी आश्रम की महिलाएं स्वयं अपने लिए नहीं सोचती ना यह महिलाएं अपने खाने-पीने का विचार करती हैं और ना ही अपने रहने का। मैं बस यह जानना चाहता हूं गुरुवर कि जब उसी मुरलीधर ने आपकी और मेरी सृष्टि की तो क्या उस मुरलीधर ने इन लोगों को नहीं रचा? आखिर उन्हीं की ही तो रचना यह सब भी हैं! तो फिर हम इन्हें इनकी मौलिक आवश्यकताओं और मौलिक अधिकारों से वंचित करने वाले कौन होते हैं ? यही सारी बातें बाकी आचार्य और गुरुवरो से भी कर सकता था, लेकिन जाने क्यों आपके चेहरे का तेज देख कर मुझे ऐसा लगा कि आप ही हैं जो मेरी इस समस्या को सुलझा सकते हैं। आप खुद देख रहे हैं कि यह मेरी व्यक्तिगत समस्या नहीं है। यह मेरी समस्या भगिनी आश्रम से जुड़ी है। अगर आपकी कृपा दृष्टि हो गई तो भगिनी आश्रम की महिलाएं भी अपने जीवन को सार्थक कर पाएंगी, उनके जीवन में आगे जितना भी समय शेष है वह आपका नाम लेकर खुशी से व्यतीत कर पाएंगी।

” तुम्हारा नाम क्या है? ” वरुण की बातें सुन प्रबोधानंद उसके बारे में जानने से अपने आप को रोक नहीं पाए। वरुण ने ऐसी लच्छेदार बातें बनाई थी, कि प्रबोधनंद अगर पीछे हटते तो पारो के सामने उनकी छवि धूमिल होने का खतरा था ….और अगर हां बोल देते हैं तो उन्हें भगिनी आश्रम की महिलाओं के लिए एक अलग से व्यवस्था करनी पड़ती। लेकिन अब वह वरुण की बातों में इस तरह फंस चुके थे कि उनके पास और कोई चारा नहीं बचा था।
” जी वरुण नाम है मेरा वरुण देव।”
जाने किस मानसिक अवस्था में वरुण के मुंह से अपना पूरा नाम वरुण देव निकला जबकि आज तक उसके मन में कभी यह भाव नहीं आया था कि उसका पूरा नाम क्या है? वह सदा से अपना नाम वरुण ही लेता आया था। लेकिन आज जाने कैसा चमत्कार हुआ था कि वह प्रबोधानंद जी के सामने बोलता ही चला गया। ऐसी प्रगल्भता और वाचालता तो उसके अंदर कभी थी ही नहीं।  वह तो बहुत शांत और सौम्य था। और इसीलिए तो वह देव का इतना अनुरागी हो गया था। क्योंकि देव ऐसा ही था । अगर उसने कुछ करने की ठान ली तो अपने उस कार्य को पूरा करने के लिए वह किसी ना किसी तरीके से मार्ग बना ही लिया करता था।
    वरुण सोच में पड़ गया कि आज उसके साथ क्या हो गया था ? अचानक उसे कुछ देर के लिए लगा जैसे उसके अंदर से देव निकल कर बाहर आ गया!  और पारो की शिक्षा के लिए प्रबोधनंद के सामने सीना ताने खड़ा हो गया था।
  खैर जो भी हुआ हो लेकिन वरुण अपने अंदर के इस परिवर्तन से खुश था संतुष्ट था क्योंकि आज तक वह हमेशा यही सोचता आया था कि वह बहुत दबा छुपा सा  है।  और अपने मन की वह चाह कर भी ना बोल पाता है ना कर पाता है। लेकिन आज पहली बार शायद पारो का चेहरा देखकर उसके मन के अंदर से आवाज आई कि ‘जो भी हो वरुण लेकिन तुझे इस लड़की को इस के सपनों को पूरा करना ही है।’

” ठीक है वरुण देव हम अभी दो दिन और आपके आश्रम में हैं। हमारे यहां रहते तक में आप इन के आश्रम की महिलाओं की संख्या और कितनी महिलाएं शिक्षित होना चाहती हैं? कितनी महिलाएं क्या सीखना चाहती हैं? क्या पढ़ना चाहती हैं? इसकी संख्या से हमें अवगत कराइए। हम यहां से जाने से पहले इनका कोई ना कोई समाधान करके जाएंगे। “
 
   प्रबोधानंद की आंखें एक बार फिर पारो पर जाकर अटक गई। इस बार पारो ने भी महसूस किया कि सामने बैठे उस आदमी की आंखें उस पर बुरी तरह से फिसल रही हैं।  ऐसा महसूस होते ही पारो वहां से उठ खड़ी हुई।
   उसे उठते देख वरुण भी खड़ा हो गया उसने झुककर प्रबोधानंद को प्रणाम किया और पारो की ओट बनाकर उसे आगे बढ़ने को कहा। पारो कमरे से बाहर निकल गई वरुण जैसे ही कमरे के बाहर आया उसने देखा परेशान सी पारो एक तरफ आगे बढ़कर सीढ़ियों पर बैठी हुई थी। वरुण भी उसके पास पहुंच गया….” क्या हुआ किसी बात से आप परेशान है क्या? क्या मुझे वहां पर आपकी शिक्षा के बारे में बात नहीं करनी चाहिए थी?”
“नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं!  मैं आपके कारण परेशान नहीं हूं।”
“फिर क्या बात हो गई ? आप चाहें तो मुझ पर विश्वास कर सकती हैं मुझे बता सकती हैं।”
  “आप पर अविश्वास का कोई सवाल ही नहीं उठता?  लेकिन जाने क्यों आजकल संसार से ही विश्वास उठ गया है। मुझे समझ में नहीं आता कि मेरा चित्त ही इतना व्याकुल है कि मुझे हर किसी पर शक होने लगता है। “
वरुण समझ गया के पारो ने भी प्रबोधनंद की दृष्टि पहचान ली थी।
   आखिर वो भी तो औरत ही थी, और औरत तो अपने पीठ पीछे भी पड़ने वाली नज़र को पकड़ने की क्षमता रखती थी।
   पारो को वो क्या दिलासा देता , वो तो खुद रात को लेकर चिंतित था। अभी तो सुबह से वो पारो के पीछे साये सा घूम रहा था लेकिन रात में तो वो भगिनी आश्रम के सामने गार्ड बन कर नही बैठ सकता था। और जाने क्यों उसे प्रबोधानन्द की आंखें देख खुद भी डर सा लग रहा था।
   उसे वाकई पारो की चिंता सताने लगी थी, और बार बार मन में ये आ रहा था की किसी तरह वो उसे यहाँ सब से छिपा कर रख पाता। अपने मन के कष्ट को छिपा कर उसने उसे ढाँढस बंधाया….
” आप घबराइए नही। मेरे रहते यहाँ आपको कोई परेशान नही कर सकता।”
   पारो उसकी तरफ देखने लगी, ,उसी समय प्रशांत भी वहाँ चला आया…-” वरुण बाहर कोई तुमसे मिलने आये हैं।”
” मुझसे मिलने ? लेकिन कौन आया है?”
” मालूम नही। मंदिर दर्शन के बाद ऑफिस में जाकर तुम्हारे लिए पूछताछ कर रहे थे तो उदयाचार्य जी ने मुझे बुला कर तुम्हें बताने कहा है।”
” ठीक है मैं देखता हूँ।”
   मन में ये संशय लिए की पता नही बाहर कार्यालय में कौन होगा , वो बाहर की तरफ बढ़ा की पारो भी लपक कर उसके पीछे हो गयी।
   वरुण ने उसे आते देखा और मुस्कुरा कर सामने बढ़ गया….

क्रमशः

aparna….

दिल से ……

          ट्रूकॉलर है आपके फ़ोन पर? होगा ही। मेरे में भी है।  आपके साथ भी होता होगा, अक्सर ये होता होगा कि ट्रूकॉलर नोटिफिकेशन आती है कि 56 लोगों ने आपका प्रोफ़ाइल चेक किया।
   आप चौन्क जातें हैं कि कौन हैं भाई ये लोग? किस संसार के हैं? क्योंकि आपके पास तो इतना वक्त ही नही होता कि नंबरों को जांचते फिरें।
  और कहीं ये देखने चले जाओ की कौन नम्बर की छानबीन कर रहा था तो अगला मेसेज आता है कि मंथली सब्स्क्रिप्शन abc  रुपयों में लीजिये और पूरे महीने अपने स्टॉकर्स पर नज़र रखिये।
   मतलब हद है यार !मार्केटिंग की भी। ये सब्सक्रिप्शन नाम के ट्रेंड ने जान ले रखी है कसम से।
यूट्यूब पर कोई खूबसूरत रंगोली की डिज़ाइन खोलते ही पहले एड आ जाता है और उसके नीचे एड फ्री देखने का सब्स्क्रिप्शन फी!!!

Advertisements


  
    लगता है बसपन का प्यार के बाद सब्स्क्रिप्शन की बहारट्रेंडिंग हैं।

  चलिए मिलतें हैं अगले भाग के साथ जल्दी ही। तब तक पढ़ते रहिये कहानी समिधा!!!

  दिल से आभार व्यक्त करती हूँ आप सभी का की आप मुझे इतने मन से पढ़ते हैं सराहतें हैं!!!

aparna…..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

26 विचार “समिधा- 34” पर

  1. Ha Ha bilkul sahi pakde hein aparna ji aisa hi hota hai hum sabke saath bhi hadd hai marketing ki bhi,.kahani jaise jaise aage badh rahi hai paro or Varun mein chhupe dev ki har baat har mode utsukta se bhar deta hai .aaj bhi dhurth Guru ki vasnamayi aankhein paro ne pahchaan li Varun kaise paro ko hifazat se rakh payega in bhediyon se

    Liked by 1 व्यक्ति

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: