शादी.कॉम – 29

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शादी डॉट कॉम-29

       जब इन्सान के मन में कोई संशय घर कर जाता है तब वो अपने जीवन मे उस समय घटित हर घटना को किसी ना किसी रूप में अपने उसी संशय से जोड़ के देखने लगता है।।
      बांसुरी ना तो अन्धविश्वासी थी और ना ही लकीर की फकीर!!! हर एक क्यों? को अपने तथ्यों पे नाप तौल कर ही निर्णय लेती थी पर ये भी सत्य है कि बहुत बार प्रेम इन्सान को कमजोर बना देता है।।
     प्रेम में पड़ा इन्सान वो सब करने को बाध्य हो जाता है जिसका पहले कभी उसके व्यक्तित्व से कोई संबंध भी ना रहा हो।।

     पहले की तेज़ तर्राट,बात बात पर अपनी ज़बान से आग उगलने वाली बंसी राजा से प्रेम और वियोग के बाद एक अलग ही बंसी बन चुकी थी,उसकी धीरता, सहिष्णुता उसकी उम्र से कहीं अधिक थी।।
     माला का उसके इसी एकमात्र रूप से परिचय था,,माला की नज़र में बंसी एक धीर गम्भीर शान्ति प्रिय लड़की थी,जो ऑफिस में भी सिर्फ उतना ही बोलती जितना आवश्यक होता था,,पर अब राजा के साथ बांसुरी को देख माला को उसके और राजा के रिश्ते की गहराई का आभास हो गया था।।

     बांसुरी तब तक वहां खड़ी रही जब तक राजा की टैक्सी धूल उड़ाती आंखों से ओझल ना हो गई , उसके बाद भारी मन और भारी कदमों से बांसुरी अपने फ्लैट की ओर बढ़ चली।।।

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    रूम का दरवाजा खोलते ही बांसुरी को अकेले सामने खड़े देख माला के माथे पर सवालिया निशान उभर आए उसने तुरंत पूछा _” सर कहां चले गए?”

बांसुरी– युवराज भैया का अचानक फोन आ गया और उन्हें तुरंत दिल्ली के लिए निकलना पड़ा अभी तो टैक्सी से मुंबई जा रहे हैं वहां से फ्लाइट लेकर दिल्ली जाएंगे।

   इतना कहते ही बांसुरी सोफे पर निढाल होकर गिर पड़ी और रोते-रोते उसकी हिचकियां बन्ध गई।।   माला ने तुरंत उसे संभाला दौड़ कर पानी का गिलास ले आई और बांसुरी को पकड़कर उसे शांत कराते हुए उसके पास बैठी रही।।

माला– अरे इतना रोने की क्या बात है बंसी । संभालो अपने आप को अब आजकल फोन इंटरनेट के जमाने में कोई दूरी तो बीच में रह नहीं गई है ,फोन लगा लो ना सर को।।

बांसुरी- जब से टैक्सी में बैठे हैं उसके 10 मिनट बाद से लगातार उन्हें फोन लगा रही हूं उनका फोन लग ही नहीं रहा।।

माला– अरे नेटवर्क नहीं होगा यार तुम तो जबरदस्ती परेशान हो रही हो।। चलो चल कर कुछ खा लो।।

बांसुरी– अभी तो हमसे कुछ खाया नहीं जाएगा    माला,, जब तक राजा मुंबई पहुंच कर हमें  एक बार फोन नहीं कर लेते।।
        तुम परेशान मत हो,, तुम सो जाओ हम अपने कमरे में जा रहे हैं।।

     बांसुरी जैसे ही अपने कमरे में गई पलंग पर रखें सुबह के सारे शॉपिंग के सामान को देखकर उसका दिल एक बार फिर से डूबने लगा।
       उसने सारा सामान उठाकर अलमारी में सलीके से रख दिया और दोनों अंगूठियों को अपनी अलमारी के लॉकर में रख कर उसे लॉक कर दिया।।

   कपड़े बदल कर ,हाथ मुंह धोकर अपने बेड पर बैठ कर उसने एक बार फिर राजा को फोन मिलाया,, राजा का फोन नहीं लगा!!

**************

इधर टैक्सी में बैठने के बाद राजा ने तुरंत युवराज भैया को फोन लगाया।।
        भैया ने जो कुछ भी उसे बताया उसके बाद उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।।

********
 
       प्रिंस इधर कुछ समय से जमीन की दलाली का काम  कर रहा था।। इसी सिलसिले में अक्सर उसका कई तरह के लोगों से मिलना जुलना हुआ करता था शहर में जमीन का कारोबार धीरे-धीरे बहुत ज्यादा पांव पसार चुका था। यह काम देखने में जितना सीधा साधा था अंदर से उतना ही काला था जमीन माफिया एक तरह से पूरे शहर को अपने अंदर समेट चुका था।।
     हर नए व्यक्ति को यही लगता की भूमि क्रय विक्रय करने वाले अपना स्वतंत्र कारोबार कर रहे हैं ऐसे एकाध नहीं कई बिल्डर कई ठेकेदार शहर में अपना अपना ऑफिस डाले पड़े

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थे।।
       प्रिंस के रिश्ते के मामा भी इसी तरह जमीन की ठेकेदारी का काम किया करते थे उन्हीं की संगत में प्रिंस ने इस काम को शुरू किया था।। शुरू शुरू में उसे यह काम बहुत आसान लगा,, कोई भी अच्छी जमीन देख कर उसके लिए ग्राहक जुगाड़ना और फिर जमीन के मालिक से ग्राहक की अच्छी डील करवा कर जो बीच में फायदा मिलता उसका पूरा पूरा लाभ उठाना।।
        इस काम में मेहनत तो जरूर थी लेकिन पैसा भी उतना ही था,, दूसरा शिक्षा दीक्षा और डिग्री कि इस काम को करने के लिए कोई आवश्यकता नहीं थी ।इसलिए भी प्रिंस को यह काम बहुत भा गया था
शुरू में जितने उत्साह से वह इस काम से जुड़ा था उतने ही उत्साह से वह आगे बढ़ता जा रहा था।।
     प्रिंस के उत्साह को हवा देने में मामा जी पूरी तरह आगे थे हालांकि  मामा जी को भी इस व्यवसाय से जुड़ी बड़ी कठिनाइयों का उतना पता नहीं था ,,पर फिर भी इतना समझते थे कि तालाब में रहते हुए मगरमच्छों से बैर नहीं किया जा सकता।। इसलिए वह अपने ऊपर काम कर रहे हैं भूमि ठेकेदारों को गाहे-बगाहे तोहफे के रूप में कुछ ना कुछ भेंट चढ़ाते रहते थे और खुश रखते थे।।
        राजा नौकरी लगने के बाद से अपने बैंक में व्यस्त था इसलिए प्रिंस के कामों का लेखा-जोखा उसे भी कुछ अधिक मालूम नहीं था।।। इधर अचानक एक दिन मामा जी ने प्रिंस को एक जमीन का टुकड़ा दिखाया जो एक किसी पुरानी बनी कॉलोनी के बीचों-बीच स्थित था,, उसके आजू-बाजू दो घर थे और वह जमीन का टुकड़ा लगभग 40- 50 साल से अनाथ की तरह पड़ा हुआ था।।
      पटवारी कार्यालय से लेकर जिन जिन कार्यालयों में जो जो जानकारियां मिल सकती थी प्रिंस ने उस जमीन के बारे में सारी जानकारियां निकलवाई , और उस जमीन का कोई भी अधिपति पकड़ में नहीं आया इस प्रकार उस बेनामी जमीन को प्रिंस ने अपने मामा के कहने पर एक फर्जी नाम से रजिस्टर करवा कर उस नाम को उस जमीन का मालिक साबित कर दिया।।
         और फिर उस मालिक से खुद जमीन खरीदने के फर्जी पेपर तैयार करके उस जमीन को अच्छी ऊंची कीमतों पर किसी दूसरे व्यक्ति के हाथों बेच दिया।।
      इस पूरे वाकये में राजा का नाम इस प्रकार दाखिल हुआ की जमीन को पहले मालिक से खरीदने और बाद में दूसरे व्यक्ति को बेचने के लिए जहां पर गवाहों की जरूरत थी वहां पर राजा ने भी दस्तखत किए थे ,,हालांकि कुछ गलती राजा की भी थी क्योंकि उसने दस्तखत करते समय ना तो पेपर की तफ्तीश की और ना ही इस फर्जीवाड़े के बारे में कोई भी पूछताछ की,  उसे बातों बातों में प्रिंस ने बस यह कहा कि यह उसके मामा की एक पुरानी जमीन थी जिसे वह उनसे खरीद कर किसी दूसरे को बेच रहा है।। बात प्रिंस की थी इसलिए राजा ने कोई अविश्वास नहीं किया और अपना सील साइन कर दिया।।
     प्रिंस को भी अपने मामा जी के ऊपर पूरा भरोसा था उसे लगा कि यह वाकई  चारों तरफ की नाप जोख में छूटी हुई बची जमीन का टुकड़ा है जिसका असल में कोई भी स्वामी नहीं है और इसीलिए उसने भी राजा को कुछ ज्यादा बताने की जरूरत नहीं समझी और  उससे दस्तखत ले लिए।।

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      राजा इन सभी बातों से अनजान था अपनी नौकरी में व्यस्त राजा को जब पुणे एक टीम के साथ भेजे जाने का प्रस्ताव आया तो वह उस टीम का हिस्सा बनने के लिए पुणे के लिए निकल गया इसी बीच में एक दुर्घटना घट गई।।

       राजा के मोहल्ले के दूसरी तरफ एक और मोहल्ला था जहां निरमा रहा करती थी वहां पर चौक की पंचायत को पूरा करने के लिए जो पंचों की सभा थी गुड्डा उनका सरदार था।। गुड्डा सालों से मन ही मन राजा से जला करता था ।।बहुत पहले जब निरमा और प्रेम के बारे में पता चला था तब गुड्डा अपनी फौज के साथ जिम चला आया था राजा से लड़ने… और राजा के हाथों एक झापड़ खा कर ही उसे सौ आसमानो के दर्शन हो गए थे और उसके बाद से ही उसने मन ही मन कसम खा ली थी कि कैसे भी हो वो राजा की हस्ती मिटा कर रहेगा।।

    समय बीतता गया राजा की मित्र मंडली भी कहीं ना कहीं किसी न किसी काम में व्यस्त हो गई,, राजा खुद अपनी पढ़ाई लिखाई के बाद बैंक में व्यस्त हो गया।।।
          गुड्डा और उसकी मित्र मंडली भू माफिया के साथ मिलकर काम करने लग गए गुड्डा खुद भी जमीन की ठेकेदारी के काम और शराब के ठेके से जुड़ गया अपने सारे व्यसनों को पूरा करते हुए भी उसने अपने मन से राजा के प्रति बैर को मिटने नहीं दिया….. बल्कि पाल पोस कर अपने मन में पलती दुश्मनी को उसने तिल से ताड़ बना लिया।।।।

      प्रिंस की बेगानी जमीन की खरीद-फरोख्त वाली बात नहीं खुलती अगर प्रिंस खुद पी पिलाकर गफलत में किसी दिन अनजाने में गुड्डा के किसी दोस्त से सब कुछ बोल ना बैठता,, पर कहते हैं ना विनाश काले विपरीत बुद्धि प्रिंस के साथ भी वैसा ही कुछ हुआ।।
        काम के अतिरिक्त दबाव और मिलने वाली अति अतिरिक्त पैसों की गर्मी से प्रिंस ने  अपने व्यक्तित्व को भुला दिया।। किसी शाम गुड्डा के किसी चेले के साथ ठेके के बाहर पी  पिलाकर उसने वह सब बातें भी बक दी जो उसे कभी नहीं बोलनी चाहिए थी।।

     गुड्डा शुरू से ऐसे ही किसी मौके के इंतजार में था गुड्डा के चेले ने जैसे ही गुड्डा को सारी बातें बताई  वह खुशी से झूम उठा इस सारे कारनामे में राजा का हस्ताक्षर होना ही बहुत था।। रिजर्व बैंक के पदाधिकारी का इतना गैरज़िम्मेदाराना व्यवहार सहज में क्षम्य नही था।।
 
     गुड्डा ने उस जमीन की खरीद-फरोख्त से संबंधित दस्तावेजों के खिलाफ पटवारी कार्यालय में शिकायत दर्ज कर दी….
        और यह शिकायत मुख्य रूप से की गई थी रिजर्व बैंक के ऑफिसर राजकुमार अवस्थी के खिलाफ।।
       पटवारी कार्यालय में रोज-रोज के मिलने जुलने के कारण प्रिंस के कई गुर्गे भी थे जिन्होंने प्रिंस को इस बाबत तुरंत ही सूचना दे दी प्रिंस ने जैसे ही यह सब सुना अपना सिर धुन के रह गया ।
….वह तुरंत भागा भागा युवराज भैया के पास गया और उन्हें सब कुछ बता दिया युवराज ने अपने व्यापारिक और छुटपुट नेताओं से संधि संबंधों का फायदा उठाते हुए पटवारी कार्यालय पर दबाव डलवा कर कुछ समय के लिये उस शिकायत की फाइल को दबवा दिया,लेकिन भविश्य में इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है इससे आशन्कित प्रिंस रातों रात अपने घर से गायब हो गया।

     दो दिन तक भी जब प्रिंस घर नही पहुंचा तब उसकी खोज मचनी शुरु हुई,, राजा तो तब वहां था नहीं, प्रेम भागा भागा युवराज भैया के पास ही पहुंचा और प्रिंस के गायब होने की खबर दी युवराज तुरंत प्रेम के लिए प्रिंस को ढूंढने निकल पड़ा।।
     
        युवराज का भी असल काम तो ब्याज का ही धंधा था जिसकी वसूली के लिये भी उसके पास कुछ दो तीन लोग अलग से मौजूद थे,, यह ऐसे लोग थे जिन्हें पूरे शहर के चप्पे-चप्पे की खबर थी युवराज को इस चीज का फायदा मिला दो से तीन फोन करते में ही उसे प्रिंस कहां है इस बात की खबर मिल गई वह प्रेम को लिए शहर से बाहर की पुरानी सी खंडहर हवेली में पहुंच गया ।।प्रिंस लगभग 2 दिन से वहां बिना खाए पिए छुपा बैठा था उसकी यह हालत देख युवराज को उस पर तरस आ गया।।

     युवराज को शुरू से ही प्रिंस की कोई गलती नहीं लगी थी लेकिन अपने ही मन में सोच सोच कर प्रिंस ने स्वयं को गुनाहगार मान लिया था उसे यह लगने लग गया था कि उसके कारण ही राजा के बने बनाए कैरियर पर धब्बा लग सकता है ।।
    अपने ही मन से परेशान अपने आप से दुखी प्रिंस अपने आप को सजा दे रहा था युवराज और प्रेम को एक साथ आते देख उसे लगा यह लोग उसे पकड़कर मारेंगे पीटेंगे डरा धमकाएन्गे, और फिर पुलिस के हवाले कर देंगे…. इन सब से बचने के लिए वह वहां से उठकर भागने लगा युवराज ने उसे आवाज दी और लगातार समझाने की कोशिश की कि वह उसे माफ कर चुका है और वह इस प्रकरण में प्रिंस कि कहीं पर भी गलती महसूस नहीं करता,, और भागकर आखिरकार प्रेम और युवराज ने प्रिंस को पकड़ लिया रोते-रोते प्रिंस ने युवराज के पैर पकड़ लिये और माफी मांगने लगा।।

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    युवराज ने अपने संबंधों का हवाला देते हुए प्रिंस को किसी से भी ना घबराने की सलाह दी और घर वापस लौट जाने को कहा।। बहुत देर बाद रो धोकर अपने मन का बोझ उतारने के बाद प्रिंस भी घर वापसी के लिए तैयार हो गया ।।प्रिंस प्रेम और युवराज वहां से निकले ही थे कि गुड्डा अपने कुछ गुंडों के साथ उधर से निकला और  युवराज और प्रिंस प्रेम को देखकर वहीं रुक गया , युवराज को उसने वहीं खड़े-खड़े धमकी दे डाली __

” कान खोल कर सुन लो प्रिंस जो कांड किए हो ना तुम बहुते बढ़िया किए हो ,,,अब इसके बाद तुम्हारे राजा भैया को तुम्हारे युवराज भैया क्या ब्रह्मा भी नहीं बचा सकते अभी भले  केस को दबा दिया तो क्या हुआ,, क्या हम बहरे गूंगे हैं जो कुछ ना कर सकेंगे ।।2 दिन के अंदर अंदर उ केस हम फिर नहीं खुलवा दिए तो हमारा नाम गुड्डा नहीं,, समझे “”

  प्रिंस शुरू से ही कमजोर दिल था उसने हमेशा से ही अपना सहारा राजा में ही ढूंढा था।। उसकी हर कमजोरी को राजा ने संबल बनकर सहारा दिया था।। और आज पहली बार उसके कारण उसके प्रिय नायक के व्यक्तित्व पर करारी चोट लग रही थी प्रिंस  ये सब सह नहीं पाया ,उसने गुड्डा की शर्ट में छिपा कर रखी कटार छीनी और उस से अपनी गरदन की नस काट ली।।

     यह सब इतना अकस्मात हुआ कि किसी को कुछ सोचने का अवसर ही नहीं मिला गुड्डा और उसके साथी यह सब देखते ही वहां से अपनी-अपनी गाड़ियों में भाग खड़े हुए।। शहर से इतनी बाहर युवराज और प्रेम अकेले प्रिंस को तड़पता देख परेशान हो गए,, उन्होंने उसे तुरंत युवराज की गाड़ी में लादा और अस्पताल की ओर भाग चले प्राइवेट अस्पताल में उसे भर्ती करने से मना करते हुए तुरंत ही मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया।। वहां से युवराज और प्रेम उसे ले एक  सरकारी हॉस्पिटल की तरफ भाग चलें, सरकारी हॉस्पिटल में डॉक्टर सर्जन सब ने तुरंत ही प्रिंस को भर्ती कर लिया और गहन शल्य चिकित्सा कक्ष में उसकी शल्य चिकित्सा प्रारंभ कर दी,, लेकिन बाहर आकर यह भी कह दिया की स्थिति गम्भीर है इसलिए अभी कुछ भी कह पाना मुश्किल है ।।प्रिंस के घर पर उस वक्त कोई नही था,सभी किसी शादी में सम्मिलित होने गांव गये हुए थे इसलिए प्रेम ने युवराज भैया से गुजारिश की कि अभी कुछ समय तक उसके घर पर कुछ नहीं कहा जाए ।।।2 घंटे की मशक्कत के बाद डॉक्टर बाहर आए और कहा कि खून बहना तो बंद हो गया है, ऑपरेशन भी सफलतापूर्वक हो गया है लेकिन फिर भी एक बार अगर दिल्ली एम्स में  दिखा दिया जाए तो बेहतर होगा क्योंकि अभी भी,  कभी अचानक  आंतरिक रक्तस्त्राव शुरू हो सकता है जो मरीज के लिए खतरनाक साबित हो सकता है यहां पर सुविधाओं का अभाव होने से इसे दिल्ली एम्स में दिखाना बेहतर होगा।। अगले 72 घंटे बहुत ही क्रिटिकल है लेकिन इन्हीं  घंटों में उसका एम्स पहुंचना भी जरूरी था युवराज ने बिना समय गंवाये प्रेम और एक डॉक्टर को साथ लिये दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया ।।

      सब कुछ इतना आनन-फानन हुआ कि युवराज ने अपने घर पर भी किसी को कुछ भी नहीं बताया सबको बस यह कह कर कि दिल्ली कुछ आवश्यक कार्य से जा रहा हूं ,,पैसे एटीएम और चेक बुक लेकर प्रेम के साथ दिल्ली के लिए निकल गया दिल्ली पहुंचने के बाद उसने राजा को फोन किया।।

    युवराज को यह मालूम था कि राजा का पुणे में 5 दिन का काम है और छठवें दिन वह मुंबई से रात की फ्लाइट लेने वाला है उसी समय पर युवराज ने राजा को फोन किया और यह कहा कि कानपुर की जगह वह दिल्ली चला आये।। फोन पर प्रिंस की हालत बताना युवराज को सही नहीं लगा इसलिए उसने राजा से  अधिक कुछ भी नहीं कहा।।

     पुणे से टैक्सी में बैठने के बाद राजा ने जब युवराज को फोन किया और उससे यह सारी बातें और प्रिंस की गंभीर अवस्था के बारे में पता चला तो राजा के पैरों तले जमीन खिसक गई।।।

    राजा ने प्रिंस को सदैव एक छोटे भाई की तरह ही प्रेम किया था।। अभी भी उसे अपना नाम जमीन में फंसने से कहीं ज्यादा चिंता प्रिंस के स्वास्थ्य को लेकर थी ,भगवान से बार-बार यही मनाते हुए कि किसी भी तरह प्रिंस की जान बच जाये वो मुंबई की ओर कूच कर गया ।।
     युवराज भैया से बात करने के बाद थोड़ी देर तक राजा को किसी बात का होश ही नही रहा,,उसे पता ही नही चला की भैया से बातें करते कब वो रोने लग गया।।
      बचपन से लेकर अभी तक की सारी बातें राजा की आंखों के सामने से घूम गई।।
     प्रिंस का हर बात में राजा की तरफदारी करना, हमेशा उस का साथ देना, उसके हर कष्ट से स्वयं  दुखी होना,, राजा की आंखे भिगो गया।।

     बचपन में भी कभी जब राजा अपने पिता के कोप का भाजन बनता था तो अनिवार्य दंड स्वरूप मिलने वाले चप्पलों के प्रसाद में राजा के साथ प्रिंस का भी बराबर का हिस्सा होता था।।
    प्रिंस का निस्वार्थ अबाध प्रेम राजा की आंखों से अविरल बहता चला गया।।

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    सारी बातें सोचते सोचते उसे प्रिंस की उन बातों की भी याद आने लगी जब वह जिम में आने वाली बांसुरी का पूरा पूरा सहयोग किया करता था।। असल में तो प्रिंस ही था जिसने शुरू से बांसुरी को सम्मान की दृष्टि से देखा था…. राजा तो बहुत बाद में बांसुरी का मित्र बना पर जिम में आने के बाद बांसुरी और प्रिंस की दोस्ती  ही पहले हुई थी ।।
    यह सब सोचते ही अचानक उसे बांसुरी की याद आ गई उसे याद आया कि उसने टैक्सी में बैठने के बाद से बांसुरी से बात ही नहीं की,, ऐसा ध्यान आते ही उसने सीट में पड़े अपने मोबाइल की तरफ देखा और बांसुरी को फोन लगाने के लिए मोबाइल उठा लिया।।

      सुबह से घूमते फिरते इधर-उधर उधर डोलते उसे फोन को चार्ज करना याद ही नहीं रहा था।। फोन पूरी तरह से डिस्चार्ज होकर बंद पड़ा था ,,उसे बैटरी बैंक का ध्यान आया अपने बैग में उसने बैटरी बैंक को ढूंढा पर वह मिला नहीं ,,उसे समझ आ गया एक रात पहले उसके होटल के कमरे में ही चार्जिंग प्लग में लगा पड़ा बैटरी बैंक छूट गया है।।।

    टैक्सी वाले से फोन मांग कर बांसुरी को फोन करना उसे सही नहीं लगा ।।अब तो एक ही उपाय था मुंबई के एयरपोर्ट में पहुंचने के बाद ही फोन को चार्ज किया जा सकता था,, और फोन के चार्ज होने के बाद ही बांसुरी से बात की जा सकती थी।।
      फिलहाल और कोई उपाय ना देख राजा ने सीट में पीछे सिर टिकाया  और आंखें बंद करके प्रिंस को याद करने लगा।

  क्रमशः

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

3 विचार “शादी.कॉम – 29” पर

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