जीवनसाथी -125

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जीवनसाथी – 125

   
   

जल्दी जल्दी हाथ चलाती पिया घर समेट रही थी कि दरवाज़े पर दस्तक हो गयी। और उसका दिल धक से रह गया।
   ” नहीईईई ….  उसे सरप्राइज देने के लिए कहीं मंत्री जी अस्पताल में पता करके उसे ढूंढते यहाँ तो नही चले आये।
   हे भगवान! ऐसे फ़िज़ूल स्यापे उसी की किस्मत में क्यों लिखें हैं।।।
    अब इतना तबाहो बर्बाद घर देख कर समर के दिल का रोमांस हवा न हो जाये।
  वो सोच ही रही थी कि वापस कॉल बेल बज गयी….
  उसने धड़कते दिल से जाकर दरवाज़ा खोल दिया…
  सामने समर खड़ा था!!!
 
   ” मुझसे तो कहा कि एक केस है और वक्त लगेगा?”

समर के सवाल पर पिया ने उसे आंखे तरेर कर देखा..

” हाँ तो जब मैंने ऐसा कहा फिर आप अस्पताल क्या करने आ गए?”
“माँ को लेकर आया था। फिर वहां पता चला कि तुम अभी ही घर निकली हो तो माँ का चेकअप करवाने के बाद उन्हें घर छोड़ सीधा फ्लैट पर चला आया।”
  
बात करते करते वो भीतर चला आया, और अंदर का नज़ारा देख वो चुटकी में सब समझ गया।

” अच्छा तो डॉक्टर साहिबा इसलिए भाग कर घर चली आयीं?”
   पिया अपना सा मुहँ लेकर रह गयी।
” अरे इतना सोचने और परेशान होने की बात नहीं है चलो हम मिलकर सफाई करते हैं। मैं वैसे भी साफ सफाई में मास्टर हूं।”
” आप तो हर काम में मास्टर हैं मंत्री जी। गधी तो मैं ही हूँ। मन ही मन सोच कर ऊपर से पिया कुछ बोल नही पायी।
   उसने लाचारगी से समर को देखा और झाड़ू उसके हाथ में थमा दी।
     डस्टिंग झाड़ू पोंछा कर दोनों ने मिलकर सारे घर को चमका दिया।
   दो बड़े गार्बेज बैग तैयार कर पिया ने पीछे की बालकनी में रखे और अपने ही फ्लैट को निहारती खड़ी रह गयी।
   मंत्री जी ने तो वाकई उसका घर संवार दिया था।
वह मुस्कुराकर हाथ बांधे खड़े अपने घर को देख रही थी कि समर ने आकर उसके कंधे पर हाथ रख दिया…
” क्या हुआ किस सोच में गुम हो गई? “
  ना में सर हिला कर पिया ने मुस्कुरा कर उसे देखा……-” आप यहां बैठिए मैं बस यूं गई और यूँ आई।”
” अब कहाँ चल दीं आप?”
” सुबह से भाग दौड़ रही हूं। अब थोड़ी थकान सी लग रही है । बस फ्रेश होकर नहा कर आती हूं। आप बैठिये आकर आपको एक बेहतरीन सी कॉफी पिलाऊंगी।”
   हां में सिर हिला कर समर वहीं सोफे पर पसर गया और सामने रखे टीवी को चला लिया। मुस्कुराती गुनगुनाती हुई पिया बाथरूम में घुस गई।
     नहा कर तैयार होकर अपने गीले बालों को झाड़ती पिया बाहर चली आई…. समर उसे देख शरारत से मुस्कुरा उठा। पिया ने उसे बैठने का इशारा किया और रसोई में घुस गई अभी वह कॉफी फेंट रही थी कि समर ने आकर उसे पीछे से अपनी बाहों में समेट लिया।
” थोड़ा तो इंतेज़ार कीजिये।”

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“इतनी देर से और क्या कर रहा था? तुमने क्या सोचा, मैं तुम्हारे घर पर क्राइम पेट्रोल देखने आया हूँ।”
बाँसुरी अपनी जीभ काट कर रह गयी। और उसकी तरफ मुहँ फेर कर उसे अपनी बाहों में भर लिया। समर ने पिया का चेहरा अपने हाथों में लिया ही था कि समर का फोन बजने लगा। समर ने पिया को बाहों में कैद किये हुए ही अपनी जीन्स की जेब से फोन निकाला और फ़ोन पर आ रहे नम्बर को देखते ही जैसे उसे कुछ बेहद ज़रूरी सी बात याद आ गयी।
उसने फ़ोन कान से लगाया और झटके से पिया को छोड़ बात करते हुए बाहर आ गया।
  समर ने फोन पर बात करने के बाद फोन रखा और पलट कर उसकी तरफ देख कर कंधे उचका दिए….
” अब तो जाना पड़ेगा डॉक्टर साहिबा एक बहुत जरूरी फोन कॉल था तुरंत पहुंचना है मुझे। “
” अरे यार यही तो सही नहीं लगता मुझे। आपके काम का कोई टाइम है या नहीं। बस वक्त बेवक्त कभी भी फोन चला आता है। एक मजदूर के भी काम करने का एक वक्त तय होता है उसके बाद मजदूर को भी छुट्टी दे दी जाती है।”
” काश हम भी मजदूर होते लेकिन हम मजदूर नहीं मंत्री जी हैं तो जाहिर है जिम्मेदारियां भी थोड़ी ज्यादा तो होंगी ही। “
” नहीं अभी नहीं जाएंगे आप प्लीज मंत्री जी, थोड़ा तो रुक जाइए बस कॉफी भी रेडी है।”
” तुम कॉफी पी लो तब तक मैं आता हूं। “
” पक्का वापस आएंगे आप।
” हां हां पक्का! आधी रात भी हो गई ना तब भी आऊंगा बस इंतजार करते रहना।”
पिया के माथे को चूम कर समर बाहर निकल गया। और उसके लिफ्ट में दाखिल होते तक पिया वहीं दरवाज़ा पकड़े खड़ी रह गयी।
     
शाम ढली रात हुई और पिया इंतजार करती रह गई। उसके दिल के किसी कोने को भी मालूम था कि समर इतनी व्यस्तता में भी उससे मिलने के लिए थोड़े से सुकून के पल चुरा कर ले जरूर आया था, लेकिन वह वापस उन पलों को इतनी जल्दी नहीं ला पाएगा।
   मुस्कुरा कर उसने एक बार अपने सारे घर को देखा और टीवी चला कर बैठ गई थैंक्यू मंत्री जी कम से कम आपने आकर मेरे घर को संवार तो दिया। 
कहते हैं औरत लक्ष्मी का रुप होती है और जिस घर में जाती है उसे संवार देती हैं । लेकिन आप साक्षात विष्णु जी का रूप है मेरे घर में आए और उसे संवार कर चले गए।

बहुत देर तक यहाँ वहाँ समय गुजारने के बाद आखिर पिया ने फ्रिज से एक कोल्डड्रिंक की बोतल निकाली एक चिप्स का पैकेट खोला और अपनी फैंसी सी ड्रेस बदल कर नाइट सूट में सोफे पर कूद गई।
टीवी पर इधर से उधर टहलती पिया आखिर अपने प्रिय शो पर आकर ठहर गयी।
और शो का एंकर चिल्ला चिल्ला कर कहता रहा …सावधान रहिये ! सुरक्षित रहिये!!



*****


वक्त बीतते वक्त नही लगता।

रेखा ने पूरी शिद्दत से अपनी बहन का करोबार संभाल लिया। ज़मीन की खरीद फरोख्त में केसर अपने पैसे बढ़ाती ज़रूर थी पर उसका पसंदीदा काम कपड़ो का ही था।
जगह जगह से कच्चा माल लाकर अपने यहाँ कपड़े तैयार करवा कर उन्हें मार्किट में उतारने को उसके अपने शो रूम थे।
रेखा के लिए प्रोडक्शन से लेकर मार्केटिंग सारा कुछ नया था। कई बार वो बुरी तरह थक जाती लेकिन फिर अगले दिन से नए सिरे से अपने आपको बेहतर बनाने में जुट जाती।
जब से उसने खुद को काम में डुबो दिया था, अब उसका ध्यान विराज की बेपरवाही पर भी नही जाता था।
अपना कामकाज और बेटे की परवरिश इससे इतर रेखा ने कुछ भी सोचना छोड़ दिया था और शायद उसके इसी रवैया का विराज पर असर दिखने लगा था।
केसर का काम जमीन की खरीदी का भी था वह अक्सर किसानों से उन्हें उनके हिसाब से अच्छा मूल्य देकर खेती वाली जमीन के बड़े बड़े टुकड़े खरीद लिया करती और फिर उन्हें अलग-अलग टुकड़ों में काटकर बड़े-बड़े लोगों को बेच दिया करती थी। इसी में उसका एक पुराना केस फंसा हुआ था और उसी सिलसिले में एक बार पूछताछ के दौरान रोहित को महल में आना पड़ा।
केस ऐसा कोई बहुत पेचीदा नहीं था क्योंकि जमीन के धंधे में यह अक्सर देखा जाता है कि किसान अपनी रोड पर से जुड़ी जमीने निकालकर पीछे की तरफ नहर या नदी तरफ की जमीन खरीदने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं । और इसी बात का फायदा जमीन का धंधा करने वाले उद्योगपति उठा लेते हैं।
गलती यहां केसर की नहीं बल्कि केसर से जमीन को खरीदने वाले लोगों की थी जिन्होंने जमीन के कुछ कागजातों में कुछ गड़बड़ी की थी।
रोहित किसी तरह भी यह नहीं चाहता था कि रेखा इन सब मामलों में फंसे और उसे थाने कचहरी के चक्कर लगाने पड़े और इसीलिए वह एक बार में उससे मिलकर सारे लीगल कागज जांच परख लेना चाहता था।
और इसीलिए रोहित को रेखा से मिलने महल में आना पड़ा हालांकि रेखा से मिलने के बाद उसे यह समझ में आया कि रेखा उन जमीन से जुड़े कागजातों के बारे में कुछ भी नहीं जानती…-” सीरियसली रोहित हम इन जमीनों के बारे में कुछ भी नहीं जानते…. अभी हमने केसर दीदी का कारोबार संभालना शुरू ही किया है! और अभी तो हमारा पूरा फोकस उनके कपड़े के कारोबार पर ही है। हां इस बारे में पिता साहेब तुम्हारी शायद कोई मदद कर सके।”

” इस वक्त कहां मिलेंगे वह?”

” पिता साहब भी इसी शहर में है और वह अपने घर में शिफ्ट हो चुके हैं। तुम चाहो तो हम तुम्हें वहाँ लेकर चल सकते हैं।”

” श्योर!! तो अगर इस वक्त बिजी नहीं हो तो क्या हम अभी चल सकते हैं?”

” हां!! हम अभी ऑफिस के लिए ही निकल रहे थे। चलो तुम्हें पहले पिता साहेब से मिलवा देते हैं उसके बाद हम ऑफिस निकल जाएंगे।”

” हम्म लेट्स गो।”

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रूपा भाभी से अनुमति लेकर रेखा रोहित के साथ घर से निकल गई। उसी वक्त विराज कहीं से घूम घाम कर वापस आ रहा था। उसने एक नजर रेखा के साथ जाते रोहित को देखा और वापस मुड़कर अपने कमरे में चला गया। फिर जाने क्या सोचकर वह वापस निकल आया और अपनी गाड़ी में बैठा उनकी गाड़ी का पीछा करने लगा।

रेखा को अपनी गाड़ी खुद चलाना पसन्द था, और इसलिए वो ड्राइवर को साथ नही लिया करती थी। उस दिन भी रोहित को साथ लिए रेखा ने अपनी गाड़ी निकाल ली…-” मैं ड्राइव कर सकता हूँ?”
” क्यों हमारे साथ बैठने में डर लग रहा है ?”
मुस्कुरा कर रोहित ने ना में सिर हिला दिया….
“तुमसे एक बात पूछ सकता हूँ रेखा?”
” इतने फॉर्मल क्यों हो रहे हो रोहित?”
” इसलिए क्योंकि अब तुम शादीशुदा हो, तुम्हारा बच्चा है , बावजूद अगर कभी तुम्हें ये लगे कि तुम अपने पति से परेशान हो और अपनी ज़िंदगी में उसे छोड़ आगे बढ़ना चाहती हो तो बेझिझक आगे बढ़ जाना, मैं अगले मोड़ पर तुम्हारा इंतेज़ार करता मिलूंगा।”
रेखा ने रोहित को देखा…-” थैंक्स रोहित! अब तक हमसे प्यार करने के लिए। लेकिन सच कहें तो अब हमें किसी के कंधों की सहारे की ज़रूरत नही रही। प्लीज़ इसे हमारा घमंड मत समझना लेकिन जाते जाते हमारी दीदी सा ने हमारी ज़िंदगी भर का इंतज़ाम कर दिया। अब हम खुद में और अपने काम में इतने व्यस्त हो गए हैं कि विराज की तरफ ध्यान ही नही जाता। “
” पर ये भी तो गलत है ना? तुम दोनों ऐसे कैसे सारी जिंदगी गुज़ारोगे?”
” होता है, बहुत बार ऐसे जोड़े भी बन जाते हैं जिन्हें नही बनना था। लेकिन ज़िन्दगी सिर्फ इश्क़ मुहब्बत में डूबे रहने का ही तो नाम नही है ना। हमें अब अपने काम से मुहब्बत हो गयी है, और हम तुम्हें यकीन दिलातें हैं अगर विराज हमारी तरफ एक कदम भी बढ़ा सकें तो हम दस कदम उनकी तरफ बढ़ा लेंगे।
” गुडलक रेखा। तुम्हें ऐसे आत्मनिर्भर देख बहुत खुशी हुई। “

बातों ही बातों में केसर का घर भी आ गया।

विराज उनकी गाड़ी का पीछा ही कर रहा था। विराज ने वहीं अपनी गाड़ी थोड़ा दूर पर ही लगा दी और उन दोनों पर नजर रखे रहा। वह दोनों साथ ही अंदर गए और ठीक पांच मिनट बाद ही रेखा वहां से बाहर निकल आई और अपने ऑफिस के लिए निकल गयी। विराज वहीं रुका रहा और रोहित पर नजर रखे रहा आधे घंटे बाद रोहित भी वहाँ से निकल गया । विराज ने वापस रोहित का पीछा किया लेकिन उसका यह पीछा करना किसी मतलब का नहीं रहा । रोहित रेखा के पिता के घर से निकलकर सीधे अपने थाने पहुंच गया।
विराज बुझे मन से महल वापस लौट गया। उसका एक मन खुश था कि रेखा उसे धोखा नहीं दे रही। लेकिन दूसरा मन रेखा और रोहित को साथ देखकर खुश नही हो पा रहा था।
उसने आज तक रेखा के लिए कभी ऐसा कुछ भी महसूस नहीं किया था और इसीलिए उसने अपने सर को झटका दिया और वापस महल पहुंचने के बाद अपने आप को शराब में डूबोने के लिए पैग तैयार करने लगा। फिर जाने उसके मन में क्या आया, की उसने वो गिलास उठा कर बाहर फेंका और बाथरूम में नहाने घुस गया।
नहा कर उसे कुछ ठीक लग रहा था, और अब वो भी राजा के ऑफिस पार्टी मीटिंग में जाने को तैयार था।
आईने के सामने खड़े विराज ने हाथों में घड़ी बांधते हुए खुद को देखा। आखिर क्या कमी है उसमें? उसके जैसी ज़िन्दगी पाने के लिए भी लोग तरस कर रह जातें हैं।
उसने एक बार फिर खुद को देखा और पार्टी कार्यालय के लिए निकल गया।
एक ही बार में उसका पूरी तरह बदल जाना मुमकिन नही था लेकिन एक छोटी सी शुरुवात हो चुकी थी।

******

पिंकी को महल से वापस लौटे एक लंबा समय बीत चुका था। घर परिवार और बच्चे में वह इतनी व्यस्त हो गई थी कि उसके पास खुद के लिए समय बचना बंद हो गया था। और इसी वजह से शायद वह रतन पर बिना बात के बेवजह नाराज होने लगी थी।
उस शाम भी रतन थका हारा अपनी टीएल मीटिंग से वापस आया ही था कि पिंकी ने गोलू की शिकायतें लगाना शुरू कर दिया…-” हमारी कोई बात नहीं सुनता है यह लड़का इतना जिद्दी हो गया है । सारा दिन इधर से उधर भागता रहेगा और हम इसके पीछे इसका खाना लेकर भागते रहते हैं। “

रतन ने आगे बढ़कर अपने बेटे को गोद में उठा लिया और प्यार से उसे डांट लगाने लगा…-” बहुत शरारती हो गए हो आप देखो मॉमा क्या कह रही है?”

बच्चे को इन सब से क्या लेना देना था? और उसे क्या समझ आना था। उसके लिए तो अभी सारा संसार उसके खेल का मैदान था और हर सामने आने वाली वस्तु उसका खिलौना। वह अपने पापा के साथ भी खेलने लगा और उसे इस तरह हंसते मुस्कुराते देख रतन भी उसके साथ खेल में लग गया। उसने रतन की पेन जेब से निकाल कर फेंकी जो सीधा जाकर पिंकी के माथे पर लगी और पिंकी एक बार फिर उन दोनों पर नाराज होने लगी…-” हद करते हैं आप दोनों बस कीजिए हमें जोर से लग गई है। ”
पिंकी की आंखों से आंसू छलक आए और वह अपना माथा थामे वहीं सोफे पर बैठ गई। रतन पिंकी की ऐसी हालत देख घबरा गया और तुरंत बच्चे को नैनी के हाथों में सौंप कर उसके पास आकर बैठ गया…-” पिंकी एक बात कहूं बुरा तो नहीं मानोगी। ”
पिंकी डबडबाई आंखों से रतन को देखने लगी और इशारे से ही सिर हिला कर उसे कहने की इजाजत दे दी।
” मैं यह कहना चाहता हूं मेरी जान, कि तुमने अपना यह क्या हाल बना रखा है? तुम ऐसी तो कभी नहीं थी। महलों में पली हुई राजकुमारी जिसका एकमात्र सपना था कलेक्ट्री, वह अपना सपना भूल कर अपने आप को एक सामान्य सी औरत कैसे मान बैठी है? देखो अगर तुम अपनी हाउसवाइफ की जिंदगी में भी खुश रहती तो तुम मेरे लिए सामान्य नहीं विशिष्ट होती! लेकिन क्योंकि तुम खुश नहीं हो इसलिए मैं तुमसे कह रहा हूं कि तुम्हें अपनी खुशी के लिए कुछ ना कुछ जरूर करना चाहिए।

अपनी बड़ी-बड़ी पलके झपकाती पिंकी रतन को देखने लगी…-” मैं सही कह रहा हूं बाबू । तुम खुद सोचो कि हमारा मिलना भी तुम्हारे सपने के कारण ही तो हुआ था। अगर तुम कलेक्टर नहीं बनना चाहती, तुम उस कोचिंग इंस्टिट्यूट में दाखिला नहीं लेती तो हम और तुम कभी मिल भी नहीं पाते। लेकिन हमारे उस मिलन का फल क्या निकला ? मैंने तो अपना सपना पूरा कर लिया लेकिन तुम्हारा सपना मेरे सपने के कारण शहीद हो गया। तुमने मेरा घर संवारने के लिए, मेरे कैरियर के लिए, मेरे बच्चे की परवरिश के लिए, अपने कैरियर को दांव पर लगा दिया। लेकिन मैं ऐसा नहीं चाहता पिंकी! मैं आज भी चाहता हूं कि तुम पढ़ाई करो। मैं तुम्हें अपनी बराबरी पर बैठे देखना चाहता हूं । बल्कि मैं तो तुम्हें अपने आप से आगे खुद से आगे जाते हुए देखना चाहता हूं ।
मेरी इस बात का यह मतलब हरगिज़ ना निकालना कि तुम हाउसवाइफ हो तो मैं तुम्हें खुद से कमतर समझ रहा हूं। तुम आज भी मेरे बराबर बल्कि कहना चाहिए मुझ से कहीं आगे हो । क्योंकि तुमने एक साथ ढेर सारी जिम्मेदारियां संभाल रखी है। और मैं तुम पर एक और जिम्मेदारी लाद देना चाहता हूं । तुम्हारी अपनी खुद की जिम्मेदारी। तुम्हारे सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी।
और बाबू !! मैं तुमसे प्रॉमिस करता हूं कि इस पूरे वक्त में जब तुम अपने एग्जाम की तैयारी करोगी, तुम्हें घर की या बच्चे की कोई जिम्मेदारी उठाने की जरूरत नहीं है। मैं हर उस जगह पर मौजूद रहूंगा जहां तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत होगी।
तुम मुझ पर विश्वास कर सकती हो पिंकी प्लीज मेरे विश्वास को ही एक मौका दे दो। “

पिंकी के मन में भी शायद कहीं दबा छिपा यही जख्म था….. जो उसने अपनी शादी के बाद कहीं गहरे अपने दिल में दबा दिया था। और जो नासूर बनकर अब उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में जहर घोलने लगा था। लेकिन वह नासूर रिसते हुए आंसुओं के रास्ते बह गया और उसने आगे बढ़कर रतन को गले से लगा लिया….-” तुम इतने अच्छे क्यों हो रतन? इतना तो हम खुद को नहीं समझ पाते जितना तुम हमें जानते हो। “

” इसीलिए तो प्रिंसेस , तुम्हारे पति हैं हम। तो मैं यह मान लूं कि अब इससे ज्यादा मुझे तुम्हें कुछ भी समझाने की जरूरत नहीं है, अब तुम मेरी बातों को समझ चुकी हो और कल से ही अपनी पढ़ाई में जुट जाओगी। “

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हॉं में सिर हिलाती पिंकी आंसू पोंछती रसोई में जाने के लिए खड़ी हो गई और रतन ने वापस उसकी बांह थाम ली…-” अब कहां चल दी मेरी प्रिंसेस ? मेरे लिए चाय बनवाने?
पिंकी ने जैसे ही हां में सिर हिलाया रतन ने अपना सर ना में हिलाते हुए अपना हाथ माथे पर मार लिया…-” बुद्धू राम यही तो समझा रहा हूं कि घर के हर एक काम को अपने सिर पर मत लादो । तुम यहां बैठे-बैठे भी हमारे बटलर को हुकुम दे सकती हो ना? इसके लिए रसोई में जाकर एक-एक बात समझाने की जरूरत नहीं है। और इतने सारे हेल्पर के बाद भी तुम्हें लगता है कि तुम्हें और कामगारों की जरूरत है तो बताओ हम अरेंज कर लेंगे । लेकिन अब गंभीरता से अपनी पढ़ाई को अपना लक्ष्य बनाओ और अपने सपने को पूरा करने जुट जाओ। क्योंकि अब मैं तुम्हें सिर्फ एक साल का वक्त दे रहा हूं और इस साल में मुझे मेरी प्रिंसेस कलेक्टर की कुर्सी पर ही चाहिए। “

हां में सिर हिला कर मुस्कुराती पिंकी रतन के गले से लग गई । रतन ने उसे कसकर अपनी बाहों में भींच लिया।

*****

प्रेम गाड़ी पार्किंग में डालकर अंदर घुस ही रहा था कि निरमा की तेज आवाज उसके कानों में पड़ी और वह घबराकर चौक गया। एक बार अपने कपड़ों पर एक पूरी नजर डालकर उसने अपनी जेबें तलाश की उसका मोबाइल भी मौजूद था। कपड़े भी उतने गंदे नहीं थे। फिर निरमा किस पर चिल्ला रही थी? यह सोचता हुआ वह अंदर दाखिल हुआ कि उसे बाहर वाले कमरे को देख कर ही समझ में आ गया कि माजरा क्या था?
आज फिर से मीठी की क्लास लगी थी। जरूर निरमा या तो उसका होमवर्क कराने बैठी थी, या फिर मीठी के किसी यूनिट टेस्ट के नंबर या कॉपी निरमा के हाथ लग गई थी और इसीलिए वह बुरी तरह से मीठी पर बरस रही थी….-” करती क्या हो तुम क्लास में? दिमाग कहाँ घास चरने चला जाता है तुम्हारा मीठी? पढ़ाई लिखाई में बिल्कुल दिल नहीं लगता तुम्हारा। ऐसे लिखता है कोई? यह तुम्हारी हिंदी की हैंडराइटिंग है? ऐसा लग रहा है मकड़ी को इंक में डूबा कर कॉपी पर छोड़ दिया गया और वह कहीं पर भी चलती हुई आगे बढ़ गई और तुम्हारी हिंदी की लिखाई बन गई। इससे तो मैं लेफ्ट हैंड से लिखूं तो ज्यादा सुंदर लिख लूँ।”

” लिख कर दिखाओ मम्मा। “

” यह देखो.. और निरमा फटाफट अपने लेफ्ट हैंड से मीठी की होमवर्क की कॉपी में लिखने लग गई उसने लगभग एक पेज लिख दिया और मीठी बैठे-बैठे मुस्कुराती रही। मीठी की नजर पीछे खड़े प्रेम पर भी पड़ गई। दोनों पापा बेटी ने एक दूसरे को आंखों ही आंखों में कुछ इशारा किया और दोनों चुपचाप मुस्कुराने लगे।
प्रेम ने मीठी को चुप रहने का इशारा किया और दबे पांव भीतर आकर निरमा के पीछे खड़ा हो गया….-” कौन कहता है कि मेरी बेटी का दिमाग कम है?

” अरे आप कब आए ?” निरमा में प्रेम को देखकर एक रूखा सा सवाल किया।

” आए तो बस अभी-अभी हैं लेकिन ऐसी क्या बात हो गई जो आप इतना रूठी हुई है, कि हमारे आने से आपको कोई खुशी भी नहीं हुई। ना चाय पूछा ना पानी? “

” हम्म ! क्या लेंगे आप चाय या कॉफी?” पूछ कर बिना प्रेम का जवाब सुने निरमा उठकर रसोई से पानी से भरा गिलास ले आई और प्रेम के सामने बढ़ा दिया….

निरमा के हाथ से पानी का गिलास लेकर प्रेम ने दो घूंट भरा और मुस्कुराते हुए निरमा को देखने लगा..-” अब तो बता दो किस बात पर इतनी नाराज हो?”

” आपकी शहजादी स्कूल में जो कारनामा करके आइ है ना आप भी सुनेंगे तो पानी पानी हो जाएंगे।”

” तब तो जरूर सुनना चाहूंगा।”

” आज इनकी क्लास में हिंदी लिखने का एग्जाम था! एक पेज इन्हें दिया गया था और बच्चों को बस उस पेज को अपनी कॉपी में उतारना था आधे घंटे के समय में इन मैडम ने ऐसी कॉपी उतारी है आप देखिए क्या आप कुछ भी पढ़ पा रहे हैं एक शब्द भी पल्ले पड़ रहा है। दस नम्बर में से इन्हें डेढ़ नम्बर मिलें हैं वो भी शायद कागज़ कोरा नही छोड़ा इसलिए।”

प्रेम ने आंखें छोटी छोटी करके उस पेज को देखने की कोशिश की और जोर-जोर से ना में सिर हिला दिया

“तो अब बताइए इसे डाँटना चाहिए या नही? मेरी जगह कोई और मां होती ना, तो अब तक इसे कूट के रख देती।
हमारे बचपन का वक्त अलग था। हम तो बिना बात के भी पिट जाया करते थे। लेकिन आजकल के बच्चे इन पर तो हाथ उठाना भी मुसीबत है।”

बहुत गंभीर सा चेहरा बनाकर प्रेम ने हाँ में गर्दन हिला दी और मीठी को देखने लगा। मीठी अपनी स्टडी चेयर पर मजे से झूमती आगे पीछे हो रही थी। और हाथ में पकड़े खिलौने को गोल गोल घुमा कर खेलती जा रही थी।
उसी के पेपर के बारे में उसकी मां इतनी चिंतित थी कि उसके पिता से बहस पर बहस किए जा रही थी। और वह इस बहस से निर्लिप्त अपने में मगन खेल रही थी। और उसकी इसी निर्लिप्तता को देखकर प्रेम को जोर से हंसी आ गई और निरमा का गुस्सा एक बार फिर भड़क उठा…-” हंस लीजिए। खूब हंस लीजिए। लेकिन कल को जब आप की राजदुलारी फेल होकर घर आएगी ना तब मुझसे आकर शिकायत मत कीजिएगा कि निरमा तुमने अपनी बेटी को कुछ नहीं सिखाया कुछ नहीं पढ़ाया।
उस वक्त फिर मुझे ताने नहीं सुनने की इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी मायानगरी चला ले रही हो लेकिन अपने बच्चे को देखने की फुर्सत नहीं है !यह मैं नहीं सुनना चाहूंगी।”

” निरमा ! हमारे जमाने में पढ़ने लिखने वाले होशियार बच्चे एक या दो होते थे । उसके बाद एवरेज 75% बच्चे होते थे। और 25% बच्चे बिलो एवरेज। लेकिन आज की जनरेशन ऐसी है इसमें 75% बच्चे एक्स्ट्राऑर्डिनरी इंटेलिजेंट होने लगे हैं। और जो 25% बचते हैं उसमें से भी 15% एवरेज में आ जाते हैं और बचे 5% ये आते है स्पेशल केटेगरी यानी कलाकार बच्चे। जो अब भी रोबोट नही बने हैं। जो अब भी गुल्ली डंडा, आइ स्पाई, कैरम खेलना चाहते हैं। और सच कहूं तो अगर मेरी मीठी उन पांच प्रतिशत में आती है तो मैं खुशी से उसे गले लगा लूंगा, और कहूंगा बेटा मुझे तुझ पर गर्व है। तुझे जो बनना है बन, जो पढना है पढ़ बस किसी अंधी रेस का हिस्सा मत बनना।”

निरमा ने घूर कर प्रेम को देखा ..-“जरूरी है आपका हर बात में ऐसे इमोशनल हो जाना”

प्रेम ने धीरे से गर्दन ऊपर नीचे की और मुस्कुराकर सिर हिला दिया। निरमा आकर धीरे से उसके कंधों पर सिर टिका कर बैठ गई। दोनों को प्यार से ऐसे साथ में बैठे देख मीठी भी दौड़ कर अपने पापा की गोदी में चढ़ गई…-” मैं कहे दे रही हूं बहुत ज्यादा सर चढ़ा कर रखा है आपने अपनी बिटिया को। “

” हां तो कहो ना । मैंने कब सुनने से मनाही की है। मैं तो पैदा ही तुम्हारी सुनने के लिए हुआ हूँ।।

” अच्छा तो आप कहना चाहते हैं कि मैं इतनी खराब हूं कि दिन भर आपको सुनाती रहती हूं।

” नहीं बिल्कुल नहीं। मैं बस यही कहना चाहता हूं कि भगवान ने मुझे एक मुहँ और दो कान इसलिए दिए हैं कि, मैं कम बोलूं और ज्यादा से ज्यादा सुनूं वह भी सिर्फ अपनी खूबसूरत सी प्यारी सी बीवी की बातें।”

” बस बातें बनवा लो इनसे।”
बनावटी गुस्से के साथ प्रेम को देखती निरमा उठकर रसोई में चाय चढ़ाने चली गई और प्रेम एक बार फिर मीठी के साथ खेलने में लग गया।

*******

जिलाधीशों के लिए तबादले एक बहुत सामान्य बात होती है। बांसुरी को भी ऑफिस ज्वाइन करके थोड़ा वक्त बीत चुका था और इसी बीच उसका वापस दूसरी जगह तबादला कर दिया गया था।
वह अपने ऑफिस में बैठी अपना काम संभाल रही थी की उसका फोन बजने लगा उसने मोबाइल देखा उसकी मां का फोन था….- ” बंसी कहां है बेटा?”

” ऑफिस में हूं माँ। बोलो क्या हुआ?”

” तेरे पापा की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। मैं डॉक्टर के पास ले कर आ गई हूं बेटा। हो सके तो तू आजा। वीना भी पास में नहीं है, वह अपने ससुराल यानी पुश्तैनी घर गई हुई है। वहां से उसे आने में बहुत वक्त लग जाएगा।”

” अरे मां इतना परेशान क्यों हो रही हो मैं बस तुरंत पहुंचती हूं तुम चिंता मत करो।”

” हां बेटा जल्दी आ जाओ डॉक्टरों को अंदेशा है कि शायद उन्हें दिल का दौरा….”
इसके आगे बांसुरी की मां की आवाज सिसकियों में डूब कर रह गई। बांसुरी ने देखा फोन कट चुका था। वह अभी राजा को फोन लगाने ही जा रही थी कि, दूसरी तरफ से उसके ऑफिस संबंधी किसी कार्यवश कोई फोन आने लगा। उसने जैसे तैसे उस फोन को निपटाया और और वापस राजा को फोन लगाने लगी। पर अब राजा का फोन व्यस्त आने लगा था। वह परेशान होकर अपनी कुर्सी से उठी, एक छुट्टी की अर्जी वहां छोड़कर अपना बैग थामे घर के लिए निकल गई।
उसने घर जाते जाते ही मोबाइल पर फ्लाइट का समय और टिकट की उपलब्धता आदि देख ली थी।
अभी वह क्योंकि विजयराघवगढ़ से दूर एक दूसरे जिले में पदस्थ थी इसलिए वह अपने कलेक्टर निवास में ही रहा करती थी।
रास्ते भर हैरान-परेशान बांसुरी की आंखों से आंसू बहे चले जा रहे थे। आज भले ही वह किसी रियासत की रानी थी, किसी जिले के जिलाधीश थी। लेकिन अपने माता-पिता के लिए तो वह आज भी एक नन्हीं सी बांसुरी ही थी। और उसके लिए उसके माता-पिता उसका सारा जहान थे। सारी बचपन की यादें आंखों के सामने से गुजरती चली जा रही थी। कैसे उसके पिता उसके सपनों को पूरा करने के लिए कई बार अपनी रातों की नींद और दिन के चैन को कुर्बान कर दिया करते थे।
अपना वह बचपन जिसे याद कर करके वह हमेशा खिल उठा करती थी आज वही बचपन उसकी आंखों को बार-बार भिगोए दे रहा था।
उसका ड्राइवर भी उसे ऐसी हालत में देख कर परेशान था। और इसीलिए तेजी से चलाते हुए गाड़ी को सीधा घर के मुख्य द्वार पर जाकर ही रुका।
बाहर राजा की गाड़ी खड़ी देख बांसुरी का माथा ठनका वो तुरंत अपनी गाड़ी से उतर घर के अंदर की तरफ भागी।
उसका अंदेशा सही था राजा उसके घर पर मौजूद था…-” साहेब आप यहां?”

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” हां बांसुरी। तुमसे बात करने के बाद तुम्हारी मां बहुत परेशान थी और उन्होंने शायद वीना दीदी को भी फोन लगाया था। मुझे वीना दीदी ने ही फोन करके सब बताया। इत्तेफाक से देखो मैं आज तुमसे मिलने आ ही रहा था। मैं लगभग यहां पहुंचने को था कि वीना दीदी का फोन आ गया और मुझे पापा जी की तबीयत के बारे में पता चल गया और इसीलिए मैंने आकर फटाफट तुम्हारी और शौर्य की पैकिंग करवा ली। चलो टिकट भी बुक कर ली है हमें इसी वक्त रायपुर निकलना होगा। ”

बांसुरी ठगी से खड़ी राजा को देखती रह गई। यह आदमी है ,या चमत्कार ?
जब कभी वह किसी मुसीबत में पड़ती है और अपने भगवान को याद करती है, कि भगवान मुझे इस मुसीबत से बाहर कर दो। वह तुरंत राजा को भेज देते हैं।
मन ही मन अपनी किस्मत को काला टीका लगाकर बांसुरी घर के भीतर दाखिल हो गई। उसने हाथ पांव धोकर गणेश जी के सामने एक दीपक जलाया और उनसे सब कुछ सही रखने की गुजारिश करके राजा के साथ घर से निकल गई।

शाम होते-होते वो लोग रायपुर के उस अस्पताल में पहुंच चुके थे, जहाँ बांसुरी के पिता को भर्ती किया गया था। डॉक्टरों के अनुसार उन्हें दिल का दौरा ही पड़ा था और बिना देरी किए डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू कर दिया था।
अगले 24 घंटे जरूर थोड़ा भारी थे लेकिन उसके बाद डॉक्टर सही स्थिति मरीज के घर वालों को बता सकते थे।
बांसुरी और राजा के वहां पहुंच जाने से बांसुरी की मां को भी बहुत सहारा हो गया था। आईसीयू के बाहर बैठे सभी परिजन बेहद परेशान थे। चिंतातुर थे। लेकिन इस सारे धीर गंभीर समय में भी छोटे से शौर्य की चुलबुली हरकतें, उसकी मोहक मुस्कान सभी के चेहरे पर मुस्कान ले आ रही थी।

कुछ देर बाद एक डॉक्टर बाहर चला आया और उसने बताया की बांसुरी के पिता को खून चढ़ाने की आवश्यकता है। और उसने उनका ब्लड ग्रुप लिखकर एक पर्ची में उन लोगों के हाथ में रख दिया…-” जरा रेयर ब्लड ग्रुप है , इसलिए हमारे अस्पताल के ब्लड बैंक में नहीं मिलेगा। लेकिन हमारे यहां के ब्लड बैंक से आपको एक नंबर मिल जाएगा। उस नंबर पर फोन करके आप इस ब्लड ग्रुप के बारे में पता कर सकते हैं। शायद वह आपके लिए खून अरेंज कर दें। ”

राजा और बांसुरी के साथ ही बांसुरी के ताऊ जी का बेटा भी दौड़ पड़ा। वह लोग तुरंत ब्लड बैंक में पहुंचकर पतासाजी करने लगे और आखिर उन्हें वह नंबर मिल ही गया।
उस नंबर पर बात करने पर सामने वाले ने उन्हें तुरंत ही अपने ब्लड बैंक का पता ठिकाना बताया और बुला लिया….
अमूमन हर ब्लड बैंक में एक ही नियम अपनाया जाता है कि, जितना पॉइंट आपको जिस ब्लड ग्रुप की आवश्यकता हो उतने पॉइंट आपको अपना खून वहां डोनेट करना पड़ता है। या फिर कई बार आप कुछ मूल्य देकर भी खून को खरीद सकते हैं।

बावजूद आज भी मेडिकल लाइन में खून के बदले खून के नियम को ही अपनाया जाता है, जिससे खून जैसी जिंदगी की चीज का कोई मोल ना लगा सके।


राजा और बांसुरी दोनों ही ब्लड बैंक में खून देने को राजी थे लेकिन वहां रिसेप्शन पर बैठे लड़के ने मना कर दिया….-” आपको जो रेयर ब्लड ग्रुप चाहिए उसके लिए आप बस यह फॉर्म भर दीजिए। उसके बाद आपको जितना ब्लड चाहिए हमारे यहां से आप लेकर जा सकते हैं। ”

” ओके थैंक यू! आप हमें प्राइस भी बता दीजिए और पैसे कहां देने है ये भी।”

” आपको कहीं कोई पैसे देने की जरूरत नहीं है। हमारा यह ब्लड बैंक सिर्फ और सिर्फ लोगों की मदद करने के लिए ही खोला गया है। इसीलिए हमने ज्यादातर सरकारी और बड़े अस्पतालों में अपना नंबर दे कर रखा हुआ है। जिससे असली जरूरतमंदों को हम निशुल्क और पूरी तरह से सुरक्षित खून मुहैया करवा सकें। हम सब एक एनजीओ के तहत काम करते हैं। “

” आप सभी तो बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। “


उस लड़के ने मुस्कुरा कर राजा को देखा और ब्लड का पाउच उसकी तरफ बढ़ा दिया। राजा बांसुरी और बांसुरी के भैया वहां से वापस लौट आए।

अगली सुबह पिछली रात से जरा सुकून भरी थी। बांसुरी के पिता की हालत में भी काफी सुधार आ चुका था, और अब डॉक्टरों ने उन्हें खतरे से बाहर करार दे दिया था। घर के सभी लोगों के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी।
बांसुरी की माँ ने रात उसे जबरदस्ती घर भेज दिया था। अगली सुबह नहा धोकर बांसुरी और राजा अस्पताल पहुंचे तो अस्पताल में बैठा आदित्य उन्हीं दोनों का इंतजार कर रहा था…-” अरे आदित्य तुम कब आए?”

” मैं जब कल महल वापस लौट कर आया तो पता चला आप लोग यहाँ के लिए निकल गए। कल रात में तो कोई फ्लाइट थी नहीं इसलिए आज सुबह-सुबह आया। “

” हां लेकिन इतना हड़बड़ा कर आने की क्या जरूरत थी, मेरे भाई। तुम कल ही तो मलेशिया से वापस लौटे हो?”

” राजा भैया!! मैं कौन सा पैदल वापस लौटा हूं? फ्लाइट से ही आया था! और ऐसी कोई थकान भी नहीं थी! वह तो अगर कल रात की कोई फ्लाइट मिल जाती तो मैं कल यहां पहुंच चुका होता। वैसे अब अंकल कैसे हैं?”

” पहले से काफी ठीक है !”
जवाब बांसुरी ने दिया। सभी लोग साथ बैठे बांसुरी के पिता की तबीयत के बारे में चर्चा में लगे रहे। बांसुरी और राजा के साथ आदित्य भी दो दिन वही रह गया। अस्पताल की भाग दौड़ में अपने राजा भैया को इधर से उधर परेशान देखना जाने क्यों आदित्य को रास नहीं आ रहा था। और इसीलिए वह हर कदम पर राजा से पहले खुद खड़े हो जाया करता था। इधर राजा की यह परेशानी थी कि अब वह एक पब्लिक फिगर था, इसलिए वह कहीं पर भी खुलेआम ना घूम सकता था ना बैठ सकता था। और इसलिए अस्पताल में भी उसका ज्यादा देर तक रुकना मुश्किल हो जाया करता था।
इन्हीं सब उलझनों के बीच चार दिन बीत गए और बांसुरी के पिता की अस्पताल से छुट्टी हो गई। अब वह पहले से काफी स्वस्थ अनुभव कर रहे थे। उन्हें लेकर सब घर निकलने को थे कि बांसुरी को अचानक कुछ याद आ गया…-” मुझे लगता है हमें एक बार उस एनजीओ में जाकर अपनी तरफ से ही सही कुछ डोनेशन दे देना चाहिए । उन्होंने हमारी जरूरत के वक्त ना तो हमसे खून लिया और ना ही कोई पैसा रूपया। मैं मानती हूं कि वह निस्वार्थ भाव से यह सेवा कर रहे हैं । लेकिन इसके लिए भी तो पैसे लगते ही होंगे, अगर हम जैसे कुछ और लोग उन्हें सहायता करने लगे तो उनका यह परोपकार का काम और भी ज्यादा बढ़ जाएगा ऐसा नहीं लगता आपको?”

” अगर आपको ऐसा लगता है, तो हमें भी ऐसा ही लगता है। हुकुम अगर आप चाहती हैं , तो हम जरूर पहले उस एनजीओ ही जाएंगे उसके बाद घर चलेंगे।”

राजा ने अपने ड्राइवर से कहकर गाड़ी उस एनजीओ की तरफ मुड़वा ली। राजा और बांसुरी के साथ ही आदित्य भी था।
वह सारे लोग उस एन जी ओ में दाखिल हुए और रिसेप्शन में बैठे उस लड़के के पास जाकर उन्होंने अपना मंतव्य उस पर जाहिर किया….

” सर लोग डोनेशन देते तो है लेकिन उससे पहले वो लोग मैडम से बात करते हैं। एक बार मैं भी मैडम से पूछ कर आता हूं, अगर वह तैयार होंगी तो आप लोगों को उनसे डायरेक्ट ही मिलवा दूंगा। फिर आप यह डोनेशन वाली बात भी उनसे ही कर लीजिएगा।”

राजा और बांसुरी ने हां में सर हिला दिया! लेकिन आदित्य को अब तक उनकी एक भी बात पल्ले नहीं पड़ी थी….. उसने प्रश्नवाचक आंखों से उन दोनों की तरफ देखा और वह दोनों उसे देखकर मुस्कुराने लगे…-” आप लोग बताएंगे भी कि यह क्या है? कौन सा एनजीओ है? और आखिर हम यहां क्यों खड़े हैं?”

बांसुरी ने पिताजी के लिए जरूरी रेयर ब्लड ग्रुप का यहां से मिलना और बाकी सारी बातें आदित्य को बता दी और इसके साथ ही यह भी कि वह लोग अभी इस ब्लड ग्रुप की ऑनर को शुक्रिया अदा करने आए हैं।

वह लोग आदित्य को साथ लिए उनके केबिन की ओर बढ़ चले।
केबिन का डोर नॉक करते ही अंदर से एक बहुत जानी पहचानी सी आवाज आई…. “अंदर आ जाइए!” बांसुरी और राजा एक तरफ खड़े रह गए और आदित्य ही पहले अंदर चला गया।
अंदर जाते ही आदित्य की आंखें आश्चर्य से फटी रह गई….-‘ केसर तुम यहां?”

केसर खुद आदित्य को अपने सामने देख चौक गई “आदित्य तुम यहां कैसे? “

आदित्य ने एक सांस में सारी बात कह सुनाई और वापस पलट कर उसने केबिन का दरवाजा खोल दिया। राजा और बांसुरी अब भी बाहर खड़े मुस्कुरा रहे थे। आदित्य ने आंखें तरेर कर बांसुरी की तरफ देखा और बाँसुरी मुस्कुराते हुए राजा को धक्का देते हुए अंदर ले आई….” यह सब क्या है भाभी साहेब? आपको कैसे पता चला कि केसर यहां मौजूद है?”

” मुझे नहीं आपके भाई साहब को पता चला। यह सब इनकी करामाती आंखों की जासूसी है। मैं तो पहले ही जानती थी इनकी आंखों में एक्सरे फिट है। केबिन के दरवाजे के आर पार भी देख लेते हैं, के अंदर कौन साहब बैठें है?”

केसर अब भी राजा और बांसुरी को देखकर अवाक खड़ी थी। उसे इस तरह हड़बड़ाया हुआ देख राजा ने उसे आराम से बैठने के लिए कहा और खुद भी सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया।

” उस दिन जब हम लोग इनके पिताजी के लिए खून लेने यहां आए थे, तब बाहर बैठे उस लड़के ने इस एनजीओ के बारे में हल्की फुल्की की जानकारी दी। और उसके अनुसार यह एनजीओ ना तो खून के बदले खून लेता था और ना ही पैसा इसका मतलब यह एनजीओ पूरी तरह से निस्वार्थ भाव से चलाया जा रहा था। यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। मैं टहलते टहलते कॉरिडोर से निकल रहा था कि मैंने एक जगह केसर के पिता की तस्वीर देख ली। और पता नहीं क्यों मुझे अंदर से लगा कि हो ना हो केसर ही है जो यहां बैठकर अपना एनजीओ चला रही है।
बस अगले दिन भी मैं अस्पताल से घर जाते समय एक बार फिर यहां आया और इस पूरे एनजीओ का चक्कर लगाने पर मैंने केसर को भी एक झलक यहां देख लिया। तब तक तुम भी आ ही गए थे, तो सोचा कि अब तुम्हें भी केसर से मिलवा ही दूँ।”

चुपचाप बैठी कैसर ने आंखें उठाकर राजा को देखा और राजा बांसुरी की तरफ हाथ जोड़ दिया।

“अब बस भी करो केसर इतनी तो तुमने गलतियाँ भी नहीं की जितनी माफी मांग चुकी हो । “

” गलतियां नहीं हमने गुनाह किए हैं बांसुरी और जिनकी कोई माफी नहीं हमें तो सजा मिलनी चाहिए सजा।”

” जरूरी नहीं कि हर गुनाहगार को कानून ही सज़ा दे, और जेल ही उसका मुकद्दर हो। तुम्हें अपनी गलतियों का एहसास हुआ और उसके बाद तुमने अपनी जिंदगी उन गुनाहों के बोझ तले रो रो कर काटी है। यही तुम्हारा पश्चाताप है केसर! तुम्हें हम सब हमारा पूरा महल दिल से माफ करता है अब वापस आ जाओ।”

राजा की बात पर केसर की आंखों से आंसू बह चले….-” मेरा उद्देश्य जिसके लिए मैंने आप का महल छोड़ दिया था वह अब तक पूरा नहीं हुआ बस वह पूरा हो जाए उसके बाद मैं वापस आ जाऊंगी।”

” ऐसा तुम्हें लगता है कि पूरा नहीं हुआ लेकिन मुझे तो लगता है कि वह तेज़ी से पूरा होने की कगार पर ही है। रेखा ने पूरे मन से तुम्हारे काम को संभाल लिया है। और अब वह अपने आप को समझने लगी है जानने और पहचानने लगी है, यही तो तुम चाहती थी ना?

” हां हम चाहते थे कि रेखा अपनी कदर करना सीख ले। और हम जानते हैं जिस दिन रेखा अपनी खुद की इज्जत करना सीख जाएगी, अपनी कदर करना सीख जाएगी। उस दिन विराज भी उसकी कदर करने लगेंगे बस उसी दिन का इंतजार है आदित्य। उसके बाद हम वापस आ जाएंगे।”

” और तब तक?

” तब तक हम यही है आपका जब भी मन करें आप हमसे मिलने चले आइएगा।”

“अच्छी बात है, लेकिन अभी तो हमारे साथ घर चलो।”

राजा की बात का मान रखते हुए केसर भी उन सब के साथ बांसुरी के घर चली गई।

बांसुरी के पिता अपने कमरे में आराम कर रहे थे। उनका खाना पीना और उनकी दवाइयां उनके कमरे में पहुंचाने के बाद बांसुरी की मां बाहर आकर बांसुरी की सहायता से सब का खाना परोसने लगी…. सारे लोगों ने एक साथ मिलजुल कर खाना खाया और वहीं बैठे बातों में लग गया….-” अरे बांसुरी तुम्हारे शहर हम बड़े सालों बाद आए हैं, तो क्यों ना उस झील पर भी चले जिसकी तुम बहुत बातें किया करती हो?

” यह भी कोई पूछने की बात है? मैं तो कब से तड़प रही हूं अपने शहर की उस खूबसूरत सी झील के किनारे बैठने के लिए।”

बांसुरी के हामी भरते हैं वह सारे लोग उठ कर तैयार हो गए ।
बांसुरी के ताऊ जी का भी पूरा परिवार इस वक्त बांसुरी के घर पर ही मौजूद था । उसके सभी भाई भाभी उनके बच्चे, बांसुरी राजा आदित्य और केसर सारे लोग दो-तीन गाड़ियों में भरकर झील की तरफ बढ़ चले।
आज बड़े सालों के बाद राजा बिना अपने बॉडीगार्ड के निकला था हालांकि इसके लिए उसे प्रेम को बहुत हाथ जोड़कर मनाना पड़ा था।
वह भी एक सामान्य गृहस्थ होने का मजा लूटना चाहता था।
राजा को तो शुरु से ही अपनी राजशाही से नफरत थी । बावजूद उसकी किस्मत उसे हमेशा एक ऊंचे पद पर ही बैठाती आई थी…
आज बड़े दिनों बाद वह अपनी जेड प्लस सिक्योरिटी को भी घर पर पीछे छोड़ कर चुपचाप अपने परिवार को साथ लेकर निकल गया था। ये और बात थी कि बड़े भारी गॉगल्स दाढ़ी मूछों और कैप के साथ उसने अपने चेहरे को आधे से ज्यादा छुपा रखा था। बाकी का खुद को छुपाने के लिए उसकी गोद में नन्हा मुन्ना शौर्य था ही।
झील पर पहुंचकर सब वहां की चमकीली सीढ़ियों पर इधर-उधर बैठ गए।
सामने कल कल की आवाज के साथ पानी इधर से उधर बह रहा था। किनारों पर लगी रोशनियां पानी पर अलग-अलग चित्र उकेर रहीं थीं। सारे लोग अपनी अपनी बातों में लगे हुए थे ।
शौर्य बार-बार राजा की गोद में उछल कूद मचाते हुए उसकी टोपी को उठा उठा कर फेंक रहा था। और राजा वापस सीढ़ियों पर गिरी टोपी उठाकर अपने सर पर रख लेता। शौर्य को इस खेल को खेलने में बड़ा मजा आ रहा था, किलकारियां भरते हुए वह बार-बार अपने पिता को परेशान कर रहा था लेकिन वह नासमझ यह नहीं जानता था कि एक पिता के लिए यह परेशानी कितनी मीठी है।
झील के आसपास से निकलने वाले हर एक गुमटी वाले को रोक रोक के शौर्य को कुछ ना कुछ चाहिए था। अमूमन इतने छोटे बच्चों को देख प्लास्टिक के रंगीन खिलौने बेचने वाले, बलून बेचने वाले ऐसे जोड़ों के आसपास घूमने लगते हैं । यही वहां भी हुआ और देखते ही देखते शौर्य ने वहां मौजूद हर एक प्लास्टिक की गुमटी से अपनी एक लंबी चौड़ी रियासत तैयार कर ली। छोटे छोटे लाल पीले हरे प्लास्टिक के खिलौने रंग-बिरंगे बलून देख देख कर वह छोटा शहजादा अपनी मिल्कियत में फूला नहीं समा रहा था। और उसकी खुशी देखकर उसके माता-पिता फूले नहीं समा रहे थे, कि उसी वक्त किसी ने राजा के कंधे पर हाथ रख दिया…-” राजा अजातशत्रु!”

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राजा तो राजा बांसुरी राजा से ज्यादा घबरा गई। क्योंकि अब राजा के साथ रहते रहते उसे भी राजा की चिंता होने लगी थी। और इस बार राजा बिना किसी सिक्योरिटी के उसके साथ चला आया था। दोनों ने जैसे ही पीछे देखा आश्चर्य से दोनों की आंखें खुली की खुली रह गई…-” अरे आप दोनों यहां?”

बांसुरी के सवाल पर भास्कर मुस्कुराने लगा…-“आप भूल जाती है रानी साहिबा सिर्फ आपका ही नहीं मेरा भी मायका रायपुर ही है। ”

बांसुरी ने मुस्कुराकर “हां” में सिर हिलाया और अदिति की तरफ बढ़ गई….. अदिति ने एक छोटी सी बच्ची का हाथ पकड़ रखा था। बच्ची बड़ी प्यारी थी लेकिन उसका चेहरा न भास्कर जैसा था और ना अदिति जैसा…-” बहुत प्यारी बच्ची है। आप दोनों को ढेर सारी बधाइयां।”

” थैंक्यू!! थैंक्यू बांसुरी!! तुम्हारा बेटा भी बहुत प्यारा है क्या नाम रखा है इसका?”

अदिति के सवाल पर बांसुरी भी मुस्कुरा उठी उसने मुस्कुराकर शौर्य को अपनी गोद में ले लिया…-” शौर्य प्रताप सिंह! आप की गुड़िया का नाम क्या है?”

” ओशिन! हमने इसका नाम ओशिन रखा है! एक्चुली मुझे कहना चाहिए कि इसका नाम ओशीन ही था तो हम भी अब इसे इसके उसी नाम से बुलाते हैं। “

” मतलब आप कहना क्या चाहते हो अदिति मैं समझी
नही।”

” कुछ खास नहीं बाँसुरी! मेरी बात का मतलब यह है कि हमने ओशिन को अडॉप्ट किया है। एक्चुअली मैं अपने कैरियर को लेकर और पेरेंट्स को लेकर बीच में बहुत ज्यादा चिंतित हो गई थी। इसी सब में कभी अपनी फैमिली बढ़ाने का हम सोच ही नहीं पाए। और जब बेबी के लिए सोचना शुरू किया तब मुझे कुछ प्रॉब्लम होने लग गई। तब ऐसे में कंसीव करके मैं कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसलिए हमने यह डिसाइड किया कि हम एक बेबी गर्ल अडॉप्ट कर लेंगे। जब यह डिसाइड किया उसी के कुछ समय बाद आई लॉस्ट माय मॉम।
वह कमी मेरी जिंदगी में बहुत गहरी हो जाती, अगर ओशिन नहीं होती। बस उसके बाद कोई सवाल जवाब हमारे बीच नहीं बचा और हमने तुरंत ही जाकर एक ओरफेनेज से ओशिन को गोद ले लिया। और सच मानो ऐसा लगता ही नहीं कि ओशिन को हमारी जरूरत थी बल्कि मुझे लगता है कि हमें, हम दोनों को ओशिन की बहुत जरूरत थी।
उसके आ जाने से हमारी जिंदगी में रंग भर गए। ऐसा नहीं था कि बिना बच्चे के हम दोनों खुश नहीं थे। ऐसा भी नहीं था कि अगर हम प्रयास करते तो मैं मां नहीं बन पाती, लेकिन जाने क्यों ऐसा लगा कि हमें बच्चा गोद ही लेना चाहिए।
पापा अब हमारे साथ ही रहते हैं। और ओशिन के कारण हर वक्त उनका मन लगा रहता है।
ओशिन छोटी थी इसलिए उसे लेकर ट्रेवल करना मुझे सही नहीं लगता था और इसीलिए बहुत दिनों से मैं यहां ससुराल नहीं आ पाई थी। मौके बे मौके भास्कर अकेला ही आया करता था, इसलिए इस बार मेरी सासू मां ने जिद करके हमें बुलाया। क्योंकि वह भी अपनी पोती के साथ खेलना चाहती थी।
उनकी स्पेशल रिक्वेस्ट थी कि उनकी पोती की मुंह दिखाई करनी है उन्हें, और इसके लिए उन्होंने एक बहुत शानदार पार्टी दी।
सच कहूं तो मम्मी जी से मुझे इतने सारे प्यार की उम्मीद नहीं थी। एक अडॉप्टेड बच्चे के साथ उसके पेरेंट्स हमेशा समाज में उस बच्चे को कैसे सेट करेंगे इसी बात को लेकर सबसे ज्यादा परेशान रहते हैं। लेकिन मेरी वह परेशानी मेरे ससुराल वालों ने बहुत आसानी से दूर कर दी।
सासु मां ने तो इसे इतने प्यार से अपना लिया कि उनसे मेरे जो भी गिले-शिकवे थे ना सारे मैं भूल गई”।

“अच्छा मैडम ऐसे क्या गिले-शिकवे थे आपके? जो आप भूल गई? “

अदिति मुस्कुराकर भास्कर की तरफ देखने लगी..-” अब मेरा मुंह मत खुलवाओ , आखिर जनरेशन कोई भी हो अगर बहू सास की बुराई ना करें तो वह बहू बहू कैसीन क्यों बांसुरी?” “

” आप बहुत प्यारी है अदिति!”

बातों ही बातों में चलते चलते वह चारों लोग झील के किनारे काफी दूर तक बढ़ गए। वही खड़े आइसक्रीम वाले से शौर्य और ओशिन आइसक्रीम खिलाने की जिद कर बैठे। उन लोगों के हाथों में आइसक्रीम दे कर वह चारों एक बार फिर अपनी बातों में डूब गए।

इन सब से दूर झील की सबसे निचली सीढ़ियों पर केसर और आदित्य पानी में पैर डाले बैठे थे…

” क्या वाकई तुम हमारे साथ नहीं चलोगी? “

” नहीं आदित्य हमारी बात समझने की कोशिश करो। अगर हम अभी पहुंच गए तो रेखा जिस जद्दोजहद से अपने आप को खड़ा करने की कोशिश में लगी है, उसकी वह सारी मेहनत खत्म हो जाएगी। क्योंकि सहारा पाते ही वह एक बार फिर कमजोर पड़ जाएगी। “

” पर मुझे लगता है अगर तुम उसके साथ खड़ी होगी तो वह ज्यादा बेहतरी से काम कर पाएगी।”

“नहीं वह मेरी बहन है। मैं उसे बचपन से जानती हूं! उसकी रग रग से वाकिफ हूं, अगर उसके सर पर पहाड़ ना टूटे तो वह एक कदम भी ना उठाएं ।करने दो उसे अभी अपने बलबूते पर सब कुछ।
आज तक उसने अपनी बहन के सहारे ही सब कुछ पाया है। लेकिन अब उसकी बारी है। उसे गिरने दो, उठने दो, संभलने दो और फिर भागने दो । एक दिन ऐसा आएगा जब लगातार भागेगी। बिना गिरे, बिना रुके, बिना अटके। और उस दिन जब भागती हुई थकेगी तो उसे सहारा देने के लिए हम बाहें पसारे उसके सामने खड़े मिलेंगे ।”

“मतलब तुम्हारी जिंदगी का जो भी निर्णय है, वह सब कुछ सिर्फ रेखा से ही जुड़ा हुआ है! और किसी से तुम्हारा कोई जुड़ाव, लगाव नहीं है?”

केसर में आदित्य को बड़ी अजीब नजरों से घूर कर देखा.. एकसक्यूज़ मी ! प्यार मोहब्बत करने वाली लड़की नहीं है हम। आप अच्छे से जानते हैं हमें आदित्य। “

” ओके! ओके बाबा!! मैं तो बस मजाक कर रहा था एक बात पूछ सकता हूं? “

फिर एक बार आदित्य को अजीब से नजरों से घूर कर केसर ने देखा और उसके पूछने से पहले ही उसके सवाल का जवाब दे दिया…..-” हां आप यहां हमसे मिलने आ सकते हैं लेकिन कभी-कभी।”

मुस्कुराकर आदित्य ने अपनी पलके झुका ली अपने बालों पर खुद ही हाथ फिरा कर वह मुस्कुरा कर झील के पानी में धीरे-धीरे कंकड़ फेंकने लगा….

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*******

निरमा की आवाज से चौक पर प्रेम बिस्तर पर उठ बैठा।

” क्या हुआ निरमा तुम ने आवाज लगाई क्या? “

” अब तुम मुझसे यह पूछ रहे हो कि मैंने तुम्हें आवाज लगाई या नहीं? “



प्रेम गहरी नींद से सुबह सुबह उठा था। उसे अचानक समझ नहीं आया कि निरमा क्या बोल रही है? उसने अपने बाजू में देखा मीठी गहरी नींद सो रही थी! इसका मतलब मीठी ने कोई शरारत नहीं की थी। अब बचा वो खुद।
प्रेम गहरी सोच में डूब गया। घर में निरमा तभी चिल्लाया करती थी , जब या तो उससे खुद से (प्रेम) कोई गलती होती थी , या मीठी से। क्योंकि निरमा का यह मानना था कि वह खुद बहुत पर्फेक्ट थी और उससे कभी कोई गलती नहीं हुआ करती। गलतियों का सारा ठीकरा या तो प्रेम के सिर फुटा करता था या मीठी के।
आज सुबह-सुबह बाथरूम के सामने खड़े होकर निरमा के चिल्लाने का कारण प्रेम की समझ से बाहर था।
” क्या हुआ निरमा कुछ परेशान हो क्या? “

” परेशान नहीं होंगी तो और क्या होंगी यह देखो।” और निरमा ने अपने हाथ में पकड़ी प्रेगनेंसी किट प्रेम के सामने रख दी।
एकाएक प्रेम को यही नहीं समझ में आया कि निरमा ने उसके सामने क्या रखा है ? वह थोड़ी देर तक आंखें मलते उसे देखने लगा….

” अरे इतना आंखें फाड़ के देखने की क्या जरूरत है? मुझे कोई अवार्ड नहीं मिला है। प्रेगनेंसी किट है यह। “

” ओह्ह मतलब !”
प्रेम को हल्का फुल्का मतलब तो समझ आने लगा था पर फिर भी एक आशंका तो मन में थी ही, इसलिए उसने निरमा से इतना खतरनाक सवाल पूछ लिया!

” मतलब ? अब इतने भोले तो नही हैं आप की इसका मतलब समझाना पड़े..

” अरे ये नही। मेरा पूछने का मतलब था कि …

” आपके पूछने का जो भी मतलब रहा हो, मेरे कहने का ये मतलब है कि यूनिवर्सिटी के साथ साथ मुझे मीठी को भी संभालना है। इसलिए मैं दूसरे बेबी के लिए नही सोच सकती…

” लेकिन निरमा सुनो तो सही….

“कुछ नही सुनना मुझे …”

” पर सुनो तुम ही तो कहती थी कि तुम्हे एक छोटा प्रेम चाहिए…!”

” कहती थी, पर अब नही कहती … और सुनो…

और निरमा बिना प्रेम की पूरी बात सुने अपनी ही लय में भुनभुनाती हुई अंदर चली गयी।
और प्रेम उसके पीछे उसे मनाने भीतर चला गया….!

****

महल वापस लौट चुके बाँसुरी और राजा अपने कमरे में थे। बाँसुरी की सहायिका उसका सामान बांध रही थी, और उदास सी बाँसुरी उसे क्या क्या रखना है बताती जा रही थी। रायपुर से वापसी के बाद दोनो साथ ही महल चले आये थे। बाँसुरी की छुट्टियाँ खत्म हो चुकी थी और अगले ही दिन उसे वापस लौटना था, इसलिए वो उदास थी और उसका मन किसी काम में नही लग रहा था। राजा वहीं बैठा शौर्य के साथ खेल रहा था कि कमरे पर दस्तक हुई और समर हाथों में कोई कागज़ थामे भीतर चला आया।
उसने आकर वो कागज़ राजा के हाथ में रखे और वापस जाने को था कि बाँसुरी ने उसे टोक दिया….-” आप कब शादी का लड्डू खिला रहें हैं समर सा? अब तो कोर्टशिप को आपके वक्त हो चला है। शादी कर लीजिए!”

” जी रानी साहिबा !! अगली फुरसत में सबसे पहले शादी ही करूँगा। अभी तो हुकुम के साथ ही हूँ।”

” हम्म अच्छा है। कम से कम आप और प्रेम भैया इनके साथ हैं तो मैं थोड़ा निश्चिंत रह पाती हूँ । मुझे तो इनके साथ रहने का मौका ही कम मिल पाता है।”

” मैंने तो आपसे कहा था कि आपका स्थानंतरण करवा लिया जाएगा पर आप ही इस तरह से तबादले के लिए तैयार नही होतीं।

” हम्म हो जाएगा, तबादला भी एक दिन हो ही जायेगा। आप बोलिये क्या लेंगे चाय या कॉफी?”

” अभी कुछ नही लूंगा रानी साहिबा। अभी तो बस ये सरकारी कागज़ हुकुम के हवाले करना था। और अगर हुकुम इजाज़त दें तो मैं शाम भर की छुट्टी लेना चाहता हूँ। “

बाँसुरी खिलखिला उठी…-“इतना सर पर मत बिठाइए अपने हुकुम को। जाइये आपको इजाज़त है आप आराम से जाइये। वैसे जाना कहाँ हैं? पिया को शॉपिंग करवाने ? “

समर मुस्कुरा कर अपने बालों पर हाथ फिराता उन दोनों को झुक कर प्रणाम कर बाहर चला गया।

बाँसुरी मुस्कुरा कर राजा के पास आ बैठी…;” क्या हुआ? आज कुछ ज्यादा ही उदास लग रही हो?”

” आपको छोड़ कर जाने का बिल्कुल मन नही कर रहा।’

“तो मत जाओ।”

“फिर मेरी नौकरी, मेरा काम?”

“मेरे साथ रह कर लो।”

“आप जानते है ये मुमकिन नही है।”

राजा ने उसकी गोद में वो कागज़ डाल दिया।

बांसुरी ने उसे खोला और फटाफट पढने लगी…. उसके स्थानांतरण का पत्र था और अब उसकी नई नियुक्ति सचिवालय में कर दी गयी थी।
बाँसुरी खुशी से राजा के गले से लग गयी…-” मतलब अब मैं हमेशा आप के पास रहूंगी। “

“बिल्कुल ! और अब हमारी हुकुम वहाँ हमारे ऑफ़िस में भी अपनी तानाशाही चलाएंगी।”

” मैं तानाशाह हूँ। ” बनावटी गुस्से से बाँसुरी ने राजा को घूर कर देखा…..

” और नही तो क्या एक अच्छे खासे राजा को मंत्री बना कर छोड़ा, अब बोलो तानाशाह नही हो।”

बाँसुरी आगे बढ़ कर राजा के सीने से लग गयी…. खिड़की पर उतरा चांद भी उन दोनों को साथ देख मुस्कुराने लगा!!!

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इति !!!



दिल से ……


आज सोचा कहानी बहुत बड़ी हो गयी है इसलिए दिल से न लिखूं लेकिन आज का भाग बिना मेरे इस कॉलम के अधूरा सा लगता।

लगभग दस हज़ार शब्दों में आज का भाग सिमट पाया। लिखते समय फिर एक बार दिल में आया कि इसे अगले तीन भागों में खत्म करूँगी, पर फिर लगा कि अब अगर इस भाग को पूरा एक बार में नही लिखा तो जाने कब तक लिखना पड़ जायेगा।

हमारे राजा रानी थे ही इतने प्यारे की उनके बारे में जितना लिखूं मुझे कम ही लगता था, लेकिन ऐसा होता तो नही है ना।
अगर लेखक बिना पाठकों की इच्छा सोचे लिखता रहा तो कहानी बहुत बार पथ से भटक जाती है।

हर कहानी का एक अंत होता ही है। और ये भी इस कहानी का अंत है राजा अजातशत्रु और रानी बाँसुरी मेरी अगली कहानी मायानगरी में साथ चलते रहेंगे। सो आप उनके बारे में निश्चिंत रहे, आप लोगों की उन सबसे मुलाकात होती रहेगी।


इस भाग के बाद कहानी से जुड़ी कई बातों के लिए एक विशेष भाग ज़रूर लिखूंगी , उसमें कहानी से जुड़ी कई बातें होंगी।
अगर आप लोगो के मन में भी कहानी को लेकर कोई शक शुबहा या सवाल हों तो समीक्षा में लिख सकतें हैं।

आप सभी ने जीवनसाथी के उस प्यार भरे सफर में बहुत साथ दिया और इसके लिए मैं आप सभी की हृदय से आभारी हूँ।

एक अच्छा लेखक वह है जिसके पाठक बहुत अच्छे हों और किस्मत से मुझे एक विशेष बुद्धिजीवी वर्ग पढ़ता है और इसके लिए आप सभी की एहसानमन्द हूँ।

बस अब और ज्यादा लिखूंगी तो भावुक हो जाऊंगी।

इस भाग का “दिल से” क्रमशः रहेगा….

आप सभी की मुहब्बत के लिये दिल से आभार शुक्रिया नवाज़िश !!!


आपकी !!!

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aparna ……































   
   



लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

32 विचार “जीवनसाथी -125” पर

  1. ना जाने कितनी बार पढ़ चुके है फिर भी लग रहा है कुछ छूट रहा है। कितनी कहानिया पढ़ ली पर जीवन साथी के बराबर कोई भी नही लगी। बहुत ही बेहतरीन विदाई दी है आपने जीवन साथी को

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  2. इस कहानी की आदत हो गईं हैं अब 🙁 काश…. ये कभी ख़त्म ही नहीं होती, यही same feeling shadi.com के समापन पर हुईं थी..।
    पर यह भी सत्य है, जो शुरू हुआ है उसे खत्म भी होना ही हैं।
    आशा है ये अंत एक नए शुभारंभ के लिए हो
    और हमें राजा-बांसुरी, प्रेम-निरमा, समर – पिया, आदित्य – केसर, विराज-रेखा को एक नए रुप मे पढ़ने का अवसर मिलेगा…🙂
    शुभ दीपावली डॉक्टर साहिबा🙂

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  3. अरे ये क्या हो गया, मैं ज़रा शादी में क्या गयी, यहां तो सब इति हो गया।

    अर्पणा जी, इस कहानी के बिना तो सब सूना सूना सा लगेगा। हर दो तीन दिन के बाद इस कहानी की इतनी तलब होने लगती है कि रहा ही नहीं जाता। कभी कभी मैं सोचती भी हुं कि सच में ये एक कहानी ही तो है फिर भी ये हमारे दिलों दिमाग पर इस कदर छा चुकी है कि हमें लगता है हम सब भी राजा जी और उनके सभी साथियों के साथ , बांसुरी और उसकी सभी सखियों के साथ वहीं राजमहल में मौजूद हैं।

    इस कहानी को और आपको हम सब की तरफ से बहुत बहुत आदर और सम्मान, हमें इतनी प्यारी कहानी देने के लिए।🙏🙏
    Love u so so much💓💓💓💓

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