समिधा- 35

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समिधा – 35 वरुण को समझ नहीं आया कि आश्रम में इस वक्त उससे मिलने कौन आ सकता है? माँ या पापा में से कोई होता तो वह उसे फोन करके ही आते। रोली और अबीर का भी इस वक्त आना मुमकिन नहीं था।

सोचते सोचते वो ऑफिस की तरफ बढ़ गया। वरुण ऑफिस पहुंचा तो उसने देखा एक लड़की एक किताब खोलें उसे ध्यान से पढ़ने की कोशिश कर रही थी।
” हेय सारा हेयर यू आर?” उसने पीछे से ही देखकर सारा को पहचान लिया। सारा भी वरुण की आवाज सुनकर खुशी से खड़ी हो गई। वह आगे बढ़कर वरुण के गले से लग गई।
” हे मैन? कैसे हो तुम और तुम्हारी तबीयत कैसी है?”
अपनी टूटी-फूटी हिंदी में सारा उससे उसका हालचाल जानने के लिए बड़ी उत्सुक सी लगी। सारा जहाँ तक हो सके हिंदी में ही बातें करने की कोशिश करती थी और इसलिए उसकी हिंदी अच्छी थी।
वरुण भी वहीं ऑफिस में उसके पास बैठ गया। तभी उसे ध्यान आया की पारो उसके साथ ही बाहर खड़ी थी उसने सारा से एक मिनट रुकने का इशारा किया और भागकर पारो को लेने चला गया। पारो को साथ लिए वह एक बार फिर वापस उस ऑफिस के कमरे में था।
पारो को देखकर सारा की आंखें चमक उठी उसने वरुण की तरफ देखा…-” कौन है यह लड़की? तुम्हारी दोस्त?”
” नहीं मेरी दोस्त तो नहीं है। “
“फिर,?”
” यह भी यही आश्रम में रहती हैं मेरे दोस्त की वाइफ है। “
सारा की आंखों से लगा जैसे वरुण की बातें उसकी समझ में नहीं आई उसने आंखें गोलमोल सी कर वरुण की तरह प्रश्नवाचक निगाहों से देखा। वरुण ने अपने हल्के स्मित से उसे धीमा सा इशारा दे दिया।। और सारा मुस्कुराकर पारो को देखने लगी…-” क्या नाम है तुम्हारा?”
” पारोमिता। “
“पडोमिता?”
सारा का गलत उच्चारण देख कर भी पारो को बुरा नहीं लगा और उसने उसका उच्चारण सुधारने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि मुस्कुरा कर वह वहां से उठ खड़ी हुई। वरुण की तरफ देखकर उसने धीमे शब्दों में कहा कि वह सारा के लिए प्रसाद लेकर आती है और बाहर निकल गई।
सारा के पास वरुण के लिए ढेर सारी खबरें थी। और जानने के लिए भी ढेर सारी बातें। सारा वरुण के बारे में सब कुछ जान लेना चाहती थी, कि आखिर कैसे वरुण के घर वाले उसे आश्रम भेजने के लिए तैयार हो गये? आखिर कैसे वरुण की मंगेतर ने उसे यहां रहने की इजाजत दे दी ? और आखिर कैसे वरुण अपनी तबीयत को संभाले हुए बिना किसी दवाई के कृष्ण आश्रम में रह रहा है? ये सारा के लिए सबसे चमत्कार भरी बात थी।वरुण ने शुरू से लेकर अब तक की सारी बातें उसे कह सुनाई और इसी सब में उसने आश्रम में चल रहे कार्यक्रम के बारे में भी सारा को बता दिया। सारा यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई। वह तो खुद कृष्ण रंग में रंगी हुई थी और उसका मुख्य उद्देश्य ही कृष्ण में समर्पित हो जाना था।

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उसने भी आश्रम के कार्यक्रम के लिए वहीं रुकने की इच्छा जताई लेकिन वरुण ने उसेवहाँ रुकने से मना कर दिया…- तुम इस वक्त कहां रुकी हो सारा?”
” होटल में हूं । लेकिन वहां रहकर मैं आश्रम का सारा काम कैसे देख पाऊंगी? मैं खुद भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनना चाहती हूं …तुम्हारी हर काम में मदद करना चाहती हूं। मैं सभी गुरुजनों के प्रवचन भी सुनना चाहती हूं। “
” तुम वह सब कुछ कर लोगी। कार्यक्रम कल सुबह से शुरू होगा कल सुबह ठीक छैह बजे तुम यहां आश्रम पहुंच जाना और मेरी एक छोटी सी हेल्प कर सकती हो?
” इसमें तुम्हें रिक्वेस्ट करने की कोई जरूरत नहीं है वरुण।”
” ओके! तो ऐसा करो प्लीज दो दिन के लिए जब तक यह कार्यक्रम चल रहा है तुम पारोमिता को भी अपने साथ रख सकती हो?”
सारा ने आंखों को गोल गोल कर वरुण से असली कारण जानना चाहा लेकिन वरुण की नजर खिड़की पर से बाहर नज़र आती पारोमिता पर पड़ गई। और उसने सारा को धीरे से इशारा कर दिया..- मैं बाद में तुम्हें सारी बातें सच-सच बता दूंगा बस फिलहाल यह ध्यान रखो कि अभी उस लड़की के सामने मैं जो भी कहूंगा इस बात को मान लेना प्लीज।”

हाँ में सिर हिलाकर सारा ने उसे आश्वस्त कर दिया। पारोमिता एक गिलास में दूध और कुछ फ़ल साथ में लिए अंदर चली आई ….-“यह आपके लिए है। “
उसने वह सारा सामान सारा के सामने रख दिया वरुण ने पारो की तरफ देखा और धीमे से अपने मन की बात कही…-“पारोमिता जी जैसा कि आप जानती हैं , कि आपके वाले आश्रम की जिम्मेदारी मुझ पर है। आप लोगों को गोपाल जी के वस्त्रों और बाकी चीजों की तैयारी करनी है। और इस सब की देखरेख मैं कर रहा हूं। इसके साथ ही कार्यक्रम के लिए अभी बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु रोज आ रहे हैं और इन श्रद्धालुओं के साथ-साथ कई आचार्य और गुरुवर भी बाहर से आए हुए हैं । उसके लिए हो सकता है हमें कुछ कमरों की या कुछ वस्तुओं की आवश्यकता पड़े जो हम आपके आश्रम से ले सकते हैं।”
पारो की समझ से बाहर था कि वरुण उसे यह सब बातें क्यों बता रहा है उसने धीरे से नजरें उठाकर वरुण की तरफ देखा…
” क्या आप यह चाहते हैं कि मैं इनके साथ चली जाऊं?
पारो ने सारा की तरफ देख कर इशारा किया उसकी इस बात से वरुण और सारा दोनों ही हतप्रभ रह गए। क्योंकि वरुण तो पारो को इस बात के लिए मनाने के लिए अजीबोगरीब से बहाने मन में सोचता कुछ का कुछ बोलता चला जा रहा था और पारो ने उसकी बात आधे में ही काट कर अपने मन की बात रख दी।
पारो की ऐसी साफ सीधी सपाट सी बात के बाद वरुण और कोई बात नहीं बना पाया उसने धीरे से कहा …-“हां।”
“ठीक है! मैं इनके साथ चली जाऊंगी! लेकिन अगर आश्रम की पद्मजा दीदी या किसी और ने पूछा तो?”
” तो मैं संभाल लूंगा। उसकी चिंता तुम मत करो बस तुम अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना।
वरुण ने सारा की तरफ देखा सारा पारो का हाथ पकड़ बाहर निकलने लगी।
बाहर वैसे भी शाम का धुंधलका फैल चुका था। बावजूद मंदिर में आने जाने वालों की भीड़ लगी हुई थी पूरे मंदिर को कई सारी रोशनी की लड़ियों से सजाया गया था। मंदिर जगमगा रहा था।
वरुण ने आगे बढ़कर पारो से आंचल सिर पर रख लेने का इशारा किया। पारो ने भी उसकी बात मान कर अपने सिर पर से चेहरे को ढकते हुए आंचल खींच लिया और सारा के साथ तेज कदमों से बाहर निकल गई।
वरुण को जैसे राहत मिल गई । वह वापस मुड़ा और मंदिर परिसर की तरफ़ अंदर जा ही रहा था कि मंदिर के शीर्ष पर उसे ऐसा आभास हुआ जैसे एक नटखट सी आकृति खड़ी है ।जिसमें एक पैर सीधा और एक सामने मुड़कर पंजों पर रखा गया है। दोनों हाथ सामने की तरफ मुड़े हुए हैं ऐसे जैसे उस आकृति ने बांसुरी हाथ में थाम रखी है।
वरुण ने मन ही मन मुरलीधर को देखकर प्रणाम किया…..-” तुम्हारी माया तुम ही जानो मुरलीधर। मेरे मन में ये कैसा मोह पैदा कर रहे हो? और यह मोह क्यों पैदा कर रहे हो? जब मैं अच्छे से जानता हूं कि वह किसी और की ब्याहता है। मुझे उसके बारे में कुछ भी सोचने का कोई अधिकार नहीं, तब फिर मेरा मन क्यों उसके लिए …..
मेरे घनश्याम मेरे मन की इस कलुषता के लिए मुझे माफ कर देना। मैं तन मन धन से अपने आपको तुम्हें समर्पित करने आया हूं।” प्रसाद वितरण के बाद मंदिर परिसर में भजन का कार्यक्रम शुरु हो चुका था । आश्रम परिसर के गुरुजन आचार्यवर एक साथ मिलकर भजन गा रहे थे। सारे श्रद्धालु मगन थे। आश्रम के पास ही स्थित कुछ घरों से कुछ बच्चों को राधा और कृष्ण की झांकियों के रूप में तैयार किया गया था। कोई छोटा सा बालक माखन चुरा रहा था तो कोई बालक गोवर्धन पर्वत को उंगलियों पर थामे खड़ा था। भक्ति में वातावरण उमंग और आह्लाद से भरा हुआ था। वहां हर एक व्यक्ति ऐसा था जिसके कण-कण में उस समय कृष्ण व्याप्त थे और हर कोई अपने आप को कृष्ण को अर्पित करने को आतुर था। इसी सब में प्रबोधनंद पहले ही उठ कर अपने कमरे में जा चुके थे। आश्रम के नियमों से विलग उनके पास उनका अपना मोबाइल था। उनकी अपनी गाड़ियों की अद्वितीय श्रृंखला थी। वह देश विदेश में भ्रमण किया करते थे और उनके एक-एक भ्रमण पर लाखों रुपए खर्च किए जाते थे उनके श्रद्धालुओं के द्वारा। प्रबोधानंद अपने कमरे में आराम कर रहे थे कि थाली में कुछ मिठाइयां रखे वरुण उनके कमरे में दाखिल हो गया।

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“प्रणाम गुरुवर ! मैं सुबह ही आपसे मिलकर गया था वरुण नाम है मेरा।”
“हां याद है हमें! वरुण देव यही नाम बताया था ना तुमने।!”
“जी गुरुवर! मैं आपके सामने बहुत तुच्छ और अकिंचन हूं। लेकिन एक बार फिर से आपको सुबह वाली बात याद दिलाने के लिए आया हूं। “
“कौन सी बात? भगिनी आश्रम की महिलाओं की पढ़ाई वाली बात?”
“जी गुरुवर! अगर आप इस प्रस्ताव को सहमति दे देते हैं। तो फिर यहां की महिलाओं का उद्धार हो जाता।”
“ठीक है हमें भी अमृतानंद स्वामी से बात तो करनी पड़ेगी।”
“गुरुवर किसी नए भवन के प्रस्ताव की बात तो है नहीं…. कि ऊपर ट्रस्ट से समर्थन लेना पड़े ! यह तो एक बहुत छोटी सी बात है …
न तो हम आश्रम में कोई नई चीज बनवा रहे हैं। और ना ही कोई पुरानी बनी हुई चीज को तोड़ रहे हैं। जिसके लिए हमें ट्रस्ट से या स्वामी जी को परेशान करना पड़े।
बहुत मामूली सी बात है कि अगर यहां की महिलाएं पढ़ना चाहती हैं तो उन्हें पाठशाला जाने की अनुमति मिल जाए। इसके साथ ही जो भी महिलाएं जो सीखना चाहती हैं उन्हें उन चीजों की अनुमति दे दी जाए। बस इतनी सी ही जरूरत थी यहां की।”

” तुम तो वरुण देव पीछे ही पड़ गए हो ! मतलब ऐसे पीछा नहीं छोड़ोगे हमारा।
चलो दिया दे दिया तुम्हें। जो तुम मांग रहे हो पर बदले में हमें क्या मिलेगा?”
“गुरुवर पहले ही आपका बहुत नाम है। आपके नाम में ही वृद्धि होगी हमेशा। आप कहेंगे तो भगिनी आश्रम का नाम आपके नाम पर रख दिया जाएगा।”
“अरे इतने सारे नाम का क्या करेंगे हम। चलो ठीक है। बाद में हम बताएंगे कि हमें क्या चाहिए? अभी तुम भी जाओ आराम कर लो। कल फिर सुबह 4 बजे से पूजन प्रारंभ हो जाएगा । हम भी आराम करना चाहते हैं।
अच्छा सुनो वह लड़की कहां गई ?उसके हाथ से जरा दूध भिजवा देना हमारे कमरे में। “

“जी मैं भिजवा दूंगा।”

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वरुण उन्हें प्रणाम कर बाहर निकल गया। और इन्हीं सब बातों में उसने जो कागज लिखित तौर पर तैयार किए थे, उनमें भी प्रबोधानन्द स्वामी के हस्ताक्षर उसने ले लिए । वह तुरंत वहां से बाहर निकला और ऑफिस में पहुंच गया। वहाँ से उसने तुरंत मंदिर ट्रस्ट के सदस्यों को सामूहिक रूप से एक मेल द्वारा प्रबोधानन्द स्वामी जी के दस्तखत किए हुए इस कागज को भेज दिया। और उसके साथ ही एक कॉपी उसने श्री गुरु अमृतानंद आचार्य को भी भेज दी।”

आश्रम में कोई भी नया कार्य शुरू करना इतना आसान नहीं था जितना ऊपरी तौर पर नजर आता था।
अमृतानंद स्वामी के पास फैक्स पहुंचने के कुछ 10 मिनट में ही अमृतआनंद स्वामी जी के यहां से मंदिर के ऑफिस में फोन आने लगा । वरुण वहीं बैठे उस फोन का इंतजार कर रहा था उसने तुरंत फोन उठा लिया….-” जी मैं मथुरा आश्रम से वरुण बोल रहा हूं। और मैंने ही अभी कुछ देर पहले यह फैक्स किया था। “
” स्वामी जी प्रबोधआनंद जी से बात करना चाहते हैं। उनका फोन बंद आ रहा है क्या आप उनसे बात करवा सकते हैं? “
” वरुण ने ‘हाँ’ कहां और फोन थामे खुद ही खड़ा रहा। जैसे ही दूसरी तरफ से अमृतआनंद स्वामी की आवाज़ आई , वरुण एक सांस में आश्रम की महिलाओं की स्थिति और उनकी आगे बढ़ने की इच्छा को लेकर अपने मन की सारी बात कह गया। उसकी बात पूरी सुनने के बाद अमृतआनंद स्वामी ने अपनी शांत स्थिर गंभीर आवाज़ में उससे उसका नाम पूछा…;” तुम बोल कौन रहे हो बेटा?”
” स्वामी जी मैं वरुण बोल रहा हूँ। वरुण देव!!”
” कल से आश्रम का कार्यक्रम शुरू होना है ना हम कल आश्रम पहुंच रहे हैं!”
वरुण के चेहरे पर मुस्कान खेल गई…. यही तो वह चाहता था ! उसने अमृतआनंद स्वामी को प्रणाम किया और फोन रख दिया। एक बार फिर बाहर निकलकर वह मुरलीधर की माया में खो गया। " अरे ओ मुरली वाले एक हाथ में मुरली पकड़े ही तुम सारे संसार को कैसे चला लेते हो? गीता में आखिर तुम ने सच ही कहा है कि बेटा तुम कर्म करो फल की चिंता मत करो फल देने के लिए मैं बैठा हूं ना! तुम कर्म करते समय जितने फल की सोचोगे नहीं उससे कई गुना मैं तुम्हारा आंचल भर दूंगा..... नमन करता हूं द्वारिकाधीश मैं तुम्हें भी और तुम्हारे रचे इस संसार को भी। जब कुछ दिन पहले ही उसने आश्रम में स्त्री शिक्षा पर बात उठायी और कहा था कि ये बात अमृतानन्द स्वामी तक पहुंचाई जाए,तब सबने उसकी बात काट कर दबा दी थी, की अमृतानन्द स्वामी इतनी आसानी से सबसे बात नही कर लेते तो तुम उनके सम्मुख अपनी बात अभी नही रख सकते। उनसे बात करने के लिए अभी कम से कम चार पांच साल और तपस्या करो।

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वो प्रसन्न था कि कम से कम अब स्वामी जी स्वयं वहाँ आ रहे थे। अमृतआनंद स्वामी के आ जाने से प्रबोधानन्द जी से पारो को बचाने की समस्या भी अपने आप सुलझ गई थी। उत्साह से अपनी चाल में मगन आगे बढ़ते वरुण को प्रबोधनंद के कमरे के सामने से निकलते हुए अचानक याद आया कि उनके लिए दूध लेकर जाना था । वह वापस रसोई की तरफ मुड़ रहा था कि सरिता सामने से चली आई...;" सरिता बहन आप मेरा एक काम करेंगी?"

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” जी गुरुदेव कहिए!”
” आप प्रबोधानन्द स्वामी के लिए एक गिलास में दूध ला देंगी। आप यहां तक लाकर दे दीजिए मैं उनके कक्ष में पहुंचा दूंगा।
” अवश्य। ” सरिता वापस मुड़कर तेज कदमों से चलती रसोई में चली गई और वहां से दूध का एक बड़ा कांस्य का गिलास भरकर ले आई। दूध के साथ ही तश्तरी में कुछ पिस्ते और काजू भी रखे थे। उस तश्तरी को हाथ में लेकर वरुण मुस्कुरा उठा और प्रबोधानन्द स्वामी के कमरे की ओर बढ़ चला…-” क्या मैं अंदर आ सकता हूं स्वामी जी?”
” हां आ जाओ।”
प्रबोधानन्दने वरुण के हाथ में दूध का गिलास देखा और उसकी भवे तन गई …-“वह लड़की कहां गई? हमने तो कहा था उसके हाथ से भेजना।”
“जी आश्रम में इतनी भीड़ भाड़ है। और इतना सारा काम है कि इधर-उधर किसी व्यवस्था में लगी होगी। मैंने उसे ढूंढने में समय व्यर्थ करना सही नहीं समझा और आपके लिए खुद ही दूध ले आया।”
“किसने कहा कि उसे ढूंढने में आपका समय व्यर्थ हो जाता वरुण देव जी? जब हमने कहा है कि उन्हीं के हाथ से भेजें, इसका मतलब है कि उन्हीं के हाथ से भेजिए। हमारे हर काम नियत होते हैं। हमारे हर काम का एक प्रयोजन होता है। और उस प्रयोजन के सिद्ध होने में ही सामने वाले की नियति है। आई बात समझ में?”
वरुण ने धीरे से ना में सिर हिलाते हुए हाथ जोड़ दिए।
” क्षमा करेंगे प्रभु !!लेकिन अभी आपकी बातों को समझने के लिए मैं थोड़ा मंदबुद्धि हूं। फिर भी मैं प्रयास करता हूं की इस भीड़ भाड़ में उन्हें ढूंढ कर आपके समक्ष ला सकूं। तब तक आप कृपया यह दूध ग्रहण कर लीजिए। रात भी बहुत हो गई है और सुबह 4 बजे से आपको अनुष्ठान में वापस बैठना है।”
वरुण ने एक बार फिर उनके सामने हाथ जोड़े और बाहर निकल गया….
उसे खुद समझ में नहीं आ रहा था कि उसके अंदर यह कैसी चंचलता घर करती जा रही थी। वह बात बात पर बातें बना रहा था। झूठ बोल रहा था, लेकिन उसे अपनी इस कृत्य पर कोई शर्मिंदगी नहीं थी। बल्कि वह अपने इस कृत्य पर गौरवान्वित था।वहां चलते भजन को सुनता और मोहित होता वरुण भी जाकर उस भजन मंडली के साथ बैठ गया और माइक अपनी तरफ खींच कर सस्वर पाठ करने लगा... अच्युतम केशवम कृष्ण दामोदरम राम नारायणम जानकी वल्लभं....

क्रमशः

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aparna…..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

20 विचार “समिधा- 35” पर

  1. तुम कर्म करते समय जितने फल की सोचोगे नहीं उससे कई गुना मैं तुम्हारा आंचल भर दूंगा…
    वाह क्या खूब लिखा है👌
    यही मंत्र है जो आपको सदैव प्रसन्न रखता है

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