समिधा – 36

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  समिधा – 36

       अमृतानन्द स्वामी के आ जाने से आश्रम में अलग ही उत्साह दौड़ गया था। हवन पूजन अनुष्ठान के साथ ही अलग अलग समय पर श्री कृष्ण के अलग अलग कलेवर उनकी अलग अलग साजसज्जा देखने वालों का मन मोह रही थी।
    श्रद्धालुओ की भीड़ उमड़ पड़ी थी। यूँ लग रहा था सारा शहर ही मंदिर में समाहित हो चुका था।
मंदिर के सारे सदस्य व्यस्त थे। आश्रम की महिलाएं भी सारा समय भोजन और बाकी व्यवस्थाओं में व्यस्त थीं।
   श्रद्धालुओं के लिए भी दोनों समय भंडारे का आयोजन था।
   और इस सब के बाद भी आश्रम में बना भोजन रोज़ चार पांच गुरूवरों के द्वारा आश्रम से बाहर ले जाकर रास्ते पर भीख मांगते अशक्त जनों में बांटा जा रहा था।
   मंदिर पूरी तरह कॄष्णभक्ति में लीन था। इतने सारे आयोजन के साथ अब अमृतानन्द स्वामी की दैव वाणी के अमृत से सभी सिक्त हो रहे थे।
     सारा के लिए ये सब कुछ बहुत नया था। उसने आज तक इसके पहले कहीं किसी धर्म में भगवान के प्रति भक्त की ऐसी श्रद्धा नही देखी थी।
   उसे सब कुछ चमत्कृत कर रहा था।
  सुबह गोपाल जी को पंडित जी द्वारा जगाया जाना। उन्हें जगाने के लिए सुप्रभात मंत्रों की आवृत्ति सुनना। उसके बाद गोपाल जी को चांदी के भगोने में रख उनके चरण और मुहँ साफ करने के बाद उनका हल्दी शहद शक्कर दूध दही से परिषेक करने के बाद शुद्ध जल में अवगाहन करवाना।
    उनके वस्त्रों और साजसज्जा का विशेष ध्यान दिया जाना और उसके बाद बच्चों की तरह उन्हें सुबह फल उसके बाद दूध का भोग लगाना।
   दोपहर उन्हें छप्पन भोग खिलाना आदि देख देख कर सारा पुलकित हो रही थी।
   रात होने पर गोपाल जी को सुलाने के लिए उनका शयनकक्ष था, जिस पर उन्हें सुलाने के बाद उनका कक्ष बंद कर दिया जाता।
  यही सब देख सारा के मन में कई तरह के सवाल पैदा होते…-” हे वरुण ! तुम लोग तो अपने भगवान को ऐसे पूजते हो जैसे वो जीते जागते तुम्हारे सामने खड़े हैं।”
” हाँ ! यही तो हमारा विश्वास है, कि वो हमारे सामने हैं।”
“लेकिन अगर ऐसा है तो वो इतनी सजी हुई खाने की थाली से कुछ खाते क्यों नही? अगर वो हैं तो एक बूंद दूध भी पीते क्यों नही। “

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“वो सब खाते पीते हैं बस हमें नज़र नही आता। हर वस्तु का एक सूक्ष्म रूप होता है और एक स्थूल रूप। तो स्थूल रूप वह है जिसे हम देख पाते हैं। और सूक्ष्म रूप उस वस्तु का सार भाग होता है। अब जैसे देखो मैंने तुम्हें यह जो सारी बातें बताइ, यह सब तुमने ग्रहण कर ली। लेकिन ऐसा तो नहीं है कि यह बातें अब मेरे पास नहीं बची। इन बातों का ज्ञान मेरे पास भी मौजूद है। और तुम्हारे पास भी। तो इसका मतलब तुमने इन बातों का सूक्ष्म रूप ग्रहण किया। और स्थूल रूप मेरे पास छोड़ दिया। बस वैसे ही हमारे मुरलीधर भी हैं। जो हमारे भोग प्रसाद का सूक्ष्म रूप ग्रहण कर लेते हैं, और स्थूल रूप हमारे लिए छोड़ देते हैं और उसके बाद यह भोग अमृत बन जाता है। देखो मंदिर में कितना ढेर सारा भोग प्रसाद बन रहा है। मंदिर में आने वाला हर श्रद्धालु पेट भर के इस भोग को ग्रहण करता है। और इसके बाद शहर भर के जरूरतमंदों में यह भोग कृष्ण जी के नाम पर बंट जाता है। कोई भी भूखा नहीं बचता कोई भी अकेला नहीं बचता। यही है श्रीकृष्ण की माया। “
     वरुण की बात सुनती सारा के हाथ श्रद्धा से स्वयं जुड़ गए।
    वरुण को मालूम नहीं था कि जब वह सारा से यह सब बातें कर रहा था उसी समय अमृतानंद स्वामी अपने 2 शिष्यों के साथ उधर से निकल रहे थे। और उन्होंने सारा का यह सवाल सुन लिया था। सवाल सुनकर यह जानने के लिए कि उनके आश्रम का यह लड़का सारा को किस तरह से जवाब देता है, वह चुपचाप वरुण के पीछे खड़े रह गए और वरुण की सारी बातें सुनते रहे।
     वरुण और सारा की बातें समाप्त होने पर अमृतानंद स्वामी के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई। उन्हें लगा उनका यह युग परिवर्तन का संकल्प निराधार नहीं है और ना ही कच्चे लोगों के कंधों पर टिका हुआ है। वह आगे बढ़ने को थे कि वरुण ने उन्हें देख लिया और तुरंत ही उन्हें प्रणाम किया।
        अमृतआनंद स्वामी उस समय स्वयं प्रवचन कक्ष की तरफ ही जा रहे थे। उनके बाद वहां पर प्रबोधानन्द जी का भी प्रवचन होना था।
           स्वामी जी का प्रवचन शुरू हुआ और पूरा कक्ष कृष्ण लीलाओं में डूबने लगा।
      आश्रम की औरतें सजावट के बाद एक तरफ बैठ गईं थी। प्रबोधानन्द की आंखें रह रह कर उनमें से गुज़र कर पारो को खोजने का प्रयास कर रही थीं।
   लेकिन पारो वहाँ होती तब तो नज़र आती। भगिनी आश्रम के कार्यों का संयोजन वरुण के जिम्मे था,उसने इसलिये आज पारो को रसोई की तरफ के कामो में लगा रखा था।
   
    रसोई की तरफ आश्रम की वरिष्ठ महिलाएं और कुछ वरिष्ठ पुरुष सदस्य भी थे जो जल्दी जल्दी हाथ चलाते भोग की तैयारी कर रहे थे। तभी उन्हीं में से किसी ने वहाँ मौजूद औरतों से आश्रम में चल रही बातों का ज़िक्र शुरू कर दिया…-” सुनने में आया है आप लोग अपने हाथ खर्च के लिए आश्रम में कोई काम करना चाहती हैं? “
” नहीं गुरुवर ऐसी तो कोई बात नहीं।”
पद्मजा दीदी के इस जवाब के बाद उन्होंने वापस अपनी बात कहनी शुरू की..
” अगर आप सही कह रही हैं तब तो अच्छा है। पर अंदर की बात यह है कि अमृतानंद स्वामी को यहां से उस लड़के ने जिसे अभी आश्रम कुछ ज्यादा ही महिमामंडित करने लगा है आप लोगों की शिक्षा संबंधी कोई संदेश भेजा था। उसने पहले प्रबोधानन्द जी से बात की। प्रबोधानन्द स्वामी ने उसे टालने की बहुत कोशिश की लेकिन जाने कैसे उसने अमृतानंद स्वामी से बात कर ली और उन तक यह बात पहुंचा दी है कि आश्रम में जो कम उम्र की महिलाएं हैं और जो पढ़ना चाहती हैं उन्हें पढ़ने का मौका दिया जाए।
   देखिए हम लोग भी आप लोगों की शिक्षा और बाकी बातों के खिलाफ नहीं है। लेकिन जब तक आश्रम में है आप लोग हमारे संरक्षण में हैं। एक बार यहां से शिक्षा के लिए लड़कियां बाहर निकलने लगीं तब यहां का माहौल खराब होने लगेगा। जब एक लड़की अपने परिवार में रहती है तो वह अपने परिवार की जिम्मेदारी होती है। उसके पिता उसका भाई आदि उसकी सुरक्षा का ध्यान रखते हैं। लेकिन जब वही परिवार वाले अपने घर की लड़कियों और औरतों का संरक्षण नहीं कर पाते तब वह यहां आश्रम में पटक कर चले जाते हैं। इसके बाद आश्रम में जितना कुछ भी आप लोगों को मिल रहा है वह कहीं से भी कम नहीं है। उसके बाद भी अगर आप लोग शिक्षा और बाकी चीजों के लिए आश्रम से बाहर निकलना शुरू कर देंगे तो आप लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आपके अपने हाथों में होगी। कौन महिला किस  स्वभाव की है यह तो हम सब नहीं जानते ना। अगर बाहर कोई ऊंचनीच हो गयी या कोई बाहर निकल कर आश्रम को कलंकित करने में लग गई, तब इस आश्रम का… इस मंदिर का क्या औचित्य रह जाएगा?
    हम लोगों को.. अपने आश्रम से जुड़ना चाहते हैं। आश्रम के लोगों को बाहर के समाज से नहीं।
    आप जितनी महिलाएं यहां इस वक्त मौजूद हैं आप सभी से मैं यही आग्रह करता हूं, कि आज अमृत आनंद स्वामी रात के भोजन के पश्चात आश्रम के प्रमुख सदस्यों को बुलाकर इस बात पर विचार विमर्श करना चाहते हैं।
   … तो आश्रम की वरिष्ठ महिलाओं को भी बुलाया जाएगा और ऐसे में बस मेरा आग्रह यही है कि आश्रम में जो जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दीजिए।
  अगर आप महिलाएं एकजुट होकर यह कह देंगी कि आप लोगों को ना ही शिक्षा की आवश्यकता है और ना किसी अन्य हुनर की तो यह बात यहीं समाप्त हो जाएगी।”
” जी गुरुवर हम समझते हैं.. आपकी बात। हम बाकी महिलाओं से भी इस बारे में चर्चा कर लेंगे। और सभी से कह देंगे कि जब अमृतानंद स्वामी पूछे तो कोई भी इस बारे में अपना मंतव्य यही दे कि उन्हें आगे शिक्षा या किसी भी अन्य वस्तु की आवश्यकता नहीं है।”
” धन्यवाद हमारी बात समझने के लिए। “
     रसोई के काम काज के बीच ही पद्मजा दीदी ने फिर आश्रम की सभी महिलाओं को चारों तरफ से बुलाकर उन गुरुवर की बात सबके सामने रख दी। और सभी ने सिर झुकाकर हामी भर दी।
      दिन भर का कार्यक्रम समाप्त हुआ संध्या कालीन आरती के बाद एक बार फिर सुरीली भजन संध्या प्रारंभ हो गई।
      इतना सब होने के बाद भी प्रबोधानन्द  को पारो की एक झलक भी नहीं मिली। वह जहां भी उसे ढूंढना चाहते सामने वरुण हाथ बंधे मुस्कुराता नजर आता ।
   जाने क्यों लेकिन प्रबोधानन्द को वरुण से चिढ़ होने लग गई थी। उन्हें मन ही मन समझ आ गया था कि पारो के नहीं नजर आने में कहीं ना कहीं वरुण का ही हाथ है।

    मंदिर के सुबह से प्रारंभ होने वाले कार्यक्रमों का अंत हो चुका था। मंदिर परिसर में भोग वितरण के बाद सभी आचार्य और गुरुवर भी अपना भोजन ग्रहण कर चुके थे । सारा सब निपटने के बाद अमृतआनंद स्वामी ने मंदिर परिसर के बाहर वाटिका में मंदिर में उपस्थित सभी महिला सदस्य और पुरुष सदस्यों को बुलवा भेजा था।
    इसके बावजूद  उदयाचार्य जी ने सिर्फ मंदिर के प्रमुख पुरुष सदस्य और वरिष्ठ महिला सदस्यों को ही वहां जाने की अनुमति दी।
    उद्यान में सब के बैठने के बाद अमृतआनंद स्वामी भी अपने शिष्यों के साथ वहां चले आए। वहां बैठे लोगों को देखने के बाद अमृत आनंद स्वामी के माथे पर बल पड़ गए…. उन्होंने तुरंत वहां खड़े एक आचार्य को बुलाकर पूछा ….-” क्या पूरे आश्रम परिसर में सिर्फ इतने ही लोग उपस्थित हैं? क्या आश्रम के बाकी सदस्य यहां से बाहर कहीं रहते हैं ?और आयोजन के समय मंदिर में चले आते हैं… और शाम को वापस लौट जाते हैं?
” नहीं गुरुवर ऐसी तो कोई बात नहीं?”
” हम इस आश्रम में रहने वाले सभी सदस्यों से मिलना चाहते हैं। चाहे वह पुरुष सदस्य हो चाहे महिला सदस्य। इसके साथ ही सिर्फ वरिष्ठ और सम्माननीय सदस्यों का ही नहीं जितने भी नवागंतुक सदस्य आश्रम में सम्मिलित हुए हैं। हमें उन सभी से व्यक्तिगत रूप से मिलना है। इसलिए आप सभी लोगों को इसी वक्त यहां बुलवा लीजिए। हां अगर महिला आश्रम में कुछ महिलाएं अभी भी भोजन आदि से नहीं निपट पाई हैं तो हम यहां रुक कर उनकी प्रतीक्षा करेंगे।”
” जी जैसी आज्ञा गुरुदेव। “
   वहां उपस्थित 2- 3 आश्रम के पुरुष सदस्यों ने तुरंत इधर उधर जाकर जो भी सदस्य किसी भी कार्य में व्यस्त थे, उन सबको उद्यान में तुरंत पहुंचने का अमृतानंद जी का आदेश सुना दिया।
    वहीं खड़े वरुण के चेहरे पर मुस्कान खे पलने लगी।
लगभग 10-15 मिनट में सारा आश्रम उद्यान में उपस्थित था एक तरफ पुरुष सदस्य पंक्ति बद्ध बैठे थे और दूसरी तरफ महिलाएं ….
    प्रबोधानन्द भी अमृतआनंद स्वामी जी के साथ ही उनके पीछे बैठे हुए थे।
 

      स्वामी जी ने कहना शुरू किया….

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” अभी कल ही आश्रम के एक बालक से हमारी बातचीत हुई हम उस बालक को यहां सामने बुलाना चाहेंगे उसने हमें अपना नाम वरुण बताया था।”
   स्वामी जी के ऐसा उद्घोष करते ही वरुण अपनी जगह से खड़ा हो गया। उसने वहीं से स्वामी जी के सामने हाथ जोड़े और स्वामी जी ने इशारे से उसे अपने पास बुला लिया।  वो धीमे कदमों से उनके पास गया और उन्हें प्रणाम कर एक तरफ खड़ा हो गया । पर स्वामी जी सिर्फ इतने से संतुष्ट नहीं हुए उन्होंने उसे अपने पास बुलाकर अपने बगल वाली तोषक पर बैठने का इशारा किया। आश्रम में उपस्थित सभी वरिष्ठ पुरुष सदस्य आंखें फाड़े वरुण को देखने लगे। प्रबोधानन्द के ह्रदय में जाने क्यों सांप लोट गया।
    यह कल का आया लड़का स्वयं स्वामी जी के बगल में बैठने जा रहा था इस जगह तक पहुंचने में लोगों को वर्षों लग जाते हैं। जाने कितना तप और कितनी साधना के बाद भी अमृतआनंद स्वामी इतने प्रेम और सहजता से अपने बगल वाला स्थान किसी को नहीं देते और , आज इस लड़के को दे दिया…. आखिर है क्या इसमें?
     वरुण संकुचित होकर धीरे से उनके पास बैठ गया।
  स्वामी जी ने बोलना शुरू किया…-” इस बालक ने कल जो किया है वह हम आज तक कभी सोच ही नहीं पाए। जिस तरह हर किसी का एक परिवार होता है…. उस परिवार में घर का वरिष्ठतम सदस्य परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी को निभाता है। वह वरिष्ठतम् सदस्य घर का सबसे बुजुर्ग पुरुष भी हो सकता है और महिला भी। यानी सामान्य शब्दों में कहें तो दादा दादी….. और अगर वह नहीं है तो घर का पुरुष सदस्य यानी के पिता। यह वह सदस्य होते हैं जो घर भर के बाकी सदस्यों की इक्छाओ अनिकच्छाओं को ध्यान में रखते हुए उनका पालन करते हैं। अगर घर के सदस्यों की इच्छाएं पूरी करने योग्य हैं अनुकरणीय हैं तो उन्हें पूरा करने का दायित्व घर के वरिष्ठतम सदस्य का होता है।
   हम भी इस कृष्ण परिवार के वरिष्ठतम सदस्य हैं। एक तरह से देखा जाए तो आप सब के पितामह, आप हमें मान सकते हैं। ह्रदय से हम भी आप सबको अपना बालक ही मानते हैं। आप सभी हमारी संताने ही तो हैं।  तो अगर आपको किसी भी वस्तु की आवश्यकता है तो वह आप हमसे ही तो कहेंगे ना। लेकिन आज तक आश्रम की जो व्यवस्था थी उसमें हम से सीधे किसी की भी भेंट या मुलाकात नहीं हो पाती थी। नए आए सदस्यों को अपने से ऊपर के सदस्यों तक अपनी बात पहुंचानी होती थी। और सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए यह बात हम तक पहुंचती थी। इसी बीच कई बार कई तरह की बातें नहीं भी पहुंच पाती थी। लेकिन हमने उस नियम को कल ही तोड़ दिया। अब आप में से हर कोई हम से सीधे आकर अपने मन की इच्छाएं बता सकता है।
  आप सभी हमारा परिवार हैं और आपके अच्छे बुरे के बारे में सोचना हमारा कार्य है लेकिन हमने शायद उस कार्य को भली प्रकार नहीं किया।
   आश्रम के एक हिस्से की तरफ से हमारी आंखें सदा ही बंद रही।  भगिनी आश्रम का हमने भी बाकी लोगों की तरह यही सोचा कि अगर भगिनी आश्रम में महिलाएं रह रही हैं तो यही उनके लिए बहुत परोपकार कर रहा है आश्रम।
  उन्हें कृष्ण भक्ति करने का पूरा मौका मिल रहा है। उन्हें दोनों समय संतुलित भोजन मिल रहा है…. और उन्हीं क्या चाहिए? लेकिन ऐसा नहीं होता। भगिनी आश्रम में भी हर आयु वर्ग की औरतें हैं। और उनकी अपनी आवश्यकताएं हैं। उनके हाथ में किसी भी तरह की कोई धनराशि नहीं रहती । अगर उन्हें अपनी किसी जरूरत के लिए पैसों की जरूरत हुई …तब वह किसका मुंह देखेंगे?  यहां उनके कोई घर के सदस्य भी उनसे मिलने आते जाते नहीं है।
   हां कुछ एक महिलाएं होंगी जिनके पास धन होता है। लेकिन अधिकतर के पास नहीं होता। तो इसलिए हमने यह निर्णय लिया है कि अगर हमारे आश्रम की महिलाएं  थोड़े बहुत धन उपार्जन के लिए अपनी कलाओं को विकसित करके आश्रम के लिए कुछ नए तरह के वस्तुओं को निर्मित करती हैं… तो आश्रम इसके बदले में उन्हें एक उचित धनराशि देगा।
  हमारा कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे मंदिरों की संख्या पूरे भारतवर्ष में जितनी है उन सभी मंदिरों के मूर्तियों के लिए अगर हमारी भगिनी आश्रम की महिलाएं तरह-तरह के वस्त्र तैयार करती हैं, या साज-सज्जा के लिए तोरण बंधन आदि निर्मित करती हैं…. कृष्ण भक्ति में रमे छोटे-छोटे रुमाल आदि तैयार करती हैं…. तो हम इन्हें बाकी के मंदिरों में भेज कर इन सबके बदले में आश्रम की महिलाओं को एक उचित धनराशि दिया करेंगे।
   इसके साथ ही आश्रम में अबसे प्रसाद वितरण के लिए कुछ सूखे तरह के प्रसाद भी हमारे आश्रम की महिलाओं द्वारा बनाए जाएंगे, और इन्हे उचित तरीको से बांधा भी जाएगा…. जिससे आश्रम में आने वाले श्रद्धालु इन्हें एक उचित मूल्य देकर खरीद सकें। यह धनराशि भी पूरी तरह से भगिनी आश्रम के लिए ही दी जाएगी।
     अब एक सबसे महत्वपूर्ण घोषणा हम करने जा रहे हैं। हम भगिनी आश्रम की ऐसी बालिकाएं जो अपनी शिक्षा किन्हीं कारणों से पूरी नहीं कर पाई…. उनके लिए शिक्षा के द्वार खोलने जा रहे हैं। लेकिन ऐसा ना हो कि हमने एक तरफा अपनी तरफ से किसी भी तरह का कोई निर्णय आप महिलाओं पर थोपा हो। इसलिए हम जानना चाहते हैं कि हम यह जो निर्णय लेने जा रहे हैं इससे आप सभी महिलाएं प्रसन्न है या नहीं?
    दूसरी बात यह है कि स्त्री शिक्षा के प्रति हमारा ध्यान वरुण ने दिलवाया था…. तो हम जानना चाहते हैं , कि क्या भगिनी आश्रम की बालिकाएं शिक्षित होना चाहती है? क्योंकि कहीं ऐसा ना हो कि हमने ट्रस्ट से बात करके आप लोगों के लिए शिक्षा का द्वार तो खुलवा दिया लेकिन आप में से कोई जाना ही नहीं चाहे तो हमें ट्रस्ट के सामने कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। इसीलिए हम जानना चाहते हैं कि आप लोगों के लिए पाठशाला का द्वार खोल दिया जाए या नहीं।”
    सभी महिलाओं को रसोई में पहले ही इस बात के लिए तैयार किया गया था , कि जैसे ही अमृतानंद स्वामी यह सवाल पूछेंगे तभी अपनी जगह पर चुप और शांत बैठे रहेंगे कोई भी शिक्षा के लिए हां नही कहेगा।
    सभी को उसी प्रकार शांत बैठे देख वरुण उद्विग्न होने लगा।  उसने पारो की तरफ देखा , पारो चुपचाप गर्दन झुकाए जमीन पर अपनी उंगलियों से जाने क्या लिखती बैठी थी।  वरुण को उसके ऊपर खीझ सी होने लगी। कैसी अजीब लड़की है आज इसकी स्वतंत्रता का, उसकी इच्छा का मार्ग खुल रहा है और यह अब भी चुपचाप बैठी है।
   अब तक प्रसन्न चित्त दिखता वरुण का कलेजा अब डूबने लगा था। पारो को ऐसे चुप बैठे देख उसका चेहरा म्लान हो गया था।
    वरुण इसी वक्त पारो से वही सबके सामने कहना चाहता था कि, खड़ी होकर स्वीकार कर लो कि तुम आगे पढ़ना चाहती हो। और आगे पढ़ाई ही तुम्हारी जिंदगी को एक सही दिशा दे सकती है। लेकिन………..
….    अमृतानंद स्वामी के बोलने के बीच में किसी को भी बोलने की अनुमति नहीं थी, और यह अच्छा भी नहीं लगता इसलिए वरुण एक कड़वा सा घूंट पी कर चुपचाप बैठा रहा।
     अमृतआनंद स्वामी ने एक बार फिर अपना कथन जारी रखा…-” मैं भगिनी आश्रम की सभी महिलाओं, कन्याओं से एक बार फिर पूछता हूं कि, आप लोग क्या आगे अपनी शिक्षा को जारी रखना चाहती हैं? और क्या मै ट्रस्ट से आप लोगों के लिए बात करके पाठशाला का मार्ग खुलवा दूँ।
    अगर आप में से किसी एक ने भी खड़े होकर सहमति दे दी तो मैं समझ जाऊंगा कि बाकी लोग शायद संकोच के कारण चुप हैं, लेकिन पढ़ना चाहती हैं । परंतु अगर आप में से किसी ने भी सहमति नहीं दी तो मैं इस बात को ट्रस्ट के सामने नहीं रखूंगा।”

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    सारी महिलाएं चुप बैठी थी कि पद्मजा दीदी अपनी जगह पर खड़ी हो गई उन्होंने गुरुवर को प्रणाम किया….-
” गुरुवर आप की दी हुई सारी सुविधाएं हम भगिनी आश्रम की सारी महिलाओं को समुचित व्यवस्था से मिल जाती है। हमें इस आश्रम में रहने में कोई कष्ट नहीं है। हम सब के लिए आपने अभी जो निर्णय लिया कि हम अपनी जीविकोपार्जन के लिए गिरधर मुरारी और राधा रानी के लिए वस्त्र तैयार करेंगे , और उन वस्तुओं की बिक्री से मिले धन को आप हमारे भगिनी आश्रम की महिलाओं को दे देंगे । इसके साथ ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए निर्मित मिष्ठान से भी जो धन और रकम इकट्ठा की जाएगी, वह हमारे आश्रम को अलग से दी जाएगी।
     इस बात के लिए मैं सारे भगिनी आश्रम की महिलाओं की तरफ से आपको धन्यवाद देती हूं। हां यह भी सत्य है कि दो वक्त के भोजन के अलावा भी हम महिलाओं की कुछ अन्य आवश्यकताएं होती हैं। और जिसकी तरफ आपने ध्यान दिया इस बात के लिए भी मैं हृदय तल से आपकी आभारी हूं गुरुवर।
रही बात शिक्षा की तो उसके लिए हमारे आश्रम की महिलाओं व बालिकाओं के पास उतना समय ही नहीं। दूसरी बात शिक्षा के लिए आश्रम से बाहर जाना भी सुरक्षा की दृष्टि से उतना सही नहीं। और सुरक्षा की बात किनारे रख भी दें तब भी अगर कोई बालिका पढ़ना ही नहीं चाहती तो फिर शिक्षा के लिए पाठशाला का द्वार खुलवाने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता गुरुवर….

” प्रणाम गुरुवर मैं पढ़ना चाहती हूं।”

पद्मजा दीदी की बातों को सुनता वरुण खुद नीचे सर किए बैठ गया था। उसे अब वहां पर कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसे लगा दो दिन में उसने जितनी भागदौड़ की, वह सब व्यर्थ हो गई। उसे मन ही मन पारो के ऊपर बहुत क्रोध आ रहा था, कि उसी बीच पद्मजा दीदी की बातों को आधे में ही काट कर एक नई आवाज खनकने लगी…

” प्रणाम गुरुवर!!! मैं पढ़ना चाहती हूँ।”

” तुम्हारा नाम क्या है बेटी?”

अमृतआनंद स्वामी की मधुर आवाज उस कन्या की आवाज़ के बाद उस परिसर में गूंज उठी।

” जी पारोमिता।

   वरुण ने पारो की तरफ देखा वह पूरी दृढ़ता से अपनी जगह पर खड़ी थी। उसने गुरुवर की तरह हाथ जोड़े रखे थे। उसकी आंखों में आत्मविश्वास की जो झलक नजर आ रही थी उसे देखकर वरुण के चेहरे पर एक मुस्कान खेल गई।
   उसने तुरंत अमृतानंद स्वामी की तरफ देखा और कहा…-” मैं कहता था ना आपसे स्वामी जी हमारे आश्रम की बालिकाएं पढ़ना चाहती हैं।”
.  अमृतआनंद स्वामी जी ने धीरे से हां में सिर हिलाया और अपना एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।

  “अगर इस आश्रम की सिर्फ एक बालिका भी पढ़ना चाहती है, तो हम उसे भी शिक्षा से विमुख नहीं रहने देंगे । बेटी कल से ही तुम्हारी शिक्षा दिक्षा के लिए जो भी प्रबंध उचित होगा करने की शुरुआत कर दी जाएगी। इसका सारा दारोमदार मैं वरुण के ऊपर डालता हूं। वरुण कल ही जितनी बालिकाएं शिक्षित होना चाहती हैं, उनकी संख्या से हमें अवगत कराओ। और जिससे हम ट्रस्ट में इस बारे में बातचीत कर ले। कान्हा जी चाहेंगे तो महीने भर  के भीतर भीतर आप सभी बालिकाएं शिक्षा के आंगन में हाथों में कलम और कागज पकड़े नजर आएंगी।
   कान्हा जी सबको प्रसन्न करते हैं सब पर कृपा दृष्टि रखते हैं राधे राधे…

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    पारो ने धीरे से वरुण की तरफ देखा वह उसे ही देख कर मुस्कुरा रहा था। वरुण ने अपने चेहरे पर कृतज्ञता के भाव ले आए जैसे उस भरी सभा में अपनी बात की लाज रख लेने के लिए पारो का हृदय से आभार व्यक्त कर रहा हो, पारो ने भी धीरे से सर झुका कर उसे  प्रणाम किया और उसके आभार का भार ग्रहण कर लिया……

क्रमशः

aparna….
   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

20 विचार “समिधा – 36” पर

  1. आपकी कहानियां जीवंतता का एहसास कराती है ,कही से भी काल्पनिक नहीं लगती ,जीवनसाथी से भी ज्यादा सिद्दत से मैं समिधा के आने का इंतजार करती हूं

    Liked by 1 व्यक्ति

  2. अमृतानंद जैसे संतो के कारण ही सनातन धर्म बचा हुआ है,क्योंकि वरुण लाख प्रयास ही करता पर अगर अमृतानंद प्रबोधानंद जैसे होते तो ये सब संभव नहीं होता

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