समिधा-37

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  समिधा -37

      आश्रम का स्थापना दिवस सारे हर्ष उल्लास के साथ आखिरकार समापन की ओर बढ़ गया।
  हर साल की तरह इस साल यहां पर कार्यक्रम ही नहीं हुआ था बल्कि आश्रम के लिए कुछ नहीं घोषणाएं भी की गई थी… और कुछ नए निर्णय लिए गए थे ! और जिस में सबसे अधिक फायदा हुआ था भगिनी आश्रम की महिलाओं को।
      समापन दिवस पर एक बार फिर महिलाओं और पुरुषों को पास ही स्थित सरोवर से जल के कलश भर कर लाने थे और आश्रम में संजोने थे।

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       कमर तक सरोवर में डूबी स्त्रियां कृष्ण नाम जपती कलश में पानी भरे बाहर निकल आयीं।
   उन सभी के इस जल आरोहण क्रम को देखने के लिए या किसी खास को देखने के लिए प्रबोधआनंद भी मंदिर से सरोवर की तरफ बढ़ते चले आ रहे थे। उनकी आंखें सरोवर में डूबी खड़ी महिलाओं की ओर ही थी कि तभी उन्हें वह दिख गई जिसे देखने के लिए 2 दिन से उनकी आंखें ललचा रही थी।
    अब अगर कोई विश्वामित्र को दोष दे तो यह तो गलत है अगर सामने मेनका हो तो विश्वामित्र की तपस्या भंग होनी बिल्कुल जायज है। कुछ ऐसे ही भाव लिए उनकी आंखें पारो के ऊपर से सरकती जा रही थी कि तभी एक पुरुष आकृति उन के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई।
   वह पारो को देखते हुए अपने विचारों में इतने मग्न थे कि उनका इस बात पर ध्यान ही नहीं गया कि महिलाएं जैसे ही सरोवर से बाहर सीढ़ियों पर पहुंची कि उनके सामने खड़े पुरुषों ने उनसे कलश अपने सर पर लिया और महिलाएं एक तरफ से होकर आश्रम के लिए निकल गई । वह पुरुष आकृति जो उनके और पारो के बीच चली आई थी वरुण ही था। उसने पारो से कलश लिया और बाकी पुरुषों के साथ प्रबोधनंद की तरफ बढ़ने लगा।
    प्रबोधानंद के पास से गुजरते हुए उसने झुककर उन्हें प्रणाम किया और मंदिर की तरफ बढ़ चला।  प्रबोधनंद एक बार फिर मन मसोसकर रह गया।
     आज कार्यक्रम की समाप्ति के साथ ही अमृतआनंद स्वामी के साथ उन्हें निकलना था लेकिन वह इस जुगत में थे कि किसी तरह उन्हें कुछ दिन और इस आश्रम में रहने का मौका मिल जाए।

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    आश्रम में बाकी सारे काम निपटने के बाद भोजन की समाप्ति हुई और अमृतआनंद स्वामी ने प्रबोधानन्द के साथ ही उदयाचार्य, स्वस्तिकाचार्य, अलोकानन्द,वरुण प्रशांत आदि लोगों को अपने कमरे में बुलवा लिया।
     ” आप सभी के साथ और सभी के सहयोग से आश्रम का स्थापना दिवस बहुत भली प्रकार मनाया गया। और इस बात से हमें हार्दिक प्रसन्नता है कि आश्रम समाज उत्थान के कार्यक्रम में एक कदम और आगे बढ़ने वाला है। स्त्री शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण बिंदु पर जिस पर आज तक हम किसी भी आचार्य गुरुवर की आंखें नहीं गई थी उस तरफ हमारा ध्यान दिलवाने के लिए मैं वरुण को आभार व्यक्त करता हूं। और आज से वरुण को शाम के प्रवचन के लिए नियुक्त करता हूं।
   वरुण आश्रम में गुरु पद या आचार्य पद पाने के लिए कठिन तपस्या करनी पड़ती है । वेदों के अध्ययन के साथ ही हमें यह भी सिखाया जाता है कि हमें अपनी बात सामने वाले के सामने इस तरह प्रस्तुत करनी है कि वह हमारी बात मानने के लिए मजबूर हो जाए।
   तुम्हारे अंदर यह प्रतिभा स्वयं श्रीकृष्ण ने सृजित की है। तुम्हें देखकर ऐसा लगता है कि स्वयं प्रभु का हाथ तुम्हारे सर पर है, और हम ये भी देख सकते हैं कि बहुत कम समय में तुमने पर्याप्त अध्ययन भी कर लिया है । इसलिए तुम्हें ये पद देते हुए हमें भी प्रसन्नता हो रही है। आश्रम और मंदिर की ज़िम्मेदारी युवा हाथों में हो तो और भी कुशल संचालन हो सकता है।
  अब हम यहाँ से निकलेंगे ।  आप में से जब भी किसी को कोई समस्या हो आप हमसे निशंक कह सकते हैं। प्रबोधानन्द आप हमारे साथ ही चलेंगे या..”
“हम रुकना चाहतें हैं गुरुवर!”
  अमृतानन्द स्वामी ने आश्चर्य से प्रबोधानन्द को देखा क्योंकि यहाँ से निकलने के बाद उनका हरिद्वार में कार्यक्रम पूर्वनियोजित था!
” पर आप तो हमारे साथ हरिद्वार जाने वाले थे।”
“आप आज निकल जाइये, हम एक दो दिन में पहुंच जाएंगे। यहाँ आश्रम में और किसी वस्तु की आवश्यकता हुई तो वो भी देख लेंगे। “
    एक वरुण के अलावा वहाँ सभी प्रबोधानन्द के निर्णय से प्रसन्न थे।
  पर वरुण ने भी मन ही मन ठान लिया था कि वो भी अब इस प्रबोधानन्द को सबक सिखा कर रहेगा।

   अमृतानन्द स्वामी को लगभग पूरा आश्रम बाहर तक छोड़ने आया था, सभी की आंखें झिलमिला रहीं थीं। स्वामी जी सही मायनों में युग प्रवर्तक थे। उनके सानिध्य में सभी को यही लग रहा था जैसे वे अपने पालक के साथ हों।
  अमृतानन्द स्वामी की गाड़ी निकलते ही सभी वापस अपने कामों में लगने लौट पड़े।
  प्रबोधानन्द पलटे और ज़रा तेज़ आवाज़ में पारो को आवाज़ लगा दी….”सुनिए !आप ही का नाम पारोमिता है ना,ज़रा हमारे कक्ष में आइये।”
   पारो अपना नाम सुन कर रुक गयी और प्रबोधानन्द कि बात सुन हॉं में सिर हिला कर खड़ी रह गयी।
  प्रबोधानन्द ने उसके बाद इधर उधर देखा और उसे वरुण भी नज़र आ गया। उसे इशारे से अपने पास बुला कर वो मुस्कुराने लगे…-” शाम ढल रही है वरुण देव जी, आप भी अपनी अमृत वाणी का प्रसाद बांटना शुरू कीजिए। हम भी आपको सुनना चाहते हैं। “
  ” हाँ वरुण ! स्वामी जी भी कह कर गए हैं, तो आओ आज श्रद्धालुओं को सिर्फ हमारी कही बातों का अर्थ समझाने की जगह कृष्ण लीलाओं पर चर्चा करो।”
   स्वस्तिकाचार्य जी के आग्रह को ठुकराना वरुण के लिए आसान नही था।
  वो मंदिर के कृष्ण मंडप की ओर बढ़ गया। जाते समय उसने पारो को देखा। वो ज़मीन को कुरेदती नीचे नज़र गड़ाए खड़ी थी।

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   वरुण ने कृष्ण को फूल पान चढ़ा कर दीप प्रज्वलित कर अपना आख्यान शुरू किया…
   इधर बाकी सभी आचार्य अपने अपने कार्यो के लिए आगे बढ़ गए। प्रबोधानन्द धीमे कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ गए और उनके पीछे सिर झुकाए पारो भी चुपचाप आगे बढ़ गयी।

*****

    भगिनी आश्रम में उस दिन अलोकानन्द स्वामी ने पद्मजा से अपने मन की बात कही थी। वो शुरू से ही हर बात पर पुरुष पक्षधर रहे थे। आश्रम की भी कई बातों में उन्हें स्त्रियों की दखलंदाजी पसन्द नही थी।
उनके अनुसार आश्रम का संचालन और देख रेख पुरुषों के जिम्मे ही होनी चाहिए,यहाँ की स्त्रियों को जितना मिल रहा है, बहुत है उससे अधिक की आवश्यकता यहाँ की महिलाओं को नही होनी चाहिए।
  अलोकानन्द और उदयाचार्य ही आश्रम के खर्चे का भी हिसाब किताब रखते थे। उन्हें मालूम था कोई भी नई चीज प्रारम्भ करना यानी एक नया खर्च शुरू करना था।
  इसी सब के बीच भगिनी आश्रम की संचालिका चारुलता दीदी का भी एक अलग ही किस्सा था।
ऊपरी तौर पर सभी यही जानते थे कि चारुलता दीदी समाजसेविका थी। दुनिया भर की सताई हुई बेचारी औरतों को ये सहारा दिया करती थी। इनके इस आश्रम के बाहर भी कुछ अन्य समाजसेवा से जुड़े काम चला करते थे।
   प्रशासन सरकार मंत्री संतरी तक उनकी खूब पैठ थी और इसी का फायदा उठा कर उन्होंने आश्रम की लंबी चौड़ी ज़मीन पर महिलाओं के लिए आश्रम की अनुमति निकलवा ली थी। आश्रम के शुरुवाती समय में वो ही कुछ महिलाओं को यहाँ आश्रय के लिए लेकर आई थी, बाद में तो कई कई औरतें स्वयं रोती बिलखती चली आयी थीं।
   इनमें से कुछ औरतें आश्रम की न होकर चारुलता दीदी की लायी हुई थीं,वो वहाँ भगिनी आश्रम में कुछ अलग ही विषबेल बोने का काम कर रहीं थीं।
    कहतें हैं ईश्वर की दृष्टि से कुछ छिपा नही है। हमें ज़रूर ये लगता है कि ये काम हम दब छिप कर रहे तो भगवान नही देख पाएंगे। पर ऐसा नही है। भगवान देखते भी हैं और समय आने पर उसका प्रतिफल भी देते हैं।

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   अभी तीन दिन से चल रहे आमोद उत्सव के बीच चारुलता दीदी भी व्यस्त थीं।
  आज अमृतानन्द स्वामी के जाते ही वो भी आश्रम में अंदर चली आयीं…
” कौन है भई जो तुम लोगो के बीच से उठ कर बाहर जाना चाहती है? वो भी पढ़ने?
  उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान दौड़ गयी..
पद्मजा ने धीरे से पारो का नाम बता दिया
” ये कब आयीं है? कौन है ये?”
पारोमिता के बारे में वहाँ उपस्थित जिसको जो पता था सभी बताते चले गए…
” लड़की तो इतनी सीधी दिखती है दीदी की लगता ही नही था कि उसके मुहँ में ज़बान भी होगी। जो बोलो वो काम कर देती है। सुखी रोटी भी डाल दो चुपचाप बेजुबान सी खा लेती है। रात जितनी देर जगा कर काम करवा लो करने के बाद भी भोर में जाग कर फिर काम में लग जाती है।”
” हाँ चारु दीदी! आजकल पद्मा दीदी के गोड़( पैर) दाबने का काम उसे ही तो दे रखा है इन्होंने।”
पद्मजा की मुहँ लगी चित्रा चहकने लगी। वहीं पीछे बैठी सरिता सब सुन कर भी चुप बैठी थी। पारो जब से आश्रम में आई तब से सरिता के साथ ही थी इसी से उसके बारे में होती ये सारी बातचीत उसके मन को भा नही रही थी।
” अच्छा तो अब तक तुम्हारे ही पैर दबा रही है। और किसी के पैर दबाने का सुयोग नही दिया क्या उसे? क्यों पद्मजा?”
” नही चारु दीदी। अभी उसे आये दिन ही कितने हुए?  फिर ऐसे किसी को भी मुहँ उठा कर बाहर नही भेज सकती न। कहीं किसी ने यहाँ उन आचार्यो से शिकायत कर दी तो?”
” हम्म ! बात तो सही है। ये आजकल की लड़कियों का अक्ल दिमाग तो होता नही। और हिम्मत देखो लड़की की सीधे अमृतानन्द स्वामी के सामने खड़ी हो गयी, एक बार को सोचा तक नही। “
” अब क्या कहें चारु दीदी। हम मना कर रहे थे कि किसी को यहाँ शिकायत नही तब भी ये बीच में हमारी बात काट कर कूद पड़ी, अब क्या कहें उसे।” 
     चारुलता का पारा चढ़ता ही जा रहा था, उसे उसके नीचे रहने वाली महिलाओं की इस कदर नाफरमानी मंजूर नही थी….
  


******

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    मंदिर में वरुण प्रवचन को बैठा था, उसका मन द्वारिकाधीश पर जितना लगा था, उसका कुछ हिस्सा पारो की चिंता में भी मगन हो रहा था। वो अपने मुरलीवाले पर पूर्णतया आसक्त नही हो पा रहा था, और इसलिए उसने कुछ पलों के लिए अपनी आंखें बंद कर ली…
  
    तुम पर अटूट विश्वास है प्रभु! तुम कभी किसी का गलत नही होने दे सकते!!
   इस संकल्प के साथ वरुण ने आंखें खोली , सामने लोगों की भीड़ बैठी थी, उसे सुनने के लिए।  उससे उसके मुरलीधर की कथा सुनने के लिए और इसी भीड़ में सबसे पीछे एक किशोर खड़ा था, पीला कुर्ता पहने, दीवार की टेक लगाए। गोल घुंघराले कंधे तक के बालों को मुस्कुरा कर अपने कानों के पीछे करते उसका ध्यान पूरी तरह वरुण पर था। और वरुण ने जैसे ही उसे देखा वो आज सुनाने वाली कथा भूल कर रह गया।
    उसने कुछ समय पहले ही श्रीकृष्ण जन्म कथा का पाठ इसी लिए किया था कि उसे यहाँ सुना सके लेकिन अब उसके दिमाग से वो कथा लुप्त हो चुकी थी।
  बावजूद वरुण ने बोलना प्रारम्भ किया….

” श्री कृष्ण ने समय समय पर स्त्री सशक्तिकरण पर कार्य किया,उनकी स्वतंत्रता हेतु प्रयत्नशील रहे इसलिए उनकी पत्नियां सही मायनों में उनकी सहगामिनी बनी न कि अनुगामिनी।
   कहा जाता है सत्यभामा तो उनके साथ उनके युद्धों के अवसर पर भी उपस्थित रहती थीं।
  स्त्रियों के लिए उनके मन में जो अभूतपूर्व आदर की भावना थी उसी का एक उदाहरण मैं आज यहाँ प्रस्तुत करने जा रहा हूँ।
    पहाड़ों पर स्थित कामरूप में नरकासुर का अत्याचार फैला हुआ था। उसने नगर की ही नही बल्कि आसपास के नगर मणिपुर, त्रिपुरा आदि की जाने कितनी स्त्रियों को बंधक कर रखा था। वो उन पर मनमाने अत्याचार किया करता। और सिर्फ वो ही नही उसके सेनापति मुर, राज्यपाल और बंदीगृह के कर्मचारी अधिकारी भी उन स्त्रियों पर मनमाने अत्याचार कर रहे थे। लगभग सोलह हजार स्त्रियों को वहाँ कारागृह के साथ साथ बाहर आंगन में बाड़ लगाकर निरीह गायों की तरह बंधक रखा गया था।
   इनमें से कई स्त्रियां नरकासुर की वासना की बलि चढ़ चुकी थीं। और कई उसके कर्मचारियों की।
   उन कुलीन स्त्रियों की अधम गति थी वहां। उन औरतों के पास वहाँ से निकलने का कोई मार्ग न था। बाहर सशस्त्र प्रहरी रात दिन उन पर पहरा रखे थे। उन स्त्रियों के पास अपने मन से मर जाने की भी सुभीता नही थी।


  
   जब द्वारिकाधीश ने मणिपर्वत पर हयग्रीव और निशुम्भ को धराशायी कर नरकासुर के तीसरे संरक्षक घेरे को भी तोड़ दिया तब वहां उपस्थित लोगों में उत्साह जागने लगा, उन्हें अपनी मुक्ति का मार्ग दिखने लगा।

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   प्राग्ज्योतिषपुर का वह बंदीगृह समस्त मानवजाति पर कलंक था, और उस कलंक को धोने जा रहे थे स्वयं द्वारिकाधीश।
  उन्होंने अपने अखंड बल और वीरता से नरकासुर का वध किया। नरकासुर का नाम भौमासुर था पर पृथ्वी पर उसके द्वारा सृजित इस नरक के कारण ही उसे नरकासुर नाम मिला और उसकी इस कलंकगाथा को समाप्त करने का जिम्मा उठाया मुरलीधर ने।

   नरकासुर के वध के बाद वो सभी सोलह हजार स्त्रियां स्वतंत्र थी और अब स्वतंत्र था उनका जीवन। पर हाय रे समाज!
   स्वयं भगवान ने जिन्हें मुक्त करवाया उन्हें भी उनके परिवार वाले कलंकित और पतिता समझ कर अपनाने से कतराने लगे और तब श्रीजी ने असुरराज भगदत्त के राज्याभिषेक वाले दिन घोषणा की कि वे स्वयं इन सोलह हजार स्त्रियों के पालक बनेंगे और फिर मुरलीधर के नाम पर बंधे मनको से तैयार मंगलसूत्र उन स्त्रियों ने स्वयं अपने कंठ में धारण किया और श्रीजी की पत्नी हुई।
   
   इस कथा से तातपर्य यह है कि सिर्फ पांचाली ही नही थीं जिनकी रक्षा को भगवान प्रस्तुत हुये वरन उन्होंने स्त्रियों के कल्याणार्थ समय समय पर अपना योगदान किया और स्त्रियों के मान की रक्षा के लिए  सदैव तत्पर रहे।.

     वरुण एक सांस में ये कथा कहता चला गया जैसे श्रीकृष्ण स्वयं उसके कंठ से कह कर उसे ही बता रहें हो कि जब खुद को मुझे समर्पित कर दिया तब फिर निश्चिंत रहो। मैं सब सम्भाल लूंगा।

   वरुण ने देखा सबसे पीछे खड़ा वो बालक अब भी वहीं खड़ा मुस्कुरा रहा था। वरुण ने अपनी बात समाप्त करने के बाद जैसे ही भजन के लिए माइक साथ बैठे गुरुवर की ओर मोड़ा, वो अपने कमर पर टिकी बांसुरी निकाल उसमें हवा फूंकता वहाँ की सीढ़ियां उतर गया।
    उसकी बाँसुरी की तान में बजती आसावरी सारे परिसर के साथ वरुण को उसी गोधूलि बेला में ले गयी जब कृष्ण अपने गोप सखाओं के साथ गाय चरा कर गोकुल वापस लौटा करते थे।

   उस मनोहारी लय में डूबते उतरते वरुण की बंद आंखों में सहसा पारो की डबडबाई आंखें तैरने लगी और उसने कसमसा कर आंखें खोल दी।
   उसे किसी भी तरह प्रबोधानन्द को रोकना होगा। कृष्ण उसे यही तो कहना चाहतें हैं की नराधम किसी भी युग का हो काल का हो उसे मारने में ही पुण्य है। ऐसे पापियों को मारना पाप नही है।
    तभी तो उसे कृष्णजन्मकथा कहनी थी पर उसके मुहँ से निकली नरकासुर के वध की कथा।

   वो एक बार मंदिर में बैठी मूर्ति को प्रणाम कर बाहर चला आया।
  तेज़ कदमो से सीढियां उतरता वो प्रबोधानन्द के कमरे की ओर बढ़ रहा था कि उसने देखा दूर खड़ी पारो सरिता के साथ आश्रम की गायों को सानी भूसा डाल रही थी। उसके चेहरे पर एक लजीली सी मुस्कान रेंग रही थी।
  वो धीमे कदमों से उस तक पहुंच कर एक विशालकाय कदम्ब की ओट में खड़ा उसे सुनने का प्रयास करने लगा…
   पारो सरिता को कमरे के भीतर क्या हुआ यही बता रही थी।
   “मुझे अंदर ले जाने के बाद वो मेरी शिक्षा मेरे परिवार सभी के बारे में पूछताछ कर रहे थे। मुझे बहुत संकोच भी लग रहा था बहन क्योंकि जाने क्यों आश्रम में आज तक किसी गुरुवर को देख ऐसा डर नही लगा जैसे इन्हें देख लग रहा था।
   ऐसा लग रहा था आंखों ही आंखों में मुझे लील जाएंगे। खुद को समेटने के प्रयास में भी यूँ लग रहा था कहीं न कहीं से मैं बिखरी जा रहीं हूँ और जिसे देख कर ही वो  मुझे ….
   वरुण की यह बात  सुनते हुए माथे की नसों में तनाव आने लगा और पारो संकोच से चुप रह गयी।
” उसने तुझे छूने की भी कोशिश की क्या?”
” सिर्फ छूने भर की नही वो तो जाने और क्या कोशिश भी कर जाता कि दरवाज़े के बाहर किसी ने दस्तक दे दी। इसने भी किसी को भी अंदर आने से मना कर दिया तब वो दस्तक और तेज़ी से होने लगी। उसके इशारे पर मैं ही दरवाज़ा खोलने गयी, पर बाहर कोई नही था। मेरा मन किया मैं वहाँ से भाग जाऊँ, पर भाग कर जाती कहाँ? यही सोचती खड़ी थी कि उसने पुकार लिया, मैं वापस मुड़ी की तभी मेरे पीछे चारुलता दीदी आ गईं।
   मुझे एक तरफ कर वो धड़धड़ाते हुए अंदर घुस गयीं। उनके शायद प्रबोधानन्द से कुछ ज्यादा ही अच्छे सम्बन्ध होंगे , वो सीधे उनके पास जा बैठी….” आजकल आप हमें सेवा का मौका ही नही देते स्वामी जी। “
” आप स्वयं समाजसेवा में व्यस्त रहने लगी हैं ,हम क्या कर सकतें हैं?”
” इस बार हमें टिकट चाहिए।  अब हम सक्रीय राजनीति में भी उतरना चाहते हैं।
” वो तो ठीक है लेकिन अभी हम थोड़ा व्यस्त थे। आपके आश्रम की नई फसल से जान पहचान में थे कि आप चलीं आयीं।
“उस सब के लिए बहुत वक्त है स्वामी जी, अभी आप हमारी बात सुनिए। ए लड़की तुम अभी जाओ और बाहर का काम देखो। और सुनो जाते हुए दरवाज़ा भिड़ा जाना।”

  और बस मैं एक सांस में वहाँ से भागती चली आयी।

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पेड़ के पीछे खड़े वरुण की आंखों में प्रसन्नता दौड़ी चली आयी। मन ही मन उसने आंखें बंद कर मुरली वाले को आभार किया, और आँखे खोली तो सामने पारो मुस्कुराती खड़ी थी…-“आप यहाँ कैसे? मैं तो आपका प्रवचन सुनने परिसर भीतर जाने वाली थी।”
” तुम चलो , जाकर वहां कृष्ण मंडप में बैठो। मैं आता हूँ।”
   पारो और सरिता ने झुक कर उसे प्रणाम किया और परिसर की ओर बढ़ गईं।
   वरुण उनके पीछे जा रहा था कि उसे पीछे स्थित भगिनी आश्रम की सीढ़ियां उतरती चारुलता और पद्मजा दिख गयीं।
  जब चारुलता अभी सीढियां उतर रही तो प्रबोधानन्द के कक्ष में कौन थी?

   एक बार फिर मुरली की तान में आसावरी चारो ओर गूंज उठी और वरुण ने देखा वो बालक बांसुरी बजाता मन्दिर के मुख्य द्वार से बाहर जाने लगा था।
   जाते जाते वो थमा और मुड़ कर एक बार वरुण को देखा , वरुण उसे ही एकटक देख रहा था। अनचाहे ही वरुण की आंखें पल भर को बंद हुई और पलक खोलते ही वो बालक अन्तर्ध्यान हो चुका था। वो गायब न हो जाये उसे अपलक देखने की चाह में ही वरुण पलकें भी झपकना नही चाहता था लेकिन उस ऊपर वाले कि इच्छा के आगे सब व्यर्थ है।

  मुस्कुरा कर  वरुण ने आसमान की ओर देख प्रणाम किया और तेज़ कदमों से सीढियां चढ़ता आगे की कॄष्ण कथा कहने ऊपर परिसर में चला आया….

क्रमशः

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aparna….
  

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

24 विचार “समिधा-37” पर

  1. क्या कहूं, कुछ समझ नहीं आ रहा। आपने तो इस कदर प्रभु भक्ति में लील लिया कि यू लगा जैसे साक्षात कृष्ण सामने है।
    आप जादूगर हो क्या। शब्दों के जादू में बांध लेती है आप। 🙏🙏🙏🙏🙏

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