समिधा -38

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  समिधा – 38

     चारुलता पद्मजा के साथ प्रबोधानन्द के कमरे की ओर बढ़ चली। कमरे के दरवाज़े लगे हुए थे, उसने बाहर से ही हल्की दस्तक दी और दरवाज़ा खुल गया।पद्मजा को बाहर ही छोड़ चारुलता अंदर चली गयी।
  उसने देखा प्रबोधानन्द पलंग पर लेटे हुए थे, वो उनके पास पहुंच गई। उसने धीमे धीमे उन्हें आवाज़ लगानी शुरू की लेकिन स्वामी जी ऐसे अचेत सोये पड़े थे कि उन्हें ढोल दमामो की आवाज़ भी न जगा सके।
    इतनी गहरी नींद में उन्हें देख वो थोड़ी देर को अचरज में डूबी खड़ी रही और फिर वापस जाने को हुई लेकिन फिर कुछ सोच कर वो वापस मुड़ गयी। उसने जाकर प्रबोधानन्द के माथे पर अपना हाथ रखा, उनका शरीर ज्वर से तप रहा था…
    ओह तो ये ज्वर से पैदा हुई अचेतावस्था थी। वो तुरंत बाहर गयी और आश्रम में मौजूद आचार्य जो वहाँ के वैद्यराज माने जाते थे को बुला लायी।
    वैद्यराज हिमाचल से थे इसी से उन्हें  जड़ी बूटियों का पर्याप्त ज्ञान था…
  उन्होंने आकर प्रबोधानन्द को देखा और ज्वरनाशन आवश्यक दवाएं दे कर चले गए। चारुलता वहीं बैठी उनके माथे पर गीली पट्टियां रखने लगी।

    बाहर सभी इस बात से चिंतित थे कि प्रबोधानंद स्वामी बीमार पड़ गए थे, लेकिन वरुण की चिंता का कोई और कारण था। वह चाह रहा था कि जल्द से जल्द प्रबोधानंद स्वामी वहां से निकल जाए लेकिन अब उनकी बीमारी ने उन्हें आश्रम में ही रोके रखा था।

    दो रात ज्वर में तपने के बाद आखिर तीसरी सुबह प्रबोधानंद स्वामी का ज्वर उतर गया। वैद्यराज की दवाओं का असर हुआ और अगले दिन स्वामी जी अपनी सेहत में काफी सुधार महसूस कर रहे थे।
उनकी बिगड़ी तबीयत देखकर ही चारु लता भी कुछ दिन आश्रम में ही रुक गई थी।
  सुबह नींद खुलने पर प्रबोधानंद स्वामी अपने कमरे से बाहर वाटिका में चले आए । खुले उद्यान में टहलते हुए उन्हें अच्छा महसूस हो रहा था। उनके पीछे ही चारुलाता भी एक तश्तरी में कुछ फ़ल मेवे और दूध लिए वाटिका में ही चली आई…
” यह कुछ फल खा लीजिए स्वामी जी, आपने परसों शाम से ही कुछ भी नहीं खाया।”
” हमें परसों की शाम का कुछ भी याद ही नहीं। पता नहीं कब हमारे सिर में हल्का सा दर्द शुरू हुआ और हम थकान से शायद सो गए।”
” आप ज्वर के कारण बेहोश हो गए थे स्वामी जी।”
” क्या कह रही हो चारु? क्या हम ज्वर से मूर्छित हो गए थे?”
” जी स्वामी जी।”
” तुम शायद उस वक्त हमारे कमरे में ही थी है ना, पिछली रात ?”
” नहीं स्वामी जी हम पिछली से पिछली रात जब तक आप के कक्ष में आए आप ज्वर से मूर्छित पलंग पर पड़े हुए थे। आपको देखने के बाद हमने तुरंत वैद्यराज को बुलाया। आपकी देह गर्म तवे सी तप रही थी।”
” अच्छा हमें तो ऐसा कुछ याद नहीं… तो क्या हम दो रातों से सो ही रहेहैं।
पर आज हमें काफी अच्छा अनुभव हो रहा है ऐसा लग रहा है हमारी सेहत ठीक है.. आज हम मथुरा के मंदिरों के दर्शन के लिए जाना चाहते हैं। गाड़ी तो हमारे लिए है ही। हम यही मंदिर परिसर से एक दो लोगों को अपने साथ ले लेंगे।”
” आप कहेंगे स्वामी जी तो हम ही आपके साथ चले चलेंगे।”
” अरे आप क्यों कष्ट करेंगी। आपकी समाज सेवा के कार्य वैसे भी इतने फैले हुए हैं कि आपके पास वैसे भी समय नहीं रहता।
” ऐसी बात नहीं है स्वामी जी। आपके लिए तो हमारे पास समय ही समय है। बल्कि हम चलेंगे तो आप हमारे समाज सेवा के कार्यों में भी कोई कमीबेसी हो तो हमें बता सकेंगे।”
” चलिए ठीक है फिर आप ही चलिए और ऐसा कीजिएगा वह एक नई लड़की आई है आश्रम में पारोमिता वह पढ़ना भी चाहती है , तो उसे भी साथ ले लीजिएगा।।बालिका है थोड़ा नगर भ्रमण कर लेगी तो उसे भी अच्छा लगेगा।”
   पारोमिता का नाम सुनकर चारुलता के माथे पर बल पड़ गए। अपनी एक तरफ की भौंह कटाक्ष में उठाए उसने स्वामी जी को प्रणाम किया और भगिनी आश्रम की तरफ मुड़ गयी।
    भगिनी आश्रम में भोजन की तैयारियां चल रही थी। पारोमिता भी सरिता के साथ बैठी एक तरफ सब्जी काट रही थी कि, चारु लता दीदी ठीक उसके सामने जाकर खड़ी हो गई । उनकी साड़ी की सरसराहट देखकर पारो ने ऊपर नजर की और उन्हें नमस्ते किया पर चारु के मुंह से पारोमिता के लिए आशीर्वाद का एक भी शब्द नहीं फूटा…-” तुम ही हो पारोमिता?”
” जी दीदी।”

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” जा कर तैयार हो जाओ… स्वामी जी तुम्हें साथ लेकर मथुरा के मंदिर घूमने जाना चाहते हैं।”
उनकी बात सुन पारो धीमे से सिर झुकाए हुए ही अपनी जगह पर खड़ी हो गई..
” लेकिन दीदी कुछ अस्वस्थता सी लग रही है, मैं नहीं जाना चाहती हूं।”
“तुम्हारे चाहने या ना चाहने से यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता! यहां तुम्हें जो कह दिया वह तुम्हें करना ही होगा…..उस दिन तो बड़ी शान से अपनी इच्छाएं बता रही थी अमृतआनंद स्वामी जी के सामने! और अब प्रबोधनंद जी के साथ शहर भ्रमण के लिए जाने का मौका मिल रहा है तो उसे गंवा रही हो? इतनी गवार तो नहीं दिखती तुम।”
” मुझे उनसे भय सा लगता है दीदी। ” पारो को लगा चारु लता सच्चे अर्थों में समाजसेवी है । और वह उन सभी स्त्रियों के दुख दर्द को समझती है महसूस करती है, और इसीलिए अनजाने में ही सही पारो के मुंह से सच्चाई निकल गई कि वह क्यों प्रबोधानंद के साथ कहीं नहीं जाना चाहती है।
” इसमें विशेष क्या है पारोमिता!!! प्रकृति ने स्वयं स्त्री को ऐसे ही बनाया है, कि वह सदा से पुरुष से भय खाती रही है। बचपन में अपने पिता और भाई से डर कर रहना, फिर विवाह के बाद अपने पति की दृष्टि के नीचे रहना। आगे चल कर बेटे और दामाद से दबना और डरना।
और समाज में जब जिस मोड़ पर आगे बढ़े पुरुषों की दृष्टि से भयभीत रहना यही तो स्त्रियों की नियति है। इसमें ऐसा क्या अलग है?
अपने आप को ऐसे बनाओ कि किसी पुरुष की नजरें, उसकी सोच तुम्हारे भय का कारण न बने। बल्कि उसकी उस सोच का, उसकी उस नजर का तुम क्या फायदा उठा सकती हो इस तरफ ध्यान देना सीखो । तभी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ सकोगी, हमारी बात समझ रही हो ना?
  पारो ने धीमे से ना में सिर हिला दिया।
” कोई बात नहीं यह जरूरी नहीं कि हमारी हर बात तुम्हें समझ में आए । अभी यह सारी दुनियादारी समझने के लिए तुम बहुत छोटी हो। जाओ अपने कमरे में जाकर यह साड़ी बदल कर आ जाओ और फिर चलो हमारे साथ।”
पारो समझ गई थी कि इस वक्त उन लोगों के साथ जाने के अलावा उसके पास और कोई उपाय नहीं था। वो ऊपर अपने कमरे में चली गई। जाते जाते बार-बार उसके मन में यही हलचल मच रही थी कि, किसी तरह वरुण भी उन लोगों के साथ शहर घूमने जा सकता । क्योंकि अब तक तो उसे सिर्फ प्रबोधानन्द से डर लग रहा था लेकिन अब चारुलता की बातें सुनकर उसके मन में वह डर और गहरे पैठ गया था।
वो ऊपर पहुंची और अपने पलंग के बाजू से लगी छोटी सी दराज से उसने अपनी दूसरी साड़ी निकाल ली और वही बरामदे की तरफ बने बाथरूम की तरफ कपड़े बदलने चली गयी। वह कपड़े बदल ही रही थी कि उसे वहां कुछ आवाजें सुनाई पड़ी… उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की, यह आवाज उसे बहुत जानी पहचानी सी लगी।
कपड़े बदल कर उसने धीरे से दरवाजा खोला और बरामदे से आगे बढ़ने लगी कि उसे समझ में आया कि, बरामदे के पीछे की तरफ छत पर सुनीता खड़ी थी… और वह मोबाइल पर किसी से बात कर रही थी। पारो बहुत धीमे कदमों से जाकर उसके ठीक पीछे खड़ी हो गई… अब सुनीता की बातें वो साफ-साफ सुन पा रही थी और समझ पा रही थी…
सुनीता किसी को फ़ोन पर ढाँढस बंधा रही थी कि वो जल्दी ही पैसे भेज देगी।
पारो आश्चर्य में डूबी उसकी बातें सुन रही थी कि तभी सुनीता पीछे मुड़ गई और उसने पारो को देख लिया।

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“अरे पारो तुम यहां क्या कर रही है?”
“मैं तो बस कपड़े बदलने आई थी, चारु दीदी के साथ शहर घूमने जाना है ना इसलिए।”
“अच्छा!!! तो तुझे चारु दीदी इतनी जल्दी अपने साथ ले जा रही है। अभी तो तुझे यहां रहते हुए ज्यादा वक्त भी नहीं हुआ।”
“हां !!!जाने का तो मेरा भी मन नहीं है… लेकिन चारु दीदी जबरदस्ती कर रही है। इसलिए जाना पड़ रहा है। वैसे एक बात पूछूं सुनीता?
“हां पूछ ना!”
“तेरे पास यह मोबाइल कहां से आया? यहां आश्रम में तो हमें मोबाइल नहीं मिलता है ना।”
पारो की बात सुन सुनीता ने जल्दी से मोबाइल अपनी साड़ी में छुपा लिया।
“इस बारे में तो किसी से कुछ मत कहना! और सुन इसके बदले में तुझे जब भी अपनी मां से बात करनी होगी, या किसी से भी बात करनी होगी…. मैं अपना मोबाइल तुझे दे दूंगी। चुपचाप यही छत पर आ कर बात कर लेना समझी।”
“वह तो समझ गई.. लेकिन तुझे यह मोबाइल मिला कहां से? किसने दिया? तेरे पास इतने रुपए आए कहां से? और दूसरी बात अगर किसी ने यह देख लिया कि तेरे पास मोबाइल है तो फिर तू क्या जवाब देगी? तुझे तो गुरूवरों को, आचार्यों को सभी को जवाब देना पड़ेगा।और कहीं अमृतानंद स्वामी तक तेरी शिकायत पहुंच गई और कहीं तुझे आश्रम से निकाल दिया तो?”
“तो क्या होगा? उसी के पास चली जाऊंगी जिसने यह मोबाइल दिया है… उसी से कहूंगी अपने परिवार को छोड़कर मुझे रख ले।”
“यह तू क्या कह रही है सुनीता। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा साफ-साफ बता ना!”
“क्या बताऊं पारो किस्मत इतनी उलझी हुई लिखी है कि अब साफ-साफ शब्दों को बोलना ही नहीं आता। तेरे जैसे ही मैं भी आई थी यहाँ दो साल पहले ।
पति के जाने के बाद एक बीस साल की विधवा के लिए ना उसके मायके में जगह होती है ना ससुराल में। अगर यही मेरी उम्र पचास साल होती ना तो यह दोनों घर वाले लड़ लड़ के मुझे अपने पास रखते, क्योंकि तब इन्हें मुफ्त की नौकरानी मिल जाती। मायके में भाभी के बच्चों के पोथड़े धोने हों या ससुराल में देवरानी जेठानी के बच्चों के।
लेकिन सिर्फ बीस साल की उम्र इन सब की आंखों में चुभती है और खासकर अगर औरत सुंदर हो तब तो और भी ज्यादा ।

पता नहीं हमारा समाज एक स्त्री को सिर्फ उसकी देह की नजर से क्यों देखता है?
और पति ना रहे तब तो ना मायका मायका रह जाता है ना ससुराल ससुराल । सारे रिश्ते नाते झूठ हो जाते हैं। यह जितने आदमी होते हैं ना इन सब की आंखों में एक ही चीज उतर आती है हम जैसों के लिए….कोरी वासना !!
इन्हें लगने लगता है कि कब इन गिद्धों को मौका मिले और यह हमें नोच खाए।
शायद इसीलिए हमारे घर की बड़ी बुजुर्ग औरतों ने आपस में मिल बैठकर यह निर्णय निकाला कि हमारे लिए सबसे सुरक्षित जगह आश्रम है । वरना ससुराल में रहने पर क्या देवर क्या जेठ ? पता नहीं कब कौन लार टपकाता रात बिरात हमारे कमरे के दरवाज़े की सांकल खटका जाए। उसी डर से बचने के लिए यहां चली आयीं, लेकिन मुझे क्या पता था कि मैं एक कुएं से निकलकर दूसरी खाई में गिर रही हूं। औरत का रूप और उसकी जवानी उसके सबसे बड़े दुश्मन हो जाते हैं अगर उसके सर पर सरमाया ना हो तो।

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एक औरत के लिए इस समाज में खुद को बचा कर रखना बिल्कुल वैसे ही हो जाता है जैसे 32 दांतो के बीच जीभ को सम्भाल कर रखना। बावजूद कभी ना कभी तो कट ही जाती है।
यहीं हुआ मेरे साथ। चारु लता दीदी कि समाज सेवा बहुत बड़ी चढ़ी हुई है। उन्हें अक्सर अपनी समाज सेवा के लिए बड़े-बड़े नेताओं मंत्रियों को प्रसाद चढ़ाना पड़ता है जिससे वह लोग अच्छी खासी मोटी रकम इनके संस्थान को दान करें और बस उस प्रसाद को चढ़ाने के लिए हम जैसों की कभी कभार बलि चढ़ा दी जाती है।
और एक बार जिस बकरी का गला इन्होंने काट दिया वह बार-बार हलाल होती है।
मैं तुझसे यह सब नहीं बताना चाहती थी पारो!! क्योंकि तुझे अभी यहां आए ज्यादा वक्त नहीं बीता। भगिनी आश्रम की यह काली सच्चाई जब तक तुझसे दूर रहती, तू उतना समय यहाँ आराम से रह सकती थी। लेकिन आज तूने खुद मेरी बातें सुन ली और ये मोबाइल भी देख लिया । अब इसके बाद तुझसे झूठ बोलने का मन नहीं किया । जाने क्यों तुझ में मैं अपनी दो साल पहले की झलक देख पाती हूं।
बिल्कुल ऐसा ही निष्पाप निष्कलंक चेहरा था मेरा भी। लेकिन इस दुनिया के लोगों ने और इस दुनियादारी ने सब पोंछ पाँछ कर रख दिया। पहली बार चारु दीदी के साथ गई , वहाँ से लौटने के बाद लगा मुझे मर जाना चाहिए। मुझे इस आश्रम में रहने का कोई अधिकार नहीं। क्योंकि तुझे पता है यह सारी बातें यहां मंदिर के आचार्यों या गुरुजनों को नहीं मालूम है। अमृतआनंद स्वामी खुद भी इस बारे में कुछ नहीं जानते।
” तो तुमने उन्हें बताने की कोशिश नहीं की।
” की थी लेकिन मैं सफल नहीं हुई। और उसी बीच एक और समस्या मेरे सर पर टपक पड़ी। कहते हैं ना मजबूरी औरत को मरने भी नहीं देती। स्वामी जी से शिकायत करने तो मैं चली थी लेकिन जिस दिन स्वामी जी से शिकायत करने के लिए उनके ऑफिस में पहुंच कर उनका नंबर लगा रही थी कि तभी मेरी बूढ़ी मां मुझसे मिलने चली आई। पूरे सात महीने बाद मेरी मां को मेरी सुधि आई थी। और वह भी जानती हो किसलिए? क्योंकि उन्हें मुझसे कुछ काम था। मां बाप बेटों की धुन में बेटियों पर बेटियां पैदा करते चले जाते हैं …उन्हें आस होती है कि उनके बुढ़ापे में बेटे उनका सहारा बनेंगे। लेकिन जब वही बेटे एक औरत के पल्लू से बंधे अपने बूढ़े मां बाप को छोड़ जाते हैं, तब वहीं बूढ़े मां-बाप उन्हीं बेटियों के पास सहारा तलाशने जाते हैं, जिन्हें बचपन से हर बार वह बेटों के कारण तिरस्कृत करते चले आते रहे थे।
मेरी मां तो बहुत गौरवान्वित थी क्योंकि तीन तीन लड़कों की माँ थी वो। और उन तीन भाइयों के बाद मैं पैदा हुई थी। इसलिए मेरे पैदा होने पर इतनी नाराजगी उन्हें नहीं थी। लेकिन उसके बाद मेरी किस्मत ने धोखा खाया पहले पिताजी चले गए और उसके बाद पति।
मेरे आश्रम आ जाने के बाद दोनों बड़े भाइयों ने पुश्तैनी घर को बेचा, अपना अपना हिस्सा लिया अपनी बीवी बच्चों के साथ अपनी अलग गृहस्थी बसा ली। छोटा भाई और मां बस यही दो प्राणी रह गए। उनके हिस्से का जो भी पैसा रूपया था उनके हाथ में रख कर दोनों बड़े भाई तो पल्ला झाड़ कर चलते बने, लेकिन मां रह गई अकेली वो भी उस छोटे भाई के साथ जो बचपन से ही मानसिक रूप से विकलांग था। पच्चीस का हो चुका है वह। लेकिन अब भी अपने हाथ से खाना तक नहीं खा सकता। इस बुढ़ापे में जब मां को खुद सहारे की जरूरत है। वह बेटे का सहारा बनी बैठी है। और इसीलिए वह मेरे पास आई थी, कि मुझे अपने साथ वापस ले जा सकें जिससे मैं उनकी बिखरी हुई गृहस्थी संभाल लूं। लेकिन उस समय जब मां ने मुझसे साथ चलने को कहा मन, में ऐसी कसक उठी कि उस वक्त लगा, अपनी ही मां को ऑफ़िस से धक्के मार कर बाहर निकाल दूँ।
रो-रो कर चिल्लाकर कहने का मन किया कि माँ! जिस वक्त मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत थी तुमने इन्हीं भाइयों का नाम लेकर मुझे यहां आश्रम में पटक दिया कि अगर मैं तुम्हारे साथ रहीं तो मुझे तुम्हारी दोनों बहुएंअपनी नौकरानी बनाकर छोड़ेंगी। कम से कम मैं यहां आराम से चैन सुकून से रह पाऊंगी। और आज जब तुम खुद अकेली हो गई हो उस भाई के साथ, तो मुझे बुलाने और अपने साथ ले जाने चली आयीं।
मैंने मां से इतना कुछ तो नहीं कहा लेकिन यह जरूर कहा कि अब मैं आश्रम छोड़कर नहीं जाना चाहती हूं।
मां रोती बिलखती वहां से निकलने लगी, तभी मुझे याद आया कि एक रात पहले जब मैं चारु दीदी के साथ गई थी, तब उन मंत्री जी ने मेरे हाथ में भी कुछ रुपए रखे थे। मैंने मां को रोका और दौड़ कर अपने कमरे में चली गई । मैंने वो लिफाफा निकाल कर देखा उसमें 5000 थे। मैं वह पूरा लिफाफा वैसे का वैसा वहां ले आई और मां के हाथ में रख दिया।

माँ ने आश्चर्य से मुझे देखा। मैंने धीरे से कह दिया कि मंदिर के कामकाज के बदले यह थोड़े से रुपए मिले हैं… तुम रख लो! और जब भी जरूरत हो मुझे बताना मैं देती रहूंगी। माँ जाने से पहले मुझे कसकर गले से लगा लिया और रोने लगी.. मैं भी रोने लगी। मन में अजीब से पीड़ा थी, मां के लिए ममता भी उमड़ रही थी और नाराजगी भी ।
समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे मन में उनके लिए प्यार ज्यादा था या नफरत। पर जो भी था वो आखिर थी तो मेरी ही मां, और उनके साथ था मेरा पागल भाई।
माँ धीमे कदमों से वापस चली गई।
दस दिन बाद ही उनका फोन आ गया कि अगर हो सके तो मैं हर पंद्रह दिन में आश्रम से होने वाली कमाई का कुछ थोड़ा सा हिस्सा उनके और उनके बेटे के खर्चे के लिए भेज दूँ। मैं जानती थी कि बड़े भाइयों ने कुछ रकम उनके नाम से भी बैंक में डाली थी। लेकिन मैं यह भी समझती थी कि माँ उन रुपयों को बैंक में जोड़े रखना चाहती है। वह शायद उन रुपयों को अपने बाद अपने छोटे बेटे के लिए लिए जोड़ कर रखी हुई थी कि, शायद इन पैसों के लालच में उनके मर जाने के बाद उनके बाकी के दोनों बेटे इस भाई की भी देखभाल कर लें।
मैंने मां की मदद के लिए हामी भर दी। और बस उसके बाद जो इरादा किया था कि जैसे ही समय मिलेगा अमृतानंद स्वामी से चारु लता दीदी की शिकायत करुंगी या फिर जैसे ही मौका मिलेगा जहर खा लूंगी यह दोनों ही इच्छाएं मेरी, मन के कहीं किसी कोने में जाकर दुबक कर पड़ी रह गईं।
इच्छा कह लो या अनिच्छा अब मैं खुद आगे बढ़कर चारु दीदी के साथ जाने लगी। उनके रईस डेलीगेट्स के सामने खुद ही बिछ कर और उनके सामने हाथ फैला कर अपने किए का मेहनताना मांगने लगी। वह लोग शायद चारु लता दीदी को पैसे दिया करते थे। लेकिन मेरे मांगने पर कुछ थोड़े रुपए मेरे हाथ में भी रख दिया करते थे ऐसे ही मेरी मुलाकात वीरेन से हुई।
वीरेन के पिता एमएलए हैं। और वीरेन खुद अपने वार्ड का पार्षद! रईस घर का है, उसकी बीवी भी नहीं है…. 5 साल पहले मर चुकी है ! मुझसे उम्र में 10 साल बड़ा है लेकिन जब से मुझसे मिला अब उसे कोई और नहीं जचती ऐसा वह कहता है।
उसी ने मोबाइल दिया है और उसी ने मुझसे यह भी कहा कि मैं एक निश्चित मासिक वेतन देकर अपने भाई के लिए एक नर्स क्यों नहीं रख लेती। मुझे उसकी यह सलाह पसंद आई और मैंने मां से भी यही कहा। माँ ने भी मेरी बात मान ली। वीरेन से जान पहचान हुए लगभग डेढ़ साल बीत चुका है, और इन डेढ़ सालों से अब मैं मां को हर महीने 10000 भेज पाती हूं । मां भी खुश हैं, उन्हें लगता है उनकी बेटी आश्रम के काम करके पैसा कमा रही है।
पर कभी-कभी मैं सोचती हूं कि क्या मेरी मां इतनी भोली है? उसे समझ में नहीं आता कि आश्रम में इतनी सारी महिलाएं हैं …सभी काम करती हैं.. और सभी को अगर 10000 देंगे तो आश्रम का क्या होगा?
खैर जो भी हो मुझे यह भी लगता है कि कई बार मां अपने आपको झूठा दिलासा दे देती है… वह भी शायद जानती है कि उनकी बेटी कहां से पैसे लाकर भेज रही है ?यह सब कुछ तुमसे कहने का बिल्कुल भी मन नहीं था पारोमिता।
मैं जानती हूं जो भी मेरी इस सच्चाई को सुनेगा वह मुझे गलत ही समझेगा। लेकिन क्या करूं जीवन बहुत कठिन है! और उसे जीना उससे भी कठिन! हम सोचते जरूर है कि अपनी मुश्किलों से निजात पाने के लिए हम अपनी जान ले ले, हम मर जाए। लेकिन आत्महत्या करना भी उतना ही मुश्किल है जितना किसी और की हत्या करना। आपका मन आपका ह्रदय कभी गवाही नहीं देता कि आप अपनी स्वयं की जान ले लो। मैं भी यह कठिन काम नहीं कर पाई।
उससे आसन मुझे अपनी आत्मा को बेचना लगा और बस वही करती आ रही हूँ।”
” आश्रम के कोई भी गुरुवर आचार्य इस बारे में नहीं जानते?”
” जानते हैं एक है जो जानते हैं। वह चारु लता दीदी के साथ मिले हुए हैं। लेकिन उनका नाम तुम्हें नहीं बता सकती पारोमिता। वरना यह लोग मिलकर मेरे परिवार को मुझे और साथ ही विरेन को भी मार डालेंगे। यह लोग ऐसे ही हैं पहले पहल हमें लगता है कि हम गलत कर रहे हैं और जब धीरे-धीरे हम इनकी दुनिया में उतरते जाते हैं, तो यह लोग हमारे चारों तरफ एक मजबूत जाल बुनते चले जाते हैं। अब इस जाल से मैं निकलना भी चाहूं तो यह मेरे लिए असंभव है। चारु लता दीदी का नाम तो मैंने फिर भी तुम्हें बता दिया लेकिन बाकी लोगों का नाम मैं नहीं बता सकती। क्योंकि इन लोगों ने अपना फंदा इतना कस रखा है कि उसमें सिर्फ मेरी जान जाने का भय नहीं है। अगर सिर्फ मुझे मरना होता तो मैं कब का इस जाल को तोड़कर बाहर निकल चुकी होती। पुलिस के पास पहुंच चुकी होती, लेकिन ऐसा नहीं है। इन लोगों का फंदा मकड़ी के जाल की तरह मेरे चारों तरफ बन चुका है और अब इससे मैं अपनी आखिरी सांस छूटने तक नहीं निकल सकती।
या तो यह हो सकता है कि यह लोग जब मैं बूढ़ी हो जाऊं, बदसूरत हो जाऊं तो खुद मुझे दूध की मक्खी सा निकाल फेंके। लेकिन उस समय मेरा किसी से भी कुछ भी कहने का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा? तुमसे भी यही गुजारिश है पारोमिता कि हो सके तो मेरी यह सारी बातें किसी से मत कहना। तुम सरिता के साथ रहती हो। हो सके तो सरिता से भी मत कहना, क्योंकि शायद वह भी इस सब के बारे में कुछ नहीं जानती।”
“ठीक है! पर यह बताओ कि तुम्हारे साथ और कौन-कौन सी लड़कियां इस सब कार्यों में लिप्त हैं?”

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“मैंने तुम्हें मेरी कहानी सुना दी ना! मेरे साथ जितनी भी और महिलाएं लड़कियां इस सब में संलिप्त हैं, उनकी भी ऐसी ही कोई ना कोई कहानी है। हम सभी एक ही नाव पर सवार हैं। और अब अगर हम में से एक भी इस नाव से बाहर कूदती है तो वह पूरी नाव को ले डूबेगी और इसलिए मैं किसी का नाम नहीं बता सकती। जो जैसा चल रहा है वैसा चलने दो । आज पता नहीं मन बहुत भावुक था इसलिए मैंने तुमसे यह सारी बातें कह दी। पर बहन मैं तुम पर विश्वास कर सकती हूं ना? कि तुम बाहर कहीं किसी से कुछ नहीं कहोगी।”
“हां तुम मुझ पर विश्वास कर सकती हो सुनीता!! मैं किसी से कुछ भी नहीं कहूंगी। “
“उस चारुलता और प्रबोधनंद से दूर ही रहना, दोनों ही सही नहीं है।”
“मुझे भी तो प्रबोधआनंद से जाने क्यों बहुत भय लगता है! अभी भी मेरा बिल्कुल मन नहीं है, लेकिन पता नहीं चारु लता दीदी क्यों इतना जबरदस्ती कर रही है? “
“उन दोनों के साथ अकेले कहीं मत जाना तुम! हो सके तो सरिता को साथ में ले लो या फिर कोई बहाना बनाकर आश्रम में ही रुक जाओ।”
“मैंने बहुत कोशिश की कि मैं बहाना बना लूं… लेकिन वह मानने को तैयार नहीं है।”
“ठीक है कोशिश करो की आश्रम के ही कोई स्वामी या गुरुवर तुम्हारे साथ चले जाएं । भगवान भी उन्हीं की मदद करते हैं, जो स्वयं अपनी मदद करने के लिए प्रस्तुत रहे। मैंने तो अपनी मदद करने की सोची ही नहीं और शायद इसीलिए मेरा ऐसा पतन हुआ।”
“ऐसा मत सोचो सुनीता! उस लीलाधर ने तुम्हारे लिए भी कोई लीला सोच ही रखी होगी।”
पारो सुनीता से बात कर ही रही थी कि सरिता उसे ढूंढती हुई आवाज देती उपर चली आई….-” अरे तू यहां बैठे-बैठे सुनीता से बातें कर रही है। वहां नीचे चारु लता दीदी ने पूरा आश्रम सर पर उठा रखा है। प्रबोधानन्द स्वामी कब से गाड़ी में बैठे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। तुरंत जाओ सखी वरना स्वामी जी गुस्सा हो जाएंगे।”
“हां” में सर हिला कर पारो वहां से उठ गई । बहुत ही भारी मन से धीमे कदमों से वो सीढियां उतरने लगी कि तभी पीछे से सुनीता ने आवाज लगा दी…-” अपना ध्यान रखना पारो।”
थके कदमों से पारो आश्रम से बाहर की तरफ निकल गई। रास्ते में ही चारु लता दीदी उसे मिल गई । उनकी झिड़कियां उसके ऊपर शुरू थी। वह शांती से उनके साथ आश्रम के मुख्य द्वार से बाहर निकल गई ।बाहर अपनी गाड़ी में ड्राइवर की सीट के बाजू में प्रबोधानन्द बैठे थे । जैसे ही चारुलाता ने दरवाजा खोला और पारो को बैठाया, प्रबोधानन्द ने पीछे की सीट पर एक नजर डाली, और पारो को देख कर मुस्कुरा कर सामने देखने लगे। पारो के ही बाजू में चारु लता दीदी भी बैठ गई। ड्राइवर की सीट अब तक खाली थी।
कि तभी ड्राइवर की सीट खोलकर वरुण भीतर चला आया उसने अंदर आकर स्वामी जी को प्रणाम किया और गाड़ी गियर में डालकर आगे बढ़ा ली।
” तुम यहाँ कैसे?”
” आपके ड्राइवर को भी तेज बुखार हो गया है स्वामी जी। और आश्रम में मेरे अलावा एस यू वी किसी को चलानी नही आती। इसीलिए अलोकानन्द स्वामी जी ने मुझे भेजा है। आप चिंता न करें मैं आपकी सुविधा का पूरा ध्यान रखूंगा।”
प्रबोधानन्द के पास कोई उपाय नही बचा था। अपनी झुंझलाहट छिपाते हुए वो खिड़की से बाहर देखने लगे और पीछे बैठी पारो ने मन ही मन मुरली वाले को मुस्कुरा कर धन्यवाद ज्ञापित किया कि एक बार फिर उसने उसकी लाज रखने वरुण को भेज ही दिया..

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क्रमशः

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aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

29 विचार “समिधा -38” पर

  1. ये सिर्फ कहानी ही नहीं बल्कि घिन्नोने समाज की कड़वी सच्चाई है। सच में एक अकेली औरत को समाज गिद्ध दृष्टि से देखता है।
    आपकी लेखनी बेमिसाल है अपर्णा👌👌

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  2. अपर्णा जी आपके इन शब्दों ने मन को छू लिया शायद इन्हीं नजरों से बचने के लिए बहुत सी औरतें घर में ही प्रताड़ना सहन करती हैं क्योंकि घर के बाहर हर एक नजर अपने आप में एक सवाल जैसी दिखाई देती है बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

    Liked by 1 व्यक्ति

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