समिधा – 39

Advertisements

  समिधा – 39

    वरुण के गाड़ी में बैठते ही प्रबोधानन्द का चेहरा उतर गया। उनकी नज़र में वैसे तो अब तक वरुण ने ऐसा कुछ नही किया था बावजूद वो वरुण को पसन्द नही कर पाते थे| जबकि वो लड़का उनके आगे पीछे घूमता उनकी सहायता को ततपर नज़र आता था।
  ” कहाँ घूमना चाहेंगे गुरुवर?”
  ” यहाँ के रास्ते मालूम भी हैं तुम्हें?”
   ” जी! शुरुवाती दिनों में तो मैं और प्रशांत पैदल ही पूरा मथुरा घूम आया करते थे। श्री कृष्ण जन्मस्थली तो जाने कितनी बार हम हो आये। प्रभु की जन्मस्थली देख कर मन ही नही भरता।”
“हम्म ! हमें तो द्वारिकाधीश मंदिर बहुत पसंद है। वहाँ भी चलेंगे।”
” जी! सबसे पहले आपको कंस किला लेकर चलता हूँ।”
” वहाँ ऐसा क्या है? हमें तो ज़रा पसन्द नही।”
“जी यही तो दिखता है कि कंस जैसा इतना बड़ा राजा जिसके पास न धन की कमी थी ना राज्य की बस अपने लोभ और लालच ने उसे कहीं का नही छोड़ा। आज उसका किला कैसा जीर्ण शीर्ण पड़ा है जो कभी आमोद प्रमोद का गढ़ हुआ करता था। ये सब हमें ये दिखाता है कि राजा हो या रंक समय सभी का बदलता ज़रूर है। और घमंड कभी किसी का नही टिकता। अगर हम अपने मन को शुद्ध साफ नही रख पाते हैं तो भगवान स्वयं हमारे मन की कालिख दूर करने का प्रयत्न करते हैं।”

Advertisements


“बस बस… स्वामी जी ने तुम्हें प्रवचन की ज़िम्मेदारी क्या सौंपी तुम तो हर जगह शुरू हो जाते हो। ये सब जो बता रहे हो तुम क्या सोचते हो, हमें नही पता होगा।?”
“ऐसा तो असम्भव है गुरुवर! जो मैं जानता हूं वो तो समंदर की एक बूंद बराबर भी नही। आप तो स्वयं समंदर हैं।”
“अच्छा सुनो  वरुण देव! हमें ज़रा कुसुम ताल की तरफ चलना होगा। वहीं थोड़ा आगे बढ़ कर हमारा भी ऑफिस है। हम प्रबोधानन्द जी को वहाँ भी ले जाना चाहतें हैं।”
” जी, ज़रूर।”
     चारुलता की बात पर वरुण ने हामी भरी और गाड़ी पहले कुसुम ताल की ओर ही घुमा ली।
     गोवर्धन और राधा कुंड के बीच कुसुम सरोवर स्थित था। उधर से गुजरते हुए प्रबोधानन्द को उस सरोवर की सुंदरता ने ऐसा आकृष्ट किया कि उन्होंने वहीं गाड़ी रुकवा ली।
   वो चारों लोग सरोवर पर उतर गए। प्रबोधानन्द के पीछे ही चारुलता चल रही थी।  उनके पीछे वरुण था और वरुण के ठीक पीछे थी पारो। वो जानबूझ कर ऐसे चल रही थी कि उस पर प्रबोधानन्द की नज़र न पड़े…
   कुछ आगे बढ़ कर वो लोग वहीं सीढ़ियों पर बैठ गए।
    प्रबोधानन्द अपने बचपन से लेकर अपने स्वामी बनने के किस्से उन लोगो को सुना रहे थे। चारुलता तो बहुत खुशी से सब सुन रही थी पर न वरुण को ही उनकी बातों में कोई रस मिल रहा था और न ही पारो को।
      वो सीढ़ियों पर सबसे ऊपर और पीछे की तरफ बैठी थी। वो धीमे से उठ कर वहाँ से दूसरी तरफ निकल गयी। कुछ छोटे बकरी के बच्चे इधर से उधर कुलांचे भर रहे थे, वो उनके पास खड़ी उनकी उछल कूद देखने लगी।
    तभी उसका ध्यान एक मेमने पर गया जो सबसे अलग थलग एक तरफ खड़ा था। पारो ने देखा उसके पैर पर शायद चोट सी थी, हल्की लालिमा सी दिख रही थी, और शायद उसी चोट के कारण वो हिल डुल नही पा राह था।
   कि तभी उसे देव के साथ कि वो शाम याद आ गई। जब घर भर से झूठ बोलकर देव पारो को तांत्रिक बाबा के पास बंधवाने के नाम पर घुमाने लेकर जाया करता था। और एक शाम ऐसे ही बहाने बना कर निकले वो दोनो एक तालाब के किनारे बैठे सूरज को डूबते देख रहे थे… और साथ ही देख रहे थे पास में खेलते कुछ बकरी के बच्चों को..
    उनमें से एक बच्चा यूं ही किनारे चुपचाप पड़ा था तभी देव ने कहा जरूर इसके पैर में मोच आई होगी। बस इसी लिए यह पैर अपना सीधा नहीं रख पा रहा है।  देव  तुरंत अपनी जगह से उठा और उसने जाकर उस बच्चे को सीधा खड़ा किया…. उसके बाद उसके उस भाग में जिसमें मोच सी महसूस हो रही थी और लालिमा थी! उस हिस्से को सीधा करके उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और वहां पर बांध दिया। थोड़ी देर पैर पर मालिश जैसी करने के बाद मेमने का बच्चा उछलता कूदता अपने साथियों के साथ खेल में लग गया और पारो देव को देख कर मुस्कुरा उठी…
” अरे वाह आपने तो उसे बिल्कुल ठीक कर दिया।”
” जानती हो पारो हमारा शरीर खुद अपने आप में एक वैद्य होता है। जब भी हमारे शरीर में कोई भी समस्या या व्याधि पैदा होती है, तो हमारा शरीर सबसे पहले उस व्याधि से लड़ने के लिए तैयारी करने लगता है। और यह बात हम इंसानों से ज्यादा यह जानवर समझते हैं। हम तो हल्के से बुखार में भी डॉक्टर के पास दौड़े चले जाते हैं कि, बुखार कम करने की दवा दे दो। लेकिन यह नहीं समझते कि हमारे शरीर में आखिर ऐसा क्या हुआ जिसके कारण हमें बुखार आया ।
   जानती हो जब भी हमारे शरीर में कीटाणुओं जीवाणु विषाणुओं का आक्रमण होता है, तो हमारा शरीर अपना तापमान बढ़ा कर उन जीवाणुओं को हमारे अंदर प्रवेश करने से रोकता है, उनसे लड़ता और उन्हें मारने की कोशिश करता है, और तभी हमें बुखार आता है। लेकिन हम इस बात को समझे बिना दौड़कर डॉक्टर के पास चले जाते हैं। यह सारे निरीह बेजुबान जानवर हम से कहीं ज्यादा समझदार होते हैं…”
   पारो मुस्कुराकर देव की बात सुनती रहती थी उसे देव को सुनना बहुत पसंद था….

Advertisements

   वह अपनी मीठी सी यादों में खोई उस मेमने को सहला रही थी कि तभी उसके कानों में ऐसा लगा जैसे देव की ही आवाज गूंजने लगी…-” कुछ नहीं हुआ है इस मेमने को बस हल्की सी मोच आई है। अभी ठीक हो जाएगा।”
  झट से पारो ने पलटकर देखा पीछे वरुण खड़ा था। वरुण ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और मेमने के पैर को थोड़ा सीधा किया और उसकी मोच वाली जगह पर बांध दिया। कुछ देर मालिश करने के बाद उसने मेमने को खड़ा कर दिया। थोड़ी देर लड़खड़ाने के बाद वह मेमना उछलता कूदता अपने साथियों के पास भाग गया….

” देखा यह जानवर हम से कहीं ज्यादा समझदार होते हैं। हम तो अपने शरीर में होने वाली अधि व्याधियों को पहचान नहीं पाते, जबकि हमारा शरीर खुद उन व्याधियों से लड़ने के लिए तैयार रहता है ।लेकिन यह जानवर इस मामले में हम से कहीं ज्यादा समझदार होते हैं । वह मेमना अपने उस मोच  वाले पैर को अपने शरीर से दबाए बैठा था। एक सीध में उसने अपने पैर को रखा हुआ था,और वह इसी तरह बैठा रहता तो 2 से 3 घंटे में उसकी मोच अपने आप ठीक हो जाती। उसके पैर के उस हिस्से की मांसपेशियां शिथिल हो जाती और उसे आराम मिल जाता। इसीलिए उसे देखते ही मुझे समझ में आ गया कि उसके किस पैर में कहां पर मोच आई है।”

    पारो आश्चर्य से वरुण के चेहरे को देखती रह गई… उसे लगा यही सब तो पहले भी उसके साथ हो चुका है। बस उस समय वरुण नहीं देव था सामने। लेकिन क्या ऐसा संभव है कि दो अलग-अलग लोग बिल्कुल एक ही तरह की बातें और एक ही तरह की सोच के हों।
    
        उसे जाने क्यों उस वक्त वरुण के अंदर देव की झलक मिल रही थी।
   ऐसा लग रहा था सामने वरुण नहीं देव खड़ा है… आंखों की वैसी ही चमक। चेहरे पर वैसा ही तेज। और उसके पास से आने वाली वही भीनी भीनी सी खुशबू कुछ भी तो देव से अलग नहीं था…..
      
    पता नहीं कैसे लेकिन उसके मन में अचानक से ऐसे भाव आने लगी कि जैसे वह देव के साथ तालाब के किनारे सीढ़ियों पर बैठी रहती थी, वैसे ही काश वरुण के साथ बैठ सके। उसकी सीढ़ियों से दो तीन सीढियां ऊपर देव बैठा करता था और उसके घुटनों पर सिर टिकाए वह बैठी सामने तालाब को देखती उस पर पत्थरों से निशाने लगाया करती थी, और वह हमेशा उसके निशानों का मजाक उड़ाया करता था।
     दोनों के बीच पत्थरों के निशानों का खेल हुआ करता था…. दोनों शर्त लगाते थे कि किसका पत्थर कितनी बार कूदकर तालाब में गायब होगा।
    और वह हर बार देव से जीत जाया करती थी।

अपने में गुम पारो सरोवर को देख रही थी कि तभी उसके बाजू से होते हुए एक चपटा का पत्थर तालाब में एक के बाद एक पांच कुदाली लगाता हुआ दूर तक चला गया…
     वह चौक पर पलटी… वरुण हाथ में ढेर सारे पत्थर लिए खड़ा था। उसने पारो की तरफ वो पत्थर बढ़ा दिए…-” निशाना लगाओगी?”
   हॉं में सिर हिला कर उसने वरुण के हाथ से पत्थर लिया और निशाना लगा दिया। उसका पत्थर सिर्फ तीन कुदाली के बाद ही डूब गया ।
    और इस बात पर उसकी भौहें चढ़ गयीं…-” नहीं ऐसा नहीं हो सकता! अगर आपके पत्थर ने पांच कुदाली लगाई है तो मेरा पत्थर दस बार कूदेगा देख लीजिएगा।’
“हाथ कंगन को आरसी क्या?  दिखा दो!
     कि आखिर तुम्हारा पत्थर दस बार कैसे कूदता है?”

       उसके बाद तो एक दूसरे से लड़ते झगड़ते पारो और वरुण वहां पर निशाना लगाते रहे । ऐसा लग रहा था जैसे कोई दो किशोर बालक बालिका है जो आपस में खेल कर एक दूसरे को हरा देना चाहते हैं।
  शुरू के दो तीन बार के बाद पारो के पत्थर ज्यादा दूर तक होने लगे और वह खुशी के मारे किलकारी मारती तालियां बजाकर हंसने लगी। उसे इस कदर खुश देख वरुण के चेहरे पर जो भाव थे वह समझाने मुश्किल थे। वरुण अपलक दृष्टि से पारो को देख रहा था, जैसे कितने दिनों बाद उसे यह चेहरा देखने को मिला था, कितने दिनों बाद ये मोहक मुस्कान उसके चेहरे को रंग रही थी।
     उसका  मन किया कि उस चेहरे को अपने दोनों हाथों में पकड़ कर चूम ले।  लेकिन तभी उसे भान हुआ कि वह वरुण है… आश्रम का एक कर्तव्यपरायण सदस्य!  और सामने खड़ी लड़की सिर्फ एक लड़की नहीं बल्कि उसी आश्रम की ही सम्मानित महिला सदस्य है ।
     और उसके लिए वरुण के मन में इस तरह की कोई भी भावना आना गलत है। सरासर गलत है।
   अपने मन के भावों को एक झटके से अपने दिमाग से निकाल कर वरुण ने हथेली में रखे बचे हुए पत्थर वहीं फेंक दिये और वापस मुड़ कर सीढ़ियां चढ़ गया। पारो को अचानक समझ में नहीं आया कि ऐसा क्या हुआ कि वरुण वहां से ऐसे चला गया।
   उसका तो अभी भी मन कर रहा था कि वरुण उसके पास ही खड़ा रहे और वह दोनों इसी तरह पत्थर फेंकते रहे।
    एक ठंडी से सांस भर कर वह भी वरुण के पीछे सीढ़ियां चढ़ गई….
” कहां चले गए थे आप दोनों? “
  उन दोनों के वहां पहुंचते ही चारु लता ने प्रश्न कर दिया।
” बस यही तो थे।  उस तरफ जरा बकरी के बच्चे और गाय के बछड़े खेल कूद रहे थे उधर ही चले गए थे।”
” बता कर जाना चाहिए था ना! प्रबोधानन्द स्वामी गाड़ी में जाकर बैठ चुके हैं। चलिए यहां से हमारे ऑफिस जाना है।”
चारुलता की बात पर सिर झुका कर वरुण गाड़ी की ओर बढ़ गया !

Advertisements


     
         कुछ देर पहले की जो शाम मुस्कुराती हुई ढल रही थी , उसे याद करते हुए पारो के चेहरे पर अब भी मुस्कान थी… वह भी चारुलता के पीछे धीमे कदमों से कार की तरफ बढ़ गई।
     उसे यही नहीं समझ में आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि वरुण बिना कुछ बोले पलट कर चला गया। उसका मन उसी बात में लगा हुआ था कि अचानक उसे समझ में आ गया कि वरुण के मन में ऐसा क्या आया होगा।
   उसे अपनी सोच पर भी बुरा महसूस होने लगा। उसे यह लगने लगा कि वह खुद कैसे वरुण के लिए अपने मन में कुछ गलत सोचने लगी थी? आखिर क्यों वह वरुण को देव की जगह देखने लगी? और जैसे ही यह बात उसके मन में आई वह शर्मिंदा होकर गाड़ी से बाहर देखने लगी। अब तक वरुण पर टिकी उसकी नजरें खुद ब खुद वरुण से हट गई। उसने तय कर लिया कि अब वह खुद को वरुण से दूर रखने का प्रयास करेगी।

     वरुण के मन की भी सारी चपलता ठंडी पड़ गई थी। वह अपनी सोच में गुम गाड़ी चलाने लग गया था। प्रबोधआनंद को इस तरह से वरुण और पारो का अचानक गायब हो जाना पसंद नहीं आया था। लेकिन दूर खड़े वह उन दोनों को बछड़ों के पास खड़ा देख चुके थे। और वैसे देखा जाए तो उन दोनों का वहां इस तरह खड़े रहना कुछ गलत भी नहीं था। अपने मन को यही समझा कर प्रबोधआनंद एक बार फिर प्रसन्न होने की कोशिश करने लगे।
  आगे बढ़ते हुए गाड़ी चारुलता के ऑफिस के ठीक सामने जाकर रुकी। चारुलता ने सादर प्रबोधानन्द जी को अंदर आमंत्रित किया, उन्हीं के पीछे वरुण और पारो भी ऑफिस में प्रवेश कर गए..
      ऑफिस में प्रबोधानन्द को बैठाने के बाद चारुलता अपने तरह-तरह के कागज पत्तर निकालकर उनके सामने बिछाती चली गई। वह प्रबोधानन्द को हर तरह से अपने प्रभाव में ले लेना चाहती थी। वह दिखाना चाहती थी कि वह समाज सेवा के क्षेत्र में किस तरह से अग्रणी है। वृद्ध आश्रमों में जाकर फल और कंबल बांटने हों, या दिव्यांगों के अस्पताल में जाकर समय-समय पर जरूरी दवाइयां बांटनी हो, हर क्षेत्र में चारुलता के कागज बड़े पक्के थे।
   वह काम कितना और क्या करती थी यह तो वह खुद ही जानती थी । लेकिन उनके पास उनके सारे किए कामों का लेखा-जोखा भरपूर था।
   एक किया चार दिखाया की तर्ज पर हर जगह के फोटोग्राफ्स भी उसने फाइल करके रखे हुए थे।
    पारो के लिए यह सब बहुत नया था। यह सब देखकर उसकी आंखें फटी जा रही थी। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई एक औरत अकेले भी समाज कल्याण का इतना सारा कार्य कर सकती है वह भी बिना किसी की सहायता के।
   कुछ देर पहले चारुलता के लिए उसके मन में जो थोड़ी सी कड़वाहट आ रही थी, वह अब अचानक चली गई। और उसे चारुलता दीदी में देवी नजर आने लगी।
वरुण एक तरफ चुपचाप बैठा अपने आप में खोया हुआ था कि, तभी चारुलता का चपरासी उन सभी के लिए चाय और कुछ नाश्ता ले आया।
    प्रबोधानन्द की आंखे रह रह कर पारो पर ठहर जाया करती। चारुलता ने चाय की कप प्रबोधानन्द की ओर बढ़ा दी।
  वो अपना कप थामे अपनी जगह से उठे और पारो के पास जाकर खड़े हो गए।
उन्होंने अपना कप उसकी ओर बढ़ा दिया…-“मैं चाय नही पीती स्वामी जी!”
” क्यों ? ” और ये कहते हुए उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रख दिया…
   पारो ने अब तक झुका रखी अपनी नज़र ऊपर उठायी और उसकी जलती आंखें प्रबोधानन्द के चेहरे पर गड़ गयीं।
   उस नाजुक कोमल सी लड़की की उन तीखी आंखों का तेज प्रबोधानन्द सह नही सका और उसने तुरंत उसके कंधे पर रखा हाथ हटा लिया। वो अपना कप अपने हाथ में लिए वहाँ से अपनी जगह वापस लौट गया।
” मुझे पसन्द नही है।” पारो का जवाब ऐसा था कि प्रबोधानन्द को एकबारगी समझ में नही आया कि वो चाय के लिए कह रही है या उसके स्वभाव के लिए।
  प्रबोधानन्द के हटते ही सामने बैठे वरुण पर पारो की नज़र पड़ गयी। वरुण भी उसे ही देख रहा था, लेकिन कुछ देर पहले के उखड़े उखड़े से वरुण के चेहरे पर अब थोड़ी शांति नज़र आने लगी थी।
  शायद उसने भी प्रबोधानन्द का हाथ रखना और हटा लेना देख लिया था और पारो के चेहरे पर आए गुस्से से ही उसके चेहरे पर संतोष की रेखाएं खींच गयीं थीं।
   उसने भी चाय लेने से मना कर दिया।
” अरे क्यों? तुम भी चाय नही पीते क्या?”
“कभी पिया करता था पर अब मन नही करता।”
    चारुलता एक बार फिर अपनी बतकही में लग गईं और पारो और वरुण अपने अपने मन से एक दूजे को हटाने में लग गए….

Advertisements

क्रमशः

   दिल से….

   आप में से कई पाठकों ने कहा कि कहानियां तो अच्छी चल रही है, लेकिन आप लोग मेरा कॉलम दिल से बहुत मिस कर रहे हैं। मिस तो मैं भी कर रही थी, लेकिन जीवनसाथी समाप्त करने के बाद पता नहीं क्यों कुछ समय तक दिल से लिखने का मन नहीं किया मैं भी अजातशत्रु जी को बहुत मिस कर रही हूं।

   अजातशत्रु और बांसुरी ऐसे दिल दिमाग पर छाए हैं की उस कहानी को समाप्त करने के बाद सच कहूं तो चार-पांच दिन तक मोबाइल देखने का भी मन नहीं किया। मैंने खुद नहीं सोचा था कि मैं इतनी इमोशनल ब्रेकडाउन में चली जाऊंगी।
    पहले लगता था कि प्रेम कथाएं लिखना सरल होता है। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। जब आप कोई कहानी लिखते हैं तब आप उस कहानी की दुनिया में पूरी तरह से चले जाते हैं। मैं खुद अपने आप को राजा साहब के महल में महसूस करती थी , उनके कमरे उनकी बालकनी उनका दीवानखाना पिया का अस्पताल समर और राजा साहब का ऑफिस, प्रेम और निरमा का आशियाना हर एक जगह ऐसा लगता था मैं उन किरदारों के साथ खुद भी खड़ी हूं।
     जब-जब रसोई से झांक कर निरमा प्रेम से चाय के लिए पूछा करती थी, तो ऐसा लगता था मैं भी निरमा से कह दूं कि मेरे लिए भी एक कप बना लेना।

Advertisements

    यह सब लेखकों के लिखने के साइड इफेक्ट्स होते हैं। और इसीलिए शायद बहुत से लेखक जब कोई एक लंबी कहानी खत्म करते हैं तो उसके बाद एक ब्रेक या पॉज़ ले लेते हैं। क्योंकि वह शायद खुद अपने रचे उन किरदारों  से बाहर निकलने की जद्दोजहद में लगे होते हैं ।
    और उस समय उनका दिमाग किसी नए किरदार को रचने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होता।
    
       और शायद यही वह चीज होती है , जिसे राइटर्स ब्लॉक कहा जाता है। मेरे साथ तो यह अक्सर होता है। जब मैंने shaadi.com लिखी थी तब बांसुरी की विदाई के बाद भी मेरा यही हाल था। और अपने आप को संभालने के लिए मुझे एक लीक से हटकर कहानी लिखनी पड़ी। क्योंकि अगर shaadi.com के तुरंत बाद मैं कोई प्रेम कहानी शुरू करती तो उस पर shaadi.com वाले राजा और बांसुरी की ही छाप नजर आती और इसीलिए एक नई प्रेम कथा शुरू करने से पहले मुझे एक ब्रेक की जरूरत थी।

    थैंक यू लिखने के बाद मुझे लगा कि अब मैं तैयार हूं shaadi.com का सीक्वेल लिखने के लिए और तब मैंने जीवनसाथी लिखना शुरू किया।
 
     दोनों कहानियों में नाम भले ही एक से थे, लेकिन किरदार बहुत अलग थे शादी.कॉम का प्रेम जहां बिल्कुल ही अलमस्त और खिलंदड़ प्रेमी था । वही जीवन साथी का प्रेम गंभीर और भावुक प्रेमी था।
   और मैं ऐसे ही लिखना चाहती थी। मैं बिल्कुल नहीं चाहती कि मेरी दो कहानियों के किरदार एक-दूसरे को ओवरलैप कर जाएं। यूं लगता है कि हर नई कहानी के साथ एक नया किरदार सामने आना चाहिए, जो अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ आप पाठकों से मिले और आपके दिलो-दिमाग पर छा जाए।

   जीवनसाथी के बाद जो नई प्रेम कहानी मैं लिखने वाली हूं उसका प्लॉट मैं पहले ही आप सब से बता चुकी हूं कि, वह मुख्य रूप से प्रेम और निरमा की कहानी होगी सिर्फ प्लॉट और नाम ही समान होंगे। बाकी बहुत कुछ इस बार अलग होगा। यह बहुत अलग सी प्रेम कहानी होगी जिसमें इस बार एक मध्यमवर्गीय परिवार से आप रूबरू होंगे।

Advertisements

जीवनसाथी के तुरंत बाद इसे शुरू न करने का कारण यह भी था कि जीवनसाथी में अभी-अभी आपने प्रेम और निरमा के किरदारों को पढा है, और इस नई कहानी के किरदार उस पुरानी कहानी के किरदारों से कुछ अलग रहेंगे । तो इन दोनों किरदारों में आपस में कोई ओवरलैपिंग ना हो जाए बस इसीलिए उस कहानी को शुरू करने से पहले एक ब्रेक ले लिया और कहानी शुरू कर दी बेस्टसेलर!!

    मेरे दिमाग के कुछ पेंच जरा ढीले हैं… इसीलिए मैं अपनी पसंदीदा जॉनर में लिखने के बीच बीच में इधर-उधर भी हाथ आजमाती रहती हूं।
  मुझे अच्छा लगता है अपनी क्षमताओं से बाहर जाकर देखना और लिखना।
     बेस्टसेलर एक बहुत ही सामान्य सी हॉरर सस्पेंस थ्रिलर है ! यह असल में एक मर्डर मिस्ट्री है जो कहानी के अंत में सुलझ जाएगी। अब तक आप जो पढ़ रहे हैं इसमें तीन अलग-अलग कहानियां चल रही है… लेकिन आगे जाकर यह सारी कहानियां आपस में जुड़ती जाएंगी और धीरे-धीरे हर राज़ पर से पर्दा उठता जाएगा।
     कहानी के मुख्य चार पात्र हैं जिनमें एक इंस्पेक्टर है शेखर! एक पत्रकार है नंदिनी! एक लेखिका है कामिनी! और एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है सुहास! इन चारों की कहानियां आपस में गुथी हुई है, जो जल्द ही आपके सामने परत दर परत खुलती जाएंगी।

*****

   अब बात कहूं समिधा की तो , समिधा लिखते हुए मुझे खुद भी बहुत मजा आ रहा है। जैसा कि मैंने पिछली बार अपनी पोस्ट में कहा भी था कि समिधा में हवन अब जाकर शुरू हुआ है अब तक तो सिर्फ हवन की तैयारियां की जा रही थी।
    
    कहानी में मैंने जिस आश्रम का वर्णन किया है , और आश्रम के अंदर की जो काली सच्चाईयां लिखी है इनका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं है ! मैंने अपने आज तक के जीवन में ऐसा कोई आश्रम कभी नहीं देखा यह पूरी तरह से मेरी कल्पना है।
     आप यह कह सकते हैं कि कुछ हद तक अखबारों में आने वाली खबरें और समय-समय पर अलग-अलग आचार्य महंतों स्वामियों का जो भंडाफोड़ अखबारों में होता है उसे पढ़कर थोड़ा बहुत जो ज्ञान मिला उसमें अपनी कल्पनाओं का थोड़ा सा रंग घोला और समिधा लिखने बैठ गई….
     लेकिन मथुरा के किसी भी आश्रम से इस कहानी का कोई भी लेना देना नहीं है।

   मैंने आज तक सिर्फ एक ही आश्रम अंदर से देखा है और वह है हरिद्वार में स्थित शांतिकुंज।
   शांतिकुंज एक ऐसी जगह है जहां जाकर आपको वाकई आत्मिक शांति का अनुभव होता है ….अपनी जिंदगी में मैंने इतनी सुंदर जगह दूसरी नहीं देखी। गुरुदेव और माताजी ने इस आश्रम का निर्माण किया था युग निर्माण के लक्ष्य को लेकर और उनके बाद भी उनके अनुयाई उनके इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प है।
      जाती पाती अमीर गरीब पुरुष महिला इनमें कहीं कोई भेदभाव इस आश्रम में आप नहीं देख पाएंगे। सभी बराबरी से पूरे सेवा भाव से ईस आश्रम से जुड़े हैं और लगातार कार्यरत हैं ।बड़े से बड़े डॉक्टर कलेक्टर इंजीनियर भी यहां पर खाना बनाते हुए और परोसते हुए दिख जाएंगे । लाइब्रेरी में किताबों को संभाल कर रखना हो या आश्रम की साफ सफाई का कार्य हो यह सभी लोग एकजुट होकर बराबरी से हर काम में हिस्सा लेते हैं।
      शांतिकुंज में वाकई स्वर्गीय सुख की प्राप्ति होती है ।

Advertisements

अब इसके साथ ही मैं अपना यह कॉलम समाप्त करती हूं । कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया… शायद पिछले इतने सारे भागों में जो नहीं लिखा था उसकी कसर आज पूरी हो गई.. अब से कोशिश रहेगी कि हर भाग में छोटा ही सही दिल से जरूर लिखूं।

aparna….
   
    
   
 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

27 विचार “समिधा – 39” पर

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: