समिधा-40

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  समिधा -40

        ऑफ़िस से वापस आश्रम लौटते तक प्रबोधानन्द बिल्कुल ठीक थे.. आह्लादित थे प्रसन्न और प्रफुल्लित थे।
   लेकिन आश्रम के मुख्य द्वार से भीतर प्रवेश करते ही उन्हें वापस तबियत खराब सी लगने लगी। ऐसा लगा जैसे एक बार फिर ज्वर की अवस्था होने वाली है।
” हमें तबियत कुछ ठीक नही लग रही चारुलता!”
“अगर आप कहें तो मैं यहीं रुक जाऊँ आपकी सेवा के लिए।”
” नही !!तुम्हें रुकने की ऐसी कोई आवश्यकता नही है। ये दोनों हैं ना। तुम आश्रम का अपना काम निपटा कर वापस लौट सकती हो।”
चारुलता ने एक नज़र पास में बैठी पारो पर डाली और धीमे से फुसफुसा उठी…-” सुन लिया, स्वामी जी चाहतें हैं तुम ही उनकी देखभाल करो। तो सम्भाल लेना, समझीं।”
   अभी कुछ देर पहले ही पारो को चारुलता में देवी के दर्शन हुए थे, और इसलिए अभी भी उसे ये बात बुरी तो लगी पर उसमें अपने मन को मना लिया।
   
   परिसर में प्रवेश के साथ ही प्रबोधानन्द कि तबियत ऐसी बिगड़ी की गाड़ी से उतर कर अपने कमरे तक जाना भी दुभर हो उठा….
     एकबारगी उसने सोचा भी था कि कुछ देर कृष्ण मंडप में बैठना है लेकिन अपनी हालत देखते हुए समझ आ गया कि ये असम्भव होगा। वो चुपचाप धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ गए…
    जाते जाते उसने चारु को इशारा कर दिया..

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चारु ने भगिनी आश्रम की रसोई में जाकर एलान कर दिया कि अबसे प्रबोधानन्द स्वामी की सेवा में पारो ही जाएगी। पारो के हाथों में फलों मेवों की तश्तरी के साथ उसे दूध भी पकड़ा दिया चारु ने, और उसे स्वामी जी के कमरे की ओर भेज दिया….
       
      वरुण के प्रवचन का समय हो चुका था और इसलिए वो मंडप की ओर बढ़ गया। पारो ने वरुण की तरफ देखा कि शायद वो एक बार मुड़ कर देख ले लेकिन बिना उसकी तरफ एक बार भी देखे वरुण अपनी लय में आगे बढ़ता चला गया।
    वो सीढियां चढतें हुए जानता था कि पीछे खड़ी पारो उसे ही देख रही है , वो खुद मुड़ कर एक बार उसे देख लेना चाहता था लेकिन अपने मन को समझा कर कड़ा कर उसने खुद को रोक ही लिया।
   सीढियां चढ़ कर उसके ओझल होते ही पारो वापस आगे बढ़ गयी।

    प्रबोधानन्द के कक्ष में प्रवेश के साथ ही उसे अजीब सी घुटन होने लगी। लेकिन चारु दीदी का आदेश था सो वो नही टाल सकी।

   वो कमरे में अंदर गयी तो देखा प्रबोधानन्द अपने तोषक पर अधलेटे से अपने फ़ोन में कुछ देख रहे थे। पारो ने उनके सामने जाकर फलों की टोकरी रख दी।  वो वहाँ सामान रख कर उठ ही रही थी कि प्रबोधानन्द ने उसकी कलाई थाम ली।
      पारो की दाईं कलाई प्रबोधानन्द की चौड़ी हथेली में कसमसा उठी…-” हमसे इतना डरने की क्या आवश्यकता है? हमारे आसपास भी नही टिकती तुम? अरे हम कोई बहुत उम्रदराज नहीं हैं… अभी सिर्फ उनतीस के….”
   प्रबोधानन्द की बात पूरी होने से पहले ही पारो के उलटे हाथ का एक जोरदार करारा थप्पड़ प्रबोधानन्द के चेहरे पर था।
   वो आश्चर्य से कलबला कर रह गए। पारो का हाथ छोड़ वो अपना गाल सहलाने लगे।
   ” अगर आप बाहर किसी से भी इस थप्पड़ की चर्चा नही करेंगे तो मैं भी किसी से कुछ नही कहूंगी। न आपकी गंदी नज़र के बारे में और न ही आपकी इस हरकत के बारे में।
   लेकिन अगर आपने शुरुवात की तो मैं भी सब कुछ सबके सामने बोल जाऊंगी। फिर भले ही मुझे ये आश्रम छोड़ कर जाना ही क्यों न पड़ जाए पर आपका कच्चा चिट्ठा अमृतानन्द स्वामी तक पहुंचा ही जाऊंगी। समझे आप?”
  ” व्यापार कर रही हो ,वो भी हमसे?”
   ” व्यापारियों के साथ ही तो व्यापार किया जाता है। मुझे उन कमज़ोर लड़कियों के जैसा मत समझ लीजियेगा जो आप जैसों की ज़्यादती सह कर भी चुप रह जातीं है सिर्फ इस डर से की अगर कुछ कह दिया तो ये आसरा भी छिन जाएगा।
   मुझे इस बात का कोई भय नही है। जैसे ये आसरा मिला कहीं और भी मिल जाएगा।”
” धमकी दे रही हो हमें। तुम जानती भी हो किस से बात कर रही हो।”
” मैं धमकियां नही दिया करती आप चाहें तो आज़मा कर देख लीजिए, अगर आप में हिम्मत है तो बुला लीजिये सारे आश्रम को।
    और मैं किस से बात कर रही ये मुझे अच्छे से मालूम है। एक नम्बर का झूठा लंपट दुर्व्यसनी है ये आदमी जो छद्म रूप धर आश्रम में घुस आया है और यहाँ की पवित्रता भंग करने के प्रयास में है। अभी तो सिर्फ एक थप्पड़ मारा है अगर दुबारा मुझे छूने या देखने का भी प्रयास किया तो डंडे से मार मार कर प्राण ले लुंगी। “
     प्रबोधानन्द के पास शब्द नही बचे थे। अपमान से उनके कानों की लोरियां जलने लगी थीं और चेहरा काला पड़ गया था…
   दूसरी तरफ मुहँ फेर कर उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं और पारो तेज़ कदमों से वहाँ से बाहर निकल गयी।
    आश्रम के पीछे बने सरोवर तक तेज़ तेज़ कदमों से पहुंच वो भरभरा कर ढह गई। सीढ़ियों पर बैठी वो फफक कर रो पड़ी….
    उसकी समझ से बाहर था आखिर उसकी किस्मत में लिखा क्या था? यहाँ जिस आस उम्मीद से आई थी अगर वो ही नही पूरी हो पा रही थी तो आखिर उसके यहाँ भी रहने का क्या औचित्य था।
    हालांकि प्रबोधानन्द से पहले आश्रम के किसी पुरुष ने कोई गलत बात उससे नही की थी लेकिन ये प्रबोधानन्द सुधर ही नही पा रहा था।

   पर उसकी उलझन का कारण दूसरा भी था। गुस्सा तो उसे प्रबोधानन्द पर ही था लेकिन वरुण की बेपरवाही भी कहीं न कहीं उसके गुस्से का कारण थी।
   उसे समझ नही आ रहा था कि कल तक हर बात पर उसका साथ देने वाला वरुण आज अचानक उस सरोवर के बाद से उसकी तरफ देख तक नही रहा आखिर क्यों?
     वो तो सुनीता की समस्या वरुण से बताने की सोच रही थी लेकिन अगर वरुण का यही रवैय्या रहा तो कैसे उसे बता पाएगी?

” क्या हुआ आप यहाँ अकेली बैठी हैं? कोई परेशानी?”

   पारो ने चौन्क कर पीछे देखा, वहाँ वरुण का दोस्त प्रशांत खड़ा था..-” नही कुछ नही। बस ऐसे ही।”
  प्रशांत भी कुछ सीढियां छोड़ कर वहीं बैठ गया…

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” मेरी कोई बात सुनता ही नही। बेहद ज़िद्दी है। जो ठान लिया वही करेगा फिर चाहे उसका कुछ भी परिणाम हो?”
   पारो आश्चर्य से प्रशांत की ओर देखने लगी…
” मैं समझी नही। आप किसकी बात कर रहे है?”
” उसी पागल से लड़के की जो सारी दुनिया भूल जाता है अपने कर्तव्यपालन के लिए और किसी से कुछ कहता तक नही।”
पारो को समझ में तो आने लगा था कि प्रशांत वरुण के लिए कह रहा है लेकिन ऐसे वो कैसे उसका नाम ले लेती इसलिए पूछ बैठी…

” वरुण के बारे में बात कर रहा हूँ। आप जानती हैं उसे कितनी बड़ी समस्या है?”

  पारो ने न में सिर हिलाते हुए मना कर दिया…-” क्या समस्या है उन्हें?”

“उसके हृदय में छेद है और साथ ही उसके हृदय के किनारों में ठीक से खून नही पहुंच पाता है , डॉक्टरों के शब्दों में कहुँ तो ब्लॉकेज है। “.

” डरने वाली बात है क्या?”

” बिल्कुल डरने वाली बात ही है। उसकी समस्या का समाधान सिर्फ सर्जरी है, और वो अब कुछ करवाना ही नही चाहता। कहता है जितना जीवन बचा है अब उसे कृष्ण समर्पित करना है।”
“हाँ तो कृष्ण समर्पित करने का ये मतलब तो नही है ना कि अपने जीवन को ही दांव पर लगा दिया जाए। अपनी ज़िंदगी के लिए प्रयास करना गलत थोड़े न है। भगवान दवा लेने से मना तो नही करते ये तो आपकी बुद्धिमत्ता कहीं से नही हुई।”

” मैं तो समझा समझा कर हार गया, लेकिन किसी को तो उसे समझाना होगा, दवाएं बिल्कुल ऐसे छोड़ देना भी सहीं नही है ना। अभी कल रात ही उसे हल्का सा चक्कर आ गया था। अपनी क्षमता से अधिक काम करता है और किसी से अपनी तकलीफ कहता नही ऐसे कैसे काम चलेगा। “

“हम्म ! लेकिन आप मुझसे ये सब क्यों बता रहे?”

  प्रशांत के पास इस बात का कोई जवाब नही था। वो क्या बताता की वो कई बार वरुण को पारो के ताकते देख चुका है , वो जानता है कि मन ही मन पारो के लिए वरुण के मन की कोमल भावनाएं क्या हैं ? और इसलिए वो खुद भी यही चाहता है कि वरुण की भावनाएं पारो भी जान ले। लेकिन ये सब कहने की उसकी हिम्मत नही थी तो उसे जो सही लगा उसने कह दिया।

   आरती के घंटो शंख की आवाज़ आते ही पारो और प्रशांत वहाँ से उठ कर कृष्णमंडप की ओर बढ़ गए।
  आरती के बाद वरुण सबको आरती देता उन दोनों तक भी चला आया।
   पारो के चेहरे के ठीक सामने आग की लपटें उसके चेहरे को उजाले से भरती जा रही थीं।
   वरुण एकटक उसे देखता खड़ा रह गया…-” यहाँ का काम निपटा लीजिये फिर आज हमें प्रबोधानन्द स्वामी की सेवा में ही रहना है।”
  पारो की बात पर किसी अच्छे बच्चे की तरह वरुण ने हॉं में सिर हिलाया और आरती रख कर बाहर चला आया।

*****

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      पारो के बाहर जाते ही प्रबोधानन्द अपमान की आग में तिलमिला कर रह गया था। लेकिन वो ये भी समझ गया था कि ये पारो की शिकायत करने का उचित समय नही था। अब तो बदले की भावना उसके अंदर दावानल की भान्ती जल रही थी। और उसके भीतर की ये अग्नि उसे सिर्फ शारीरिक ही नही मानसिक रूप से भी संतप्त करने लगी थी।
  बहुत अकड़ है तुझमें छोकरी। मैं भी तुझे दिख दूंगा की प्रबोधानन्द आखिर है क्या बला। तुझे अपने कदमो पर गिरा कर तेरी सारी अकड़ न निकाल दी तो प्रबोधानन्द मेरा नाम नही।
  अभी शारीरिक रूप से अस्वस्थ था तो मुझे थप्पड़ धर गयीं न। ये थप्पड़ तुझे बहुत भारी पड़ेगा। इस थप्पड़ का मूल्य जीवन भर चुकाने पर भी नही चुका पाएगी। समझती क्या है खुद को हैं….
   अभी बिंदल से बात करता हूँ और तेरी सारी हेकड़ी निकलवाता हूँ।
  प्रबोधानन्द किसी को फ़ोन लगाने जा ही रह था कि चारु कमरे में चली आयी…-“अरे आपने तो कुछ भी नही लिया? ऐसे तो कमज़ोरी आ जायेगी स्वामी।जी।”
“चारु वो लड़कीं कहाँ गयी? वो आज रात भर हमारे कक्ष में ही रहेगी? हमें जिस वस्तु की आवश्यकता होगी वही प्रस्तुत करेगी। समझ गयीं तुम, वरना तुम्हारे सारे फंड जो आश्रम की तरफ से मिलते है कैंसिल ही समझो।”
   प्रबोधानन्द का आखिरी वार निशाने पर लगा,चारु तिलमिला कर रह गयी। उसे गुस्सा तो प्रबोधानन्द की अजीबोग़रीब फरमाइश पर आ रहा था पर उतरने वाले था पारो पर।
   अभी भी तो उसने पारो को यहाँ भेजा था पर वो यहाँ फल और दूध पटक कर जाने कहाँ गायब हो गयी थी।
  इतनी नाराज़गी के बावजूद अपने चेहरे को संयत किये मुस्कुरा कर चारुलता ने प्रबोधानन्द को प्रणाम किया और हंस कर उसकी बात मान ली…-” आप कहें तो जीवनपर्यंत उसे आपकी सेवा में लगा दूं । आप इतने नाराज़ क्यों लग रहे हैं स्वामी जी। कुछ भूल हो गयीं क्या हम सब से?”
    प्रबोधानन्द खुद तिलमिलाए बैठा था लेकिन पारो के थप्पड़ की बात वो ऐसे किसी को भी क्या बताता इसी से चुप लगा गया।
  ” बिंदल से बात हुई क्या तुम्हारी?”
  ” हाँ उनसे तो हमारी बात होती ही रहती है। उन्ही से तो ये सारा कारोबार है।”
   ” हम्म सब ठीक चल रहा है ना?”
   ” सब कुछ मज़े में चल रहा है स्वामी जी, आप ये कुछ भोग ग्रहण करें मैं तब तक मैं आपके भोजन के साथ उस लड़की को भी भेजती हूँ। अबकी ज़रा समझा सीखा कर भेजूंगी।”
  “नही उसकी आवश्यकता नही है। समझाना सिखाना हम खुद कर लेंगे। तुम बस भेज दो।”

   चारुलता ने प्रबोधानन्द को प्रणाम किया और बाहर निकल गयी। उस कक्ष से बाहर निकलते ही उसके तेवर बदल गए। जलती हुई आंखों से पारो को ढूंढती चारु को पारो तो नही मिली पर वरुण ज़रूर मिल गया…-” वरुणदेव सुनो, उस लड़की को कहीं देखा क्या ?”
” किसे ?”
” वही लड़की पारोमिता? प्रबोधानन्द स्वामी की तबियत फिर बिगड़ गयी है। उन्हें कक्ष में अकेले नही छोड़ा जा सकता उनके साथ किसी का होना ज़रूरी है। सो इसलिए हम लोगों ने सोचा कि पारो ही उनके कमरे में रुक जाए, रात मध्यरात कही उनकी तबियत बिगड़ी तो कम से कम हमें बाहर खबर तो दे पाएगी।”
” मैं रुक जाता हूँ उनके साथ!”
” नही!स्वामी जी का आदेश यही है वही रुकेगी तो अब वही रुकेगी। जाओ भेजो उसे”

  वरुण के चेहरे पर तनाव की रेखाएं खिंच गयीं। एक गहरी सांस भर वो चारु के सामने से हट कर पारो को ढूंढता आगे बढ़ गया कि तभी उसे दूसरी तरफ से पारो आती हुई नजर आ गई।
   वह अभी पारो से कुछ कह पाता कि उसके पहले ही चारुलता की आवाज उन दोनों के कानों में गूंज गई
” पारोमिता प्रबोधानन्द स्वामी की तबीयत आज भी सही नहीं है। और इसलिए आज रात तुम उनके कक्ष में उनकी सेवा में प्रस्तुत रहोगी। कहीं आधी रात उनकी कुछ तबीयत बिगड़ी तो हमें बताने के लिए उनके साथ किसी का होना बहुत जरूरी है।”
     चेहरे पर मैं ही क्यों वाले भाव लाते हुए भी पारो ने चारुलता दीदी से कुछ नहीं कहा। और चुपचाप सिर झुका कर हां कह दिया। उसकी इस तरह हां कहने पर वरुण को पारो पर ही जोर से गुस्सा आ गया। चारुलता दीदी अपनी बात कह कर वहां से भगिनी आश्रम की तरफ बढ़ गई। प्रशांत भी किसी काम से निकल गया अब वहां बस वरुण और पारो ही खड़े रह गया।
” मुंह में दही जमा रखा था क्या?  मना भी तो कर सकती थी?”
  वरुण को खुद समझ नहीं आया कि आज तक पारो से इतने सम्मान से बात करने वाला वह आज उसे किस अधिकार से इस तरह डांट बैठा ।
” स्वामी जी की तबीयत सही नहीं है , उनकी सेवा के लिए वहां किसी का रहना जरूरी है। ऐसे में मना करना अच्छा नहीं लगता।”
    मन ही मन पारो को वरुण का इस कदर उसकी चिंता में उसे डांटना अच्छा लग रहा था लेकिन वह भी वरुण के शाम के बर्ताव के कारण थोड़ी सी दुखी थी। और इसीलिए उसने ऐसा उल्टा जवाब दिया उसका जवाब सुनकर वरुण की भौहें तन गई।
” अच्छा तो यह बात है । पूरे आश्रम में एक तुम्हारे अलावा और कोई नहीं बचा उनकी सेवा के लिए।”
” उनकी सेवा के लिए तो बहुत से लोग हैं । लेकिन अगर मुझे ही चुना गया है, और मुझे मौका मिल रहा है तो इसमें आपको क्यों कष्ट हो रहा है?”
   पारो की इस बात ने वरुण की आंखें खोल दी उसे एकदम से आभास हुआ कि जैसे वह वरुण नहीं कोई और है। उसके अंदर से ऐसा लगा जैसे कोई और पारो के ऊपर इतना हक जताते हुए उससे बात कर रहा है।
    पारो सही ही तो कह रही थी आश्रम में भले ही बहुत से लोग हैं लेकिन अगर पारो को स्वामी जी की सेवा करने का मौका मिला तो उसे क्यों बुरा लग रहा था?  क्यों उसे बार-बार प्रबोधआनंद की दृष्टि में पारो के लिए गलत ही नजर आ रहा था ? ऐसा और तो किसी को नहीं नजर आ रहा, फिर अकेले उसे ही क्यों? क्या वह कुछ ज्यादा सोच ले रहा है… कहीं यह उसके मन में पारो के लिए  कोमल भावनाओं से पैदा हुई जलन तो नहीं है।
     अगर वह प्रबोधानंद को गलत समझ रहा है तो वह खुद भी कितना सही है?
   प्रबोधानंद अगर पारो को घूरता रहता है तो वह खुद भी तो दुनिया से छिपकर उसे देखने का कोई भी बहाना नहीं  छोड़ता? तो फिर उसमें और प्रबोधानंद में अंतर भी क्या हुआ ? उम्र का भी ऐसा कोई खास बहुत ज्यादा अंतर नहीं है..
    प्रबोधानंद अधिक से अधिक उससे दो या तीन साल ही बड़े होंगे।

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     वो अपने मन के भावों में इस कदर फंसता जा रहा था कि उसे खुद ही समझ नहीं आ रहा था कि उसके मन में पारो के लिए जागती कोमल भावनाएं सही है या गलत?
   अपने मन को कड़ा कर वह वहां से मुड़कर कृष्ण मंडप की तरफ बढ़ गया और पारो अकेली खड़ी रह गई।

   पारो को लगा था कि अगर वह कुछ कड़े जवाब देगी तो वरुण शायद नरम पड़ जाएगा । और एक बार फिर तालाब किनारे उसके साथ पत्थर फेंकने वाला वरुण बन जाएगा। लेकिन यहां तो पांसा ही उल्टा पड़ गया। उसकी कठोर वचनों को सुनकर वरुण ऐसा टूटा कि उसे अकेला छोड़ कर वहां से चला गया।
     पारो ने तो वरुण के सामने बस उसे चिढ़ाने के लिए ही अंदर जाने की बात मान ली थी, लेकिन अब उसकी स्थिति विकट थी। वह अपने ही शब्दों में बुरी तरह फंस चुकी थी। काश जिस समय वरुण, प्रशांत उसके साथ खड़े थे तभी वह चारुलता दीदी की बात मानने की जगह काट देती, तो वह दोनों लड़के मिलकर कोई ना कोई और उपाय निकाल लेते। लेकिन उसने खुद ने चारु की बात पर हामी भर दी और उसके बाद वरुण से इतनी सारी बहस करके उसे भी नाराज कर दिया। अब तो उसके पास कोई नहीं बचा था जो उसे बचा सके और पता नहीं अंदर वह प्रबोधानंद क्या सोच कर बैठा था।

     आश्रम में भोजन का समय हो चला था सभी आचार्य गुरुवरों के बाद भगिनी आश्रम की महिलाओं ने भी भोजन कर लिया। सबको खिलाने पिलाने के बाद अंतिम पारी में बैठी सरिता सुनीता पारो और उनकी हमउम्र सखियां एक दूसरे से बातें करते हुए खाना खा रही थी। लेकिन पारो का आज किसी काम में मन नहीं लग रहा था। उससे एक निवाला भी खाया नहीं गया। उसे रह-रहकर बस यही चिंता सता रही थी कि उसने क्यों प्रबोधानंद के कक्ष में जाने के लिए हामी भर दी।
    उन लोगों का खाना निपटते ही चारुलता एक बार फिर पारो के पास चली आई… उसे दूर से ही देख कर चारु ने गर्दन हिलाकर स्वामी जी के कमरे में जाने का उसे इशारा कर दिया! पारो चुपचाप मन मसोसकर अपने जगह से उठकर चारु की तरफ बढ़ने लगी की सुनीता ने उसका हाथ पकड़ लिया…-” अपना ध्यान रखना बहन। “
हां में सिर हिला कर पारो धीमे कदमों से आगे बढ़ गई।
   दिल में तो उसके ऐसी हलचल मची थी कि एक-एक कदम मनो भारी हुआ जा रहा था। लेकिन अपने आप को समझती अपने मन को समझाती धीमे-धीमे कदमों से प्रबोधानंद के कक्ष की ओर बढ़ चली। मन ही मन वो जाने कितने तरीके सोच रही थी कि अगर अब प्रबोधानंद ने उस पर हाथ डालने की कोशिश की तो वह क्या करेगी।  उसे याद था कि कुछ समय पहले जब वह फल रखने उनके कमरे में गयी थी तो वहां फलों के पास एक छोटा सा चाकू भी रखा था। उस चाकू को याद कर के उसके मन में थोड़ी सी तसल्ली के भाव जागे…..
      ज्यादा कुछ हुआ तो चाकू उठाकर प्रबोधनंद के आर पार कर देगी…. बस यही सोचकर वह वाटिका में मैं बने उस अकेले कक्ष के दरवाजे तक पहुंच गई ।वहां पहुंचने के बाद वो एक बार मुड़कर पलटी.. चारु दीदी सीढ़ियों से नीचे खड़ी थी। उन्होंने उसे अंदर जाने का इशारा किया और आगे बढ़ गई… तीन चार सीढ़ियों के ऊपर ही कक्ष का दरवाजा था, जो लगा हुआ था। उसने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर प्रवेश किया। दरवाजे के साथ एक छोटा सा गलियारा लगा था, जिससे अंदर बढ़ने पर सोने का कमरा था।
    दरवाजे के अंदर घुसते ही उसकी नजर दीवार से लग कर खड़े वरुण पर पड़ गई।  और उसे देखते ही पारो के चेहरे पर सूरज सी रोशनी चमकने लगी। उसकी आंखें खुशी से उद्भासित हो गई… उसने आश्चर्य से वरुण की तरफ देखा वरुण ने तुरंत अपने होठों पर उंगली रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया और पारो ने गर्दन हाँ हिलाकर एक भीनी सी मुस्कान वरुण को दी और मुड़कर दरवाजा बंद कर लिया…

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क्रमशः

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aparna ……
   
     
      

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

17 विचार “समिधा-40” पर

  1. ये पारो ने ही किया था या मुरलीवाले की ही कोई लीला थी। मुझे तो चारूलता और प्रबोधानंद जैसे लोगों को सीधा गोली से उड़ा देने का मन करता है ,थप्पड़ तो मामूली बात है। वरूण के लिए पारो अलग सी परेशानी है , पारो सामने होती है तो उसके अंदर का देव जाग जाता है और फिर वरूण के लिए असहज सी स्थिति खड़ी हो जाती है। अब प्रबोधानंद को क्या कमाल दिखाएंगे वरूणदेव बाबू 😁😁

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