समिधा -41

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      समिधा -41

       दरवाज़े से भीतर आते ही पारो की नज़र वरुण पर पड़ी और वो चौन्क कर मुस्कुरा उठी। और उसे देखते ही वरुण ने अपने होंठों पर उंगली रख़ उसे चुप रहने का इशारा कर दिया।
    वरुण की बात समझ कर वो भी चुपके से दरवाज़ा बंद कर वहीं खड़ी रह गयी।
  दरवाज़े पर खड़े दोनो कुछ पलों के लिए जैसे सारी बाहरी दुनिया भूल कर रह गए।
   पारो की आंखों में उलाहना था तो वरुण की आंखों में माफ़ी…

” कोई है क्या?”
  दोनो शांत खड़े थे कि अंदर से प्रबोधानन्द की आवाज़ उन तक चली आयी। दोनों से कोई जवाब देते नही बना कि तभी वरुण ने पारो से जवाब देने का इशारा किया और खुद अपनी जेब से कुछ निकालने लगा…

” जी स्वामी जी!! मैं अभी आयीं।” पारो के शब्दों में मधुरता और कोमलता का लवलेश भी नही था। अपने कठोर शब्दों के लिए उसके मन में कोई ग्लानि भी नही थी।
“जल्दी आओ, हमें पानी चाहिए। “
“जी !!”
  पारो ने लाचारगी से वरुण की तरफ देखा,उसने तब तक अपने हाथ में पकड़ रखी धूप उसकी ओर बढ़ा दी।
  ये क्या है वाले भाव चेहरे पर लिए पारो वरुण की ओर देखने लगी। वरुण ने उसके सामने अपनी चौड़ी सी हथेली फैला दी…
    उसकी हथेली पर लिखा था
     “इसे जला देना, बस दो मिनट में उसे नींद पड़ जाएगी।”
   वरुण की हथेली में कुछ लिखा था, पर पारो को पढ़ने में असुविधा सी हो रही थी, वो वरुण के सामने से हट कर उसकी बगल में चली आयी और एक बार फिर वही देव की खुशबू उसे इस संसार से परे ले चली। कुछ पलों को उसने आंखें बंद कर ली।
    उसे लगा सामने देव की हथेली फैली रखी है। उसने उन हथेलियों को अपने हाथ में थाम लिया और अपनी आंखों के पास पढ़ने ले आयी..
      उसके हाथ में लिखी पंक्तियों को पढ़ने के बाद पारो के चेहरे पर हंसी खेल गयी.. उसने मुड़ कर वरुण की तरफ सवालिया नज़रों से देखा.. वरुण ने हॉं में सिर हिला दिया और उसे अंदर जाने का इशारा कर दिया।
  पारो उसके हाथ से धूप लिए अंदर चली गयी।  उसे वरुण की इस हरकत पर हंसी आ रही थी, और अपनी हंसी दबाने के बाद भी चेहरे पर मुस्कान कायम थी उसे मुस्कुरातें देख प्रबोधानन्द अपने पलंग पर उठ बैठे…-“सुबह तो बहुत अकड़ कर गयी थी , अब देख ली हमारी ताकत। खुद मुस्कुरातें हुए हमारी सेवा में चली आयीं ना।”
   बिना प्रबोधानन्द को देखे ही पारो ने सबसे पहले जाकर धूप जला कर एक ओर रख दी..
  अच्छा चारु ने पूरी व्यवस्था से भेजा है लड़कीं को। मन ही मन सोचते प्रबोधानन्द के चेहरे पर मुस्कन रेंगने लगी…
“अच्छा सुनो ! इधर आओ, बैठो तो सहीं हमारे पास। “
   पारो अपनी नाक पर अपना ही आँचल रखती प्रबोधानन्द से ज़रा दूर खड़ी रही…

” ये नाक क्यों बंद कर रखी है। तुम्हें ये खुशबू पसन्द नही है क्या?

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“फिर कौन सी खुशबू पसन्द है? सुनो हमारे पास तो तरह तरह के देसी विदेसी परफ्यूम के जोड़े भी हैं। हमारे विदेशी समृद्ध जजमान तोहफे देते रहते हैं। तुम चाहो तो कुछ निकाले तुम्हारे लिए।”
  वो चुपचाप ना में सिर हिला कर खड़ी रह गयी
“क्या हुआ कुछ बोलोगी नही? ये तो गलत बात है। सुबह थप्पड़ भी तुम्हीं ने मारा , और अब चुप भी तुम ही खड़ी हो।हमें तो लगा था हम तुम्हें बुला कर उस थप्पड़ का बदला बहुत गुस्से में लेंगे पर तुम्हारा चेहरा इतना भोला और मासूम सा है कि क्या तुमसे कोई नाराज़ रहे।
  तुम्हारा वो थप्पड़ भी माफ किया, तुम भी क्या याद करोगी किस स्वामी से पाला पड़ा था।
   अच्छा सुनो यहाँ आओ तो सहीं। हमारे पास बैठो, दो बातें हमसे भी कर लो.. हम इतने भी बुरे नही हैं जितना तुमने सोच लिया।
  अगर कोई हमें पसन्द आ जाये तो हम उसका जीवन संवार देते हैं.. तुम्हें भी यहाँ आश्रम में सब मिलेगा, जो चाहोगी वो सब। तुम्हारे लिए अलग कमरे की व्यवस्था करवा देँगे.. हमारे साथ हमारी विदेश यात्राओं का हिस्सा बन पाओगी..”
  आगे के शब्द उनके मुहँ में ही लड़खड़ाने से लगे और धीरे धीरे उनकी आंखें बंद होने लगीं।
  पारो को समझ आ गया कि वो धूप काम करने लगी है। उसके चेहरे पर वापस धीमी सी मुस्कान खेलने लगी…
.    अपने आप में बड़बड़ाते स्वामी जी धीरे धीरे गहरी नींद में खोने लगे और फिर कुछ ही देर में एक तरफ उनकी गर्दन लुढ़क गयी।
     पारो चुपचाप दबे पांव उस शयनकक्ष के बाहर के गलियारे की तरफ चली आयी। वहाँ वरुण भी अपनी नाक पर रुमाल बांधें बैठा था।
   उसके पास आ कर पारो ने हाथ के इशारे से वरुण को बता दिया कि प्रबोधानन्द सो चुका है। वरुण के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी।
   वो बाहर गलियारे में ज़मीन पर ही दीवार से टेक लगाए बैठा था। पारो भी उस तक जाकर वहीं बैठ गयी..
” अब तुम अपने कमरे मे जाकर आराम से सो जाओ। मैं यहीं रहूंगा। कोई ज़रूरत हुई तो मैं देख लूंगा।”
    पारो ने गहरी नज़रों से वरुण की तरफ देखा..
“आप भी अपने कमरे में जाकर आराम कीजिये, आप को भी आराम की ज़रूरत है।”
“हॉं तो मैं ने कब कहा कि मैं आराम नही करूँगा। मैं यही सो रहूंगा।”
” यहाँ कितना आराम हो पायेगा ?”
“हो जाएगा, तुम चिंता मत करो। तुम जाओ यहाँ से।”
    वरुण के ऐसा बोलते ही पारो वहाँ और जम कर बैठ गयी..
“मैं तभी जाऊंगी जब आप यहाँ से जाएंगे। “
“अरे मेरी बात अलग है, तुम्हारी अलग। तुम्हारा यहाँ रुकने का कोई औचित्य ही नही।”
” मैं वैसे भी स्वामी जी के लिए नही आपके लिए रुक रही हूं।”

ना में सिर हिला कर वो बिना कुछ बोले खड़ी रही

      एक पल को वरुण का चेहरा गुलाबी सा हो गया..
   वरुण ने परेशान हो एक गहरी सांस ली और अपनी बात रखने लगा…-” मैं भी चला गया तो चारु जी को क्या कहेंगे?”
“वो तो मैं चली गयी तब भी कुछ कहना ही होगा ना। तब क्या कहेंगे?”
   इसी बीच वरुण को कुछ देर पहले अंदर से आती पारो और प्रबोधानन्द कि बातें याद आ गईं और उसे एक पल को लगा कि पूछ लें अंदर क्या बातें हो रही थीं…” प्रबोधानन्द क्या कह रहे थे तुमसे?”
  पारो कुछ देर को शांत रही फिर धीमे से उसने कहना शुरू किया…” कुछ देर पहले जब मैं यहाँ आयीं थी तब इन्होने मेरा हाथ पकड़ लिया था..”
   वरुण के माथे की नसों में तनाव आने लगा..-” फिर?”
“फिर क्या मैंने पलट कर एक झापड़ धर दिया उनके गाल पर!”
     आश्चर्य और खुशी से वरुण के चेहरे पर चमक दौड़ गयी…-” सच?”
” हाँ !!! मुझे भी नही पता अचानक मुझे क्या हो गया था, शायद दिमाग में पहले से गुस्सा भरा पड़ा था, इसलिए शायद!”
” हम्म ! बहुत गुस्से वाली हो?”
“नही !!! पहले कभी नही आता था, ससुराल या मायके में आता भी था तो खुद को संभाल लेती थी पर अब पता है यहाँ कोई नही है अपना। खुद ही खुद का ध्यान रखना है..”
    वरुण का चेहरा जाने कैसा तो हो गया… वो जानता था कि सामने बैठी पारो सच कह रही है लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर गहन उदासी सी छा गयी…
   वो कुछ सोचते हुए अपने आप में गुम था कि पारो ने उसकी चुप्पी को देखते हुए अपनी बात रख दी…

   “सुनिए आप से कुछ बात कहनी थी?” 
    ” हॉं कहो!”    वरुण ने कहा और फिर पारो ने एक एक कर सुनीता की बताई सारी बातें वरुण को बता दी…..
   जैसे जैसे बातें खुलती गयी वरुण के आश्चर्य की सीमा नही रही.. उसे विश्वास ही नही हो रहा था कि आश्रम में इतना कुछ चल रहा है, और वो भी आचार्य अमृतानन्द के जाने बिना।
  ” क्या करना चाहिए कि ये सब रुक जाए?”
   “सोचना पड़ेगा! क्योंकि अगर हम सीधे सीधे जाकर पुलिस में या अमृतानन्द स्वामी से कहते हैं तो सबूतों के अभाव में हम ही झूठे ठहरा दिए जाएंगे। दूसरी बात हमें ये भी पता करना होगा कि इस सब में कौन कौन जुड़ा हुआ है। आश्रम से कितने लोग इस काम में लिप्त है। सारी बातें पता चलने के बाद ही हम कुछ कर पाएंगे। और उसके लिए हमें और लोगों की भी ज़रूरत होगी।”
  ” और कौन हमारी मदद कर सकता है?”
   “तुम अपने आसपास की महिलाओं में धीरे धीरे पता करो कि कौन कौन इस सब से जुड़ी हैं और उन सब के पास से बाकी जानकारियां निकलवाने की कोशिश भी करना। तब तक मैं भी इधर कोशिश करता हूँ कुछ पता चलता है तो।”
    दोनों की बातों में रात बीतती जा रही थी कि फिर वरुण ने जोर देकर पारो को उसके कमरे में आराम करने भेज ही दिया…
    पारो चाहती तो थी कि वरुण भी कुछ देर आराम कर ले लेकिन वो तैयार नही हुआ….

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****
    सुबह के साढ़े चार बज रहे थे, आश्रम में हल्की फुल्की सी हलचल अभी शुरू हुई ही थी कि प्रबोधानन्द के कमरे के दरवाज़े पर खटका सा हुआ।
वहीं बैठे बैठे नींद लेते वरुण की दरवाज़े पर की दस्तक से आंख खुल गयी।
   उसने धीमे से दरवाज़ा खोला सामने पारो खड़ी थी। अपने हाथ में कुछ लिए हुए वो अंदर आ गयी। उसके हाथ में एक गिलास था। वरुण चौन्क कर उसे देखने लगा..-“, ये क्या है?”
” ये सोंठ वाला गरम पानी है। लीजिये पी लीजिये!”
” लेकिन ये क्यों?”
  ” ज़रूरी है आपके लिए। आप लीजिये और पी लीजिये उसके बाद आप थोड़ी देर अपने कमरे में जाकर आराम कर लीजिए। अब मैं यहाँ बैठती हूँ। “
     वरुण ने पानी धीरे से पीना शुरू किया, उसे वो पानी गले में बड़ी राहत दे रहा था..
“तुम्हें कैसे मालूम था कि ये पानी मुझे अच्छा लगेगा।”
” पुराने नानी के नुस्खें हैं ये तो। आप को कल बार बार खांसी सी आ रही थी, उसी से लगा कि आपको ये पीना चाहिए। “
    वरुण मुस्कुरा कर रह गया… उसने जब तक में वो खत्म किया, आश्रम में हल्का उजाला सा फैलने लगा था।।
   वरुण उठ कर अपने कमरे की ओर चला गया। उसके जाने के कुछ देर में ही चारुलता हाथ में चाय का कप लिए खुद चली आयी।
   दरवाज़ा खुला हुआ था, और दरवाज़े के साथ लगी दीवार से पीठ टिकाए पारो ज़मीन पर ही बैठी थी।
   दरवाज़ा खोल चारु भीतर चली आयी, पारो पर तीखी नज़र डाल वो अंदर चली गयी।
   उसने देखा, स्वामी जी गहरी नींद सोए पड़े थे। अभी भी उनके उठने के कोई आसार नजर नही आ रहे थे। चाय वहीं एक किनारे रख वो बाहर निकल आयी..-” जाओ अब तुम भी अपने काम धाम में लगो। भोर होने लगी है। “
  पारो चुपचाप उठ कर जाने लगी तो चारु ने उसे टोक दिया…-“स्वामी जी की तबियत बिगड़ी तो नही?”
  पारो ने चारु को मुड़ कर देखा और गहरी नज़रों से उसे देखते हुए कहने लगी…-“मेरे यहाँ आते ही कुछ देर में स्वामी जी गहरी नींद सो गए. ..”
” अच्छा तुरंत ही?” चारु के कौतूहल का ठिकाना न था
” जी! शायद थके हुए थे और तबियत भी..”
“हम्म !! ठीक है जाओ!”
    पारो को स्वामी जी के कमरे से रात में निकल कर अपने कमरे में जाते चारु पहले ही देख चुकी थी लेकिन उस वक्त उसने कुछ नहीं कहा।
      आधी रात के वक्त कहीं बीच में जब धूप पूरी जल चुकी थी वरुण ने जाकर उसके अवशेष वहाँ से समेट लिए थे और अपने कमरे में जाते समय एक तरफ को बहते पानी में प्रवाहित भी कर दिए थे।

***

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   सुबह सवेरे आश्रम की अपनी गतिविधिया शुरू हो चुकी थीं। सुबह की मंगल आरती के बाद वरुण का प्रवचन था।
    मंदिर में भी रोज़ रात कान्हा जी का बिस्तर लगाया जाता था और उसके बाद मंदिर के पुजारी वहाँ पर्दा खींच कर बाहर चले आते थे।
   उसके बाद सीधे सुबह चार बजे ही पर्दा खोला जाता था। और ये काम सालों से एक ही पुजारी जी के जिम्मे था। और उनका कहना था कि रात में कितने भी अच्छे से बिस्तर लगाया जाए, लेकिन सुबह बिस्तर की चादरों में सिलवटें जरूर नजर आती हैं । और यही उनका विश्वास था कि उनके कान्हा जी भी दिन भर सारे संसार का पालन करने के बाद रात में कुछ घड़ी का आराम जरूर करते हैं।
     नियम से हर चार दिन में कान्हा जी का बिस्तर चादर तकिए के गिलाफ़ बदल दिए जाते थे।
    आज भी कान्हा जी को जगाने के बाद उनका स्नान ध्यान आचमन पूजन संपन्न होने के बाद उनकी आरती करते हुए पुजारी जी ने आरती के बाद अंत में कपूर जलाकर वरुण के हाथ में थमा दिया। कपूर के साथ ऊंची ऊंची लपटों से कान्हा जी की आरती उतारते हुए वरुण ने मन ही मन यह संकल्प लिया कि जिस तरह कान्हा जी ने नरकासुर का वध किया था और 16000 महिलाओं को मुक्ति दिलाई थी उसके आतंक से, उसी तरह अब इस आश्रम में जिन महिलाओं की दुर्गति हो रही है उन्हें उस पाप कुण्ड से वह मुक्त करवाकर रहेगा….

    आरती करने के बाद कपूर दान को नीचे रखने के बाद वरुण ने प्रणाम किया और जैसे ही मुड़कर अपने आसन की तरफ बढ़ा… पारो ने तुरंत उसके आसन के सामने रखे पटल को पोछने के बाद उसकी किताबों के साथ ही एक कलम भी वहां रख दी। यह वही कलम थी जिससे आख्यान के बीच वरुण अक्सर किताब में कुछ निशान खींचा करता था। शायद वह पंक्तियां उसे कुछ ज्यादा ही पसंद आती थी.. इसलिए उन पंक्तियों के नीचे अपनी कलम से निशान बना लिया करता था….

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   आज तक आरती होने के बाद वह खुद उतर कर पीछे बने वाचनालय से अपनी पुस्तक और कलम उठा कर लाता था लेकिन आज उसके आरती संपन्न करते तक में पारो सब कुछ लाकर वहाँ रख चुकी थी। उसने श्रद्धालुओं को प्रणाम किया और एक नजर किनारे खड़ी पारो पर डाली। पारो ने आंखों ही आंखों में उसे प्रणाम किया वरुण ने भी धीमे से उसे जवाब दिया और अपनी जगह पर बैठ गया।  अपनी जगह पर बैठते ही उसका ध्यान गया किनारे पर ही एक तांबे का बड़ा सा जग रखा हुआ था, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि वह कभी भी वहां पर कोई भी पानी का कलश नहीं रखा करता था। उस जग  के साथ ही एक छोटा सा गिलास भी रखा था। गिलास औंधा रखा था जिसके नीचे एक छोटा सा कागज फड़फड़ा रहा था। वरुण ने उस कागज को उठाकर खोला उसमें मोती से अक्षरों में लिखा हुआ था…-” आख्यान के बीच में अगर जरूरत महसूस हो तो थोड़ा पानी पी लीजिएगा वरना गला सूखने से आपको तकलीफ हो जाती है, पानी हल्का गरम है। गले को राहत मिलेगी।…..”
     वरुण ने उस पर्ची को मोड़ कर अपने कुर्ते की जेब में डाल लिया उसके चेहरे पर एक भीनी सी मुस्कान खेल गई। उसने सामने देखा पारो उसे ही देख रही थी। पारो ने धीरे से जग की तरफ इशारा किया और सिर नीचे करके धीमे-धीमे कदमों से बाहर निकल गई….

    मन ही मन श्रीकृष्ण स्मरण करते हुए वरुण ने आज का आख्यान शुरू कर दिया…

क्रमशः

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aparna…

दिल से….

     सबसे पहले तो आप सभी का हार्दिक आभार कि आप सभी मुझे इतना दिल से पढ़ते हैं और सराहतें हैं।
    अब चलते हैं आने वाली कहानियों के बारे में जानने। जैसा कि मैंने पहले भी आप लोगों से कहा था कि दिवाली के बाद मैं एक नई कहानी वापसी की शुरुआत करूंगी अपने ब्लॉग पर। इसके साथ ही मैंने यह भी सोचा था की मायानगरी भी प्रतिलिपि की जगह अब सिर्फ ब्लॉग पर आएगी। लेकिन आप सब जीवनसाथी से इतना ज्यादा जुड़े हुए हैं कि राजा और बांसुरी को वापस पढ़ने के लिए आप मायानगरी से भी जुड़ना चाहते हैं तो आप सभी की इतनी सारी डिमांड देखते हुए मैंने यही सोचा है कि अब कहानी मायानगरी प्रतिलिपि पर ही आएगी।
     ब्लॉग पर और प्रतिलिपि पर एक साथ एक ही कहानियां चलाना जरा मुश्किल हो रहा है। कहानी के हिस्से पहले मेरी नोटबुक पर सुरक्षित होते हैं, उसके बाद प्रतिलिपि के ड्राफ्ट पर और उसके बाद ब्लॉग पर। एक ही चीज तीन-तीन जगह पर सुरक्षित होने से जगह की बहुत समस्या हो रही है फोन पर..
       यही सब सोचकर अब यह निर्णय लिया है कि समिधा दोनों जगह एक साथ आती रहेगी।
    लेकिन अब से बाकी कहानियां दोनों जगह पर अलग-अलग आएंगी।
   कोशिश मेरी यही रहेगी कि जिन कहानियों को भी मैं धारावाहिक के रूप में लिखूं उनके भले ही सिर्फ 15 मिनट के पार्ट हों लेकिन रोज आ सकें। जिससे आप सभी पाठकों को भी सुविधा हो।
    मायानगरी प्रतिलिपि पर ही आएगी और मेरी कहानी वापसी एक्सक्लूसिवली सिर्फ मेरे ब्लॉग पर आएगी।

    आप सभी से यही निवेदन है कि आप सभी इसी तरह मुझे पढ़ते रहें और अपना स्नेह बरसाते रहे। आप लोगों की समीक्षाओं से रेटिंग से और दिए गए स्टिकर से भी बहुत ज्यादा उत्साह बढ़ता है। और आप लोगों का यह बढ़ाया हुआ उत्साह ही हम लेखकों को लिखने की ताकत देता है। मुझे पढ़ते रहने के लिए दिल से आभार
शुक्रिया
नवाजिश!!!

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aparan…

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

39 विचार “समिधा -41” पर

  1. Seedhe dil mein utar jate hein aapke ek ek shabd… paro or Varun ke beech ye mook bonding kab mukhar ho gyi sab padhte huye bhi kaise samay beet raha dono ka pyara sa rishta madhur se madhrtam ho gya hai..ab baki mahiaon ke liye dono kya kya karte hein unka rishta kya Nye aayam banayega padhne ko aatur hein..

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