समिधा -42

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  समिधा -42

      प्रबोधानन्द को अपने तयशुदा कार्यक्रम के हिसाब से हरिद्वार निकलना था, लेकिन अब उनका मन वहाँ से जाने का ही नही हो रहा था। अमृतानन्द स्वामी के पास से प्रबोधानन्द को बुलाने के लिए बार बार संदेश आ रहे थे लेकिन उसने आखिरकार अपनी बीमारी का बोल कर आने में असमर्थता जता ही दी।

   प्रबोधानन्द फिलहाल यहीं रुकने वाले हैं ये जानने के बाद वरुण तनाव में आ गया था। उसे लगा था एक आध दिन रुक कर प्रबोधानन्द निकल गया तो चिंता ही खत्म, लेकिन अब वो यहाँ रुकने वाला है ये सोचने वाली बात हो गयी थी….

प्रबोधानन्द के दिमाग से पारो के थप्पड़ वाली बात नहीं निकल पा रही थी। और इसीलिए अब उसके मन में पारो को पाने की इच्छा बदले की भावना के साथ मिलकर अधिक प्रबल हो गई थी….
     पारो का थप्पड़ रह रह कर उसे अपमान की आग में झुलसाता जा रहा था और इसी लिए अब उसके दिमाग में हर वक्त पारो से बदला लेने का जुनून , उसका अपमान करने की इच्छा बलवती होती जा रही थी और इसलिए उसने चारु से भी साफ शब्दों में कह दिया था कि वो भी अब कुछ दिन आश्रम में ही रुक जाए।
“चारु आज तो किसी भी कीमत पर वह लड़की हमारे कमरे में होनी चाहिए। समझ रही हो ना?”
   
” हमने तो हमेशा ही आपकी आज्ञा पर उसे आपके पास भेजा है, आप ही का स्वास्थ्य साथ नही देता तो क्या किया जाए। वैसे अभी आपका स्वास्थ्य कैसा है?”

   चारु को मन ही मन प्रबोधानन्द पर गुस्सा आने लगा था। उसे स्वामी जी का किसी के लिए ऐसा पागलपन नही सुहा रहा था। उसके अनुसार प्रबोधानन्द को अपने कार्य पर अधिक ध्यान देना चाहिए ये सब तो बाद कि बातें हैं लेकिन प्रबोधानन्द इन्ही सब व्यसनों में अधिक लिप्त होते जा रहे थे। लिप्त तो वो खुद भी थी, लेकिन हर काम समयानुसार किया करती थी।
    उसे हर काम के लिए एक वक्त और हर वक्त पर वो काम करना पसंद था, और अब प्रबोधानन्द का पागलपन उसका जी का जंजाल बनता जा रहा था।
प्रबोधानन्द की फरमाइशें भी सीमाएं लांघती जा रही थी।
   उन्हें अब हर वक्त पारो अपने सामने चाहिए थी। आश्रम में ऐसे खुल्लमखुल्ला उनकी इक्छाओ की पूर्ति करना मुश्किल था। फिर भी प्रबोधानन्द को नाराज़ करना चारु के बस के बाहर की बात थी और इसलिए वो मजबूरी में उनका हुकुम बजाए जा रही थी…

  ” यही हाल रहा तो किसी दिन ये स्वामी जी भगिनी आश्रम की औरतों से जूते खाते यहाँ से निकाला जाएगा। अरे थोड़ा तो संयम रखो, उस लड़की को देख कर एकदम ही पगला गया है।” मन ही मन सोचती चारु उनके कमरे की ओर बढ़ चली….. सुबह प्रबोधानन्द के बुलाने पर वो जब उनके कमरे में गयी तब फिर एक बार वो शुरू हो गए थे।
” सुनो चारु! आज के हमारे हवन में वो हमारे साथ ही बैठेगी! और बल्कि आज के बाद हमारे हर कार्य में उसे ही हमारे सहयोग के लिए ठीक कर दो। और किसी की अब हमें आवश्यकता नही है। समझ गयीं!” 
    चारु ने मन ही मन अपना माथा पीट लिया। वो कैसे इस ठरकी बाबा को समझाए की ऐसे करने से सारे आश्रम में बातें फैलने लगेंगी लेकिन प्रबोधानन्द भी अपने ही गर्व में चूर था। उसके अनुसार इस आश्रम में उसे रोक टोक सके ऐसा कोई न था।

” जी गुरुवर! हम जा रहे आपकी तैयारियां करने, तब तक आप भी स्नान ध्यान निपटा लीजिये।”
  
   वो उन्हें प्रणाम कर बाहर निकल गयी… पैर पटकती भुनभुनाती वो रसोई की तरफ बढ़ी जा रही थी कि सामने से आता वरुण दिख गया…-“ये एक और ज्ञानी मिल गया। एक वो है जो अपनी ऊटपटांग फरमाइशों से आश्रम में जीने नही दे रहा और एक ये है कृष्ण लीला सुना सुना कर मरने भी नही दे रहा। क्या करें हम ? “

” क्या हुआ चारुलता जी! आप कुछ परेशान लग रही हैं।”
   वरुण के सवाल पर वो धीमे से मुस्कुरा कर भर रह गयी। वरुण का जवाब देने के लिए उसके पास कुछ होता तब तो कहती….
   उसी समय भगिनी आश्रम से निकलती महिलाएं रसोई की ओर बढ़ रही थी, उसने उनमें से ढूंढ कर पारो को आवाज़ लगा दी..
“ओ लड़की इधर आना। ” पारो ने सुनने के बाद भी उधर का रुख नही किया, धीमे से सरिता ने उसके कान में फुसफुसा कर कहा भी ..-“पारो तुझे ही पुकार रहीं हैं। जा सुन ले।”
” मैं ओ लड़की नही हूँ सरु ! जब तक मेरा नाम नही लेंगी मैं नही सुनूँगी।”
   
“अरे ओ सुन क्यों नही रही… क्या नाम है तुम्हारा?”
  चारु को पारो का नाम अच्छे से याद था पर अपने स्वभाव के कड़वेपन के कारण उसे हर किसी को जलील करने में ही सुख मिलता था… और इसलिए वो उसे ऐसे बुला रही थी पर उसे भी नही पता था कि उसका पाला किससे पड़ा था। पारो बिना सुने रसोई की तरफ मुड़ गयी, सरिता बार बार डर के मारे उसे कोहनी मारती रही…. लेकिन पारो ने एक बार भी मुड़ कर चारु की तरफ नही देखा, आखिर थक कर चारु ने उसका नाम पुकार लिया…-” अरे ओ पारोमिता तुम्हे ही बुला रहें हैं । ज़रा यहाँ आना!”

  अब पारो के कदम ठिठक कर रुक गए और वो मुड़ कर चारु तक चली आयी..-“पहले हमारी आवाज़ सुनाई नही दी थी क्या?”

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“आवाज़ तो सुनाई दे रही थी पर समझ नही आया था कि आप मुझे बुला रहीं है।”

  पारो ने हाथो से ही चारु और वरुण को प्रणाम किया। वरुण तो उसे ही देख रहा था, पारो का जवाब सुन उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिल उठी।

” अभी प्रबोधानन्द स्वामी हवन करेंगे और उसके बाद उनका उद्गार होगा। इन दोनों मौकों पर तुम्हें उनके साथ ही बने रहना है। स्वामी जी का आदेश है!”

“क्षमा करें चारु दीदी। पर आज मैं हवन में नही बैठ पाऊँगी!”

“लेकिन क्यों?”

    पारो ने एक नज़र वरुण पर डाली और वापस चारु की ओर मुड़ गयी…” अभी तीन दिन मैं मंदिर नही जा सकती, अशुद्ध हूँ।  आप समझ रहीं हैं ना!”

” ओह्ह अच्छा! फिर ऐसा करना जब वो हवन निपटा कर अपने कक्ष में जाएं तब उनका जलपान लेकर उनके कमरे में पहुंचा देना।”

  बिना कोई जवाब दिए पारो नीचे देखती खड़ी रही और चारु अपनी चप्पल फटकाती वहाँ से निकल गयी।

   वरुण ने पारो की ओर देखा, पारो ने आंखें उठाई और उसकी आंखें मुस्कुराने लगी।
“आपके व्याख्यान के लिए सारी तैयारी कर दी है। आपकी पुस्तिका आपकी कलम और हल्का गुनगुना पानी, सब कुछ आपके आसन के पास रख आयीं हूँ। पानी अभी कुछ ज्यादा गर्म है पर जब तक आपके बोलने का समय होगा तब तक सही तापमान में रहेगा,आपके पीने लायक हो जाएगा।”
    वरुण की आंखों में प्रश्नचिन्ह था कि अभी अभी हवन में न बैठ पाने का कारण उसकी प्रवचन सामग्री की तैयारियों में बाधक क्यों नही बना?

  वरुण की आंखों का सवाल पारो समझ गयी….. पारो ने एक पल को पलकें झपकी और वापस वरुण को देख मुस्कुरा उठी…-“चारु दीदी से झूठ कहा मैंने। मुझे उस पाखण्डिनंद के साथ किसी हवन में नही बैठना, और इसके लिए चाहे मुझे झूठ बोलना पड़े या और कोई उपाय करना पड़े पर मुझे ये गलत नही लगता। हो सकता है आपकी नज़र में मैं गलत हों लेकिन मुझे उस आदमी के सामने भी जाने से घिन आ रही है।”

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  वरुण के चेहरे पर भी एक अलग सी मुस्कान रेंग गयी…-“ठीक है, ठीक है। अभी शांत हो जाओ। अधिक उत्तेजना में ज़ोर से न कह जाना अपनी बात। वैसे तुम्हारी बात सत्य है कृष्ण भी तो यही कहतें हैं… की परपीड़क को मारने के लिए जो झूठ छल प्रयोग किया जाता है वो पाप नही पुण्य है। तुम्हारे इस झूठ का कोई दोष तुम पर नही आएगा पारो।”

” मैं पाप पुण्य नही मानती। मरने के बाद कहाँ जाऊंगी क्या करूँगी किसे पता है। मरने के बाद मेरे अच्छे कर्मों का लेखा जोखा जिसे आप पाप पुण्य में बांधते है मुझे मिलेगा भी की नही मैं क्या जानूं?
   मेरे हृदय को जो सत्य और सही लगता है वही मेरे लिए पुण्य है और जो गलत लगता है वो पाप। उस पाखंडी से छुटकारा पाने अगर मुझे उसे मारना भी पड़ गया तो ये मेरे लिए पुण्य ही होगा।”

“हम्म सही कह रही हो। अभी उनका हवन चलेगा और उस समय से मेरा आख्यान होने में लगभग बीस मिनट का समय रहेगा। तुम ऐसा करो पीछे सरोवर के पास सुनीता और एक आध वो लड़कियां जो प्रबोधानन्द का शिकार बन चुकी हैं को लेकर आओ। तुरंत!!
   मैं प्रशांत को लेकर वहीं पहुंच रहा हूँ।”

“क्या करने वाले हैं आप?”

“अभी अभी तुमने ही तो उपाय बताया है। बस वही करना है।”

” मैंने क्या उपाय बताया?”पारो आश्चर्य से वरुण को देखने लगी..

“सरोवर तक सबको लेकर तो आओ। फिर सभी के सामने बताता हूँ कि हमें आगे क्या करना है।इस प्रबोधानन्द को तो इसी के जाल में फांसना होगा वरना
इसके अत्याचारों पर कोई विराम नही लगेगा। और उसे हमें रँगे हाथों पकड़ना है। इसलिए सुनीता जैसी और भी कोई उसकी सताई औरतें हो तो उन्हें भी ले आना लेकिन सुनो पारो ज्यादा औरतों को इस बारे में मालूम न हो तो अच्छा है। मुझे लगता है आश्रम में कुछ चारुलता की औरतें भी तुम सब के बीच घुली मिली हैं जिससे आश्रम की हर खबर उस तक पहुंचती रहे। इसलिए ज़रा होशियार रहना। “

   हॉं में सिर हिला कर पारो वहाँ से रसोई की ओर मुड़ गयी।
     हवन शुरू हो चुका था इसलिए उन लोगों के पास ज्यादा वक्त नही बचा था।
   पारो ने जाकर सुनीता से बात की और सुनीता तुरंत अपने साथ कि एक और लड़की कावेरी को ले आयी।कावेरी उन लोगों से उम्र में कुछ ज्यादा बड़ी थी लेकिन उम्र बढ़ जाने पर भी उसकी सुंदरता म्लान नही हुई थी।
     पारो ने पिछली रात ही सुनीता को ये बात बता दी थी कि उसने वरुण से उसकी समस्या का ज़िक्र किया है और वो उन सभी को इस दलदल से निकालने के लिए प्रयासरत है।

   ****

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  मंदिर में पूजा अर्चना के बाद हवन प्रारम्भ हो चुका था। प्रबोधानन्द ने हवन में पारो को न देख चारुलता से उसके बारे में पूछने के लिए चारुलता को ढूंढना शुरू किया। लेकिन उनकी सवालिया नज़रों से बचने के लिए चारुलता खुद हवन में उपस्थित ही नही हुई।
    गुस्से में खीझते प्रबोधानन्द हवन करते रहे। उन्हें उम्मीद थी कि हवन के बाद कमरे में शायद चारु पारो को भेज दे।
         

    वो अपनी हवन वेदी में अकेले ही बैठे थे। उनका स्थान भी सामान्य लोगों से ज़रा ऊंचाई पर बना था। बाकी सभी आचार्य अपनी अपनी वेदियों में आंखें बंद किये बैठे ध्यानमग्न मंत्रोच्चार कर रहे थे…
    उसी समय प्रशांत सरोवर के पास से तेज़ कदमो से मंडप की ओर चला आया।
   उसे पता था मंडप में बैठे दस के दस आचार्य इस वक्त आंखें बंद किये बैठे होंगे। वो चुपके से प्रबोधानन्द के पीछे चला आया। उसने अपने हाथ में कुछ छिपा रखा था , उसे जला कर उसने धीमे से प्रबोधानन्द के पीछे से सामने की ओर सरका दिया और खुद उनके सामने तरफ आकर उनके घृत पात्र को भरने लगा। प्रबोधानन्द ने हलचल की आवाज़ सुन ऑंखे खोल दी। प्रशांत ने उनके सामने ही उनके घृत पात्र को भरा और पास ही रखी हवन सामग्री में घी डालने लगा कि प्रबोधानन्द की नज़र हवन कुंड के दूसरी तरफ बैठी कावेरी पर चली गयी। बाल खोले, आंखों में प्रगाढ़ अंजन लगाए कावेरी उस समय ऐसी लग रही थी जैसे कितना रो कर आई है। उन्होंने उसे देखा और प्रशांत की तरफ देखने लगे,पर प्रशांत चुपचाप अपना काम करने में लगा था।
   उन्हें एकाएक अपनी आंखों पर विश्वास नही हुआ और उन्होंने वहीं हाथ पोंछने के लिए रखे मलमल से अपनी आंखें साफ की और फिर सामने देखा लेकिन अब वहां कोई नही था, न कावेरी और न प्रशांत!!

   वो एक बार फिर ध्यान लगाने की कोशिश करते हवन में समिधा को सही ढंग से संजोते उस पर घी की धार बहाने लगे….

क्रमशः

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

19 विचार “समिधा -42” पर

  1. सही कहा पारो ने जो सत्य हो और अपने को सही लगे, वो पुण्य और जो मन को गलत लगे वो पाप।
    इस पाखंडी स्वामी जी की तो वरूण सही बैंड बजाएगा। चारुलता का कहना सच ही हो जाए और ये स्वामी आश्रम की सभी महिलाओं से जुते खाकर ही जाए।

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