समिधा – 43

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समिधा – 43

        हवन समाप्त होते तक में प्रबोधआनंद थोड़ी थकान महसूस करने लगे थे।
    हवन के पूरे होते ही, वह वहाँ से उठ गए और अपने कमरे की ओर जाने लगे… वहां बैठे आचार्यों ने उनसे आरती करने के लिए विनम्र अनुरोध भी किया, लेकिन उन्होंने तबीयत सही नहीं लगने का बहाना कर अपने कमरे की ओर रुख कर लिया….

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    सुबह तक वो भले चंगे थे , यहाँ तक कि पूजा पाठ निपटा कर जब हवन में बैठे तब भी ठीक थे फिर हवन के बीच अचानक न जाने क्या हुआ कि उन्हें हल्की घबराहट सी लगने लगी। वो तो हवन बीच में छोड़ा नही जा सकता था वरना वो हवन छोड़ ही कमरे में चले जाते।
     उनके वहां से जाते ही हवन पूजन होने के बाद रोज की तरह वरुण अपने प्रवचन के लिए अपनी जगह पर आ बैठा।
   अपने आसन पर बैठते हैं उसकी नजर सामने पाटे पर रखी पुस्तिका और कलम पर पड़ी और उसे एकदम से पारो का चेहरा याद आ गया।
    वरुण के ठीक बगल में बायीं ओर गुनगुने पानी का कलश रखा था। और कलश से लगा हुआ एक छोटा सा चांदी का गिलास रखा था। इन सभी छोटी छोटी चीजों में आज उसे पारो नजर आ रही थी… मुस्कुराकर उसने आज की कथा कहनी प्रारंभ की…..
    
        वरुण के कथा समाप्त करने के बाद भगिनी आश्रम की वह महिलाएं जो वहां रोज बैठकर भजन गाती थी ने हारमोनियम संभाला और ढोलक बजाते हुए भजन गाने लगी….

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     सांवरी सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया।

एक तो तेरे नैन तिरछे, दूसरा काजल लगा ।
तीसरा नज़रें मिलाना, दिल दीवाना हो गया ॥

एक तो तेरे होंठ पतले, दूसरा लाली लगी ।
तीसरा तेरा मुस्कुराना, दिल दीवाना हो गया ॥

     एक तो तेरे साथ राधा, दूसरा रुक्मणि खड़ी ।
     तीसरा मीरा का आना, दिल दीवाना हो गया ॥

    भजन समाप्त होते तक में आश्रम में भोजन का समय हो गया था।
   सबका भोजन आदि निपटा कर दोपहर में एक बार फिर सरोवर पर वरुण प्रशांत पारो सुनीता और कावेरी एक साथ थे।
   आज रात के लिए जो भी उनकी तैयारी थी वह सब लगभग पूरी हो चुकी थी। कोई एक सामान वरुण ने बाहर से मंगाया था जो शाम तक मिल जाने की संभावना थी।
   सारी बातें सब को अच्छे से समझा देने के बाद वरुण ने सभी को जाकर आराम करने कह दिया…..  और खुद वही सरोवर की सीढ़ियों पर बैठ गया। प्रशांत ने उसे साथ चलने के लिए पूछा भी…-” नहीं प्रशांत मैं थोड़ी देर शांति से यहां बैठना चाहता हूं! बस थोड़ी देर में आ जाऊंगा।

” ठीक है जैसा ठीक समझो, पर आ जरूर जाना। इतनी देर तक और इतना लंबा प्रवचन देने के बाद तुम्हें भी थोड़े आराम की जरूरत है वरुण।”

  वरुण के “हां” में सर हिलाते ही प्रशांत सुनीता कावेरी के साथ ही पारो भी वहां से निकल गई… लेकिन वरुण को वहां अकेले छोड़ पारो का मन कहां लगता?
    अपने कमरे में जाने के बाद वो एक बार फिर धीमे कदमों से वापस लौट आई…-” क्या मैं भी यहां बैठ सकती हूं? आपके एकांत में मेरे आ जाने से कोई विघ्न तो नहीं पड़ेगा?”

वरुण ने पारो की आवाज सुनी और चौक कर पीछे देखा…. वह सामने हाथ बांधे ख़ड़ी मुस्कुरा रही थी… वरुण ने भी इशारे से मुस्कुरा कर सिर हिला दिया और वह आकर उसके कुछ सीढियां नीचे की सीढ़ियों पर बैठ गई…

” आज भी तो प्रबोधानंद के लिए भोजन लेकर जाने का जिम्मा तुम्हारे हिस्से था ना?  गई थी क्या उनके कमरे में?”

पारो को जाने कैसे लेकिन यह समझ आ गया कि वरुण को शायद यही बात मन ही मन मथ रही थी कि सुबह से उसे पारो कहीं दिखाई नहीं दी थी और उसने यह सोच लिया था कि प्रबोधानंद की जिद को पूरा करने हो सकता है पारो को उसके कमरे में चारु ने भेज दिया हो।

“आपको क्या लगता है? मैं गई थी या नहीं? “

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   पारो के इस गोलमोल जवाब से वरुण चिढ़ गया।

“अब ये मुझे क्या पता? मैं कोई अंतर्यामी तो हूँ नही। और तुम इस तरह पहेलियां बुझाने से अच्छा है सीधे शब्दों में मेरे सवाल का जवाब दे दो।”

अब भी वरुण के समझ से बाहर था कि आखिर क्यों वह इतने हक से पारो को डांट लिया करता था।
  आज प्रवचन के पहले मिलने के बाद से उसने पारो को अब तक नहीं देखा था। लगभग यह दो-तीन घंटे का समय यूं ही बीत गया था…
   और उसके लिए पारो को यह बताना बहुत कठिन हो रहा था कि इन दो तीन घंटों में पारो को देखे बिना उसका जी कैसे कसमसा कर रह गया था.. ..
  
     उसका ध्यान बार-बार प्रबोधानंद के कक्ष की तरफ चला जा रहा था कि, कहीं उसने पारो को बुलाकर वापस कोई बदतमीजी तो नहीं कर दी । हालांकि पारो का पिछला व्यवहार देखकर वह थोड़ा बहुत तो आश्वस्त हो गया था कि अब प्रबोधानंद इतनी आसानी से पारो पर हाथ नहीं डाल सकता। लेकिन फिर भी आखिर मन ही तो था जो पारो के लिए बेचैन हुआ जा रहा था।
   और वह अपने मन में चलती इस उलझन का कोई ओरछोर नहीं पा रहा था।

   ऐसी बेचैनी तो उसे कभी कादंबरी के लिए भी नहीं हुई थी। उस समय भी नहीं जब नई-नई सगाई के बाद वह कादंबरी को पहली बार इंडिया अकेले छोड़कर अमेरिका जा रहा था …..
        फिर इस लड़की में ऐसी क्या बात थी कि जो इसकी तरफ देखते ही उसके ह्रदय में ममता का सागर उमड़ पड़ता था। हमेशा ऐसा लगता था कि इस लड़की को अपने सीने से लगाए इस सारे संसार से छुपा कर कहीं दूर ले जाए। और लेकिन उसी पल उसका खुद का दिमाग उसके मन पर कोड़े बरसाने लगता था, कि वह यहां सब कुछ छोड़ कर सांसारिक वृत्तियों को छोड़कर वैराग्य लेने आया हुआ है… और ऐसे में उसके मन में एक पराई औरत के लिए ऐसे भाव आना सही नही है।

   “नहीं!!! मैं आज अभी तक प्रबोधानंद के कमरे में नहीं गई हूं! उन्होंने खुद ही चारु दीदी से संदेश भेज दिया था कि, आज वह पूरे दिन आराम करना चाहते हैं और उनके कमरे में कोई भी नहीं आएगा।
  उन्होंने खुद ही कह रखा है कि वह शाम को ही अपने कक्ष से बाहर आएंगे और रात का भोजन मेरे हाथ से भेजने के लिए कहलवा दिया है।”

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” बहुत अच्छे!!! सुबह कुछ भी नहीं खाया इसका मतलब हमारी सुबह वाली तरकीब काम कर रही है… और अच्छा है उनका दिन भर खाली पेट रहकर रात में ही सीधे भोजन करना भी हमारे फायदे की ही बात है।
  तुमने सुनीता और कावेरी को सब कुछ ठीक से समझा दिया है ना। “

” हां मैंने तो समझा ही दिया है, लेकिन आपने भी इतनी बार उन लोगों को समझाया है कि अब हम में से कोई भी कुछ नहीं भूल सकता। “

   पारो के मुस्कुराकर कहने पर भी वरुण के चेहरे पर कठोरता वाले भाव बने रहे। वह बेचारा अपने आप में परेशान था। वह एक युद्ध अगर प्रबोधानंद के खिलाफ लड़ रहा था, तो दूसरा युद्ध अपने खुद के मन के खिलाफ लड़ रहा था।
     उसे अपने मन को, अपनी आत्मा को पारो से विमुख करना था।  लेकिन कितनी भी कोशिश कर ले वह बार-बार पारो की तरफ फिसलता चला जा रहा था।

   “रुकिए जरा एक मिनट, इधर झुकिए मेरी तरफ!”

वरुण को एकाएक पारो की बात समझ नहीं आई वह इधर-उधर देखने लगा कि पारो खुद दो सीढ़ियां ऊपर चढ़कर वरुण के कंधे तक पहुंची और हाथ बढ़ाकर उसके कान के ऊपर पेड़ से लटकती मकड़ी को उसके जाल के साथ हटाकर एक तरफ फेंक दिया।
    मकड़ी हटा देने के बाद भी पेड़ से कुछ घास फूस जो गिरकर वरुण के बालों में अटकी थी पारो उन्हें वहां से हटाने लगी। अनजाने ही पारो की कोमल उंगलियां वरुण के कानो और उसके आसपास की त्वचा से होते हुए बालों पर फिरती रही और वरुण की धड़कने बढ़ाती रही।
   वरुण को उस वक़्त यही लग रहा था कि यह पल यही ठहर जाए…
     वो  इसी तरह सीढ़ियों पर बैठा रहे और उसके बालों में पारो की उंगलियां यूं ही फिरती रहे… उसे एक पल को लगा कि काश वो पारो की गोद में सर रखकर अपनी सारी चिंताओं से मुक्ति पा लें….
     लेकिन तभी उसकी आंखें झटके से खुल गई और उसने पारो का हाथ जोड़ से झटक दिया…

” यह क्या कर रही हो?  अपनी सीमाओं को समझो?”

  ” क्यों?अपनी सीमाओं से परे जाकर मैंने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया? जो आप इतने गुस्से में आ गए? “

वरुण की समझ से बाहर था कि वह पारो को कैसे बताएं, कैसे समझाए कि जब जब पारो की उंगलियां गलती से भी उसे छू जाती हैं तो उसके मन में कैसी अदम्य लालसा जागने लगती है, उसे पाने की।  जिन लालसाओं, कामनाओं को वह छोड़ कर अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहता है…. वही कामनाएं अपना सर उठाने लगती हैं।
   
” कुछ नहीं …तुम नहीं समझोगी।  अब जाओ तुम भी थोड़ी देर आराम कर लो आज रात में हो सकता है रात भर जागना पड़ जाए। “

  वरुण को भर नजर घूर कर पारो ने हां में सर हिलाया और धीमे कदमों से सीढ़ियां चढ़कर अपने भगिनी आश्रम की तरफ मुड़ गई।

    शाम के समय भगिनी आश्रम की महिलाएं एक साथ चाय  पिया करती थी… पर आज पारो सुनीता और कावेरी अपनी चाय लिए ऊपर चले आए।
    खिड़की के पास बैठी  पारो की आंखें खिड़की से बाहर ही लगी हुई थी… बार-बार बाहर देखती जैसे वह किसी को ढूंढ रही थी ….सुनीता और कावेरी आपस में बातें कर रही थी लेकिन सुनीता का ध्यान पारो पर ही था…

” क्या हुआ पारो किसे ढूंढ रही हो?

” नहीं किसी को भी तो नहीं।” पारो के चेहरे पर बिल्कुल ऐसे भाव चले आए जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो कि तभी सीढ़ियों पर से ऊपर चढ़कर सरिता भी अपनी चाय लिए उन लोगों के पास चली गई…

” तुझे नई सखियां क्या मिली अपनी पुरानी सखी को इतनी जल्दी भूल गई।

सरिता के मीठे से उलाहने पर पारो ने आगे बढ़कर उसके गले में अपनी  गलबहिया डाल दी और उसके कंधे पर अपना सर रखें मुस्कुराने लगी…

” तुझे कैसे भूल सकती हूं?  तू ही तो है जो उस समय मेरे साथ थी जब मेरी मां ने भी मेरा साथ नहीं दिया!  आश्रम के शुरुआती दिन कितने कठिन थे मेरे लिए और तूने हर मोड़ पर, हर रास्ते पर मेरा साथ दिया है। तुझे तो मैं अपनी अंतिम सांस तक भी नहीं भूल सकती। “

“चल चल बातें मत बना!! बल्कि यह बताओ कि तुम तीनों मिलकर क्या खिचड़ी पका रहे हो? आज दोपहर के भोजन के बाद भी तुम तीनों अचानक ही गायब हो गए थे। ?
  दोपहर भोजन के बाद जब आश्रम की सभी बहने अपनी-अपनी जगह पर आराम कर रही थी तब चारु दीदी दो घड़ी के लिए ऊपर हमारे इस कमरे में भी आई थी। तुम तीनों के ही पलंग खाली देखकर उन्होंने मुझसे ही सवाल किया… और वह भी तेरा नाम लेकर पूछा था कि पारोमिता कहां गई?”

“फिर तूने क्या कहा?”

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“कुछ नहीं, बस मैंने कह दिया कि गौशाला में एक गौमाता जरा अस्वस्थ हैं । उनके पैर में थोड़ी चोट लग गई है उन्हें ही तेल हल्दी लगाने गई होगी। कभी उसे  डॉक्टर बनने का भूत सवार था न!”

“हमें बचा लिया तूने।”

“अब मुझे भी बचाओ! मेरा भी उद्धार करो! और मुझे भी बताओ कि यह क्या चल रहा है तुम तीनों के बीच।”

“कल सुबह तुझे सब कुछ पता चल जाएगा बहन…. बस तब तक थोड़ा सा धैर्य रख ले। “

“चल ठीक है तेरी बात मान कर मैं धैर्य ही रख लेती हूं पर और क्या-क्या रखने के लिए देगी मुझे? “

  उन चारों की बातों के बीच में कब शाम ढल गई उन्हें पता ही नहीं चला!  शाम की आरती भजन पूजन के बाद भोजन भी निपट गया।
  

      रात्रि भोजन के समय भी चारु ने जब प्रबोधनंद से खाने के लिए पूछा तो उन्होंने उस वक्त भूख नहीं होने की बात कह दी। और कहा कि वह बाद में भोजन करेंगे, पहले वह आश्रम के बाकी लोगों का भोजन निपटा लें।
   सब कुछ हो जाने के बाद चारु लता ने पारो को बुलाया और उसके हाथ में स्वामी जी की भोजन की थाली पकड़ा दी। उस थाली पर ऊपर से एक रेशमी कपड़ा भी ढक दिया… पारो उस थाली को लेकर स्वामी जी के कमरे की तरफ बढ़ चली..

   आश्रम के नियम भी अनोखे हैं! हम सभी के लिए लौकी तोरी टिंड़े कद्दू के अलावा कुछ नहीं बनता, क्योंकि अगर हम तामसिक भोजन खाएंगे तो हमारे मन में तामसिक विचार आएंगे… तो यह प्रबोधानन्द ढोंगी के लिए इतने छप्पन भोग बनाने की क्या जरूरत है ? सबसे ज्यादा तो इसे ही अपने मन को बांध कर रखने की जरूरत है।

  मन ही मन विचार करती पारो आश्रम वाटिका के बीचो बीच अकेले बने प्रबोधानंद के कक्ष के सामने खड़ी थी!  चारु लता वहां तक साथ आई थी उसके बाद उसने पारो से सवाल किया…-” मैं भी अंदर चलूं या तुम..

उनकी बात आधे में ही काट पारो ने हड़बड़ा कर तुरंत ही कह दिया…-” नहीं मैं संभाल लूंगी!! आप जाइए! आप भी दिनभर आश्रम में व्यस्त थी… आप भी थक गई होंगी , चारु दीदी!!”

  पारो के मुंह से इतनी समझदारी वाली बातें सुन चारु को थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन उसे लगा कि हो सकता है प्रबोधानंद के व्यक्तित्व का जादू शायद इस लड़की पर भी चल गया हो… थकान के कारण बहुत ज्यादा सोचने का उनका कुछ मन भी नहीं था।  वह मुंह फेर कर भगिनी आश्रम में बने अपने कमरे की तरफ आगे बढ़ गई।
      उनके वहां से जाते हैं पारो ने चैन की सांस ली, और दरवाज़े की ओर बढ़ गयी।  क्योंकि उसे पता था दरवाजे के भीतर शयन कक्ष के पहले बने गलियारे में उसके साथी उसका इंतजार कर रहे थे……

क्रमशः

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aparna….

दिल से……

    
     वैसे तो आप सभी जानते हैं कि फिल्मी गानों का और मेरी कहानियों का रिश्ता पुराना है… गाने बस मधुर होने चाहिए , चाहे वह मेरी पैदाइश के पहले के भी क्यों ना हो। पर अगर गाना सुंदर है मधुर है तो मुझे पसंद जरूर आता है। ऐसे ही कुछ भजन भी बहुत अच्छे लगते हैं। मैंने हमेशा अपनी कहानियों में कहीं ना कहीं जगह बनाकर फिल्मी गाने घुसाए हैं, हालांकि साहित्य की दृष्टि से एक अच्छे साहित्य उपन्यास में फिल्मी गाने नहीं होने चाहिए।

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     मुझे एक बार हमारी प्रतिलिपि के ही सुविख्यात साहित्यकार स्वर्गीय श्री कुसुमाकर सर ने गाने लिखने पर टोका भी था…. उन्होंने कहा था कि गाने उपन्यास की सुंदरता को समाप्त कर देते हैं!
      और उसके बाद से मैंने फिल्मी गाने कहानियों में डालना बंद कर दिया। शायद आप लोगों ने भी नोटिस किया होगा कि जीवनसाथी में कुछ भागों में फिल्मी गाने थे लेकिन बाद के भागों में मैंने गाने डालने बंद कर दिए।
    खैर मैं गाने डालती भी थी तो सिर्फ 2 पंक्तियां लिखती थी जिससे शब्द सीमा भी कम रहें, और जरूरत के मुताबिक मैं जो भाव फिल्मी गानों से प्रस्तुत करना चाहती हूं वह भी पाठकों तक पहुंच जाए। वैसे ही आज इस भजन को कहानी के इस भाग में लिखा है।
   शुरू में इस भजन की सिर्फ दो पंक्तियां ही लिखी थी लेकिन सच कहूं तो यह भजन मुझे इतना पसंद है , कि मैं अपने आप को रोक नहीं पाई और तीन अंतरे लिख दिए।

     कभी फुर्सत में हों तो इस भजन को गूगल करके सुनिएगा जरूर…. बहुत मीठा भजन है।

  जय श्री राधे राधे….

  पढ़ते रहिए ….. आप लोगों का मुझे यूं पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है…

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aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

18 विचार “समिधा – 43” पर

  1. हर भाग के साथ कहानी बहुत अच्छे से आगे बढ़ रही है स्वामी जी का सच कैसे बाहर आता है देखना दिलचस्प होगा एक बार देव के घर वालों को भी एहसास होना जरूरी है कि उन्होंने पारो के साथ कितना गलत किया है

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