समिधा-44

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  समिधा -44

उनके वहां से जाते हैं पारो ने चैन की सांस ली, और दरवाज़े की ओर बढ़ गयी।  क्योंकि उसे पता था दरवाजे के भीतर शयन कक्ष के पहले बने गलियारे में उसके साथी उसका इंतजार कर रहे थे……

   दरवाजे को धीरे से खोलकर पारो अंदर चली आई। अंदर आते ही उसकी नजर वरुण और सुनीता पर पड़ी वो लोग दीवार से लगे एक तरफ चुपचाप सांस रोके खड़े थे। उन दोनों पर नजर पड़ते ही पारो के चेहरे पर मुस्कान चली आयी।
    वरुण ने उसे जल्दी से भीतर आने का इशारा किया और अपने होठों पर उंगली रख कर चुप रहने का भी। पारो ने हाँ में सिर हिलाते हुए अंदर प्रवेश करने के बाद अपने हाथ की थाली एक हाथ में पकड़ी और मुड़कर दरवाजा बंद करने लगी।
      दरवाजा बंद करते समय ही उसकी नजर वहां से जाती हुई चारु पर पड़ी और राहत की सांस लेकर पारो ने दरवाजा बंद कर दिया।
    दरवाजा जरा जोर से ही पारो ने बंद किया था… इस खटके की आवाज को अंदर लेटे हुए स्वामी जी ने भी सुन लिया उन्होंने तुरंत अंदर से आवाज लगा दी

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“कौन है वहां?”

“स्वामी जी!! मैं हूं पारोमिता!”

“अच्छा आ जाओ, भीतर आ जाओ।”

“जी स्वामी जी अभी आई।”

एक बार वरुण की तरफ देखकर वह अंदर दाखिल हो गई।
    उसके अंदर प्रवेश करने से पहले ही वरुण ने अपने पास छुपा कर रखी एक पुड़िया खोल कर स्वामी जी की खीर की कटोरी में कुछ मिला दिया।
   धीमे कदमों से थाली लिए पारो स्वामी जी के सामने पहुंच गई …स्वामी जी की आंखों में अब भी सुबह का खुमार नजर आ रहा था। पारो ने उन्हें गहरी नजरों से देखते हुए उनसे पूछ लिया…-” अब कैसी तबीयत है आपकी?”

  पारो को ऐसे खुद की तरफ देखते देख कर प्रबोधानन्द के चेहरे पर भी मुस्कान चली आई।

” सुबह से अभी ठीक महसूस कर रहा हूं। अब थोड़ी-थोड़ी भूख लगनी भी शुरू हो गई है। पता नहीं सुबह अचानक ऐसा क्या हुआ था, कि आंखों में जरा धुंधला धुंधला दिखने लगा और सिर भारी हो रहा था। उसके बाद कुछ भी खाने पीने का मन ही नहीं कर रहा था।”

“अभी तो साफ साफ दिखाई दे रहा है ना?”

आंखों में धुंधलेपन की समस्या प्रबोधानंद को अब भी हो रही थी… लेकिन जाने क्यों उसने उसे झूठ ही कह दिया…-” हां!! अभी तो साफ साफ दिख रहा है।

   पारो ने मुस्कुराकर प्रबोधानंद के पलंग के एक तरफ बैठने के लिए रखी कुर्सियों के सामने टेबल पर उसकी थाली रख दी…-” आप इधर आ जाइए और खाना खा लीजिए।”

  प्रबोधानंद का तो अपने पलंग से उठने का बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा था… जाने सुबह से शरीर क्यों ऐसे टूट रहा था? लेकिन फिर भी पलंग पर बैठ कर खा तो नहीं सकते थे, इसलिए उठ कर उन्हें कुर्सी तक जाना ही पड़ा …उनकी कुर्सी के ठीक पीछे खिड़की खुलती थी।
     खिड़की के पीछे प्रशांत छिपकर खड़ा था। उसने एक बार फिर अपने आसपास यह देखकर कि कोई भी नहीं है, सुबह वाली धूप जलाकर खिड़की से जरा अंदर की तरफ सरका दी… उसका धुँआ धीरे-धीरे प्रबोधआनंद के चारों तरफ फैलने लगा…
  ” मैं आपके लिए हल्का गुनगुना पानी लेकर आती हूं।”

   यह बोलकर पारो उनके सामने से हटकर एक तरफ जाने लग गई…. प्रबोधानंद ने उसे रोकना चाहा लेकिन एक बार फिर उन्हें थोड़ा अजीब सा महसूस होने लगा। आंखें वापस थोड़ी सी भारी होने लगी, और ऐसा लगा जैसे उन्हें देखने में कुछ कष्ट सा हो रहा है। उन्होंने अपनी आंखें मली और जैसे ही उन्होंने अपनी आंखें खोली सामने सुनीता बैठी थी…

” इतनी जल्दी आप हमें भूल गए स्वामी जी? कितने बड़े-बड़े वादे किए थे आपने हमसे, कि हमें अपने साथ विदेशों की सैर करवाएंगे….. बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घुमाएंगे,  खूब सारे नए कपड़े दिलवाएंगे । आश्रम में हमें अलग से कमरा दिलवा देँगे।  अपने तो इसमें से  कुछ नहीं दिलवाया बल्कि आपके जाने के बाद हमे जो मिला वह तो और भी बुरा था।”

” तुम हमारे कमरे में कैसे आ गयी? जाओ यहां से, हम तुमसे बाद में बात करेंगे।”

” ऐसे कैसे चले जाए?  पहले हमारा चेहरा तो देख लीजिए… हमने तो अपना चेहरा आधा ढक रखा है। आपने हमें पहचाना कहां होगा? आपके लिए तो हम और हमारी जैसी लड़कियां तितली की तरह है , बस एक बार अपनी उंगली से पकड़ा और जैसे ही हमारा रंग आपकी उंगलियों में छूटा आप हमें छोड़ कर उड़ जाते हैं। “

” यह सब क्या बक रही हो?  तुम हो कौन?”

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और सरिता ने अपने चेहरे से अपने आंचल को हटा दिया… अब तक उसकी सिर्फ आंखें ही नजर आ रही थी उसका चेहरा देखते ही प्रबोधानंद चौक कर जरा पीछे की ओर सरक गया।
  उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि आप तक उसने आश्रम की लड़कियों को इस कदर डरा कर रखा था कि किसी की हिम्मत उसकी अनुमति के बिना उसके कमरे में प्रवेश करने की नहीं हुई थी। यह लड़की आज अचानक बिना उससे अनुमति लिए ऐसे कैसे चली आई… यही उनके लिए बहुत बड़ी बात थी?  आंखों के धुंधलेपन से परेशान उन्होंने अपनी आंखों को एक बार मलकर वापस खोला तो सामने पारो खड़ी थी….

” स्वामी जी यह आपका पानी हल्का सा गर्म है….. संभल के पीजियेगा कहीं मुहँ ना जल जाए। “

स्वामी जी आश्चर्य से चारों तरफ देखने लगे। क्योंकि अब उन्हें सुनीता कहीं नजर नहीं आ रही थी । उन्होंने एक बार फिर अपनी आंखें साफ की और पारो को देखने लगे…-” पारोमिता क्या  इस कमरे में और कोई भी लड़की है? क्या तुमने किसी को भी देखा है?”

  “ना” में सिर हिला कर पारो गुमसुम सी खड़ी रही….-” मैंने तो किसी को नहीं देखा स्वामी जी!! इस कमरे में तो सिर्फ मैं ही हूं। आप भोजन तो शुरू कीजिए। आज आपने सुबह से कुछ भी नहीं खाया ऐसे में तो कमजोर हो जाएंगे आप?”

“आज अचानक तुम्हें हमारी चिंता क्यों होने लगी? कल तो बहुत जोर का थप्पड़ मार कर गई थी?”

“चिंता तो मुझे आज भी आपकी नहीं हो रही है, लेकिन क्योंकि आप इस आश्रम का एक हिस्सा है और मैं भी इस आश्रम की सदस्य हूं , तो मेरा फर्ज बनता है कि आप के खान-पान का ध्यान रखूं।”

“अकड़ बहुत ज्यादा है तुममें लड़की?”

“जानती हूं स्वामी जी!! शायद परिस्थितियों ने मुझे ऐसा बना दिया है।”

“हम कह तो रहे हैं कि हम तुम्हारी परिस्थितियां बदल देंगे। तुम्हें वह सारी सुख सुविधाएं मिलेंगी, जो तुम जैसी लड़की को मिलनी चाहिए। तुम जानती भी हो कि तुम कितनी सुंदर हो। और तुम अपने इस रूप को भुनाकर कितना कुछ पा सकती हो। इस संसार में हर एक वस्तु की एक कीमत होती है, तुम भी बहुत सुंदर हो अगर तुम हमारी बात मान जाओ तो हम तुम्हें कहां से कहां पहुंचा देंगे तुम सोच भी नहीं सकती…

  स्वामी जी अपनी लय में कहते चले जा रहे थे कि तभी पारो के ठीक पीछे से कावेरी सामने चली आई…

” जैसे आपने मुझे पहुंचाया….?  आज से  पांच साल पहले यही शब्द आपने मुझसे कहे थे । याद है, स्वामी जी? तब मैं भी आश्रम में नई-नई आई थी। कुछ समय तक तो मुझे आपकी बातें बहुत बुरी लगी लेकिन फिर लगने लगा कि शायद इस आश्रम से मुक्ति का यही उपाय होगा। लेकिन आपने क्या किया मुझे बुद्धू बना कर मुझसे झूठ बोल कर मुझे हर लिया।
   यही सारे सपने तो आपने मुझे भी दिखाये थे।  यही सारे हसीन वादे आपने मुझसे भी किए थे, कहा था अगर मैं आपके जीवन में चली आई तो मेरे जीवन से सारी कालिख और अंधेरा दूर हो जाएगा। लेकिन आपने क्या किया ? मेरा भोग लगाने के बाद आपने अपने परिचितों में मेरा प्रसाद बांट दिया ….
    मुझे तो आपने एक निर्जीव वस्तु से भी गई बीती बना दिया था…..याद है  स्वामी जी !!! भूल गए क्या?”

प्रबोधानंद के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। क्योंकि इस कावेरी से पिछले डेढ़ दो साल से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई थी। यह आज अचानक कहां से यहां टपक पड़ी थी? उन्होंने तो बहुत पहले ही चारु से कहा था कि इसे किसी और आश्रम में भेज दिया जाए। अब इसका यहां पर कोई काम नहीं , लेकिन पता नहीं क्यों चारु ने इसे नहीं भेज यही रख रखा था।

   वो आंखें फाड़  उसे देखने की कोशिश कर रहे थे पर आंखें और धुंधली होती जा रही थी। उन्होंने नीचे सर किया और अपनी आंखों पर थोड़ा पानी लगा कर आंखें खोली… लेकिन अब कोई भी वहां नहीं था।  पारो नीचे बैठी थाली में कुछ और चीजें सजाकर उनकी राह देख रही थी….

” यह सारी लड़कियां अंदर कैसे आती जा रही है?

” कौन सी लड़कियां स्वामी जी !!!यहां तो बस मैं ही हूं, और आप कुछ खा भी नहीं रहे।”

पारो ने खीर की कटोरी उठाई और स्वामी जी के सामने कर दिया “कम से कम ये खीर ही खा लीजिए।”

“हमें कुछ ठीक नहीं लग रहा है… सुबह से तबीयत ठीक नहीं हो रही, और अभी कुछ अजीब अजीब सी चीजें हो रही है।”

“आप सोचते बहुत है ना स्वामी जी!! मन ही मन मनसूबे  तैयार करने लगते हैं। इतने बड़े-बड़े सपने देखने लगते हैं, कि असल जिंदगी में आपको कुछ नजर ही नहीं आता।”

“यह क्या बकवास कर रही हो।”!

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    पारो ने धीमे से गुनगुना कर जो कहा था वह भी प्रबोधानंद को सुनाई दे गया और वह उस पर नाराज होने लगे… इस पर पारो ने मुस्कुराकर वह कटोरी वापस उनके सामने कर दी…

    “जी आप नाराज मत होइए.. मेरा कहने का तात्पर्य सिर्फ यह था कि, आप अपने खाने पीने पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। आज आपने सुबह से कुछ भी नहीं खाया है ….और शायद इसीलिए आपकी तबीयत सही नहीं लग रही है।  चलिए अब आप सबसे पहले यह खीर खत्म कीजिए..”

  प्रबोधानंद को भी यही लगा कि शायद सुबह से एक अन्न का दाना भी उसके पेट में नहीं गया और इसीलिए उसे तबीयत ज्यादा खराब लग रही है। वह फटाफट खीर खाने लग गया, और लगभग दो-तीन मिनट में ही उसने पूरी कटोरी खा कर नीचे रख दी। पारो के चेहरे पर मुस्कान खेलने लगी।

  तभी पारो के पीछे से वापस सुनीता निकलकर सामने चली आई …प्रबोधनंद के ठीक सामने हाथ बांधे खड़ी हो वापस मुस्कुराने लगी।
   इतनी देर में प्रशांत ने धुँआ करने के लिए जो सामग्री रखी थी उसे हटा लिया था जिसके कारण अब पारो सुनीता या कावेरी को उस धुँए से कोई समस्या नहीं होनी थी।

“हर चीज़ अब भी सबसे पहले ही चाहिए आपको स्वामी जी। और फटाफट चट कर जाने की आदत भी गयी नही आपकी। मुझे भी ऐसे ही खा कर जैसे कटोरी एक तरफ फेंक दी मुझे भी फेंक दिया था। याद है स्वामी जी?
    और आपके वो कुत्ते जिनके सामने मुझे फेंका था आपने, कुछ दिनों पहले तक नोच रहे थे मुझे। फिर जानते हैं आप? मैंने उनसे बचने के लिए क्या उपाय किया?
   आप कैसे जानेंगे ? आपकी प्रिय चारु ने आप तक ये बात आने ही नही दी….., या हो सकता है आपको पता भी हो तो आप अनजान बने घूम रहे हों?”

” कौन सी बात ? क्या किया तुमने?”
   ये पूछते हुए प्रबोधानन्द ने एक नज़र वहीं एक तरफ खड़ी पारो पर डाली। लेकिन पारो के चेहरे पर ऐसे निर्लिप्त भाव थे जैसे उसे सुनीता नज़र ही नही आ रही…

“क्या आप सच में नही जानते कि मैंने क्या किया? चलिए मैं ही बता देती हूँ। जब आपके उन रईस दोस्तो से मैं तंग आ गयी और मुझे बचने का कोई उपाय नही दिखा तब मैंने अपनी ही साड़ी का फंदा बनाया और झूल गयी… ऐसे…”
    वो एक तरफ को किनारे सरक गयी…. और उसके ठीक पीछे की दीवार पर फांसी के फंदे से लटकी एक औरत की छाया सी दिखने लगी।
   प्रबोधानन्द के कमरे में वैसे भी अधिक प्रकाश नही था, नाइट बल्ब जैसी नीली झिली सी रोशनी में दीवार पर औरत की झूलती लाश की परछाई डरावना माहौल बना रही थी…
   वो हड़बड़ा कर अपनी जगह से गिरते गिरते बचा, उसे अपनी आंखों पर विश्वास नही हो रहा था। वो तुरंत पीछे की ओर घुमा, ये देखने के लिए की आखिर परछाई बन कहाँ से रही है। पर उसके पीछे मुड़ते ही उसके सामने बाल बिखेरे कावेरी खड़ी थी…

” मुझे क्यों इतनी जल्दी भूल गए स्वामी जी?  आपने तो कहा था आप मेरा भला कर देंगे, मेरी जिंदगी सवार देंगे ….मैं अगर आपका कहना मान जाऊं तो आप जिंदगी भर मेरा ख्याल रखेंगे। लेकिन आप तो दो ही साल में मुझे भूल कर अपने रास्ते निकल गए। आप तो बहुत बड़े पाखंडी निकले स्वामी जी। “

  ” जाओ यहां से…. तुम यहाँ कैसे आ गई? यह तुम सब की कोई मिलीभगत है, मैं समझ गया हूं। “

  प्रबोधानंद  ने उसे हटाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया लेकिन उनका हाथ कावेरी के सामने से निकल गया… पर वह कावेरी को छू नहीं पाए।
        इस बात से वह थोड़ी देर को चौक गए और कावेरी को पकड़ने के लिए आगे बढ़ने लगे.. कावेरी अब भी अपनी जगह पर ही खड़ी थी और प्रबोधनंद को ऐसा लग रहा था वह चलते जा रहे हैं, लेकिन वह कावेरी तक पहुंच नहीं पा रहे थे….

    उन्होंने वापस पलट कर देखा पारो अब भी उनकी थाली में कुछ थोड़ा बहुत परोस रही थी। वह बिल्कुल इस तरह से निर्लिप्त उनकी थाली सजा रही थी, जैसे उसे ना तो कमरे की दीवार पर लाश की परछाई नजर आ रही और ना ही सरिता और ना कावेरी। वो मुड़ कर एक बार फिर उस तक चले आए..

” ए लड़कीं सुनो क्या नाम है तुम्हारा?”
घबराहट में वह पारो का नाम तक नहीं ले पा रहे थे… पारो ने नीचे बैठे बैठे ही उनकी तरफ अपना चेहरा उठा दिया अपनी गहरी काली आंखों से उन्हें घूरते हुए उसने कहा ….”सरिता !!! सरिता नाम है मेरा!”

” क्या बकवास कर रही हो? तुम सब मिली हुई हो, मैं सब जानता हूं.. यह सब मुझे डराने के लिए कर रही हो ना बोलो?”

” जो खुद अपने पाप की गहराई में डूबता चला जा रहा हो, उसे मैं क्या डराऊंगी?”

” बंद करो यह नाटक और निकलो तुम सब मेरे कमरे से। “

  उसी पल कमरे में थोड़ी रोशनी बढ़ गई पारो वापस थाली को सजा कर  प्रबोधानंद की तरफ देखने लगी….-” स्वामी जी आप वहां कब चले गए आप तो यहां बैठे खा रहे थे… मैं तो आपकी कटोरी में खीर परोस रही थी….
    मैं इतनी देर से खीर की कटोरी पकड़े खड़ी हूं और आपने अभी तक चखी भी नहीं।  क्या कल के थप्पड़ से अब तक आप मुझसे नाराज हैं?”

  प्रबोधानंद के चेहरे पर गुस्से की लकीरें खिंच गई उसने घूर कर पारो की तरफ देखा…-” मुझे बुद्धू बना रही हो। तुम्हें क्या लगता है मुझे समझ में नहीं आ रहा है… अभी अभी तो मैंने खीर खाकर कटोरी रखी थी और तुम ये दूसरी कटोरी देते हुए कह रही हो कि मैंने खीर नहीं खाई?  उल्लू समझ रखा है क्या मुझे?”

प्रबोधानंद के ऐसे कहते हैं किसी ने उसे कंधों से पकड़कर अपनी तरफ मोड़ लिया । प्रबोधनंद जैसे ही पलटा सामने सुनीता खड़ी थी…-” उल्लू नहीं पाखंडी समझा है तुझे, और तू पाखंडी है। और अब तू अपनी सजा भुगतने तैयार रह ।
     तेरे कारण ही मैंने अपना जीवन समाप्त कर दिया। और अब मैं वापस आई हूं तुझ से बदला लेने के लिए… और सिर्फ मैं ही नहीं इस आश्रम की जिस जिस लड़की के साथ तूने ज्यादती की है, वह सारी लड़कियां अब तुझ से बदला लेकर रहेंगी ।”

  ” दूर रहो मुझसे।  तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। प्रबोधानंद ने सुनीता का हाथ पकड़ने के लिए उसकी तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन हवा में ही प्रबोधानंद का हाथ इधर-उधर घूमता रहा। लेकिन सामने खड़ी सुनीता को वह छू भी नहीं पाया । प्रबोधानंद का डर अब अपने चरम पर था।
    ना तो वह कावेरी को छू पा रहा था और ना सुनीता को।
    दीवार पर अब भी वह परछाई वैसे ही नजर आ रही थी। इधर पारो का अलग ही नाटक चल रहा था। अब उसका सिर जोर-जोर से घूमने लगा… उसे लगा वो इस कमरे में रहा तो पागल हो जाएगा ….
    वह जोर से चिल्लाते हुए गलियारे की तरफ भागा कि तभी सुनीता ने उसका हाथ पकड़ लिया..-” तुझे क्या लगता है प्रबोधानन्द तू अब भी जिंदा है?  अरे मूर्ख अगर तू जीवित होता तो तू मुझे कैसे देख पाता? तेरी तबीयत बिगड़ी थी ना उसमें तेरे प्राण पखेरू उड़ चुके हैं।”

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” चुप करो जैसे चमत्कारों की कहानियां हम अपने श्रद्धालुओं को सुनाते हैं, वैसी ही  उटपटांग कहानियां हमें मत सुनाओ हम जानते हैं कि…”

” तू कुछ नहीं जानता और अगर जानता भी है तो जानबूझकर अनजान बन रहा है। आ  मुझे छूने की कोशिश कर। क्या तू मुझे छू पा रहा है? नहीं ना फिर तुझे समझ में क्यों नहीं आ रहा प्रबोधानंद!!
     अगर इस संसार में देवता है तो दानव भी है। अगर इंसान हैं तो आत्माएं भी हैं। हर इंसान के अंदर एक आत्मा होती है और जब वह आत्मा उस इंसान से विलग हो जाती है तो इंसान मृत हो जाता है।
   मेरी आत्मा तो उसी दिन मृत हो गई थी, जिस दिन तू ने अपने इन गंदे हाथों से मुझे छुआ था। लेकिन फिर भी मैं घिसट सिसक कर ही सही  जिंदा थी। पता नहीं क्यों जिंदा थी? शायद अपने परिवार को पालने पोसने के लिए।
    लेकिन जब तेरे और तेरे आदमियों की ज्यादातियां बढ़ती गई तब मेरी हिम्मत चूक गई। और उस समय ना तो मेरा बीमार छोटा भाई मेरी आंखों के सामने था और ना मेरी बूढ़ी मां।  उस वक्त मुझे बस यही लगा कि मैं अपनी आत्मा को अपने शरीर से अलग कर दूं। अपनी आत्मा को मुक्ति दे दूँ। और मैंने अपने गले में फांसी लगाकर खुद को मुक्त कर दिया। ये मेरी सोच थी कि मैं मुक्त हो जाऊंगी , लेकिन मेरी आत्मा यहीं इसी आश्रम में भटकती रह गई… तेरे इस रंगीले कमरे के चारों तरफ।
   क्योंकि मेरी मौत का जिम्मेदार तू जो था। आखिर मेरी आत्मा क्यों नहीं भटकती? मेरी मौत को भी तो पूरा न्याय नहीं मिला। इस आश्रम के लोगों को भी मेरी मृत्यु के बारे में पता नहीं चल पाया। तेरी उस महिला मित्र ने मेरी लाश को अपने आदमियों से कहकर ठिकाने लगवा दिया। इस आश्रम के एक आचार्य तक को  भी पता नहीं चला कि भगिनी आश्रम में रहने वाली सुनीता अचानक कहां चली गई।”

प्रबोधानन्द  ध्यान से सुनीता की बातें सुनता रहा …
  सुनीता उसकी तरफ बढ़ती हुई अपनी बात कहती रही और प्रबोधनंद पीछे हटते हुए उसकी बातें सुनता रहा धीरे-धीरे उसकी बातें सुनते हुए प्रबोधानन्द आगे बढ़ता चला गया…और कमरे से बाहर आ गया।

” मैं सच कह रहा हूं जैसे इस आश्रम के किसी आचार्य को नहीं पता था वैसे ही मुझे भी नहीं पता था कि तुम मर चुकी हो। “

” अब तो पता है ना!! तो अब चल मेरे साथ।।”

  “नहीं मुझे छोड़ दो मुझे जाने दो”
  
     रात बीत चुकी थी, हल्की सी भोर का समय था।कमरे में हल्का उजाला हल्का अंधेरा सा था।  उस पर बाल बिखराई भूतनी के समान दो औरतें ….दीवार पर बनती लाश की परछाई… और उस पर खाई हुई खीर में मिली हुई दवा का असर प्रबोधानंद के सर चढ़कर बोलने लगा था… उसका डर अपने चरम पर था.. अब उसे लगा अगर वह उस भूतिया कमरे में रहा तो पागल हो जाएगा….
   अपने कमरे से वो गलियारे की तरफ निकल रहा था कि पारो उसके सामने चली आयी….

” खीर तो खा लीजिये स्वामी जी। “

   उसे एक तरफ को धक्का देकर वो चारु का नाम पुकारता बाहर निकल गया…

” ये क्या हो रहा है हमारे कमरे में?  वो लड़कियां सुनीता और कावेरी वहाँ कहाँ से चली आयीं? ठीक है हम मानते हैं कि हमारे उनके साथ गलत सम्बन्ध थे!! ये भी मान लेते हैं कि उन्हें इस काम के लिए हम ही ने डराया धमकाया भी… और हमारे बाद बड़े बड़े व्यापारियों नेता मंत्रियों के सामने भी उन्हें परोस दिया पर उसका मतलब ये थोड़े ही हुआ कि इस सब में हम अकेले दोषी हैं। इस सब से हमारा अकेले का तो फायदा नही होता? अगर हम उन लड़कियों के साथ वक्त बिताने के बाद उन्हें  रईसों के हवाले कर देते थे तो क्या बदले में उन लड़कियों की कोई कमाई नही होती थी। अभी अगर ये लड़कियां बाहर बैठ कर यही धंधा करती होती तो पुलिस के चक्करों से इन्हें कौन बचाता। हमारे सरंक्षण में कम से कम उनसे तो सुरक्षित ही हैं। ठीक है माना कि तुम लोग इसे दलदल मानते हो पर उन लोगो को इस दलदल में खींचने में हमारे साथ साथ तुम्हारा भी बहुत बड़ा हाथ …”

  प्रबोधानन्द कमरे से बाहर मंदिर परिसर के बीचोंबीच खड़े चारु पर तेज़ आवाज़ में अपनी भड़ास निकाले जा रहे थे कि आसपास की भीड़ देख चारु ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया…..

” यह क्या कह रहे हैं आप स्वामी जी मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानती।”

   उसने चारों ओर देखा आसपास मंदिर के आचार्य भगिनी आश्रम की महिलाएं और बाकी सदस्य भी जमा हो गए थे। उस गोल घेरे के बीच प्रबोधनंद और चारु लोगों से घिरे खड़े थे। चारु ने एक बार फिर सब की तरफ देखा और हाथ जोड़ लिए….-” मैं सच कह रही हूं इस बारे में मैं कुछ भी नहीं जानती कि यह  स्वामी जी क्या बोल रहे हैं? “

    उसने उदयआचार्य और बाकी गुरुओं को देख वापस अपनी बात कहनी शुरू कर दी…-” मैं सच कह रही हूं आचार्यवर!! मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानती। मैं प्रबोधानंद जी की खास सेवा में उपस्थित रही हूं लेकिन यह महिलाओं से जुड़ी क्या बात कह रहे हैं वह मैं कुछ भी नहीं जानती।”

” कोई बात नहीं मैडम!! आप एक तरफ हट जाइये, यह जो भी कह रहे थे यह सब हमने रिकॉर्ड कर लिया है। और अब कौन क्या जानता है? और क्या नहीं? यह सब थाने में चल कर ही पता चलेगा। चलिए स्वामी जी आपका समय पूरा होता है।”

  चारु की आंखें फैल गई उसने पीछे पलटकर देखा पीछे पुलिस खड़ी थी। उन्ही पुलिस वालों में से एक पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने फोन पर स्वामी जी की कही गई एक एक बात रिकॉर्ड कर ली थी।
 
   इस सारे झोल झमेले के बीच ही वरुण पारो और बाकी लोग कमरे से बाहर निकल आये थे , और चुपके से उसी भीड़ का हिस्सा बन गए थे। वरुण ने ही पुलिस को इत्तला कर यहाँ बुलवाया था।

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    आश्रम के सारे लोगों के सामने पुलिस वाले ने एक बार फिर रिकॉर्डिंग चलाई और आगे बढ़ कर प्रबोधानन्द के हाथ में हथकड़ियां डाल दी…

” उम्मीद है आप में से कोई भी इस पाखंडी को यहाँ से लेकर जाने का विरोध नही करेगा।”

  सभी आचार्य गणों ने घृणा से प्रबोधानन्द को देख पुलिस के जाने के लिए मार्ग बना दिया…

    प्रबोधानन्द जो अपना सिर पकड़े वहीं ज़मीन पर बैठ गया था कि हथकड़ी को पकड़ कर पुलिस वाले ने खींचा और गिरते पड़ते वो खड़ा हो गया..

  जाते जाते उसने एक बार पलट कर देखा, पारो भी उस भीड़ में खड़ी उसे दिख गयी। उसे आंखों से ही भस्म करता वो पुलिस की गाड़ी की तरफ बढ़ रहा था कि उस भीड़ से हवा में उड़ता एक चप्पल उसके माथे पर जाकर लगा, उसके बाद उस भीड़ से एक एक कर लहराते हुए चप्पलों से प्रबोधानन्द का सम्मान तब तक चलता रहा जब तक पुलिस उसे अपने घेरे में लेकर गाड़ी में बैठा कर ले नही गयी…

क्रमशः

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aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

28 विचार “समिधा-44” पर

  1. जो हुआ अच्छा हुआ लेकिन कुछ अधूरा सा लगा । प्रबोधानन्द के साथ उसके रहीसजादे भी जेल जाने चाहिए थे एवं आश्रम को भी बदनामी से बचाना जरूरी है ।।।
    जय श्री राधे ……
    💐💐💐💐💐
    🙏🙏🌴🙏🙏

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