समिधा-45

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समिधा – 45

    पुलिस प्रबोधानन्द को पकड़ कर ले जा चुकी थी लेकिन आश्रम का माहौल आज सामान्य नही हो पाया था।
  मंदिर तो बिना बताए बंद नही किया जा सकता था, इसलिए श्रद्धालुओं के लिए मंदिर खुला था पर आश्रम के बाकी दैनिक कार्यक्रम जैसे प्रवचन भजन आदि आज के लिए स्थगित कर दिए गए थे।
  चारुलता जल्दी से जल्द वहां से निकल जाना चाहती थी… लेकिन आश्रम के गुरु आचार्यों ने चारुलता को ऑफिस में पूछताछ के लिए बुला लिया।

    इधर रोज का पूजन अर्चन साधारण रूप से समाप्त करने के बाद आज वरुण को प्रवचन नहीं देना था वह सरोवर की तरफ निकल गया वहां उसके बाकी साथी उसका इंतजार कर रहे थे…

” आओ वरुण बस तुम्हारा ही इंतजार हो रहा था… अब बताओ जरा की उस पाखंडीनंद के होश ठिकाने लाने के लिए तुमने उसकी खीर में क्या मिलाकर खिलाया था?”

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” हां यह सवाल तो हम सब जानना चाहते थे, बल्कि मैं तो और भी बहुत सारे सवाल आप से पूछना चाहती थी स्वामी जी।”

अबकी बार सवाल सुनीता की तरफ से आया था यह सभी लोग सीढ़ियों पर बैठे थे। सबसे नीचे बैठी पारो की आंखें वरुण पर एकदम स्थिर थीं और एकटक उसे निहार रही थी। बहुत बार उसे खुद भी लगता कि वह कैसे बेशर्म सी वरुण को ताकने लगती थी लेकिन पता नहीं क्यों वरुण की आंखों से उसे देव की आंखें झांकती हुई नजर आती थी।
    वरुण को देखकर हमेशा ऐसा लगता था कि शरीर भले ही वरुण का हो लेकिन इसके अंदर दिमाग दिल सब कुछ देव का आ गया है।

  वरुण ने एक नजर उन सब को देखा और फिर उन्हीं के साथ सीढ़ियों पर बैठकर उसने सुनीता की तरफ देखा और बोलना शुरू किया…

” आप सभी के सवालों का जवाब जरूर दूंगा। लेकिन सबसे पहले मैं आपसे जानना चाहता हूं , कि आखिर आपने अपने ऊपर इतने अत्याचार होने दिए ही क्यों?
   अगर पहली बार में ही उस पाखंडी को आपने आंखें दिखा दी होती! और खींच के एक थप्पड़ उसके गाल पर रख दिया होता तो शायद वह इतना आगे नहीं बढ़ पाता।

   “आप सही कह रहे हैं स्वामी जी! शायद मैं ही कमजोर पड़ गई थी… कुछ अपने परिवार की तकलीफों के कारण और कुछ उस मजबूत आदमी के दिए प्रलोभन के कारण, शायद मेरे मन में भी यह लालच आ गया था कि इस एक आदमी को खुश और संतुष्ट करके मैं अपना जीवन संवार लूंगी… लेकिन जब ऐसा कुछ हुआ नहीं , तब मेरी आंखें खुली और मुझे समझ में आया कि मैं किस गहरे दलदल में फंस चुकी हूं। और जब एक बार उस गहरे दलदल में नीचे उतर गई तब मुझे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिला।”

“ऐसा तुम्हें लगता है सुनीता, कि तुम्हें रास्ता नहीं मिला। आखिर तुमने पारो से सब कुछ सच कहा ना!! यही सच अगर कुछ सालों पहले कह देती तो पहले ही इस दलदल से मुक्ति मिल जाती।”

“पर किसे कहते स्वामी जी? आश्रम में जितनी महिलाएं हैं, उनमें से मैं किस पर विश्वास करूं और किस पर नहीं? यह भी तो मुझे नहीं पता था। वह तो पारो इतनी निश्चल है बिल्कुल बच्चों सी कि इससे अनजाने ही मैं अपने ह्रदय की सारी पीड़ा कह गई।  और इत्तेफाक देखें कि इसने बिना देरी किए आपसे सब कुछ कह दिया और आप दोनों ने मिलकर हमें उस नर्क से बचा लिया।”

  “वह सब तो ठीक है, लेकिन इस सब के बारे में हम पांचों से बाहर कोई बात नहीं जानी चाहिए। क्योंकि चारुलाता अब तक आश्रम में है, और उसके खिलाफ हमें अब तक कुछ भी नहीं मिला। अगर प्रबोधानंद पुलिस के सामने चारुलाता के खिलाफ कुछ बोलते भी हैं, तो भी चारुलता को कुछ दिन रिमांड में रखने के बाद सबूत ना मिलने की कारण पुलिस छोड़ भी सकती है। इसलिए अब हमें उस पर नजर रखनी होगी। हालांकि अभी अभी प्रबोधनंद पकड़ा गया है, तो चारु जरूर कुछ समय के लिए शांत हो जाएगी…… लेकिन बहुत लंबे समय तक शांत बैठी रहे वह ऐसी औरत नहीं है।”

“तुम सही कह रहे हो प्रशांत और मेरा साथ देने के लिए तुम्हारा आभार भी व्यक्त करता हूं ..दोस्त!!”

“एक तरफ दोस्त भी कहते हो, और दूसरी तरफ आभार भी देते हो! खैर अब बताओ कि यह सारी दवाइयां और वह जादूई  धूप यह सब तुम्हें मिला कहां से?”

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“मेरी दोस्त सारा से!! मैं जब सिएटल (अमेरिका) में रह रहा था तब वहां सारा से मेरी दोस्ती हुई थी। सारा के पिता जाने-माने जादूगर थे और वह अक्सर बड़े-बड़े जादू के शो किया करते थे। उन सब के दौरान वह कई अलग-अलग तरह के करतब दिखाया करते थे
और वाकई अपनी आंखों के सामने उनके बड़े-बड़े जादुई करतब देखना ऐसा लगता था जैसे मैं वाकई जादू की दुनिया में पहुंच गया हूं । असल में वह इल्यूशंस क्रिएट किया करते थे। यानी कि ऐसे दृश्य हमारे सामने बनाया करते थे कि, हमें यूं लगता वह सारा सबकुछ जो हम स्टेज पर देख रहे हैं , सच है। जबकि वह असल में सिर्फ एक तस्वीर हुआ करती थी। तब उस समय मैंने सारा से उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की थी, और सारा ने मुझे अपने पिता से मिलवाया भी था ।
  उसके पिता अमेरिका में घूम घूम कर अलग अलग जगह शो किया करते थे इसलिए सारा सिएटल में रहा करती थी।
   उनके पास वैसे तो वक्त कम हुआ करता था, लेकिन हम लोग सारा के अच्छे दोस्त थे इसलिए उन्होंने हमें सिर्फ समय ही नहीं दिया अपनी काफी सारी ट्रिक्स भी बताइ और उसी में उन्होंने इस जादुई पाउडर के बारे में बताया था।
     वो जब जादू किया करते थे तब उनके सहयोगी हर एक पंक्ति के पीछे उस जादुई पाउडर को मोमबत्तियों में डालकर जला दिया करते थे। लोगों को ऐसा लगता था कि यह खुशबू के लिए जलाया जा रहा है। लेकिन इससे निकलने वाला धुआं आंखों के सामने एक अलग सा पर्दा तैयार कर देता था और जिसके कारण हम जब जादू देखते थे तो बहुत सी चीजें जो हमारे पीठ के पीछे पर्दे पर चला करती थी.. वह हमें अपने सामने नजर आती थी और ऐसा लगता था हम उन चीजों को साफ-साफ देख रहे हैं।  वह हमारे पीठ के पीछे दो लड़कियों को आधा-आधा काट कर जोड़ दिया करते थे। यानी एक लड़की का धड़ और दूसरी लड़की का सिर, यह सब हमारे पीछे की स्क्रीन पर वह कंप्यूटर के द्वारा ग्राफिक से किया करते थे.. लेकिन उस पाउडर के कारण हमें यूं लगता था जैसे स्टेज पर हमारे सामने दो लड़कियां आधी आधी कट कर आपस में जुड़ गई वह वाकई गजब का अनुभव था।
    यह इत्तेफाक ही था कि जब मैं अमेरिका से हमेशा के लिए भारत वापस आ रहा था तब उन्होंने मुझे गिफ्ट के तौर यह पांव पाउडर भेंट किया था। हालांकि उन्होंने उस समय यह कहा भी कि यह तुम्हारे किसी काम का नहीं है लेकिन फिर भी मेरी याद के तौर पर इसे रख लो……. और देखो उस पाउडर ने आज कितना काम किया।
    सुबह जब प्रबोधनंद हवन कर रहे थे और प्रशांत ने उनके पीछे यह धूप जलाई, तब प्रबोधनंद को अपने सामने बैठी वह लड़कियां नजर आने लगी जो उनके पीछे थी। और इसीलिए हाथ बढ़ाने पर वह किसी को भी छू नहीं पा रहे थे। इसके साथ ही उस धूप का यह प्रभाव हुआ कि उन्हें आंखों में कुछ धुंधलापन सा आया और इसी के कारण उन्हें भूख लगनी बंद हो गई। मैं यह इसलिए चाहता था कि शाम को उन्हें दवा वाली खीर खिलानी थी और उसका अधिक असर तभी होता जब खाने वाला खाली पेट हो। मेरी इच्छा पूरी हो गई क्योंकि प्रबोधानंद ने दिनभर कुछ भी नहीं खाया था।
    शाम को जब पारो ने प्रबोधआनंद को वह नशीली खीर खिलाई तो उस के कारण उसका दिमाग भी काम करना बंद कर गया। उस चीज के प्रभाव के कारण ही उसे हर चीज दुगुने प्रभाव से नजर आ रही थी… जब साधारण सी साज सज्जा के साथ सुनीता और कावेरी बार बार उसके सामने आने लगीं तब उसे उन दोनों में ही भयानक भूतनीया नजर आने लगीं। इसके साथ ही खिड़की से बाहर की तरफ टॉर्च की रोशनी और बड़े कटआउट की सहायता से दीवार पर हमने लाश की झूलती हुई परछाई भी बना दी। उस परछाई को देखकर वो और भी ज्यादा डर गया इसके साथ ही कमरे की रोशनी भी हम बार-बार जला बुझा रहे थे और इन्हीं सब चीजों का एक साथ ऐसा असर हुआ कि प्रबोधआनंद खुद ही हर एक बात कबूल कर गया। हालांकि यह सब करने से पहले मैंने नहीं सोचा था कि प्रबोधनंद इतनी जल्दी पकड़ में आ जाएगा। मैंने उसे एक बहुत मजबूत आदमी सोच रखा था लेकिन शायद उसके पाप कर्मों की हांडी इतनी बढ़ चुकी थी कि छलकने ही लगी थी…… और इसीलिए वह बार-बार बेशर्मी से चारुलता को पारो को अपने कमरे में भेजने के लिए कहने लगा था।
   अपनी ताकत और घमंड में वह इस कदर चूर हो गया था कि उसे दिन दुनिया के बारे में सोचने और फिक्र करने की  बात भूले से भी दिमाग में नहीं आ रही थी! और बस यही से उसके पतन का रास्ता शुरू हो गया। उसने कभी सोचा भी नहीं कि सारे संसार से थकी हारी औरतें इस आश्रम में पनाह लेती हैं और वह इन औरतों को खराब करके इनका सौदा कर देता है। सुनीता , कावेरी क्या आप लोगों ने सोचा भी है कि आपको बड़े-बड़े नेता मंत्रियों के सामने परोसने के बाद यह लोग आपके बदले एक मोटी रकम लिया करते थे।
   बहुत शर्म की बात है कि इतने बड़े मंदिर परिसर से और इतने सारे आचार्यों की पीठ पीछे से ऐसा काला काम यहां होता रहा। और आज तक किसी ने इस काम को रोकने की कोशिश नहीं की …मेरा तो सोच सोच कर ही खून खौल रहा था, मैंने कितनी मुश्किल से खुद को रोका है उस प्रबोधनंद को मारने से यह मैं ही जानता हूं। वरना मेरा बस चलता तो मैं उसका गला दबाकर उसे वहीं खत्म कर देता। लेकिन मैं भी चाहता हूं कि वह कानूनी तरीके से पूरी सजा काटे।
    अब एक बात और मैं आप दोनों से कहना चाहता हूं चारुलाता तो पूरी कोशिश में होगी कि वह आज के आज यहां से अपने घर निकल जाए । उसके यहां से जाते हैं आप दोनों को इतना डर नहीं रह जाएगा।। पुलिस प्रबोधनंद को पकड़कर जरूर ले गई है, लेकिन उसके खिलाफ उन्हें पुख्ता गवाह और सबूत चाहिए होंगे । प्रबोधनंद का इकरारनामा काफी है… लेकिन आप दोनों को आगे आकर अपने ऊपर बीती हर एक बात पुलिस से कहनी होगी। क्योंकि इकरारनामा उसने अनजाने में किया है जब उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा तब जरूर अपनी बात से मुकर जाएगा और अगर वह अपनी बात से मुकर गया और हमारे पास कोई गवाह नहीं रहे तो कोर्ट उसे बड़ी आसानी से छोड़ देगा। तो क्या मैं आप दोनों से यह उम्मीद कर सकता हूं कि आप दोनों गवाही देने से पीछे नहीं हटेगी।”

” हम बिल्कुल पीछे नहीं हटेंगे। आपने और पारोमिता ने जिस तरह से हमारा साथ दिया है, हम कोशिश करेंगे कि इस नर्क में हमारे साथ आश्रम की और भी जो महिलाएं शामिल थी वह भी अगर प्रबोधानंद के खिलाफ बोलने के लिए खड़ी हो जाए तो और भी अच्छा होगा। “

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“लेकिन वरुण यह भी तो हो सकता है कि यहां मौजूद सभी आचार्यवर यह बात ना पसंद करें। क्योंकि इससे हमारे मंदिर और आश्रम की बदनामी होगी। देखो वैसे भी अगर एक स्वामी पाखंडी निकला ढोंगी निकला तो उसके साथ चलने वाले हर किसी को बाहर निशाना बनाया जाएगा। इस पूरे कृष्ण आश्रम पर उंगलियां उठने लगेंगी और लोगों का भरोसा टूट जाएगा तो अभी कुछ कहा नहीं जा सकता कि प्रबोधानंद के ऊपर कोई केस चलेगा या नहीं!”

“कह तो तुम सही रहे हो दोस्त इस बारे में भी कुछ सोचना होगा।  मैं सोच रहा हूं इस बारे में अमृतआनंद स्वामी जी को फोन करके सब कुछ सच बता देना चाहिए। इसके बाद वो जो निर्णय लें वह निर्णय हमें भी मानना ही पड़ेगा।”

     ऑफिस में उपस्थित उदयाचार्य  स्वस्तिकआचार्य तथा बाकी गुरुवरों ने चारुलता से जितना हो सकता था , पूछताछ की… लेकिन वह अपनी बात पर अड़ी रही । और उसने यही कहा कि प्रबोधानंद स्वामी अपनी रोज की दवाइयां लेना भूल गए थे और शायद इसीलिए तबीयत सही नहीं होने के कारण कुछ भी बोले चले जा रहे थे। उसने उनके इस आचरण के लिए सभी से माफी मांगी और रोते हुए ऑफिस से बाहर निकल गई। वह सरोवर के पास से गुजर कर अपने कक्ष की ओर तेज कदमों से जा रही थी, तभी उसने वरुण पारो और बाकी लोगों की  बातें सुनी और वह वही एक बड़े से कदंब के पेड़ के पीछे छुप कर खड़ी हो गई और इन लोगों की योजना के बारे में सुनने लगी।
    
    वह लगभग सारी बातें सुन लेती कि तभी पीछे से सरिता चली आई…-” प्रणाम चारु दीदी वहां रसोई में पद्मजा दीदी आपको बुला रही हैं।”

चारु का पहले ही दिमाग खराब था और उस पर जैसे ही वरुण कुछ काम की बात बताने लगा था कि यह लड़की धमक पड़ी थी। उसका मन तो किया यही गड्ढा खोदकर सरिता को दफन कर दे। लेकिन अपने जज्बात समेटे वो पैर पटकती रसोई की तरफ निकल गई। सरिता को अचानक से समझ में नहीं आया कि चारु दीदी उस पर नाराज क्यों हो रही थी, कि तभी उसकी नजर सरोवर की सीढ़ियों पर बैठी पारो और बाकी लोगों पर चली गई वह मुस्कुराती हुई उन लोगों की तरफ बढ़ गई।

   आश्रम में सुबह सुबह  जो कुछ भी हुआ था उसमें आश्रम के किसी भी सदस्य को यह भनक तक नहीं लग पाई थी कि इस सारे काम के पीछे वरुण पारो प्रशांत सुनीता और कावेरी का हाथ है।
   आश्रम के लोग यही सोच रहे थे कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि प्रबोधनंद अपने कमरे से बाहर भागता हुआ आया और चिल्ला चिल्ला कर उसने अपने पापों के बारे में खुद ही वहां उपस्थित समूह को बता दिया।
    जहां महिलाएं इसे कृष्ण का चमत्कार मान रही थी, तो वही आश्रम के पुरुष किसे प्रबोधआनंद के पापों का घड़ा भरकर छलकना मान रहे थे। खैर जो भी था किसी को भी इस सबके पीछे वरुण और पारो का हाथ है, यह भान नहीं हो पाया था।

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   अपने दोनों हाथों को तेजी से हिलाती मुस्कुराती सरिता भी उन लोगों के पास जाकर सीढ़ियों पर बैठ गई….-” आज आप लोगों का भोजन करने का विचार नहीं है क्या? कब से देख रही हूं तीन-चार दिन से आप लोग सरोवर के इसी स्थान पर मंडली जमा कर बैठ जाते हैं, और जाने क्या बातों में लगे रहते हैं। और यह पारो दुष्ट मुझसे कुछ बताती भी नहीं।”

“तुझे भी सब कुछ बता दूंगी, लेकिन अभी वक्त नहीं आया है… और अगर तुझे कुछ भी जानना है तो इन से पूछ ले।”
     पारो ने धीमे से वरुण की तरफ इशारा कर दिया वरुण ने बाकियों से नजरें छुपा कर पारो को आंखें तरेर कर देखा और पारो ने आंखों ही आंखों में उससे माफी भी मांग ली।

   “तुम लोग नहीं बताओगे तो मैं चारु दीदी से जाकर पूछ लूंगी , वह अभी उस कदम्ब के पेड़ के पीछे खड़ी खड़ी तुम लोगों की बातें सुन रही थी, कि तभी पद्मजा  दीदी ने मुझे उन्हें बुलाने के लिए भेजा और मैंने उन्हें रसोई की तरफ भेज दिया। अब समझ आया इसीलिए शायद वह मुझ पर नाराज हो रही थी कि, वह तुम लोगों की पूरी बात नहीं सुन पाई होंगी।”

  नादानी और भोलेपन में सरिता सारी बातें कह गई और वरुण प्रशांत के कान खड़े हो गए…;” क्या कहा चारु लता यहां खड़ी थी?”

“यहां नहीं वहां कदम्ब के पेड़ के पीछे। वैसे वहां से मुझे तो तुम लोगों की कुछ खास बातें समझ में नहीं आई, पर वह पूरे कान लगाए हुए तुम लोगों की बातें सुन रही थी। “

वरुणा प्रशांत ने एक दूसरे को गहरी नजरों से देखा और कुछ सोच में डूब गए।

“कोई बात नहीं आप में से किसी को भी डरने या घबराने की कोई जरूरत नहीं है। वैसे भी अगर चारु लता ने हमारी सारी बातें सुन ली होंगी, तब भी वह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। और दूसरी बात अब वह बौखलाहट में कोई ना कोई ऐसा कदम जरूर उठाएगी जिससे वह खुद भी फंस जाए। “

सरिता ने बड़ी बड़ी आंखों से उन सब की तरफ पलकें झपकाते हुए देखा। उसके सिर के ऊपर से यह सारी बातें निकल गई। और इसलिए वह सीढ़ियों पर अपनी जगह खड़ी हो गई…-” पारो तू चलेगी मेरे साथ? सारे आचार्यवर बैठ रहे हैं। चल उन्हें खाना परोसने।”

पारो ने चुपचाप हां में सिर हिलाया और एक नजर भर उनकी तरफ देख कर उठ कर चली गई। वरुण भी उसकी आंखों में बंधा कुछ देर तक उसे देखता ही रह गया ।
      जैसे ही पारो और सरिता उन लोगों की आंखों से ओझल हुए प्रशांत ने अपनी बात रख दी…-” अब हम लोगों को भी यहां से अंदर चलना चाहिए वरना आचार्य लोग भी सोचेंगे कि आखिर हम यहां बैठ कर कर क्या रहे हैं? आप लोग भी भगिनी आश्रम की तरह प्रस्थान कीजिये।”

   प्रशांत ने कावेरी और सुनीता की तरफ हाथ छोड़ दिए वह दोनों भी उन दोनों को प्रणाम कर रसोई की तरफ बढ़ गई।

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  कृष्ण मंडप के सामने ही एक बड़ा सा भोजन कक्ष बना हुआ था। जहां आमने-सामने लंबाई में दरियां बिछाकर और इन दरियों के सामने छोटे-छोटे पाटे रखकर गुरु आचार्यों को भोजन करने बैठाया जाता था आज भी सारे आचार्य खाने एक साथ बैठ गए।
  सुबह के कार्यक्रम के बाद आज मन तो किसी का भी खाने को नहीं था लेकिन वहां का बना भोग पहले श्री कृष्ण को अर्पित किया जाता था और इसीलिए उन सभी का खाना असल में कृष्णार्पण हो जाने के कारण प्रसाद स्वरूप हो जाया करता था और प्रसाद को नकारने की हिम्मत उनमें से किसी में भी नहीं थी। और इसीलिए सभी बेमन से खाना खाने बैठ गए। आज सरिता और पारो भोजन परोस रही थी।
    सभी की थालियों में रोटियां परोसते हुए पारो आगे बढ़ी। वरुण के सामने जाकर वो ठिठक गई। वरुण ने सिर्फ एक ही रोटी का इशारा किया और पारो ने उसकी थाली में दो रोटियां डाल दी। वरुण ने आंख उठाकर उसे देखा और आंखों ही आंखों में पारो ने उसे खा लेने का अनुरोध किया और आगे बढ़ गई।
     सभी की दाल की कटोरीयों में घी डालने का जिम्मा भी पारो के ही हाथ आया और सभी की कटोरी में उस छोटी चमची से पिघला हुआ घी डालते हुए पारो एक बार फिर वरुण की कटोरी में दो चम्मच डालकर आगे बढ़ने लगी…. वरुण ने उसे घूर कर देखा।थोड़ा आगे बढ़कर पारो ने दोनों हाथ धीरे से जोड़ कर उससे माफी मांग ली और जग में से गिलासों में पानी ढालने लगी….
     

क्रमशः

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

18 विचार “समिधा-45” पर

  1. शुक्र है कि स्वामी महाराज अपनी सही जगह पहुंच गये। वो इसी लायक हैं।
    वरूण की मुश्किल अभी भी बनी हुई है कयुंकि ये चारु मैडम बहुत पहुंची हुई चीज़ है। इसे फसाना आसान नहीं है । वरुण और बाकि सबको बहुत संभलकर चलना होगा।
    अर्पणा जी हाथ जोड़कर माफी🙏🙏, क्युंकि पिछले काफी वक्त से आप तो रेगुलर हैं पर हम रेगुलर नहीं हो पा रहे। कोशिश रहेगी अब से हर बार अपनी हाज़िरी देने की।😊😊👍

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