समिधा -46

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  समिधा -46

      अगले दिन मंदिर में उपस्थित सभी आचार्य गुरुओं की मीटिंग बैठी। वरुण और प्रशांत भी मौजूद थे।
  चर्चा का विषय एकमात्र यही था कि प्रबोधानन्द के मामले में क्या किया जाए? अभी तक तो बस मामला एक पुलिस थाने में ही था लेकिन जैसे ही मामला कोर्ट कचहरी या मीडिया तक जाएगा तो आश्रम की बदनामी होनी तय थी।

    आश्रम के लिए बहुत ही विकट परिस्थिति थी ये सभी चिंतित बैठे थे। वरुण और प्रशांत चुपचाप एक दूसरे को देख रहे थे। उन्होंने प्रबोधानन्द को तो मज़ा चखा दिया था लेकिन उसका इतना दूरगामी परिणाम सोचा ही नही था। हालांकि इस बात पर एक बार वरुण और प्रशांत की बात भी हुई थी।
   वरुण का दिमाग इसी बात पर अड़ा हुआ था कि उदयाचार्य जी ने बोलना शुरू किया…

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“प्रबोधानन्द की कहानी आप सभी नहीं जानते हैं… ऐसा नहीं है कि इसने सिर्फ गलत काम ही किए हैं, मुझे तो खुद आज अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा कि प्रबोधानन्द ऐसा भी कर सकते हैं।
   अपने घर से किसी बात पर रूठ कर निकले प्रबोधानन्द को जो अमृतानंद स्वामी ने अपने पास पनाह दी और अपने साथ लेकर गए…..
…… तो वह स्वयं भी इनके दिमाग से और इनकी वाकपटुता से प्रभावित रह गए थे।
  फिर  अमृतानंद स्वामी ने यह सोचा था कि यह मठ के कार्यों को करने वाले सदस्य के रूप में मठ में उनके साथ रह लेंगे। उस समय प्रबोधानन्द की उम्र भी कम थी। मात्र चौदह – पंद्रह साल की उम्र में वह अपना घर त्याग चुके थे। पर अमृतानंद स्वामी के साथ आने के बाद उन्होंने अमृतानंद स्वामी की भक्ति में अपना दिन रात एक कर दिया। वो वही करते जो स्वामी जी कहते। उनकी आज्ञा से उठना बैठना… सोना जागना, खाना पीना…उनकी इतनी भक्ति देख स्वामी जी भी प्रसन्न थे, उस पर प्रबोधानन्द दिमाग के एकदम तेज़ थे।
    उस समय प्रबोधानन्द स्वामी बनारस निवास किया करते थे। उस मठ में भी विभिन्न तरह के चढ़ावो के साथ ही धन भी चढ़ा करता था। उस सबको गिनने और अलग करना रोज़ का सिरदर्द हो गया था। तब एक रात जब कुछ महंत यही काम कर रहे थे, उन सब के लिए चाय लेकर गए प्रबोधानन्द ने तुरंत कहा…-“अगर शुरू से ही ये सभी वस्तुएं अलग अलग डालने की व्यवस्था हो अर्थात दानपात्र ही 2 हों जिनमें एक में रुपये और दूसरे में अन्य वस्तुएं डाली जायें तो किसी को भी असुविधा नही होगी।”
  वहाँ उपस्थित सभी लोग चौन्क कर उस बालक को देखने लगे कि इतनी छोटी उम्र में इतनी बुद्धि कैसे? कुछ एक महंतों ने बात काटनी चाही पर अमृतानन्द स्वामी को प्रबोधानन्द की बात जम गई और उन्होंने वही किया…
    ऐसे ही एक बार की बात है…
मठ में कुछ ऊँची जात के लोग दर्शन को आये हुए थे। वो लोग अपना पूजा पाठ महानुष्ठान करवा रहे थे… उसी समय वहाँ कुछ निम्नजातिवर्ग के लोग आ पहुंचे और दर्शन के लिए मंडप से होते हुए आगे बढ़ गए।
   वहाँ अनुष्ठान में बैठे किसी ने उन लोगों को देख कर पहचान लिया और वहाँ बवाल मचा दिया कि इन लोगों को अंदर प्रवेश कैसे और किसने दिया?
  इन्हें मंदिर दर्शन की पात्रता नही होनी चाहिए… और वैसे उस समय भी उन्हें मंदिर दर्शनों की पात्रता तो थी पर मंडप में प्रवेश नही दिया जाता था।
तो इसी बात को ध्यान में रख़ कर किसी ने उन्हें टोक दिया कहा कि अगर दर्शन करना भी है तो मंडप से परे खड़े होकर ही दर्शन करें। यहां सब छूकर अपवित्र न करें।
   यह सब सुनते ही मठ में अमृतानन्द स्वामी समेत सभी को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन उनमें से कोई भी खड़े होकर उस आदमी की बात काट पाता कि महज इक्कीस वर्ष के प्रबोधानन्द ने चाकू उठा कर उस आदमी के हाथ में एक छोटा चीरा बना दिया। उसके तुरंत बाद उसने अपने और उन दलितों के में से एक पुरुष के हाथ में भी चीरा लगा दिया।
   तीनो का खून बलबला कर छलक उठा। वहीं रखें एक पात्र में उसने उन दोनों आदमियों के साथ साथ अपना भी खून एकत्र किया और फिर उस नाराज व्यक्ति के पास जा पहुंचा।
  उसके कटे हुए स्थान पर हल्दी का लेप रख उसने उस पात्र को उसके सामने बढ़ा दिया। अब तक में वह आदमी गुस्से से पागल हो उठा था… लेकिन वह नाराज होता उसके पहले अमृतानंद स्वामी भी उसके पास पहुंच चुके थे कि तभी प्रबोधानन्द ने बोलना शुरू किया…

-” महानुभाव आप मुझसे उम्र अनुभव आदि सभी में बड़े हैं… इसलिए मैं आपको क्या शिक्षा दूं ? फिर भी मैं अबोध बालक बस यह कहना चाहता हूं, इस पात्र में से आप अपना स्वयं का रक्त पहचान लीजिए , बस आपको इतना ही करना है , और तुरंत ही हमारा मठ और यह आश्रम उन दलितों को उनके खून के द्वारा पहचान कर यहां से बाहर कर देगा।”

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बात अचंभित कर देने वाली थी!!! अमृतानंद स्वामी ही नहीं वहॉं अनुष्ठान में बैठे हर एक व्यक्ति के मन में यही सवाल जागा कि इतनी छोटी उम्र में यह बालक इतनी बुद्धिमता वाली बात कैसे कर सकता है? अमृत आनंद स्वामी धीरे धीरे मुस्कुराने लगे…
उस आदमी ने उस पात्र को अपने हाथ में लिया और इधर उधर हिलाकर बहुत कोशिश की …कि उन तीनों रक्त को पृथक कर सकें लेकिन यह संभव नहीं था।

” यह तीनों तो बिल्कुल एक से है, इनमें वे अपना रक्त चुनना असंभव है । यह क्या मजाक कर रहे हो तुम? “

प्रबोधानन्द मुस्कुराने लगे और उन्होंने मंदिर की तरफ देख कर इशारा कर दिया…-” जब उस बनाने वाले ने आपके हमारे और उस आदमी के रक्त में कोई भेद नहीं किया। तब आप और हम कौन होते हैं? सिर्फ चमड़ी के रंग या पैदा होने के स्थान और कुल को लेकर भेदभाव करने वाले?
   क्या आप माता सीता का कुल बता सकते हैं ?उनका गोत्र बता सकते हैं? क्योंकि रामायण के अनुसार तो वह राजा जनक की गोद ली हुई पुत्री थीं।
महाराज जनक को खेत की ज़मीन जुताई के समय मिली सुंदर कन्या यानी धरती की बेटी थी वह।
धरती का तो कोई कुल नहीं, कोई जाति नहीं, कोई धर्म नहीं… फिर भी प्रभु श्री राम ने माता सीता से कभी उनके कुल और जाति के बारे में सवाल किये बिना उन्हें अपनाया, उनसे विवाह किया। उन्होंने तन मन से उन्हें अपनी प्राणप्रिया माना और अपना लिया। तो जब हमें बनाने वाले उस परमात्मा ने जाति और कुल के ऊपर विचार नहीं किया तो हम और आप क्या उनसे भी बड़े हो गए हैं जो यह भेदभाव करने लगे हैं?”

प्रबोधानन्द की बात सुनते ही उस आदमी ने आंखें झुका ली। उसे मन ही मन इतनी ग्लानि हुई की उसने उसी समय प्रबोधनंद के पैर पकड़ लिये। अमृतानंद स्वामी के चेहरे पर एक गर्व भरी मुस्कान छलक उठी और उस दिन से हमारा मठ और आश्रम पूरी तरह से हर जाति वर्ग के लिए खुल गया।

   इतना ही नहीं पहले हर कार्य के लिए अलग सेवादार नियुक्त किए जाते थे। कई सेवादार तो सिर्फ अपना पूरा जीवन आश्रम की साफ सफाई में ही निकाल दिया करते थे।
  लेकिन जब अमृतआनंद स्वामी ने प्रबोधानन्द जी को एक गरिमामय पद दिया तब अमृतानंद स्वामी से कहकर प्रबोधानन्द जी ने सेवादारों की प्रथा भी हमारे मठों से और आश्रमों से हमेशा हमेशा के लिए समाप्त करवा दी। उन्होंने कहा कि मंदिर में कार्य करने वाला हर एक व्यक्ति और हर एक सदस्य उस कृष्ण के लिए कार्य कर रहा है, तो वह चाहे प्रवचन देने का कार्य हो भजन कीर्तन पूजा-पाठ आरती का कार्य हो या साफ-सफाई का, है तो सभी एक बराबर श्रद्धालु !! हैं तो सभी उस मुरली वाले के भक्त!! तो इसलिए इन सभी पदों को स्वामी, आचार्य और गुरुवर इन नामों से पुकारा जाए भले ही काम के अनुसार इन पदों को निम्न मध्यम और उच्च तीन भागों में बांट दिया जाए जिससे पद क्रम के अनुसार आचार्य वर और गुरुवर के बारे में बाकी लोगों को मालूम चल सके लेकिन सेवादार कोई भी ना कहलाये।
   वैसे कृष्ण का सेवादार होना भी अपने आप में सम्मानित पद ही है, और अपने आप में ही बहुत प्रसन्नता की बात है । लेकिन अगर सेवादार कहलाएंगे तो मंदिर के हर एक सदस्य फिर सेवादार ही कहलाएंगे।

  अमृतानन्द स्वामी को प्रबोधानन्द की यह बात भी बहुत अच्छी लगी। और उन्होंने फिर हमारे हर एक आश्रम से सेवादार पद को समाप्त कर दिया।
पहले पहल हमारे ट्रस्ट के मुख्य मंदिर में जो नियम बनाए जाते थे , वही हर मंदिरों और मठों में पालन करना आवश्यक था। यहां तक कि किस दिन क्या भोजन बनेगा? किस मठ में कितना दूध दिया जाएगा? अगर गाय पाली जाएंगी तो कितनी संख्या में गाय पाली जाएंगी ? लगभग कुल कितने गुरुवर और आचार्यवर आश्रम में निवास करेंगे? हर एक चीज का नियम एक पुस्तिका में लिखा होता और उस पुस्तिका के प्रति हर एक मठ और आश्रम में पहुंचा दी जाती। और सभी लोग अक्षरश: उसमें लिखी बातों का पालन किया करते थे लेकिन ऐसा पालन करना भी बहुत कठिन था।
   बनारस के आश्रम की पुस्तिका में लिखा है कि सोमवार को सुबह पालक साग बनेगा तो वह पालक साग हर जगह बनना आवश्यक था।
    राजस्थान, गुजरात … यह सब ऐसी जगह है जहां हर समय हर एक साग भाजी का मिलना संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में उनके यहां बहुत बार इस तरह के नियम पालन नहीं हो पाते थे, और वस्तुतः उन्हें हर्जाने के रूप में मुख्य आश्रम को एक राशि भेजनी पड़ती थी।
प्रबोधानन्द एक बार राजस्थान के आश्रम गए हुए थे अमृतानंद स्वामी के साथ । तब उन्होंने वहां के आश्रम में यह सारी परेशानियां देखीं।हालांकि इस बारे में वह खुद भी यही सोच रहे थे और तब उन्होंने अमृतानंद स्वामी से इस बारे में बात की कि हर एक मठ और आश्रम के उस जगह के अनुसार अपने नियम होने चाहिए क्योंकि बहुत सी ऐसी वस्तुएं हैं जो पूरे भारत में हर जगह नहीं मिल सकती। इसके साथ ही पूरे भारत में हर राज्य की अपनी अलग विशेषताएं हैं। अपना अलग पहनावा, अपना अलग खान-पान है तो ऐसी स्थिति में एक मुख्य आश्रम के द्वारा सभी आश्रमों को संचालित किया जाना तो गलत नहीं है, लेकिन दैनिक उपयोग मैं आने वाली वस्तुओं के लिए नियम बनाना और उसे पालन करने को बाध्य करना सही नहीं है। क्योंकि ऐसे नियमों का पालन तो हर जगह एक साथ संभव ही नहीं है।

अमृतआनंद स्वामी स्वयं प्रबोधनंद की बातों से सहमत थे। लेकिन वह अपने से ऊपर बैठे ट्रस्ट के लोगों से यह बातचीत करने में संकोच का अनुभव कर रहे थे। तब प्रबोधनंद ने स्वयं आगे बढ़कर अमृतानंद स्वामी के पैर पकड़ लिए…-” स्वामी जी अगर आप आज्ञा दें तो ट्रस्ट के आचार्य से मैं स्वयं बात कर लूंगा।”

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“लेकिन ट्रस्ट के सदस्यों से बात करने के लिए अभी तुम बहुत छोटे हो प्रबोधानन्द। उन लोगों तक हर कोई नहीं पहुंच सकता। सीढ़ी दर सीढ़ी तय कर कर ही उन तक पहुंचा जा सकता है।

” इसका भी उपाय है मेरे पास! आप ट्रस्ट से मुलाकात के लिए समय मांगिये और जब आप मिलने जाए तो आप कह दीजिएगा कि आपके गले में खराश है या खराबी है, जिसके कारण आप अपना प्रवक्ता साथ लेकर आए हैं। मैं सिर्फ आपके प्रवक्ता की हैसियत से यह बातें एक बार ट्रस्ट के सामने रखना चाहता हूं। आखिर मंदिर के ट्रस्ट में भी इंसान ही तो हैं और वह हम इंसानों की तकलीफों को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा?

अमृतआनंद स्वामी तो पहले ही प्रबोधानन्द से प्रभावित थे, अब उसने उन्हें निशब्द कर दिया था। उनका ये कहने का मतलब नही था कि वो ये सब नही कह सकते और किसी और के द्वारा अपने मन की बात कहलवा सकतें हैं ,वो यही बात प्रबोधानन्द को समझना चाहते थे पर अपनी जिद के पक्के प्रबोधानँद को कुछ भी समझाना अपने आप में टेढ़ी खीर था। उन्होंने उसे हामी भरी और उसे साथ लिए ट्रस्ट से मुलाकात करने चल पड़े। ट्रस्ट से हुई उनकी मुलाकात सफल रही। ट्रस्ट के आगे प्रबोधानन्द ने अपने तर्कों से ट्रस्ट में उपस्थित सभी लोगों को इस बात के लिए मना लिया कि राज्य के अनुसार अलग-अलग आश्रम अपनी सुविधा अनुसार अपने दैनिक उपयोग की वस्तुओं को तय कर सकते हैं और अपने नियम रोज के लिए स्वयं बना सकते हैं।

   मंदिर के पूजन अर्चन अनुष्ठान आरती भजन आदि के सारे कार्यक्रम सभी आश्रमों में एक समान होंगे… लेकिन हर आश्रम का खानपान और पहनावा उस आश्रम के वातावरण के अनुसार होगा।

यह भी एक बहुत बड़ा परिवर्तन था, जो सभी आश्रमों में हुआ था। और इस परिवर्तन के बाद हर एक आश्रम ने व्यक्तिगत रूप से प्रबोधानन्द से मिलकर उसे आभार व्यक्त किया था और इसके बाद एक भव्य कार्यक्रम में प्रबोधनंद को गुरु की पदवी मात्र 22 वर्ष की आयु में दे दी गई थी।

उस समय आश्रम सिर्फ हमारे भारतवर्ष में ही मौजूद था। उसी समय एक अमेरिकन भक्त बनारस के आश्रम में आया था । प्रबोधनंद से मिलने और उनका प्रवचन सुनने के बाद उसने इस आश्रम को वाशिंगटन में खोलने की प्रार्थना की। अमृतआनंद स्वामी और ट्रस्ट के बाकी लोग इस बात के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन एक बार फिर प्रबोधानन्द ने ट्रस्ट के लोगों के साथ मिलकर मंत्रणा की और अमृतआनंद स्वामी की उपस्थिति में सभी को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि मंदिर भारत से बाहर भी खुलना चाहिए।
   उन्होंने सभी से यही कहा कि जब बाकी के धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार प्रसार कर सकते हैं, तो हम इस बात में पीछे क्यों रहें? ठीक है, हम यह मानते हैं कि हमारे धर्म को प्रचार प्रसार की आवश्यकता नहीं है!! लेकिन फिर भी इस तरह के प्रचार में मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती।
दूसरी बात अगर अमेरिका में हमारा भव्य आश्रम् बनता है तो अमेरिका और वहां रहने वाले भारतीयों के द्वारा मोटी रकम चंदे के रूप में हमारे आश्रम को मिलेगी। आप सभी यह मत सोचें कि मुझे रुपयों का कोई लालच है , मैं बस यह चाहता हूं, कि जितनी मोटी धनराशि हमारे आश्रम को मिलेगी उस धनराशि का फायदा हम आश्रम के द्वारा संचालित अस्पतालों वृद्ध आश्रम अनाथ आश्रम आदी में लगाकर अपने आश्रम का लाभ बढ़ा सकते हैं।
   प्रबोधानन्द ने और भी ऐसी कई बातें कही कि ट्रस्ट के सभी आचार्यों के साथ अमृत आनंद स्वामी भी प्रबोधानन्द के भक्त हो गए । सबने एक साथ अमेरिका में मंदिर खोलने को मंजूरी दे दी।

  अमेरिका में मंदिर ट्रस्ट की स्थापना के समय अमृतानंद स्वामी के साथ ट्रस्ट के बाकी लोग भी गए थे। और उन सब के साथ प्रबोधानन्द भी उस कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
   उस अंग्रेज ने तो प्रबोधानन्द के हाथों ही मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कराई जानी चाहिए थी। लेकिन प्रबोधानन्द ने यहां पर अपने स्वभाव की विनम्रता दिखाते हुए अमृतानंद स्वामी को आगे कर दिया और इस प्रकार एक बार फिर वह सब की आंखों में ऊंचा उठ गया था।
उस मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से वापस लौटते साथ सभी मठाधीशों ने एक साथ मिलकर प्रबोधानन्द को गुरु से एक और ऊपर की पदवी यानी आचार्य की पदवी दे दी। वह भी महज़ दो ही सालों के भीतर । यानी कि इस पूरे आश्रम में सबसे कम उम्र में आचार्य की पदवी पर पहुंचने वाला प्रबोधनंद ही बन गया था। महज 24 की आयु में आचार्य का पद पा चुके प्रबोधानन्द के लिये आगे रास्ते खुलते चले गए। अमेरिका में एक बार मंदिर खुलने के बाद यह सिलसिला नहीं थमा। और भारत से बाहर यूरोप लंदन ऑस्ट्रेलिया नीदरलैंड्स एमस्टरडम सभी जगह हमारे ट्रस्ट स्थापित हुए। और हर जगह प्रबोधानन्द अमृतानंद स्वामी के साथ बना रहा। आगे के उनके कई मंदिर के कार्यक्रमों में तो प्रबोधानन्द अकेले ही जाने लगा और फिर ऐसा हुआ कि साल में तीन से चार बार प्रबोधानन्द के विदेशों के चक्कर लगने लग गए…

देखा जाए तो आश्रम की कीर्तिगाथा में प्रबोधानन्द का बहुत बड़ा हाथ है। और दूसरी बात प्रबोधानन्द को तो हमने पुलिस के हवाले कर दिया लेकिन उसे रातों रात छुड़वा कर यहां से बाहर भेजना होगा क्योंकि बाकी सारे कई आश्रमों में उसके श्रद्धालुओ की संख्या इतनी अधिक है कि उसके नाम पर उसके भक्त बवाल मचा देंगे…

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“आप सही कह रहे हैं आचार्य! प्रबोधानन्द ने गलत तो किया है लेकिन साथ ही वो बाहर के लोग भी तो गलत है जिन्होंने आश्रम की महिलाओं के साथ गलत किया है। हमें उनके बारे में भी सोचना चाहिए कि कैसे उन्हें  कानून के हवाले किया जाये।”

  सभी की बातें सुनते बैठे वरुण के दिमाग में फिर कोई बात आने लगी थी…

” मेरे पास एक उपाय है … जिससे आश्रम का गलत लाभ उठाने वाले सभी कानून की गिरफ्त में भी आ जाएंगे और प्रबोधानन्द पर लगे इल्ज़ाम के कारण आश्रम पर कोई आंच न आने पाएगी… लेकिन..!

“क्या है वो उपाय?”

  स्वस्तिकाचार्य ने उससे पूछा ही था कि सभी के लिए चाय लिए पारो और सरिता वहाँ चली आयीं।
हर किसी के सामने चाय का प्याला रखती सरिता ने जब वरुण के सामने प्याला रखा तो उसमें हल्दी वाला दूध देख कर वरुण के माथे बल पड़ गए, उसने तुरंत चेहरा उठा कर सरिता की ओर देखा तो सरिता तुरंत एक तरफ हो गयी और उसने दूसरी तरफ खड़ी पारो की ओर इशारा कर दिया…

   पारो ने आंखों ही आंखों में वरुण से पी लेने की गुज़ारिश की और तभी प्रशांत ने भी धीमे से उसकी ओर झुक कर एक फुलझड़ी छोड़ ही दी…

” सर्दी भी तो है तुम्हें, हल्दी वाला दूध गले को आराम देगा.. पी भी लो, वरना ये भिजवाने वाली तब तक सामने खड़ी घूरती रहेगी जब तक पी नही लोगे।”

  वरुण ने सामने देखा, पारो एक तरफ खड़ी उसे ही घूर रही थी…-“कैसे समझाऊँ इसे ..?”

“क्या समझाना है भाई! पहले खुद समझो, अपनी तबियत देखो, फिर दूसरे को समझाना।”

   वरुण ने एक बार फिर पारो की तरफ देखा और चुपचाप अपना गिलास उठा कर मुहँ से लगा लिया…
   पारो मुस्कुरा कर बाहर निकल गयी….

क्रमशः

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aparna …

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

22 विचार “समिधा -46” पर

  1. एक बात समझ नहीं आई, सबको पता है कि प्रबोधानंद ने जो किया वो गलत है, फिर भी उसे बाहर भेजने की बात कह रहें हैं। जो कुछ भी स्वामी अमृतानंद ने प्रबोधानंद के बारे में कहा , उससे तो ये भी लगता है कि किसी ओहदे पर पहुंचने के लिए ही प्रबोधानंद सब कुछ करता रहा।
    वरुण के लिए पारो की फिक्र, खुद पारो और वरूण को जरुर किसी परेशानी में डाल देगी।😒

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