समिधा – 47

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   समिधा – 47

  
    उदयाचार्य के अपनी बात समाप्त करने के बाद सारे आचार्य सोच में थे सभी की निगाहें वरुण की ओर थीं कि आखिर वरुण के दिमाग में ऐसी कौन सी योजना है जिसके लिए वो इतने आत्मविश्वास से कह रहा है।
  उदयाचार्य ने उससे पूछा पर अपना विचार बताने के पहले वरुण भी कुछ जानना चाहता था।
  
  ” स्वामी जी अब तक आपने जो बताया उससे तो यही मालूम चला कि प्रबोधानन्द जी ने आश्रम के लिए बहुत कुछ किया है। पर मुझे ये समझ नही आ रहा कि इतना ज्ञानी अचानक ऐसे पतित कार्य में कैसे संलग्न हुआ? “

  ” यहाँ उपस्थित सभी के मन में यही बात है शायद। और इस के बारे में मैं कुछ भी नही जानता लेकिन यहाँ उपस्थित स्वस्तिकाचार्य इस बात पर रोशनी डाल सकतें हैं। स्वस्तिक क्या आप इस बारे में कुछ कहना चाहेंगे?”

   अब सभी स्वस्तिकाचार्य की तरफ देखने लगे। अपने गले को ज़रा साफ कर उन्होंने बोलना शुरू किया….

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“मैं शुरू से प्रबोधानन्द के साथ नही था। मैं उसके काफी पहले ही यहाँ आचार्य पद पर आ चुका था। प्रबोधानन्द ने जब आचार्य का पद संभाला तब अमृतानंद स्वामी ने उसे मेरे साथ कर दिया और मुझसे कहा कि मैं उसे आचार्य पद की गरिमा और दीक्षा के बारे में अवगत करा दूं|  मैंने सोचा नया लड़का है इसे अभी बहुत ही चीजें सिखानी समझानी पड़ेगी। लेकिन वह मेरी सोच से बहुत आगे था। और वैसे देखा जाए तो सही अर्थों में वाकई वह बहुत तीव्र बुद्धि का स्वामी था। हम जब तक किसी समस्या के लिए सोचना शुरू कर पाते, उसके पहले ही वह समाधान प्रस्तुत कर दिया करता था। अब ऐसे व्यक्ति को मैं क्या और कैसे सिखा पाता ? इस चीज को मैं भी समझता था और इसलिए मैंने उसे कुछ भी समझाने की जगह उसकी तरफ दोस्ती का ही हाथ बढ़ाया और उसने भी बहुत प्रेम से वो हाथ थाम लिया। उसने बहुत कुशलता से आश्रम की जिम्मेदारी उठानी शुरू कर दी थी। आश्रम में एक नियम था कि हर एक काम के लिए एक व्यक्ति और एक व्यक्ति के लिए एक काम । लेकिन उसने आश्रम के लगभग हर एक काम को पूरी जिम्मेदारी से अपनी निगरानी में करवाना शुरू कर दिया। हर बात के लिए वह आदेश पारित करता और उसके व्यक्तित्व का प्रभाव ऐसा था कि हर कोई उसके सामने नतमस्तक हो उसका आदेश मानने को बाध्य हो जाया करता था। शायद किसी किसी को भगवान अंदर से ही सम्राट बनाकर पैदा करते हैं। प्रबोधानन्द उन्हीं में से एक था, लेकिन कहते हैं ना कि एक सम्राट में जहां लोगों का नेतृत्व करने की क्षमता होती है, निर्णय लेने की क्षमता होती है, सभी में अनुशासन बनाए रखने की क्षमता होती है, वहीं इतनी सारी अच्छाइयों के बावजूद एक सम्राट के अंदर हमेशा अपने आधिपत्य को लेकर एक गर्व की भावना, अभिमान की भावना जरूर रहती है। और उस अभिमान से प्रबोधानन्द भी अछूता नहीं रह सका।

    शुरुआत में जितने प्रेम और प्यार से वह सभी स्वामी गुरु आदि का आदर किया करता था। धीरे-धीरे उसकी आंखों से वह प्यार और सम्मान घटने लग गया। एक समय ऐसा आया कि उसे अपने प्रभुत्व अपने बल पर अपनी बुद्धि और विवेक पर इतना अभिमान हो गया कि, वह अपने साथ के आचार्यों पर भी कड़े शब्दों का प्रयोग करने लगा।
    पहले तो हम सभी ने यह प्रयास किया कि हम प्रबोधनंद की बातों पर ध्यान ही ना दें लेकिन धीरे-धीरे यह समस्या बढ़ने लगी। अब ऐसा हुआ कि जिस आश्रम में वह रहा करता वहां हर एक चीज उसकी पसंद की होने लगी। हर एक कार्य के लिए चाहे कोई भी स्वामी या आचार्य निर्धारित हो, पर उस कार्य को कैसे करना है और कैसे नहीं का निर्णय प्रबोधनंद स्वविवेक से लेने लगा। उसने अब किसी भी कार्य के लिए किसी अन्य से पूछने की आवश्यकता ही समझनी छोड़ दी। एक बार हम सब ने मिलकर सोचा भी की अमृतआनंद स्वामी से इस बारे में बात करनी चाहिए , लेकिन हम सब यह भी जानते थे कि  प्रबोधानन्द अमृतआनंद स्वामी का सर्वाधिक प्रिय शिष्य है, और उनकी आंखों पर उस समय प्रबोधनंद के स्नेह का चश्मा चढ़ा हुआ था। वह इस कदर उससे प्रभावित थे, कि उन्होंने मन ही मन शायद यह तय कर लिया था, कि वह अपनी गद्दी अपने बाद प्रबोधनंद को ही देंगे।
     अमृतआनंद स्वामी की वृद्धावस्था और उनका प्रबोधानन्द पर अटूट विश्वास देखकर हम में से किसी का भी मन नहीं हुआ, कि हम स्वामी जी से प्रबोधानन्द की शिकायत करें। हम मन मार कर रह गये, लेकिन यहीं पर हमने गलती कर दी। अगर कोई विषबेल आपके आंगन में फलने फूलने लगे तो उसे शुरुआत में ही काट कर फेंक देना चाहिए, वरना वह बढ़ते बढ़ते अमरबेल का रूप धर लेती है। और उसके बाद वह उस उद्यान में उपस्थित हर एक वनस्पति को लील जाती है यही हमारे साथ भी हुआ।
    इसके बाद एक बार मैंने गुपचुप तरीके से आश्रम ट्रस्ट में प्रबोधानन्द के खिलाफ शिकायत दर्ज की उसका परिणाम यह हुआ कि, ट्रस्ट ने मुझे ही उस आश्रम से हटाकर दूसरे आश्रम में पदस्थ कर दिया। मैं समझ गया कि प्रबोधनंद की पहुंच अब बहुत ऊंची हो चुकी थी और वह हमारी तरह एक सामान्य आचार्य बस नहीं रह गया था। उसने जितना कार्य हम सबके सामने आश्रम के लिए किया था अंदर ही अंदर उसने ट्रस्ट के लोगों के साथ भी अपने संबंध उतने ही प्रगाढ़ कर लिए थे।
      उम्र तो उसकी भी ऐसी कोई ज्यादा थी नहीं। और जैसे उसकी उम्र थी उस उम्र में सामान्य कामनाएं जागना स्वाभाविक ही था। और इसीलिए आश्रम किसी भी गुरु स्वामी आचार्य से उनकी इच्छा के विरुद्ध जाकर ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करवाता। आश्रम में आज भी सुविधा है कि अगर कोई आचार्य चाहें तो अपने पद से त्याग पत्र देकर विवाह करके गृहस्थाश्रम व्यतीत कर सकते हैं… और जब चाहे तब विवाह की जिम्मेदारियों को निपटाने के बाद अपनी आयु पूरी करने के बाद वानप्रस्थआश्रम में आने पर हमारे कृष्ण आश्रम वापस आ सकते हैं। लेकिन प्रबोधानन्द ने विवाह के मार्ग को नहीं चुना क्योंकि आश्रम में अब उसका अपना एक स्थान था पद था। और उस गरिमामय पद पर रहते हुए वो अपने मनमाने कार्य कर सकता था।
   यह तो हम सबको बहुत बाद में पता चला कि वह विदेशों में मंदिरों के शिलान्यास, निर्माण आदि में बहुत बड़ी राशि लिया करता था। उसमें से कुछ राशि अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए अलग से रख लिया करता था ।जबकि ऐसा करने की आज्ञा किसी को भी नहीं है। अगर आप मंदिर ट्रस्ट के लिए मिली राशि को स्वयं के उपयोग के लिए रखना चाहते हैं तो इसके लिए आपको ट्रस्ट से अनुमति लेनी होती है।
   वैसे भी आश्रम ट्रस्ट हर महीने सभी सदस्यों को फिर चाहे वह गुरु हो आचार्य हों, उनके कार्य और पद के अनुरूप  एक निश्चित राशि प्रदान किया ही करती है। इसके बावजूद प्रबोधानन्द ने राशि का गबन शुरू कर दिया। और यहीं से उसका पतन शुरू हुआ। पहले पहल विदेशों में पूजा-पाठ कर्मकांड करवाने के नाम पर जब भी वो जाया करता था, तो अपने आने-जाने का खर्च भी वह विदेशों में स्थित अपने यजमानों से ही वसूला करता था। वहीं धीरे से उसकी कुछ महिला मित्र बननी शुरू हुई, और फिर उसे एक बार इस तरह की मित्रता की आदत हुई वो सुधारने की जगह बिगड़ता ही गया।

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    मैंने अपने स्तर पर उससे बात करने की और समझाने की बेहद कोशिश की, लेकिन अब वह जिस स्थान पर पहुंच चुका था वहां उसे उसके अभिमान ने इस कदर जकड़ रखा था कि वह अपने सामने हर किसी को गलत समझने लगा। तरह-तरह के कुतर्कों से उसने मुझे भी परास्त कर दिया। मैंने एक बार उसे यह धमकी भी दे दी कि मैं ट्रस्ट से बात करूंगा, लेकिन मेरे द्वारा ट्रस्ट में बात किए जाने से पहले ही उसने पता नहीं ट्रस्ट के लोगों से क्या बात की कि मुझे मेरे पद से एक पद नीचे स्थान देकर ट्रस्ट ने एक बार फिर मेरा स्थान बदल दिया।
   उसने पता नही ट्रस्ट के लोगों को क्या घुट्टी पिलाई थी , कि कोई उसके बारे में कुछ सुनना ही नही चाहता था। और बस इसलिए मैं भी चुप लगा गया। लेकिन मुझे नही पता था कि बढ़ते बढ़ते उसकी मनमानी इतनी बढ़ जाएगी कि वो अपने ही आश्रम की महिलाओं पर कुदृष्टि डाल बैठेगा।
   और ये उसने जो भी किया है कहीं से भी क्षमा के योग्य नही है। इसलिए उदयाचार्य जी का ये कथन की उसे बाहर निकलवाना होगा मुझे रास नही आ रहा है। हालांकि उदयाचार्य जी ने ऐसा कहा है , तो कुछ सोच कर ही कहा होगा लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर तो नही चाहता कि वो बाहर आये। बल्कि ये चाहता हूं कि कुछ ऐसा हो जिससे आश्रम की बदनामी हुए बिना ही उसे उसके किये की सज़ा मिल जाये और साथ ही इस कार्य में उसके साथ संलग्न अन्य लोगों को भी जेल का सुख मिल सके।
   बोलो वरुण तुम क्या कहना चाहते थे।”

” गुरुवर आप सभी मुझसे बड़े हैं श्रेष्ठ भी हैं। मेरे मन में यह विचार आया था कि अगर आश्रम ही प्रबोधानन्द के खिलाफ रिपोर्ट करेगा तो आश्रम की बदनामी नही होगी। पर अगर कोई श्रद्धालु या भक्त आश्रम के किसी सदस्य पर उंगली उठाता है तो पूरे आश्रम की बदनामी होती है। मेरा कहना बस ये है कि हमें अमृतानन्द स्वामी जी को सारी बातें बता देनी चाहिए। उसके बाद वो प्रबोधानन्द के खिलाफ लिखित कार्यवाही कर उस कार्यवाही को ट्रस्ट में भेज कर पारित करवाएं और उसके बाद सार्वजनिक रूप से अगर अमृतानन्द आचार्य प्रबोधानन्द का पद समाप्त कर उसे मठ से निष्कासित करने का आदेश दे देते हैं, तो उसके बाद उस पर कोई भी इल्जाम लगे वो सारे उसके अपने होंगे और तब उसके किये कार्यों का और उस पर लगे आरोपों का कोई दुष्प्रभाव आश्रम पर नही पड़ेगा।”

  वहाँ उपस्थित सभी आचार्यों ने एक साथ वरुण की बात पर सहमति की मुहर लगा दी।  तुरंत ही सर्व सहमति से उदयाचार्य जी ने अमृतानन्द स्वामी को फ़ोन मिला दिया।
    सारी बातें सुनने के बाद अमृतानन्द स्वामी भी सकते में आ गए। उनके मन के लिए ये बहुत बड़ी चोट थी, उन्होंने प्रबोधानन्द को अपनी संतान मान कर प्रेम किया था, और अपनी संतान का ऐसा कलुषित दुर्व्यवहार उनके लिए असहनीय था। बड़ी कठिनता से उन्होंने खुद को संभाला और अगले ही दिन आश्रम पहुंचने की बात कह कर फ़ोन रख दिया।
   वहाँ उपस्थित सभी आचार्य वर अब भी परेशान थे पर अब कम से कम उन सभी को एक मार्ग मिल गया था।
   उदयाचार्य जी ने वरुण और प्रशांत को  स्वस्तिकाचार्य के साथ मिलकर प्रबोधानन्द के काले कारनामों को कलमबद्ध करने की ज़िम्मेदारी दी और इस मामले में जो भी जितना प्रकाश डाल सकता था, उनसे उतनी सहायता करने की बात रख दी।

  शाम की आरती का समय होता देख उनमें से कुछ आचार्य पूजा स्थल को चले आये।
   रात्रि के भोजन के बाद भी कुछ समय वेद चर्चा हुआ करती थी। उसके लिए आज दो दिन से कोई एकत्र नही हो पा रहा था। इस हेतु आज उदयाचार्य ने सभी से विशेष आग्रह कर सभी को कृष्ण मंडप में बुलाया था।
    खाने के बाद वरुण कुछ देर को सरोवर की सीढ़ियों पर आ बैठा था। वो धीमे धीमे छोटे छोटे तिनके ऊपर की सीढ़ियों पर बैठे सामने पानी में फेंकता जा रहा था। सीढ़ियों का ऐसा निर्माण हुआ था कि ऊपर की सीढ़ियां खड़ी सी थी और नीचे की ढलान पर थीं। जिसके कारण अगर कोई सबसे नीचे की सीढ़ियों पर बैठा हो तो ऊपर बैठे इंसान को दिखाई न दे।
   वही वरुण के साथ हुआ। वो तिनके पर तिनके फेंकता रहा और कुछ देर में ही नीचे की सीढ़ियों पर कुछ हलचल सुनाई पड़ी,वरुण ने ध्यान से देखा नीचे की सीढ़ियों से पारो ऊपर चली आयी।
   उसके बालों में जगह जगह तिनके फंसे हुए थे।
वो उन्हें धीमे से निकालते हुए चली आ रही थी। वो खुद खाने के बाद सरोवर के पास बैठी वरुण के बारे में ही सोच रही थी। वो सोच रही थी कि वरुण में ऐसा क्या था जो उसके आसपास रहने पर उसे ऐसा आभास होता था जैसे वो देव के पास हो… और कहीं उसकी आंख बंद हुई तब तो बिल्कुल यही लगता कि उसके पास वरुण नही देव है। वरुण उसे कोई अपरिचित अनजान पुरुष क्यो नही लगता था। उसकी मुस्कान, उसकी गहरी आंखें सब कुछ उसे क्यों डुबाने पर तुली थीं।
   बहुत बार दिमाग लगा कर सोचने पर उसे आभास होता था कि उस जैसी स्त्री को ऐसे लुभावने सपने देखने का कोई हक नही है ,जब वो अकेली होती हर बार यही प्रण करती की अब वो वरुण के मोहपाश में नही फंसेगी पर उसे एक झलक देखते ही वो जैसे सब भूल कर रह जाती।
   आज भी सरोवर में बैठी वो यही सोच रही थी कि शायद वरुण उससे दूर भागना चाहता है और एक वो है कि उससे चिपकी चली जा रही है,अब उसे भी अपना मन कड़ा करना ही होगा।
  की तभी उसके बालों में एक तिनका आकर उलझ गया, और फिर एक के बाद एक आते ही चले गए और कहीं बाल चिड़िया का घोंसला न बन जाये इस डर से उसे अपनी जगह से उठ कर ऊपर जाना पड़ा जहाँ वरुण उसे आश्चर्य से खड़ा देख रहा था।
  वरुण तक पहुंचते ही उसका नियंत्रण बिगड़ा और वो अपनी ही साड़ी में उलझ कर गिरने को थी कि वरुण ने उसे सम्भाल लिया। उसकी कमर के इर्द गिर्द वरुण की बाहों का घेरा था।
    पारो का कलेजा जैसे उछल कर मुहँ को अ गया। उसकी डर से आंखें बंद हो गयी। और वरुण की उंगलियों के स्पर्श से उसके सोए मन के सारे तार झनझना उठे…
  …. वो पता नही कब तक वैसी ही खड़ी रह जाती की उसे पकड़ कर वरुण ने  सीधा खड़ा कर दिया….

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” आंखें खोलो पारोमिता , तुम ठीक हो!”

  घबरा कर पारो ने आंखे खोल दी… अब भी उसकी धड़कन रेलगाड़ी से होड़ लेती भाग रही थी।

“सांस लो पारोमिता!”

  पारो ने एक नज़र वरुण को देखा और शरमा कर नीचे देखने लगी।

  उसकी हालत समझते हुए भी वरुण उसे वहीं छोड़ तेज़ कदमों से अपने कमरे की ओर चला गया।

“पहले तो पारो ही कहा करते थे, अब अचानक पारोमिता? लेकिन क्यो ?
   अपनी सोच में गुम पारो भी भारी कदमों से अपने भगिनी आश्रम की तरफ मुड़ गयी…

क्रमशः

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aparna …..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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