समिधा -48

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समिधा – 48

       गुरु आचार्यों के बुलावे पर अमृतआनंद स्वामी अगले दिन ही आश्रम पहुंच गए। उनके वहां पहुंचने से पहले सभी आचार्यों ने मिलकर प्रबोधानंद के कार्यों का सारा लेखा-जोखा लिपि बद्ध कर रखा था। जिससे कि अमृतानंद स्वामी को इस बारे में निर्णय लेने में अधिक समय ना लगे।
     अमृतानंद स्वामी ने सारी चीजें पढ़ी और उसके बाद उन्होंने सभी गुरुओं के साथ बैठकर एक निर्णय लिया और तुरंत ही मंदिर ट्रस्ट की तरफ एक चिट्ठी भेज दी।
    मंदिर ट्रस्ट को सूचना भेजने के साथ ही वरुण के कहने पर अमृतानंद स्वामी ने प्रेस रिलीज भी जारी किया, और जिसमें उन्होंने लिखित और मौखिक आदेशात्मक निर्णय दिया कि प्रबोधानंद स्वामी का अब इस कृष्ण मंदिर या आश्रम से कोई भी लेना देना नहीं है । किसी समय अमृतानंद स्वामी ने जरूर यह सोचा था कि अपने बाद वह अपनी गद्दी प्रबोधानंद को ही सौंपेंगे लेकिन अब उन्होंने साफ और स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उनके बाद उनकी गद्दी प्रबोधानंद को किसी भी हाल में नहीं दी जा सकती।

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     मीडिया और अखबार वालों के लिए यह बहुत बड़ी खबर थी, क्योंकि प्रबोधानंद एक बहुत बड़ा नाम था। और उनका इस तरह से आश्रम से बेदखल होना सबसे बड़ी सनसनीखेज खबर बन कर आई थी।
     अब तक मीडिया वालों को यह खबर नहीं पहुंची थी कि प्रबोधानंद को पुलिस पकड़ कर ले जा चुकी है।
उन लोगों को तो रोज के लिए एक मसाला मिल गया था और इसलिए वह उन खबरों में नमक मिर्च लगाकर उनका समय समय पर प्रसारण कर रहे थे।
   इधर अमृतानंद स्वामी के द्वारा मंदिर ट्रस्ट को विज्ञप्ति  भेजने के बाद ट्रस्ट ने भी प्रबोधानंद के खिलाफ पुलिस में जांच के लिए शिकायत दर्ज करवा दी थी।

   ये सब कुछ होने के साथ ही पुलिस आश्रम में आकर कुछ दो चार भगिनी आश्रम की महिलाओं का लिखित बयान लेकर चार्जशीट तैयार करने में लग गयी।
   केस हाई प्रोफाइल था, इसलिए पुलिस भी तुरंत हरकत में आई थी और हफ्ते भर में ही प्रबोधानन्द का केस कोर्ट में लग गया था।

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    इस सब झमेलों में प्रबोधानन्द ने एकदम से चुप्पी साध ली थी। उसकी तरफ से अब तक कोई बयान जारी नही हुआ था।
   बावजूद चारुलता डर के मारे बिना किसी को कुछ बताए वहाँ से रातों रात भाग खड़ी हुई थी। वहां भगिनी आश्रम में भी उसके बारे में किसी को कुछ नही पता था।।
   उसके ऑफिस में भी कोई उसके बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नही रखता था। जिससे पुलिस कुछ मालूमात कर पाती।
   और इसी लिए चारुलता के खिलाफ जुर्म दर्ज होने के बावजूद पुलिस उसे पकड़ नही सकी।

  आश्रम का काम वापस सुचारू रूप से प्रारम्भ हो गया। अमृतानन्द स्वामी कुछ दिन ठहर कर वापस निकल गए।
    भगिनी आश्रम की महिलाओं के लिए शिक्षा प्रारम्भ करने की उन्होंने जो बात ट्रस्ट के पास भेजी थी, वो प्रस्ताव भी ट्रस्ट ने पास कर दिया था।
   और अब आश्रम की वो महिलाएं जो आगे अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं, उनके पाठशाला जाने का मार्ग प्रशस्त हो चुका था।
   ये बात मालूम चलते ही पारो ने सबसे पहले दर्शन को चिट्ठी लिखी, और अपने मन की खुशी उसने अपने बालसखा के साथ बांट ली।
   चिट्ठी पढ़ने के बाद चिट्ठी का जवाब देने के बदले दर्शन खुद अपनी बऊ दी से मिलने चला आया था। दर्शन के हाथों पारो की जेठानी आनन्दी ने कुछ दो तीन हल्के रंगों की साड़ियां भी भेज दी थीं और साथ ही पारो के पसंदीदा गुड़ के संदेश भी।
   पर जाने क्यों ये सारा सामान देख कर भी पारो के चेहरे पर कोई प्रसन्नता के भाव नही छलके। शायद वो भी समझती थी कि अपने सर पर बैठी तीन तीन सासों की नज़र से छिपा कर कुछ भेजना आनन्दी के लिए कितना कठिन रहा होगा।

   उसे वैसे भी इन सारे सामानों की आवश्यकता से कहीं अधिक आवश्यकता किसी के साथ और सहारे की थी। उसे लगा काश सामान भेजने की जगह बऊ दी ही आ जाती..
   वो दर्शन के साथ आश्रम के ऑफिस के बाहर खुले आंगन में बैठी थी… उसे सामान देख कर भले न हुई हो पर दर्शन को देख कर बहुत खुशी हो रही थी।

” घर पर सब कैसे है दर्शन?”

“सब मजे में हैं बऊ दी। तुम बताओ, तुम कैसी हो? क्या तुम्हारे घर से कोई आता रहता है मिलने?”

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  वो क्या जवाब देती, क्योंकि वो जानती थी कि उसकी माँ की कैसी हालत थी वहां। दिन रात अपनी जेठानियों की गृहस्थी में कोल्हू के बैल सी जुती उसकी माँ के पास तो शाम के समय हाथ मुहँ धोने का भी वक्त नही हो पाता था। वो बेचारी किसी तरह बाली दादा से मिन्नतें कर ही एक बार बस यहां आ पाई थी। बाली दादा को भी पारो से स्नेह था लेकिन बात वहीं आकर अटक जाती थी कि एक जवान लड़की की ज़िन्दगी भर की ज़िम्मेदारी कोई नही लेना चाहता। जैसे उसकी उम्र और उसका रूप ही उसका सबसे बड़ा दोष हो, उसका सबसे बड़ा शत्रु हो।
   आज अगर उसका पति साथ होता तो उसकी यही खूबियां उसे स्वर्ग का सुख दिलवाती होतीं और आज उसकी यही खूबी उसकी सबसे बड़ी खामी बनी उसकी जिंदगी की पतवार को डिगा रही थी।

  ” नही दर्शन !! एक तुम्हारे अलावा कोई मिलने नही आ पाता है। मैं भी सबकी समस्या समझती हूं। और वैसे देखा जाए तो कोई मुझसे मिलने कम ही आये तो मेरे लिए ही अच्छा है। वरना घर की याद ज़्यादा आने लगती है।”

  पारो की बात पर दर्शन ने आंखें झुका ली। उसे अचानक सूझा नही की वो क्या कहे। पारो को भी बोलने के बाद लगा कि उसने ऐसा क्यों बोल दिया। अब धीरे धीरे उसका अपने घर पर के लोगों पर गुस्सा कम भी तो हो गया था। अब तो वो अपनी माँ की मजबूरी समझ पा रही थी पर कभी कभी उसके मन का विद्रोह बाहर निकल ही आता था।

” तुम्हें स्कूल कब से जाना है? “

“बस दो चार दिन में शुरू हो जाएगा। स्कूल में दाखिला नही हुआ है। अब यहाँ के गुरुवर पर निर्भर करता है कब दाखिले के लिए लेकर जाते हैं?”

“हाँ !! पर उन्हें जल्दी करना चाहिए। क्योंकि ऐसे तो पढ़ाई में पिछड़ जाओगी? और फिर इस बार बारहवीं हैं ना? “

“तुम्हें क्या लगता है दर्शन ? तुम्हारी बऊ दी स्कूल के भरोसे अब तक बैठी होगी। वो तो तुमने जिस दिन किताबें पहुंचाई थी, उसी दिन से मेरी पढ़ाई भी शुरू हो गयी थी।
   अपने स्तर पर देखा जाए तो मैं काफी कुछ पढ़ चुकी हूं। भौतिक विज्ञान और रसायन थोड़ा कम समझ में आते हैं,वो शायद स्कूल जाने से आने लगेंगे।”

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“इतना आसान नही होता बऊ दी। मैंने तो ट्यूशन भी शुरू कर दी है। बिना अलग से पढ़े ये सब समझ में आना बहुत कठिन है। “

“अब कठिन हो या सरल,मुझे तो खुद ही पढना है। यहाँ आश्रम की तरफ से मुझे स्कूल जाने की मंजूरी मिल गयी क्या उतना कम है? अब उसके ऊपर मैं ये नही कह सकती कि मुझे पढ़ाई समझ में नही आ रही और मुझे ट्यूशन भी लेनी है।”

” एक उपाय है। मैं हर रविवार आकर तुम्हारी हफ्ते भर की पढ़ाई का लेखा जोखा ले लूंगा। और जो तुम्हें नही समझ मे  आएगा….

“उसे मैं पढ़ा दूंगा।”

  दर्शन की बात आधे में ही काट कर वरुण बोल गया।
आश्चर्य से दर्शन और पारो उसे देखने लगे।

*****

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  वरुण अपने कमरे से निकलने के बाद से ही पारो को इधर उधर ढूंढ रहा था। उसे उससे कोई विशेष काम नही था,बस यूं ही कि वो क्या कर रही है? कहाँ है जानने के लिए ही उसकी आँखे बेकरार हुई जा रही थी।
   कमरे से निकल कर बाहर आने के बाद उसने एक बार कृष्ण मंडप पर नज़र फिराने के बाद भगिनी आश्रम की तरफ भी रुख किया।  आश्रम के सामने से निकलते हुए उसने चोर नजर से वहाँ के बाहरी परिसर पर दृष्टि डाली पर वो नज़र नही आई।
   वहाँ से हट कर वो एक बार सरोवर की सीढ़ियां भी उतर आया,लेकिन आज पारो वहां भी नही बैठी थी। सब जगह देख कर हारा थका वो कृष्ण मंडप की ओर बढ़ ही रहा था कि प्रशांत सामने से आता दिख गया…

” क्या बात है भाई वरुण? किसे ढूंढ रहे हो?”

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“किसी को नही ! मैं तो बस यूं ही टहल रहा था।”

” इस वक्त पर टहल रहे हो? “

  प्रशांत के माथे पर चिंता की लकीरें देख वरुण ने उसे टालने के उद्देश्य से कह दिया….

“अरे मैं तुम्हें ही ढूंढ रहा था।”

  वरुण की बात पर प्रशांत मुस्कुरा कर रह गया..

“मैं भगिनी आश्रम में कब से रहने लगा? “

अपनी चोरी पकड़ी जाती देख वरुण प्रशांत से नज़र चुराता आगे बढ़ने लगा, की पीछे से प्रशांत ने उसे वापस टोक दिया….

” आश्रम के ऑफिस में कोई लड़का आया है पारोमिता से मिलने। पता नही कौन है?”

“उसका देवर दर्शन होगा। वही आता है अक्सर …”

  वरुण का इतना त्वरित जवाब सुन प्रशांत मुस्कुराने लगा। मुस्कुरा कर वो आगे बढ़ गया, और अपनी जल्दबाजी और उतावलेपन पर वरुण अपना माथा पीट कर रह गया।
  ” हद है , खुद पर ज़रा सा भी संयम नही है और बनने चलें है सन्यासी। यही हाल रहा तो आज प्रशांत ने टोका है कल को सारा आश्रम समझ जाएगा। “

मन ही मन खुद से बात करते वरुण पुस्तकालय की ओर बढ़ ही रहा था कि उसका दिल नही माना ।
  ” भाड़ में गई मेरी समझदारी। एक बार देख तो लूँ की वाकई मिलने आया कौन है?”

  वापस अपने मन से लड़ते हुए वरुण ऑफिस की तरफ को बढ़ चला।
   उस वक्त दर्शन पारो को पढ़ाई और ट्यूशन का महत्व बता रहा था कि वरुण पहुंच गया और दर्शन की बात आधे में ही काट कर उसने अपने मन की बात रख दी …
  दर्शन कह ही रहा था..

“एक उपाय है। मैं हर रविवार आकर तुम्हारी हफ्ते भर की पढ़ाई का लेखा जोखा ले लूंगा। और जो तुम्हें नही समझ मे  आएगा….

“उसे मैं पढ़ा दूंगा।”

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   कि वरुण ने बीच में ही उसकी बात काट दी। वरुण को यूं वहाँ अचानक पहुंचना देख कर दर्शन और पारो चौंक गए।

  पारो आश्चर्य से आंखें फाड़े वरुण को देखने लगी..

“हाँ !! सच कह रहा हूँ। फिज़िक्स और केमेस्ट्री तो पढ़ा ही सकता हूँ। बाकी बचा बायोलॉजी , उसके लिए दर्शन तुम मदद कर देना ।”

” जी दादा!! सॉरी मैंने आपको गुरु जी की जगह दादा कह दिया। हमारे बांग्ला में बड़े भाई को दादा बुलाते हैं ना।”

  वरुण ने हंसते हुए दर्शन के कंधे थपथपा दिए…

” हाँ तो बोलो ना!! मैंने कब मना किया है बाबुन !!

  वरुण की बात सुनते ही दर्शन एकदम से उसकी तरफ देखने लगा, क्योंकि उस पर बहुत लाड़ आने पर उसके देव दादा भी उसे बाबुन ही बुलाते थे।
    उसे इस तरह खुद को देखते पा कर वरुण मुस्कुराने लगा…

“अरे बड़ा भाई ही तो हूँ तुम्हारा। “

  दर्शन का एकदम से दिल किया कि वरुण के गले से लग जाये लेकिन संकोच में सकुचा कर वो चुप खड़ा रहा, कि तभी वरुण ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया।
    वरुण के गले से लगते ही दर्शन की आंखें भीग गयी। उसे बिल्कुल ऐसा लगा जैसे उसके देव दादा वापस आ गए….

   पारो की खुद आंखे भीगने लगी… उन दोनों को ऐसे साथ खड़े देख वो भी खुद को सम्भाल नही पायी।

“अब तुम क्यों रोने लग गयीं?”

  वरुण ने दर्शन को प्यार से एक ओर कर पारो की तरफ देखते हुए अपना सवाल दाग दिया। और वो वरुण के ऐसे अपनत्व भरे स्वर से एकदम पिघल गयी।
   दो दिन से वरुण से जो मन ही मन नाराज़गी पाले बैठी थी,सब भरभरा कर चूर चूर हो गयी।

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  कैसा निष्ठुर था वो…. जब वो उससे दूर जाने की सोच उससे मन हटाने लगती तभी एकदम अपना सा बन उसके पास चला आता। और जब जब आता उसे देव का एहसास करा जाता। ऐसा लगता जैसे सिर्फ अपनी मीठी बातों से ही उसे सहला गया हो।
   और वो चाह कर भी उसके मोह से अपने आप को अलग नही कर पाती।

  पता नही कृष्ण भी कैसी लीला रच रहे थे…. कि उसके उस बंजर मन में जहाँ वो सोचे बैठी थी कि अब कोई जलधारा नही बहनी है वहाँ अमृत का स्रोत बहाने की तैयारी कर रहे थे….

क्रमशः

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aparna ….

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लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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