समिधा -49

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समिधा -49

   आसमान से उतरती धूप चेहरे पर पड़ती बहुत भली लग रही थी, और उससे भी भला लग रहा था, उन दोनों का साथ।
    वरुण और दर्शन को साथ बातों में उलझे देख पारो उन दोनों को अपलक निहार रही थी। वरुण कितने प्यार से दर्शन से घर भर की खबर ले रहा था। जैसे हर किसी को जानता हो।
   ठाकुर माँ के घुटनों से लेकर माँ के ठाकुर जी ( कान्हा जी) तक,बाबा की दुकान से लेकर काकी की बेटी के ससुराल तक हर बात की तसल्ली से तस्दीक कर रहा था कि सब कुशल हैं या नही।
   यहाँ तक कि दुकान की बढ़त के लिए उसने दर्शन को जाने कितने तरीके और नए तरीके के सामान भी बता दिए थे।
   इस बार दुर्गा पूजा में चंडी मंडप कहाँ बनेगा, क्या कैसा होगा? उन लोगों की ये सारी बातें सुनती बैठी पारो धीरे धीरे आश्चर्य में डूबने लगी।
   ये तो उससे भी ज्यादा उसके घर को जानता था।

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लेकिन वो कैसे ये सब जानता था? जितने आराम और तसल्ली से वो दर्शन के कंधे पर हाथ रखे बैठा था, दूर से क्या नज़दीक से देखने पर भी लोगों को यही लगेगा कि दो भाई साथ बैठे एक दूजे का हाल चाल ले रहे हैं।
    जाने उस शाम में ऐसा कुछ था या पता नही क्या बात थी पर पारो वरुण पर से नज़रे फेर ही नही पा रही थी।
   
    वही चौड़ा माथा, हल्के बिखरे उलझे से बाल, और तीखी लंबी नाक और उसके नीचे उसके भींचे हुए होंठ।
    बिल्कुल जैसे किताबों में देखी किसी बहुत सुंदर ग्रीक देवता की तस्वीर हो…
  … जिसमें उसने अपना एक हाथ बड़ी अदा से अपने घुटनों पर टिका रखा हो, सतर चौड़े कंधे खुले हुए और उन पर झूलती अलकें, और ऊपर आसमान की ओर ताकती बड़ी बड़ी पलकों वाली आंखें …
….. हाँ ये चेहरा उसने देखा तो था….
…. उस शाम जब वो भागती दौड़ती जोइता के घर पहुंची थी और वो किसी अंग्रेज़ी पत्रिका के पन्ने पलट रही थी।
  वहाँ उस ग्रीक देवता जो अपने सुंदर नयन नक्श और सुंदर देहयष्टि के लिए प्रसिद्ध है को देख कर उसे इसी चेहरे की तो याद आयी थी।
   और फिर उसके बाद उसने इस चेहरे को देखा था, काली मंदिर में…
   हे भगवान!!! ये तो वही लड़का है जो मंदिर के बाहर बच्चों को गुब्बारे दिला रहा था..
…. ये तो स्वयं द्वारिकाधीश हैं फिर इनकी सत्यभामा कहाँ गयी।

  कड़ी से कड़ी जुड़ती चली गयी और पारो को एकाएक वरुण से हुई हर मुलाकात याद आती गयी। आज तक वो किस भुलावे में बैठी थी,उसे याद क्यों नही था कि वो वरुण से पहले मिल चुकी है।
   पर खैर याद आ जाने से भी क्या बदल जाना था।मंदिर की मुलाकात के बाद साड़ियों के बाज़ार में भी तो मिलना हुआ था,जहाँ उसकी पसन्द की साड़ी को उसी सनकी सत्यभामा ने छीन लिया था।
  और उसके बाद उसने वरुण को आखिरी बार देखा था अपनी शुभ दृष्टि में…
….अपनी सप्तपदी की शुभ दृष्टि में जिसमें उसे देव को देखना था!!!

    पारो की आंखें जाने क्यों छलकने को बेकरार हुई जा रहीं थीं।

     ये कैसी सज़ा मिल रही थी उसे। पहले भगवान ने उसके बाबा को छीन लिया जब बाबा जैसे ही उसका ध्यान रखने के लिए देव को उसकी जिंदगी में भेजा तो फिर उसे वापस क्यों छीन लिया।

  और अब जब उसे छीन ही लिया तो मन को इतना कड़ा तो बना सकते थे कि वो इस तरह वरुण की ओर न फिसले? क्या वरुण को लेकर उसका ऐसा सोचना उसे शोभा देता है।अब जब उसके जीवन से सारे रंग जा चुके हैं तब फिर वो क्यो वरुण को देखने भर से गुलाबी हुई जाती है।

   वो उन दोनों को देखती बैठी थी कि वरुण ने पारो की तरफ देख अपना प्रस्ताव रख दिया…

“आज दर्शन हमारे साथ यहीं आश्रम में रुकेगा। क्यों ठीक है ना पारोमिता?”

   वो तो इतनी देर से उसे ही देखती बैठी थी, लेकिन साथ ही ये भी सोच रही थी कि उसे मालूम नही चलेगा? पर ऐसा कहां सम्भव था?
वरुण भले ही दर्शन से बात कर रहा था, लेकिन तब भी उसे पारो की आंखें खुद पर महसूस हो रहीं थीं।

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  पारो ने हाँ में सिर हिलाया और उठ कर अंदर जाने लगी…
   उसे लगा शायद वरुण उसे रोकेगा या पूछेगा कि कहाँ जा रही हो पारो? पर ऐसा कुछ नही हुआ।
  पारो ने जाकर पद्मजा दीदी को बता दिया कि आचार्य वरुण के कहने पर आज उसका देवर दर्शन वहाँ रुकने वाला है इसलिए उसके लिए भी भोजन की तैयारी करनी होगी।

    वो वापस लौट रही थी कि उसे पद्मजा दीदी ने कोई काम बता कर वहीं रोक लिया। हालांकि उसका मन तो वहीं बाहर लगा हुआ था फिर भी मन को मार कर वो वहीं काम पर लग गयी।
   कुछ देर बाद पद्मजा दीदी ने सरिता को बुला कर चाय की ट्रे पकड़ा दी कि बाहर बैठे लोगों को दे आये। पारो का मन वहीं अटका पड़ा था, पर इतनी औरतों के बीच सरिता से ट्रे लेने की उसकी हिम्मत नही हुई।
   उधर सरिता चाय लेकर बाहर पहुंची… वरुण और दर्शन के साथ ही अब प्रशांत भी वहाँ मौजूद था। वरुण ने चाय लेते हुए सामने वाली पर नज़रें उठायी तो सामने पारो की जगह सरिता थी, तुरंत उसके चेहरे का रंग बदल गया।
    वक्त रहतें ही वरुण ने खुद को संभाल लिया लेकिन प्रशांत की नज़रों ने उसकी ये चोरी पकड़ ही ली।
    शाम की आरती का समय हो चुका था। आरती के बाद आज वरुण का ही प्रवचन था।

   दर्शन श्रद्धालुओं के साथ सामने ही बैठ गया…  वरुण अपने आसन पर आया तो आज उसकी पुस्तिका के ठीक बगल में एक छोटा सा सफेद रुमाल रखा था, जिस पर नीले हरे रेशमी धागों से मुरली और मयूरपंख काढ़ा गया था। रुमाल इस ढंग से मुड़ा रखा था कि उसमें कढ़ी मुरली और पंख सामने ही नज़र आ रहे थे।
   वरुण को पाठ प्रवचन के बीच पानी के दो घूंट लेने की आदत थी, और जिसके बाद अक्सर उसके पास मुहँ पोंछने को कुछ नही होता था। और वो अक्सर अपने कुर्ते की बाँह से ही ये काम कर लिया करता था। आज वहाँ रखा रुमाल देख उसे रखने वाली याद आ गयी और उसके चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी। वरुण को लगा जैसे कोई उसे देख रहा है उसने जैसे ही सामने नज़र उठायी प्रशांत उसे ही देखता खड़ा था। प्रशांत ने उसे देखते ही अपने दोनो कंधे उठा कर ” कहाँ तक भागोगे ” वाली मुस्कान दी और बाहर निकल गया।
   प्रवचन के बाद श्रद्धालुओं का समय तय था। वे अपनी समस्याएं स्वामी जी को बताया करते थे। वैसे तो आज के पहले वरुण ने इस समस्या परश्नोत्तरी पर काम नही किया था। और आज पहली बार वो यहाँ श्रद्धालुओं की जिज्ञासा दूर करने बैठा था।।
   उस भीड़ भाड़ के बीच से एक महिला उठ कर हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी…

“स्वामी जी!! मेरी शादी को साढ़े चार साल पूरे हो चुके हैं लेकिन अब तक मुझे संतान सुख नही मिला। स्वामी जी आप कुछ उपाय बताएं जिससे हमें संतान प्राप्ति हो सके।”

वरुण उस महिला की बात सुन हल्के से मुस्कुराने लगा।

” आपकी उम्र क्या है बहन ?”

“जी स्वामी जी इसी महीने तीस पूरा हो जाएगा।”

“ठीक है , मैं अब जो उपाय बताने जा रहा हूँ, वो आपको और आपके पति को एकसाथ मिलकर करना होगा,क्योंकि संतान तो दोनो के ही प्रयासों से ही मिलेगी ना!”

  उस औरत और उसके पति ने हाथ जोड़े हुए ही हाँ में सिर हिला दिया।

” आप दोनों की उम्र और शादी को बीता समय देख कर मैं समझ सकता हूँ कि आप बच्चे को लेकर कितना परेशान होंगे।”

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“स्वामी जी हम दोनों तो एक दूसरे के साथ भी बहुत खुश हैं लेकिन घर परिवार नाते रिश्तेदार हमें चैन से जीने नही देते। जहाँ जाओ हर कोई हमें बच्चे के लिए टोकना शुरू कर देता है। इसलिए लगता है कि अब बच्चा हो ही जाना चाहिए।”

“तो क्या आप बच्चा दुनिया वालों के लिए पैदा करना चाहते हैं?”

“नही वो मतलब नही था मेरा?”  और औरत के पति ने अपनी सफाई दी..

“पर मेरा यही मतलब है। आप दोनो ध्यान से मेरी बात सुनियेगा। अगर आपको चार सालों में संतान नही हुई तो इसमें आपके प्रारब्ध का ही दोष हो ऐसा ज़रूरी तो नही। सबसे पहले अपने शरीर में क्या ऐसी समस्या है वो जानने की कोशिश कीजिये क्योंकि संतान नही हो पाने की चिकित्सा एक डॉक्टर मुझसे कहीं ज्यादा अच्छी तरह कर सकता है। मैं कोई चिकित्सक तो हूँ नही जो आपकी समस्या का निदान कर पाऊं।
   अब मुझे ये बताइये की क्या आपने पहले कभी किसी डॉक्टर से परामर्श लिया है?

“नही गुरुवर!!”

“क्यों? आपको मेरे पास आने से पहले वहीं उनके पास ही जाना चाहिए था न।
  आप अगर तन मन से बच्चे के इच्छुक हैं तो कल ही डॉक्टर के पास जाए।
अब दूसरी बात आपके मन में जब तक स्वयं के लिए ये निर्णय  लेने की बात न आये तब तक सिर्फ दुनिया के लिए आपको कुछ भी करने की क्या आवश्यकता है।
   क्योंकि दुनिया के लिए आप जितना करतें जाएंगे वो आपसे और भी ज्यादा की उम्मीद रखती जाएगी। जब तक लड़का या लड़कीं की शादी न हो जाये तब तक उन्हें शादी करने की सलाह दी जाती है उसके बाद  बच्चे के लिए सलाह दी जाती है, और सिर्फ सलाहें ही दी जाती हैं कोई मदद नही की जाती। इसलिए मेरा यही मानना है कि सिर्फ ये सोच कर की घर पर सभी रिश्तेदारों , सभी दोस्तों ने यही निर्णय लिया है तो हमें भी लेना चाहिए, आप कोई भी निर्णय न लें।
और जब आप दोनो पूर्ण प्रसन्नता और हृदय से अपने परिवार को बढ़ाने के लिए तैयार होंगे तब कृष्ण स्वयं आपका परिवार बढ़ा देंगे।
   कृष्ण पर आपके विश्वास को कभी खोना नही है। क्योंकि आपके लिए जो उचित होगा वो आपको बिना किसी बाधा के ज़रूर मिलेगा और जो आपके हिस्से का नही होगा वो आपको किसी भी मूल्य पर नही मिलेगा।
   इसलिये निर्भय रहें निशंक रहे… आपकी झोली में खुशियां ज़रूर खेलेंगी।”

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  वो दोनो औरत और आदमी प्रसन्नता से अपनी जगह जा बैठे और श्रीकृष्ण के जयकारे से परिसर गुंजायमान हो गया।
   सबसे पीछे बैठी पारो का मन एक बार फिर अपने मन मंदिर में जा बैठे द्वारिकाधीश की ओर झुकने लगा।

    रात के भोजन के लिए सारे आचार्य बैठ चुके थे। दर्शन भी बैठ गया था। अपने हाथ में परोसने का पात्र लिए पारो वहाँ एक तरफ खड़ी हो गयी , उसकी आँखे उन लोगों में किसी को ढूंढ रही थी। दर्शन के ठीक एक तरफ प्रशांत बैठा था, और दूसरी तरफ की जगह खाली थी। जैसे ही उसे समझ आया कि वरुण वहाँ नही है,वो दूसरी तरफ उसे ढूंढने जाने को मुड़ी ही थी कि उसके ठीक पीछे खड़ा वरुण सामने आ गया।
   और उसे अपने इतने पास देख वो एक बार फिर अपनी सुध बुध खो कर उसे देखने लगी।
    दोनो एक दूसरे से आंखें हटा नही पा रहे …. कि वरुण ने ही धीमे से कहा…

“सामान्य रहो पारो। तुम कांप रही हो। “

   वरुण के इतने पास खड़ी पारो सच ही कांपने लगी थी…

“मुझ पर से अपना ध्यान हटा लो, हमारा कोई भविष्य नही है। “

   वरुण ने धीरे से अपनी बात रखी और लंबे लंबे डग भरते हुए अंदर चला गया, और पारो सूनी आंखों और सूने मन से वहीं खड़ी रह गयी। बस यही तो बचा था। पहले संसार उसका मज़ाक उड़ा रहा था, आज वरुण उड़ा गया!
   इसमें वरुण का भी क्या दोष है?  भगवान ने स्वयं जब उसके जीवन का मज़ाक बना छोड़ा है तो हर कोई अगर वही कर रहा तो किसी का क्या दोष।

ठीक ही तो कह गया वो , उस जैसी रंगहीन विधवा के साथ किसी का भी क्या भविष्य हो सकता है?

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   ऑंसू से धुंधली पड़ी जाती आंखों के साथ उसने हाथ में पकड़ रखा सामान वहीं नीचे रखा और तेज़ कदमों से सरोवर की तरफ बढ़ गयी।

  वरुण ने कहने को कह तो दिया था, लेकिन ये कहने के लिए उसे खुद को कितनी हिम्मत लगी थी, ये वही जानता था। उसके मन में जाने क्यों ये डर बैठने लगा था कि जैसे प्रशांत समझने लगा है कहीं आश्रम के बाकी लोगों को समझ मे आने लगा तो पारो के चरित्र पर एक काला दाग लग जायेगा। और फिर वो दाग छुड़ाना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
    वो पारो को दुनिया से बचाये रखने के लिए तो अपने प्राण भी दे सकता था फिर इतना सा कह देने मात्र से अगर वो उस पर से अपना ध्यान हटा लेगी तो इसमें बुराई क्या थी?

   वो खुद ही दोनो पक्ष सोचता चला जा रहा था। बुराई क्या थी?
   क्या उसे खुद को पारो का इस तरह इच्छा भरी आंखों से उसे देखना गुदगुदा नही जाता था?
   क्या जब जब वो पारो को देखता था, उसके मन में कामनाओं का ज्वार भाटा नही जागता था?
     क्या उसे लेकर इस दुनिया से इस आश्रम से दूर भाग जाने के ख्याल उसके मन में नही कुलबुलाते थे?

   पारो से अधिक तो वो उसे पाने को लालायित हो उठा था, और अपने मन को काबू करने को उसने पारो को दूर रहने की सलाह दे डाली थी।

  खुद ही खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी दे मारी थी। 

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अपने मन को असीमित कठोर कर ही उसने पारो के सामने ये बात रखी थी। और ऐसा कहने के बाद भी उसकी आंखे और मन पारो से नही हट पा रहा था। वो जाकर दर्शन के पास बैठ तो गया लेकिन आंखें पारो का पीछा करती रहीं।
   पारो को अपने हाथ का सामान वहीं पटक कर ऑंसू पोंछते और सरोवर की तरफ जाते देख उसका मन ठनका कि पारो आंखों से ओझल हो गयी।
    और लगभग दस मिनट बाद सरोवर की तरफ से छपाक की आवाज़ आई।
   उसके आसपास बैठे सभी लोग सामान्य ढंग से बैठे खाते रहे,जैसे किसी ने उस आवाज़ को सुना ही न हो लेकिन वरुण का मन तो सरोवर की ओर ही लगा था,  वो एकदम से अपनी जगह पर खड़ा हुआ और सरोवर की ओर तेज़ कदमो से बढ़ गया……

क्रमशः

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aparna……




लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

17 विचार “समिधा -49” पर

  1. मन की दुविधा का बहुत ही सजीव चित्रण किया है आपने। वरुण और पारो दोनों के ही मन मे प्रेम उत्पन्न हो चुका है लेकिन दोनों ही समाज के डर से अपने मन को जान कर भी उससे दूर भाग रहे हैं।
    पता नही दोनों के लिए नियति ने क्या तय किया है??

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