समिधा- 50

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समिधा – 50

     और लगभग दस मिनट बाद सरोवर की तरफ से छपाक की आवाज़ आई।
   उसके आसपास बैठे सभी लोग सामान्य ढंग से बैठे खाते रहे,जैसे किसी ने उस आवाज़ को सुना ही न हो लेकिन वरुण का मन तो सरोवर की ओर ही लगा था,  वो एकदम से अपनी जगह पर खड़ा हुआ और सरोवर की ओर तेज़ कदमो से बढ़ गया……

    वरुण के चेहरे पर घबराहट झलक रही थी, अपने माथे पर छलक आयीं बूंदों को पोंछता वो सरोवर में पहुंचा तो देखा पारो उदास सी सीढ़ियों पर बैठी थी।
उसे वहां बैठे देख वरुण के चेहरे पर राहत के साथ ही एक नाराजगी भी नजर आने लगी वह तेजी से पारो के पास पहुंच गया..

” यह क्या भद्दा मजाक है?”

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वरुण के सवाल पर पारो चौक कर उसकी तरफ देखने लगे

” मैंने क्या किया?”

” अभी सरोवर में क्या फेंका जो इतनी जोर की आवाज आई।  मुझे अचानक लगा जैसे तुम पानी में कूद गई और मैं भागता हुआ चला आया।”

” क्यों चले आए आप ? अगर मैं पानी में कूद भी जाती तो उससे आपको क्या फर्क पड़ता ? वैसे भी मैंने पानी में कुछ भी नहीं फेंका।

यह कहकर पारो ने सरोवर की दूसरी तरफ इशारा कर दिया।
    मंदिर परिसर के ही कुछ श्रद्धालु सरोवर के दूसरे सिरे पर सरोवर से जल कलश में भर रहे थे, उन्हीं में से किसी महिला के हाथ का पानी से भरा कलश उसके हाथ से छूटकर सरोवर में गिर पड़ा था। और जिसकी आवाज वरुण के कानों तक पहुंची थी।
    आवाज वैसे तेज भी नहीं थी, लेकिन शायद वरुण ही अपने मन में कुछ गुनता बैठा था और इसीलिए उस आवाज को उसने पारो से जोड़कर देख लिया था।

अपने आप पर लज्जित सा होता वह वापस लौटने को था कि पारो ने उसे आवाज लगा दी..

” यहां तक आए ही हैं,  तो कुछ देर बैठ जाइए।”

पारो के पास दो घड़ी बैठने का तो वरुण का भी बहुत मन था लेकिन वह क्या करता। उसके दिल और दिमाग के बीच की लड़ाई में वह बुरी तरह परेशान था। फिर भी अपने दिल के हाथों मजबूर वहीं दो सीढ़ियां उतरकर वह भी बैठ गया।

” आपने कितनी आसानी से कह दिया कि मुझ से मन हटा लो आपको क्या लगता है मेरा मन आप पर टिका हुआ है ?अभी कुछ महीनों पहले ही अपना सर्वस्व खो चुकी हूं उसके बाद आपने ऐसा सोच भी कैसे लिया कि मैं आप पर आसक्त होने लग गई।
   आपने जो भी कहा उससे आपने मेरे मान सम्मान को ठोकर पहुंचाई है! मैं जानती हूं इसमें गलती मेरी है क्योंकि मेरे मन की चंचलता के कारण ही आप मुझसे यह कहने को बाध्य हुए। लेकिन मेरा मन ऐसा चंचल क्यों हो रहा है इसका कोई जवाब मुझे खुद को भी समझ नहीं आता।
   मैं जब जब आपके सामने होती हूं मुझे ऐसा लगता है मैं अपने पति देव के सामने खड़ी हूं । मैं जानती हूं मुझे यह सारी बातें किसी पराए पुरुष के सामने कहने का कोई हक नहीं , लेकिन जाने क्यों आपको देखकर ऐसा लगता ही नहीं कि आप पराये हैं। हमेशा ऐसा लगता है जैसे मैं आपको सदियों से जानती हूं।
    आपके आसपास रहने पर ऐसा लगता है जैसे देव मेरे आसपास हैं। आपकी बातें सुनना, आपको देखना, आपके आसपास रहना, आपकी सेवा करना , यह सारे कार्य सिर्फ इसीलिए करती हूं कि मुझे लगता है मैं यह अपने देव के लिए कर रही हूं। मैं जानती हूं मैं गलत हूं मैं यह भी जानती हूं कि अकिंचन हूं आपवित्र हूं आप मुझसे बात करें मैं इस लायक नहीं हूं।
    फिर भी आप कदम कदम पर मेरी सहायता करते हैं इस बात को भुलाकर कि मैं संसार की सबसे अभागिनी स्त्री हूँ। और मेरे जैसी स्त्री को प्यार करने या पाने का कोई हक नही है।
    आप अपनी जगह बिल्कुल सही है और आपने जो कहा उस बात को मैं सहर्ष स्वीकार करती हूं। आज के बाद मेरे कारण कभी आपको कोई कष्ट नहीं होगा। मैं आपके किसी मार्ग का रोड़ा नहीं बनूंगी। मेरी पूरी कोशिश यही रहेगी कि जब तक मैं इस आश्रम में रहूं यानी कि मैं जब तक जीवित रहूं तब तक आप के सामने ना पडूँ।

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   आखरी बार आपके सामने से जाने से पहले आपके चरणों की धूल लेना चाहती हूं। क्योंकि अनजाने ही सही आपने बहुत बार मुझे मेरे देव की झलक दिखलाइ है। और सिर्फ मुझे ही नहीं उनके छोटे भाई दर्शन को भी आप में उसका बड़ा भाई देव ही नजर आता है।
    ऐसा क्यों होता है यह ना मैं समझ पाती हूं और ना ही दर्शन? लेकिन वह भी मुझसे हमेशा यही कहता है कि उसे आप में उसके बड़े भैया दिखाई देते हैं।  इसके पीछे साधन जो भी हो लेकिन साध्य आप ही हैं। और इसलिए आखरी बार आप की चरण रज लेकर आपके सामने से हट जाना चाहती हूं।”

अपनी बात पूरी कर पारो वरुण के पैरों में झुक गई। उसके पैरों के सामने की धरती से चुटकी भर मिट्टी लेकर उसने अपने माथे पर लगाई थी, कि वरुण ने उसके कंधे पकड़कर उसे ऊपर उठाया और अपने सीने से लगा लिया।

   शाम के धुंधलके  में दो शरीर एक दूसरे से जुड़े एकाकार हो गए थे। दूर से आती किसी रोशनी के कारण सरोवर में बनता उनका प्रतिबिंब ऐसे जुड़ गया था कि वह दो नहीं एक नजर आ रहे थे।

” मुझे माफ कर दो पारो मैं खुद अपने मन की हालत समझ नहीं पा रहा हूं।  मैं क्यों तुम्हारे लिए इतना कमजोर पड़ने लगा हूँ मुझे नही पता। मेरा मन तो करता है कि तुम इसी तरह हर वक्त मेरे साथ रहो …..

        मन तो और भी बहुत कुछ करता है जो मैं बता नहीं सकता और शायद बताऊंगा तो तुम सुन भी नहीं पाओगी… लेकिन क्या करूं मैं यह भी जानता हूं कि मेरा ऐसा सोचना गलत है। तुम किसी और की पत्नी हो । मैं खुद यहां सन्यासी बनने आया हूं। क्या मेरा इस तरह तुम्हारे लिए आसक्त  होना सही है? “

धीरे से वरुण ने पारो के कान में अपने मन की बात कह दी…
   और पारो ने भी उसी तर्ज पर वरुण के कानों में अपने मन की बात कह दी।
   उस सिंदूरी शाम ने दोनों के मन को जैसे प्रीत के रंग से रंग दिया था।

” आप बताइए ना!! मुझे सब कुछ बताइए, आपको क्या लगता है? आप क्या चाहते हैं? मैं सब कुछ जानना चाहती हूं.. और आप यकीन मानिए मैं सब कुछ सुन लूंगी। या शायद आपके मुंह से सुनना चाहती हूं।”

” मैं जानता हूं ,हम दोनों ही एक दूजे के लिए तड़प रहे हैं। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि हम दोनों के मन में उठी यह कामनाएं गलत है। “

” क्या कृष्ण के मंदिर में प्रेम करना गलत है? “

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पारो के सवाल पर वरुण ने उसके चेहरे को अपनी बाहों में भर कर अपनी तरफ खींच लिया….

” मेरे इतने पास मत आओ पारो कहीं मैं अपना सारा संयम खो ना बैठूं। मुझे सिर्फ तुम्हारी चिंता है। कभी तुम्हारे नाम पर कोई भी दाग मेरे कारण लग गया, तो मैं जिंदगी भर अपने आप को माफ नहीं कर सकूंगा। और अब जब तुम जान चुकी हो कि मेरे मन में भी तुम्हारे लिए उतना ही प्यार है, तो  हमारे उस प्यार के लिए मेरी बात मान लो और मुझसे दूर चली जाऊं। यह तुम्हारे लिए ही अच्छा होगा।
    हमारे शरीर एक नही हो पाए तो इसका मतलब यह तो नहीं कि हमारा प्यार कम हो गया….

” मतलब आप मानते हैं कि आप मुझसे….

” मानता हूं। मेरा रोम रोम आकंठ तुम्हारे प्यार में डूबा हुआ है। मैं खुद नहीं जानता कैसा कब हुआ? कैसे हुआ? कब मेरे मन में यह तरंगे  मचलने लगी? कब मेरी आंखें सिर्फ तुम्हारे चेहरे में अपना अस्तित्व ढूंढने लगी? कब मेरी उंगलियां तुम को छूने के लिए लालायित होने लगी? मेरी समझ से परे है ये सब मेरे साथ कब हुआ? लेकिन  दूसरों को मेरी भावनाओं का पता चले उसके पहले जिसके लिए यह भावनाएं हैं उसे मालूम होना चाहिए… और इसीलिए आज हिम्मत करके मैंने तुमसे सब कह दिया लेकिन आज के बाद….”

” आज के बाद वही होगा जो आप चाहेंगे मैं अब कभी भी आपके रास्ते नहीं आऊंगी।

पारो ने एक नजर वरुण को देखा और तेज कदमों से सीढ़ियां चढ़कर भगिनी आश्रम की तरफ चली गई।

वरुण नहीं खड़े सोचता रह गया कि कुछ देर पहले अचानक उसे क्या हो गया था जो उसने पारो के सामने अपने मन की सारी बातें खोल कर रख दी। उसे इस तरह पारो से अपने प्यार की बात स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी। क्योंकि अब तक तो वह लड़की फिर भी उसके बिना जी ले रही थी लेकिन आज के बाद क्या वो एक सामान्य जीवन जी पाएगी?
    अब जब वो उसे अपने सीने से लगा चुका है, अपनी उंगलियों में उसका चेहरा थाम कर अपने चेहरे के इतने पास में ला चुका है, उसकी खुशबू महसूस करती पारो की प्रेम में बोझिल होती आंखें उसने खुद देखी हैं। क्या अब इस सब के बाद पारो उसे भूल पाएगी? उससे दूर रह पाएगी? और पारो के बारे में वो सोचना छोड़ भी दें तो क्या स्वयं वरुण पारो के इतना पास पहुंचने के बाद उससे दूरी निभा पाएगा?

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अपने विचारों में खोया वरुण धीमे कदमों से अपने आश्रम की तरफ बढ़ने लगा कि तभी उसे ढूंढता हुआ प्रशांत वहां चला आया। प्रशांत उस से कुछ पूछता इसके पहले ही वरुण को अजीब सी घबराहट होने लगी। चेहरे पर झलकती पसीने की बूंदे, और तेज होती सांसो से वह अपनी स्थिति की गंभीरता समझ पाता कि उसी समय उसका सिर घूमा और वह बेहोश होकर प्रशांत की बाहों में गिर पड़ा।

प्रशांत वरुण की हालत, उसकी स्वास्थ्य समस्या से वाकिफ था और इसी लिए  उसे इस तरह वरुण का बेहोश होकर गिर जाना सही नही लगा। और वो उसे दो लोगों की सहायता से तुरंत मंडप की तरफ ले गया। वहाँ अन्य आचार्यो को सूचित करने के बाद वो वरुण को लिए अस्पताल निकल गया। उसके साथ आश्रम के और आचार्य भी जाना चाहते थे, लेकिन प्रशांत ने सबको यह समझा कर की अगर कोई गंभीर बात हुई तो वो सबको वहाँ बुला ही लेगा बोल एक किनारे कर अस्पताल निकल गया…

अस्पताल पहुंच कर डॉक्टरों की जांच के बावजूद वरुण को होश में आते न देख प्रशांत को चिंता सताने लगी थी। उसने आश्रम में अभी किसी को भी वरुण की सेहत के बारे में बताने से मना कर रखा था।
   अभी ही प्रबोधानन्द वाला किस्सा हुआ था,उसी चर्चा से आश्रम अब तक आंदोलित था, अब उसके बाद अगर वरुण की सेहत के बारे में मालूम चला तो जाने क्या होगा, यही सोच कर प्रशांत ने सारी जिम्मेदारी खुद पर ले कर बाकियों को इस बात से दूर ही रखा था।

  ****

  वरुण से दूर होकर पारो भगिनी आश्रम की सीढ़ियां चढ़ गई थी। अपनी खाट पर बैठी खिड़की से बाहर देखती वो जाने क्या सोचते बैठी थी कि सरिता उसे खाने के लिए बुलाने आ गयी। लेकिन भूख नही है कि ज़िद पर अड़ी पारो उसके लाख बुलाने पर भी उसके साथ नीचे नही गयी।

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    सरिता के जाने के बाद वो खिड़की पर आ खड़ी हुई। उसकी खिड़की के इस भाग से नीचे कृष्ण मंडप का वो हिस्सा साफ नजर आता था, जहाँ अक्सर वरुण भोजन के बाद प्रशांत और बाकी लोगों के साथ बैठा करता था।
   ठीक है उसने उसे दूर रहने कहा है पर दूर से देखने पर तो कोई मनाही नही है।अगर वो उसकी खुशी के लिए उससे दूर हो सकती है तो अपने मन की खुशी के लिए उसे दूर से ताक तो सकती है।
   अपनी सोच पर, अपने बचपने पर उसे स्वयं हंसी आ गयी। और वो खिड़की पर खड़ी इधर उधर देखती वरुण को तलाशने लगी।
  लेकिन वरुण वहाँ होता तब तो नज़र आता। वो देर तक वहाँ खड़ी वरुण के बैठने की जगह ताकती खड़ी रही……

क्रमशः

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aparna……
  


लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

21 विचार “समिधा- 50” पर

  1. आख़िर वरुण और पारो ने एक दूसरे से अपनी भावनाएं व्यक्त कर ही दी। दोनों ने एक दूसरे से दूरी बनाए रखना भी स्वीकार कर लिया लेकिन कब तक और वो भी तब जब वरुण की तबीयत फिर से बिगड़ गई। आगे क्या होगा जानने के लिए इंतज़ार रहेगा अगले पार्ट का।

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  2. समिधा के अर्धशतक पूरी होने की बधाई👏 आखिरकार वरुण और पारो को एक दूसरे के प्रेम का पता चल ही गया अगले भाग का बेसब्री से इंतजार रहेगा

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  3. यकीन नहीं होता की आज पारोमिता और वरुण या कहे वरुणदेव ने अपनी अपनी भावनाएं एक दूसरे से कह दी ..👌🏻😊 इंतजार रहेगा की आगे ये घटनाक्रम किस तरफ मोड़ लेता है…

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