समिधा – 51

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  समिधा -51

    अस्पताल में वरुण को होश आ गया था लेकिन उसकी हालत अब भी बहुत स्थिर नहीं थी ।
डॉक्टर उसकी अलग अलग तरह की जांच में लगे थे। प्रशांत रात भर से उसके पास बैठा था ।
   सुबह तक में वरुण की हालत थोड़ी सुधर चुकी थी। इसलिए डॉक्टरों ने उसे आईसीयू से निकालकर सामान्य आईसीयू मेडिकल वार्ड में शिफ्ट कर दिया। डॉक्टर के अनुसार अगर शाम तक में वरुण को और भी आराम हो जाता है तो उसे आईसीयू मेडिकल से डिस्चार्ज कर के कमरे में शिफ्ट कर दिया जाएगा। लेकिन प्रशांत के द्वारा डिस्चार्ज के बारे में पूछताछ करने पर डॉक्टर ने यही कहा कि अभी कम से कम वरुण को 4 दिन अस्पताल में रहना ही होगा।

  यह सुनकर कि वरुण को कम से कम 4 दिन और अधिक से अधिक 1 सप्ताह अस्पताल में रहना पड़ सकता है , प्रशांत के पास आश्रम में बाकी लोगों को भी बता देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था और इसीलिए उसने अगले दिन आश्रम की जिन 2,-4 गुरुवरों को वरुण की हालत के बारे में बताया था उन्हें फोन करके वरुण की स्थिति की सूचना बता दी।

आश्रम में प्रशांत का फोन आते ही सभी आचार्यों में हलचल सी मच गई उस दिन सुबह की आरती और पूजा पाठ निपटने के बाद प्रवचन होना था। यह वही समय था जिस समय पर वरुण अपना प्रवचन दिया करता था। रोज की तरह पारो ने जाकर प्रवचन की सामग्री से लेकर हर चीज वरुण के हिसाब से वहां तैयार करके रख दी, और खुद श्रद्धालुओं के पीछे हमेशा की तरह बैठने की जगह वहां से हटकर मंडप से पीछे की तरफ चली गई।
    वरुण की अनुपस्थिति में आज उदयाचार्य स्वामी ने प्रवचन का जिम्मा उठा रखा था। हालांकि आज उनसे श्रद्धालुओं के सामने कुछ भी कहा नहीं जा रहा था, लेकिन फिर भी कहना तो था ही। क्योंकि मंदिर परिसर से बाहर वो लोग यह बात नहीं जाने देना चाहते थे। किसी प्रकार से प्रवचन निपटाने के बाद उन्होंने भक्तों को प्रसाद वितरण के लिए भगिनी आश्रम की तरफ भेज दिया।
   इतनी देर से मंडप के पीछे छिपी बैठी पारो अंदर से कौतूहल में थी कि आज वरुण प्रवचन देने क्यों नहीं आया?  क्योंकि अब तक भगिनी आश्रम में यह खबर नहीं पहुंची थी, श्रद्धालुओं के वहां से जाते ही वह अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाई और उदयाचार्य स्वामी के सामने स्वयं पहुंच गई।
   पिछली रात दर्शन को भी वरुण ने साथ ही रोक लिया था लेकिन भोजन के बाद से वह खुद भी वरुण से मिला नहीं था। उसे लगा वरुण किसी जरूरी काम से ऑफिस में या फिर कहीं बाहर गया हुआ है। इसलिए दर्शन ने भी ज्यादा पूछताछ नहीं की।
और भोजन करने के बाद अपने हमउम्र लड़कों के साथ ही सोने के लिए मंडप के पीछे वाली छत पर चला गया था।

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   सुबह जल्दी उठकर वह पारो से भेंट करने के बाद घर के लिए निकल गया। हालांकि उसका मन वरुण पर ही तब भी लगा हुआ था। उसने उस समय भी वरुण को  ढूंढने की कोशिश जरूर की। जाने से पहले एक बार बार उनसे मिलना चाहता था। लेकिन उसकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई। वरुण ना तो अपने कमरे में मौजूद था और ना ही पुस्तकालय में ।इसके अलावा दर्शन ने सरोवर की सीढ़ियों के अलावा कृष्ण मंडप की  छत , मौलसिरी का बगीचा हर वह जगह देख ली जहाँ उनके मिलने की संभावना थी लेकिन वरुण नहीं मिला।
   10- 15 दिन में वापस आने का वादा करके दर्शन ने अपनी बऊ दी के पैर छुए और उससे विदा ले कर निकल गया।

इसके पहले जब भी दर्शन अपनी बऊ दी से मिलकर लौटता था तब बहुत भारी मन और भारी कदमों से ही वह वापस लौटा करता था उसे मन ही मन हमेशा ही लगता कि उसके भाई के जाने के बाद उसकी बऊ दी उसकी जिम्मेदारी है। और अपने भाई की निशानी समझकर उसे अपनी बऊ दी का ख्याल रखना चाहिए। और इसीलिए पारो को आश्रम में देखकर उसका मन हमेशा खट्टा हो जाता था। लेकिन इस बार पता नहीं ऐसा क्या हुआ था, कि वह बहुत प्रफुल्लित मन से वहां से लौट रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी बऊ दी को भी जीने का एक ठोस आधार मिल चुका है।

दर्शन के जाने के बाद ही पारो वरुण की सेवा के लिए उसके प्रवचन के लिए तैयारियों में लग गई थी। लेकिन वरुण को अपने प्रवचन स्थल पर ना पाकर उसका मन चिंतित होने लगा था।
   और वह अपने उतावलेपन में उदयाचार्य स्वामी के सामने पहुंचकर वरुण के बारे में एक ही सांस में पूछी बैठी।

” आज स्वामी जी नहीं है यहाँ?”

उदयाचार्य जी आश्चर्य से पारो को देखने लगे। क्योंकि पारो ने कोई नाम तो लिया नहीं था। बहुत झिझक के साथ संकुचित होते हुए पारो ने वरुण का नाम लेकर उदयाचार्य स्वामी से पूछ लिया। तब उदयाचार्य स्वामी ने कहना शुरू किया।

” आप सब भगिनी आश्रम वाली महिलाओं को अब तक नहीं बताया गया था , लेकिन कल रात में स्वामी वरुण देव की तबीयत अचानक बिगड़ गई। और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा है । अभी भी अस्पताल में ही हैं, और मैं इस बारे में बताने के लिए भगिनी आश्रम आने ही वाला था। हमारे यहां से प्रशांत वरुण के साथ हैं। लेकिन वह कल से ही उनके साथ हैं तो हो सकता है वोनकुच घड़ी आश्रम वापस आकर आराम करना चाहते होंगे।
   इसलिए अभी मैं और स्वस्तिकाचार्य हममें से कोई भी एक अस्पताल जाकर प्रशांत को वापस भेज देगा। अगर आपमें से भी किसी को वरुण से मिलने जाना है तो हमारे साथ चल सकती हैं।”

अपना सारा लाज संकोच त्याग कर पारो एकदम से सामने आ गई

” मैं आपके साथ जाना चाहती हूं”

  पारो की उम्र ही ऐसी थी कि वहां मौजूद सभी बड़े उसे एक बालिका के समान ही व्यवहार किया करते थे। उदयाचार्य स्वामी ने उसके सर पर हाथ फेर कर हां में सर हिला दिया।

” मुझे सिर्फ 10 मिनट का समय दीजिए मैं अभी अपना सामान लेकर आती हूं।”

” सामान लेकर आने की कोई जरूरत नहीं है, हम दो-तीन घंटे में वापस लौट आएंगे।’

” लेकिन मैं नहीं लौटूंगी। मै अब उन्हें साथ लेकर ही वापस आऊंगी।”

  पारो के बाल हठ पर उदयाचार्य धीमे से मुस्कुरा उठे….

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” ठीक है, जाओ जो भी सामान लाना है, जल्दी से लेकर आ जाओ फिर हम निकल चलेंगे।”

पारो वहां से बात कर पहले अपने कमरे में चली गयी। वहां से अपनी दो साड़ियां रख  वो नीचे रसोई में चली गई।
उसने फटाफट पतली सी खिचड़ी के साथ ही एक बड़े थरमस में भरकर गर्म पानी ले लिया। कुछ फ़ल अपने झोले में डालने के साथ ही, तश्तरी चाकू और अन्य जरूरी हर एक सामान अपने झोले में रखती वह घबराहट में रसोई के बर्तनों से टकराती इधर उधर कुछ ना कुछ गिराती भी जा रही थी, कि तभी उसकी मदद के लिए सरिता और सुनीता दोनों चलीं आयीं। दोनों ने मिलकर छोटे-छोटे डिब्बों में कई सारी चीजें वरुण के लिए उसके साथ रख दीं। वरुण की तबियत के बारे में सुन कर पारो को घबराहट सी होने लगी थी। उसकी आंखें बार बार छलकी जा रहीं थीं। उन्हें पोंछती वो फ़टाफ़ट हाथ भी चलाती जा रही थी।

” तुझे अकेले डर तो नहीं लगेगा, मैं भी साथ चलूँ।

सरीता के भोले से सवाल पर पारो बड़ी मुश्किल से मुस्कुरा कर रह गई….

” मुझे डर नहीं लगेगा सरिता, और फिर वहां वह भी तो मौजूद है ना।”

सरिता ने पारो की बात सुनकर भक्ति में अपनी आंखें बंद करते हुए हाथ जोड़ लिया..
      पारो ने वरुण के लिए कहा था जिसे वहां मौजूद सरिता और सुनीता ने भगवान कृष्ण समझ लिया।
सरिता और सुनीता को यही लग रहा था कि वरुण ने उन सब की शिक्षा दीक्षा के लिए तथा आश्रम की महिलाओं के लिए जितना कार्य किया है उसी के फल स्वरुप पारो वरुण को इतना आदर सम्मान देती है, कि उसकी सेवा के लिए तुरंत प्रस्तुत हो गई। बल्कि पारो की तत्परता देखकर एक पल को सुनीता कट कर रह गई। क्योंकि उसे लगा कि वरुण ने उसे जिस नरक कुंड से बाहर निकाला था, उसके बाद इतनी तत्परता उसे दिखानी चाहिए थी।
  इसीलिए उसने भी पारो के साथ चलने के लिए पूछ लिया….
लेकिन इस समय पारो के मन में जो चल रहा था, वह सिर्फ पारो ही समझ सकती थी। उसे इस समय न सरिता की आवश्यकता थी ना सुनीता कि, उसे बस लग रहा था वह किसी तरह हवा में उड़कर वरुण के पास पहुंच जाए, और उस की ऐसी सेवा करें कि वह एक बार फिर उठ बैठे।

उदयाचार्य स्वामी स्वस्तिकआचार्य और पद्मजा दीदी के साथ पारो भी आश्रम की गाड़ी में अस्पताल की ओर बढ़ चली।

अस्पताल में वो लोग जैसे ही पहुंचे, प्रशांत उन्हें नीचे रिसेप्शन के पास ही मिल गया। वह कुछ ज़रूरी दवाई लेने के लिए नीचे फार्मेसी की तरफ जा रहा था। आचार्यों के साथ आई हुई पद्मजा दीदी और पारो को देख कर उसके चेहरे पर भी प्रसन्नता छा गई। वह तुरंत आगे बढ़ा और उसने पारो का हाथ थाम लिया…

” मैं जानता था तुम जरूर आओगी। बल्कि मैं तो चाहता ही था कि तुम आ जाओ। और हो सके तो कुछ देर वरुण के पास बैठकर फिर लौट जाना। “

प्रशांत भी अब तक वरुण की तबीयत के कारण मानसिक रूप से बहुत परेशान था और इसलिए रीति नीति के बारे में सोचे बिना ही पद्मजा दीदी और बाकी आचार्यों के सामने ही उसने पारो के सामने अपने मन की बात रख दी। हालांकि उसके पारो से यह सब कहते तक में स्वामी जी और पद्मजा दीदी आगे वरुण  के कमरे की तरफ़ बढ़ चुके थे।

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   कॉरिडोर में सिर्फ प्रशांत और पारो ही खड़े थे। प्रशांत के ऐसा कहते ही पारो की आंखों से दो बूंद आंसू छलक पड़े…

” अरे रोओ मत। वो ठीक है । और चार-पांच दिन में बिल्कुल ठीक हो कर आश्रम वापस भी लौट आएगा।”,

” लेकिन उनके साथ ऐसा हुआ क्यों?  क्या पहले भी उनके साथ ऐसा हो चुका है?”

” हां हो चुका है। एक दो बार नहीं कई बार। पहले उसे लगता था, कि कुछ कमजोरी और थकान के कारणों से उसे चक्कर आते हैं। बाद में जब वह अमेरिका गया और वहां उसने अपनी जांच करवाई तब पता चला कि उसे ह्रदय रोग है।”

” रोग है तो उसका कोई इलाज भी तो होगा।”

” इलाज तो है लेकिन बहुत महंगा है।और वह भी यहां इस शहर में तो संभव नहीं है। बड़े-बड़े हार्ट सर्जन भी इस ऑपरेशन को करने में एक बार को कांप उठते हैं इतना आसान नहीं है उसका इलाज। “

” आसान नहीं है तो क्या निरुपाय छोड़ दिया जाएगा। बच्चों को क्या पढ़ना आसान लगता है दूसरी तीसरी कक्षा के बच्चों को इतनी लंबे-लंबे पहाड़े याद करने पड़ते हैं क्या वह उन्हें  आसान लगता है?  15- 16 साल की बहू को जब घर भर के लिए 40-50 रोटियां बेलनी पड़ती है, तो क्या वह उसे आसान लगता है। दादा काम तो कोई भी आसान नहीं और देखा जाए तो सब आसान है।
    सिर्फ इसलिए कि यह काम कठिन है, और मैं इसे नहीं कर सकता हम उस काम को छोड़ नहीं सकते ना। तो आज से ही आप ये बात याद रखिए कि आपको उन्हें इलाज करवाने के लिए मनाना ही पड़ेगा।”

” वो बहुत जिद्दी है, और वो नहीं मानेगा। उसने यही तो कसम ली है कि अगर उसके कृष्ण का अस्तित्व है तो उसे कभी कुछ नहीं होगा। और वह अपनी एक साधारण और सामान्य औसत आयु जी कर ही मरेगा। अब ये भी क्या बात हुई। अजूबा ही है वो।  बोलो क्या कोई भगवान से भी शर्त लगाता है? “

” लगाने दजिये शर्त।
      उन्होंने भगवान से यही शर्त लगाई है, ना कि भगवान उनकी रक्षा करेंगे और उन्हें लंबा जीवन देंगे। अब इसके लिए भगवान भी तो कोई ना कोई उपाय रच सकते हैं।”

” वरुण की समस्या कोई साधारण हृदय रोग की समस्या नहीं है पारो। इसका इलाज काफी लंबा और महंगा भी है। हम लोग और आश्रम अपने इतने बड़े कर्मवीर को ऐसे खोना नहीं चाहता,  इसलिए हो सकता है आश्रम ट्रस्ट की तरफ से ऑपरेशन के लिए वरुण को पैसे दे दिए जाएं । लेकिन वरुण को मैं जितना जानता हूं वह आश्रम का 1रुपया भी अपने स्वयं के ऊपर खर्च नहीं करेगा।”

“कोई बात नहीं…
     अगर व्याधि कृष्ण ने दी है तो उसका निदान करने का उपाय भी वही देंगे।
    और  कोई उपाय भी तो हो सकता है।  आइए एक बार उनसे मिल तो लूँ।”

प्रशांत पारो को लेकर वरुण के कमरे की तरफ बढ़ गया।

प्रशांत ने कमरे का दरवाजा खोला और पारो को लेकर अंदर चला गया। अब तक वरुण को होश आ चुका था। और वह अपने पलंग पर लेटा उदयाचार्य स्वामी और  स्वस्तिकाचार्य जी से बातचीत कर रहा था।
वही एक तरफ खड़ी पद्मजा दीदी ने उसके लिए जूस ग्लास में निकाला हुआ था। उसकी तरफ बढ़ा रही थी कि वरुण ने लेने से मना कर दिया..

” माफ कीजिएगा दीदी इस वक्त लेने का बिल्कुल भी मन नहीं है। जब इच्छा होगी तब थोड़ा सा ले लूंगा।”

पारो ने पद्मजा दीदी के हाथ से गिलास लिया और वरुण के पास जाकर उसकी तरफ बढ़ा कर चुपचाप खड़ी हो गयी।

वरुण ने उसे भी एक दो बार मना किया, लेकिन पारो उसी तरह चुपचाप खड़ी रही। आखिर थक हार कर वरुण ने पारो के हाथ से जूस ले  लिया और धीरे-धीरे  पीने लगा।
          वह  जानता था कि यह जिद्दी लड़की अगर अपनी में आ जाए तो किसी की नहीं सुनेगी।
कहीं यह सिरफिरी सबके सामने कुछ बोल ना जाए। वरुण के मन में यह भी छोटा सा डर था और इसीलिए उसने चुपचाप जूस के गिलास को अपने मुंह से लगा लिया।

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  कुछ देर सभी से बातचीत करने के बाद स्वस्तिकाचार्य उदयाचार्य वहां से निकलने लगे।  उन्होंने पद्मजा से भी साथ चलने के लिए।
पद्मजा उन लोगों के साथ ही लौटने वाली थी, उसने अपना झोला कंधे पर टांग लिया और जाकर वरुण के सिर पर अपना हाथ रख दिया….

” स्वस्थ रहो। जितना जल्दी हो सके स्वस्थ होकर आश्रम वापस लौट आओ। आश्रम तुम्हें याद कर रहा है।”

“, जी दीदी!” इतना कहकर उसने धीरे से अपने हाथ जोड़ लिए।
    पद्मजा ने  बाहर जाते जाते पारो की तरफ देखा और उसे भी साथ चलने का इशारा कर दिया। पारो की तरफ से कोई जवाब ना पाकर पद्मजा ने आखिर पारो से कह ही दिया…

” क्या हुआ?  तुम अब तक यहां बैठी क्यों हो?  चलो तुम्हें तो हम लोगों के साथ लौटना है।”

” नहीं पद्मजा दीदी मैं आज यहीं रुकूँगी।”

“सत्यानाश” मन ही मन वरुण ने सोचा और धीमे से आंखें मूंद ली, क्योंकि वो समझ गया था कि अब ये सोच बैठी है तो पद्मजा दीदी में इतनी क्षमता नही है कि वो पारो को यहाँ से ले जा सकें।

आश्चर्य से पद्मजा  कि आंखें फट गई!  दो अकेले लड़कों के साथ पारो को ऐसे अस्पताल में छोड़ देना कहीं से भी बुद्धिमानी नहीं थी। और फिर तब जब अभी-अभी प्रबोधनंद का भंडाफोड़ हुआ था।
   

” नहीं नहीं!!! तुम यहाँ अकेले कैसे रह सकती हो?  अभी चलो मेरे साथ।”

” मैं नहीं जाऊंगी दीदी मुझे क्षमा कीजिए । “

वरुण के चेहरे पर परेशानी झलकने लगी थी। उसके चेहरे को देखकर प्रशांत इस मामले में हस्तक्षेप करने आगे बढ़ गया…

” पद्मजा दीदी मैं ने ही पारो से कहा था कि हो सके तो वह हमारे साथ रुक जाए। असल में रात के समय बाहर सिर्फ लेडीस नर्स होती हैं। और ऐसे में किसी भी जरूरत के लिए मेरा बार-बार बाहर जाना या उन्हें बार-बार कमरे में बुलाना मुझे कल ठीक नहीं लग रहा था। इसलिए मैंने सोचा ही था कि भगिनी आश्रम से अगर कोई महिला आ जाती तो हमें बहुत मदद हो जाती।”

      हालांकि पद्मजा को प्रशांत की यह बात भी बहुत पसंद तो नहीं आई, लेकिन अब उसके पास कोई उपाय भी नहीं था।  क्योंकि अब अगर वह जोर जबरदस्ती से पारो को ले जाती तो यह ऐसा हो जाता की आश्रम के किसी पुरुष सदस्य की तबीयत खराब हुई और उन्हें जरूरत पड़ने पर भगिनी आश्रम की महिलाएं पीछे हट गई।

यही सब सोचती पद्मजा दीदी शांत खड़ी थी कि उदयआचार्य स्वामी उन्हें बुलाने के लिए वापस चले आए। जब उन्होंने यह देखा कि पद्मजा दरवाजे पर खड़ी है और पारो अब तक अंदर ही है तो उन्हें बात कुछ कुछ समझ में आने लगी..

” क्या हुआ पारोमिता हमारे साथ नहीं जाने वाली हैं क्या?”

” स्वामी जी मैं चाहता  था कि भगिनी आश्रम की कोई महिला……

प्रशांत की बात पूरी होने के पहले ही उन्होंने हाथ उठाकर हां में गर्दन घुमा दी।

” हां ठीक है जैसे में  आप सबको सुविधा हो। बस एक बार उस बालिका से भी पूछ लेना कि वह यहां रुकने के लिए तैयार है या नहीं?”

     उनके सवाल पर प्रशांत आगे बढ़ कर जवाब दे पाता कि इसके पहले ही पारो स्वयं आगे बढ़ गई…

” जी गुरुवर मैं स्वयं यहां रुकना चाहती हूं। “

इसके आगे वह चाहती तो कह सकती थी, कि वरुण के प्रयासों से ही उसे पाठशाला जाने का मौका मिलने वाला है। और यही वरुण का उसके ऊपर इतना बड़ा एहसान है कि उसे उतारने के लिए वह उसकी सेवा का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहती।
        लेकिन पारो ने इसमें से कुछ भी नहीं कहा। वह शायद अपने और वरुण के बीच संबंध के लिए कहीं पर भी कोई सफाई नहीं देना चाहती थी….

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उदयाचार्य स्वामी की सहमति के बाद पारो के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दौड़ गयी।
   उधर वरुण के चेहरे पर भी अब राहत के भाव नज़र आने लगे थे……
   अपने चेहरे की मुस्कान छिपाने ही उसने दूसरी तरफ चेहरा घुमा लिया।

क्रमशः

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aparna…..






लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

24 विचार “समिधा – 51” पर

  1. वरूण ने भले ही पारो को खुद को भूल जाने को कह दिया हो पर आज दिखाई देती उसकी मुस्कान और उसे छिपाता वरूण कुछ ओर ही कह रहे हैं। वरूण की सेवा के लिए रूकी जिद्दी पारो इस तरह तो वरूण के ओर भी करीब हो जाएगी। कान्हा जी लीला वो ही जाने ❣️❣️

    Liked by 1 व्यक्ति

  2. बिल्कुल सही सोचा वरुण ने, पारो ने एक बार जो ठान लिया उससे उसे डिगाना बहुत मुश्किल है। अब जब पारो को अपने साथ-साथ वरुण की भी भावनाएं पता हैं तो इस समय पारो को समझाना नामुमकिन है।
    इन सब से वरुण और पारो को लेकर आश्रम में बातें न बनने लगे जाए ??

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