समिधा – 52


समिधा – 52

     पद्मजा दीदी को अच्छा तो नही लगा लेकिन उदयाचार्य जी के खिलाफ जाकर पारो को साथ ले जाने की उनकी हिम्मत नही थी।
    चेहरे पर गुस्से के भाव लिए वो वहाँ से चली गयी।  उनके चेहरे के भाव देख वरुण भी पल भर को घबरा गया । उसे लग रहा था पारो को यहाँ नही रुकना चाहिए और उनके साथ चले जाना चाहिए।
  लेकिन पारो  के चेहरे पर न कोई बेचैनी थी और न कोई घबराहट, जैसे वो सब कुछ पहले ही तय कर चुकी थी।

कभी कभी वरुण पारो के इस निर्भीक स्वभाव से डर भी जाता था।
प्रशांत निर्विकार भाव से खड़ा था।

   बाकी सब के वहाँ से जाते ही कमरे में बस वही तीन लोग रह गए थे।
  पारो ने बैग में से गर्म पानी की बोतल और खिचड़ी निकाल कर बाहर रखी और वरुण के लिए परोसने लगी।

“अभी कुछ खाने का मन नही है।”

“पर दवाएं तो आपका मन देख कर आपको खिलाई नही जा सकती ना। और दवा लेने के लिए आपको खाना खाना ही पड़ेगा। “

वरुण ने लाचारगी से प्रशांत की तरफ देखा। प्रशांत ने कंधे उचका कर ना में सर हिला दिया जैसे कह रहा हो मेरे बस में कुछ नहीं है।

” पारोमिता !!! मेरा सच में कुछ खाने का मन नहीं है!”

” काश ऐसा हो सकता कि आप के बदले मैं यह खाना खा लेती, आपके बदले मैं दवाइयां भी खा लेती, और सब का फल आपको मिल जाता।
    पर खैर अगर ऐसा होता तब तो मैं आपकी बीमारी ही मांग लेती भगवान से।
        वह तो मैं नहीं कर सकती, लेकिन इतना तो कर सकती हूं कि उस बीमारी का इलाज जो दवाइयां दे रहे हैं डॉक्टर वह आपको समय पर खिला सकूं।”

” तुम्हें नहीं लगता तुम कुछ ज्यादा ही ज़िद्दी हो।”

” आपको लगता है कि मैं जिद्दी हूँ?  तो फिर  पूरी कर दीजिए ना मेरी ज़िद और खा लीजिए चुपचाप। मैं जानती हूं आपको सादी खिचड़ी पसन्द नहीं है। इसीलिए सब्जियां डालकर छौंकी खिचड़ी बनाई थी। साथ ही कच्चा नींबू ले आई हूं, क्योंकि मुझे लगा शायद घी और अचार आपको अभी डॉक्टर मना करेंगे। “

वरुण ने चुपचाप प्लेट उठाई और खाने लगा। प्रशांत को हंसी आने लगी लेकिन वह अपनी हंसी छुपाने के लिए खिड़की से बाहर देखने लगा। तभी उसे लगा जैसे किसी ने उसकी कंधे पर हाथ थपथपा के उसे पीछे मुड़ने को कहा है।  प्रशांत ने पीछे मुड़कर देखा तो उसके सामने प्लेट में खाना लिए पारो खड़ी थी…

” आपके लिए भी खाना लेकर आई थी भैया!!  जानती हूं कल से ही आपने भी ठीक से कुछ भी नहीं खाया होगा। “

पारो के हाथ से थाली लेकर प्रशांत ने उसके सिर पर अपना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में रख दिया।

“हम सब को तो खिला रही हो, लेकिन तुमने क्या खाया है?”

“आप लोग खा लीजिए फिर मैं भी खा लूंगी।”

” यह देखा प्रशांत!! हमें खिलाकर खुद भूखे रहने का कैसा षड्यंत्र है इनका?”

” भूखे रहने से क्या मेरी हर इच्छा पूरी हो जाएगी? “

पारो ने वरुण की आंखों में देखते हुए जैसे ही यह सवाल किया वरुण प्रशांत के सामने झेंप कर रह गया। और चुपचाप अपनी प्लेट और चम्मच पर ध्यान लगाते हुए खाने लग गया। और पारो मुस्कुरा कर उन दोनों को खाना परोसने में लग गयी।

  खाना खाने के बाद प्रशांत वरुण के पास ही बैठ गया दोनों आश्रम से संबंधित बातचीत में लग गए और पारो ने वही कमरे से लगे बाथरूम में सारे बर्तन धो पोंछ कर साफ-सुथरे करके वापस जमा लिये। वो लगातार कुछ न कुछ छोटा मोटा काम करती जा रही थी। लेकिन खाने नहीं बैठ रही थी और वरुण प्रशांत से बातों में लगा होने के बावजूद बार-बार पारो की तरफ देख रहा था कि आखिर वह खा क्यों नहीं रही है?
   प्रशांत को भी यह बात समझ में आ रही थी, लेकिन वह मुस्कुराने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकता था।
     दो महीने बाद आश्रम में होने वाले किसी कार्यक्रम के बारे में प्रशांत वरुण को बता रहा था, लेकिन वरुण का ध्यान बार-बार पारो की उठापटक में ही अटक कर रह जा रहा था। आखिर  प्रशांत ने धीमे शब्दों में वरुण को टोक ही दिया…

” सिर्फ देखने भर से क्या होगा, जाओ जाकर तुम ही मदद कर दो?  यहाँ से क्या देख रहे हो?”

” नहीं नहीं!! ऐसी कोई बात नहीं है!” वरुण चौन्क गया, जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो।

” तो कैसी बात है? वही बता दो क्योंकि मैं इतनी देर से जो तुमसे कह रहा था उसका एक शब्द भी तुमने सुना तो है नहीं। “

” अरे नहीं ऐसी बात भी नहीं है! मैं तो बस यह देख रहा था, कि इतने छोटे से कमरे में इसे क्या काम मिलता जा रहा है ,जो ये खाना-पीना छोड़कर बस काम में लगी हुई है। “

” इन औरतों के मायाजाल में मत फंसो।  यह जब चाहे तब अपनी मर्जी से काम पैदा कर सकती हैं और जब चाहे तब इनके सारे काम निपट जाते हैं।”

” तुम्हें कैसे इतना अनुभव है?  तुम्हारी तो अभी शादी भी नहीं हुई? “

” अनुभव और शादी का आपस में क्या लेना देना? शादी तो मैं जानबूझकर नहीं करना चाहता क्योंकि जिससे मैं शादी करना चाहता था वो…”

” तुम्हें छोड़ कर चली गई? “

” हां यही समझ लो दोस्त और उसके जाने के बाद यूं लगा जैसे जिंदगी से सारे रंग भी चले गए ।अपनी उलझी की जिंदगी के साथ मैं अपने परिवार वालों पर बोझ नहीं बनना चाहता था। जिंदगी इतनी निरस हो गई थी , कि हर गली मोहल्ला एक अंधेरे से भरा रास्ता नजर आने लगा था। एक ऐसा रास्ता जिसका कोई अंत नहीं था। अपनी जिंदगी से इतना परेशान था कि कुछ सोच ही नही पा रहा था और इसीलिए आश्रम चला आया।
और आज जब अपना जीवन देखता हूं, तो लगता है मैंने बहुत सही निर्णय लिया । क्योंकि इस आश्रम के बिना और कहीं भी मुझे जीवन के सही मायने नहीं मिलते। यहां आने के बाद कृष्ण सेवा के साथ मुझे समझ आ गया कि मेरी जिंदगी में भी रंग है।

” क्या उसकी कहीं और शादी हो गई? कौन थी वो?”

” साथ ही पढ़ती थी प्रिया। साथ ही हम खेले कूदे, और बड़े हुए थे । हमारे घर आसपास ही थे, सो बचपन की दोस्ती थी। साथ साथ ही स्कूल गए,  और फिर कॉलेज। इंजीनियरिंग करने के बाद हम दोनों साथ ही नौकरी में आ गए। और जैसे ही हमने अपनी दोस्ती को एक रिश्ते में बदलना चाहा, उसी वक्त उसे पता चला कि उसे ब्लड कैंसर है।

” फिर क्या हुआ?”

” मैं उसे किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था लेकिन वह मुझसे शादी करने को राजी ना हुई। उसने मुझे अपनी कसम दे दी, कि मैं उसकी जिंदगी से दूर चला जाऊं। लेकिन मैं किसी सूरत में उनकी बात मानने को तैयार नहीं था। मैंने मेरे घर वालों को भी इस बात के लिए तैयार कर लिया, की प्रिया बीमार है। और मैं उससे तब भी शादी करूंगा और पूरी कोशिश करूंगा कि उसे अच्छे से अच्छा इलाज दिलवा कर उसे वापस एक स्वस्थ जिंदगी दे सकूं। मेरे घर वालों ने शुरू में तो मेरा विरोध किया, लेकिन फिर मेरे प्यार की ताकत के आगे वो लोग भी झुक गए और उन्होंने मंजूरी दे दी। मैं बहुत खुशी से उसके घर उसे यह खुशखबरी सुनाने गया लेकिन तब तक वह अपना घर छोड़कर कहीं जा चुकी थी।
   शायद वह समझ गई थी, कि मैं उसे किसी भी हाल में नहीं छोड़ने वाला हूं। और उसे यह लगने लगा था कि अगर मैं उससे शादी करता हूं तो मेरी सारी जिंदगी उसकी बीमारी के पीछे, उसकी तीमारदारी के पीछे ही खर्च हो जाएगी। और मुझे जिंदगी का कोई सुकून शादी का कोई सुख नहीं मिल पाएगा। मुझे सुखी करने के लिए वह अपना घर छोड़कर चली गई थी। और वह भी ऐसे कि उसने अपने घर परिवार में किसी को नहीं बताया कि वह कहां जा रही है ? उसके माता-पिता का रो रो कर बुरा हाल था ! हम सब ने मिलकर उसे ढूंढने की कोशिश की लेकिन हाथ कुछ नहीं आया।
    पता नहीं मुझसे कहां चूक हो गई थी? जो मैं उसे अपने प्यार का विश्वास ही नहीं दिला सका, कि उसके बिना जीना मेरे लिए कहीं ज्यादा कठिन होता उसके साथ उसकी तीमारदारी करते हुए जीने से। काश वो एक बार मेरे प्यार की गहराई को समझ पाती तो मुझे छोड़कर नहीं जाती ।
     मैं आज भी नहीं जानता, कि वह जिंदा है या नहीं लेकिन उसके जाने के बाद मेरे लिए यह सारी दुनिया खत्म हो गई थी। मुझे लगा जैसे मैं खुद को खत्म कर लूं, लेकिन अपने माता-पिता का चेहरा देखकर मैं वह भी नहीं कर पाया।
     इंसान वाकई जब तक जिंदा रहता है जन्म और मरण के चक्र में फंसा ही रहता है । हमसे मोह माया इतनी बुरी तरह चिपकी रहती है कि बहुत बार ना हम जी पाते हैं और न मर पाते हैं।
   ऐसी विकट परिस्थिति में कोई अगर हमारा साथ देता है तो वह हमारा खुद का धैर्य और संयम ही है।
सच कहूं वरुण तो आश्रम में आने के बाद जीवन का एक मार्ग मिल गया। जीवन को जैसे एक उद्देश्य मिल गया।
   अपना सर्वस्व श्रीकृष्ण को समर्पित करने के बाद अब भले ही सारा दिन मैं सिर्फ कृष्ण अर्चना में व्यस्त रहता हूं, लेकिन अब भी मेरे दिल के एक कोने से यही आवाज आती है, कि काश प्रिया वापस आ पाती। खैर वो जहां भी हो, स्वस्थ हो सुखी हो और सुरक्षित हो। आज भी मरने से पहले एक आखरी बार उसे सुखी देखना चाहता हूं।
   मैं चाहता हूं वह जहां भी हो,स्वस्थ हो । उसने अपना घर परिवार बसा लिया हो।उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान देखकर बस मैं आंखें मूंद लूँ। इतनी ही इच्छा है मेरी।
    दोस्त वैसे मुझे ज्यादा कहना तो नहीं चाहिए क्योंकि तुम्हारी जीवन के बारे में भी मैं बहुत ज्यादा कुछ तो नहीं जानता। फिर भी यही कहूंगा कि अगर कभी तुम्हारे रास्ते में सच्चा प्रेम तुम्हें दिखाई दे तो उसकी तरफ से बिल्कुल ही आंखें मूंद कर आगे मत बढ़ जाना।
    हम जिस कृष्ण की सेवा करते हैं। उस योगेश्वर ने भी जितना भी सारा ज्ञान संसार को दिया उस ज्ञान के पीछे कहीं ना कहीं प्रेम ही छुपा हुआ है।
    राधा और कान्हा के अमर प्रेम के लिए भी तो यही कहा जाता है..

       तुम क्या छूटीं उस कान्हा से
        जैसे सारा रस बिखर गया
       द्वारिकाधीश के हाथों फिर
       सारा महाभारत निखर गया।

   इसलिए याद रखना वरुण,  कृष्ण भी तभी तक कान्हा थे जब तक राधा उनके साथ थी,बाद तो वो द्वारिकाधीश ही हुए और महाभारत रच दी।”

  प्रशांत ने अप्रत्यक्ष रूप से वरुण को जो समझाना चाहा था वो वरुण को भी समझ में आ रहा था लेकिन वो अब भी हिम्मत नही जुटा पा रहा था।
   इतनी देर से किसी न किसी काम में उलझी पारो को देख आखिर वो खुद को रोक नही पाया…

“तुम खुद कुछ खाओगी या नही?”

  पारो ने वरुण की तरफ देखा और मुस्कुरा दी ..

“मेरा व्रत है!”

“व्रत ? आज कौन सा व्रत है?”

“एकादशी …!”

“कब से रख रही हो..?”

“जब से आश्रम में आयीं हूँ…!

“पर क्यों?

“भगिनी आश्रम की लगभग सभी बहने रखती हैं। “

“मतलब हम लोग तो नही रखते ? फिर तुम क्यों रखती हो? इसका भी कोई नियम है क्या?”

“मुझे नही पता। एकादशी तो ज़रूरी व्रत है ,  पर ऐसा लगता है जैसे वहाँ की महिलाएं शायद जानबूझ कर इतने व्रत रखती हैं कि उनके हिस्से का उस दिन का अनाज बच जाए और किसी और के काम आ सके। “

वरुण और प्रशांत चौन्क कर एक दूसरे को देखने लगे।

“ये कैसा त्याग और कैसी तपस्या है, जो आश्रम की महिलाओं के ही हिस्से आती है। “

  वरुण ने बहुत दुखी होकर कहा। और उसके दुख से प्रशांत भी दुखी हो गया।

“मैं आपको दुखी नही करना चाहती थी, लेकिन अब भी आश्रम के अंदर कई विसंगतियां हैं। लेकिन मुझे विश्वास है आप पर, की आप एक-एक कर इन सभी विषमताओं से भगिनी आश्रम को मुक्त करवा ही लेंगे। “

  “आश्रम की विसंगतियों को तो बाद में सुलझा पाऊंगा पर पहले अपने सामने खड़ी विसंगति को तो सुलझा लूँ।”

“मैं आपको विसंगति लगती हूं। “

“लगती नही हो , तुम हो। इतनी सी उम्र में इतना सारा ज्ञान समेटे बैठी हो पर अपने ऊपर आने पर तुम्हारा सारा ज्ञान गंगा में डुबकी लगा जाता है।
  अब चुपचाप पहले कुछ खाओ उसके बाद ही कुछ बोलना…”

“मेरा बोलना इतना नापसंद है कि मैं ना बोलूं इसलिए इतनी कठिन शर्त रख दी..
   और मन ही मन सोच रहे कि अब बच के दिखा पारो की बच्ची! या तो व्रत तोड़ या बोल मत। और आप जानते हैं,मेरे लिए दोनो ही बातें असम्भव हैं।”

“फिर भी तो इतनी देर से बोलती चली जा रही हो…”

  दोनों की मीठी चुहलबाजी देखता प्रशांत भी बीच बीच में तड़का लगाता मुस्कुराए जा रहा था।
  इतने दिनों में, जब से वो वरुण के साथ था पहली बार उसने वरुण को ऐसे खिलखिला कर हंसते देखा था…..

क्रमशः

aparna….



लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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