समिधा -54

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समिधा -54

डॉक्टर के केबिन में बैठी पारो को डॉक्टर ने सारी ज़रूरी बातें समझा दीं।

“अच्छा इसका मतलब अगर किसी का ऑपरेशन करना सीखना है तो उसके लिए तीन साल और पढना पड़ता है?”

“जी हाँ !  पहले पांच साल एम बी बी एस करना पड़ता है फिर 1 साल इंटर्नशिप करनी पड़ती है तब डिग्री कंप्लीट मानी जाती है।”

“मतलब डॉक्टर उसके बाद बन जातें हैं ?”

“हाँ डॉक्टर बन जातें हैं लेकिन किसी भी बीमारी या किसी विशेष विषय में विशेषज्ञ बनने के लिए तीन साल और पढना पड़ता है।”

“मतलब उसके बाद ही….

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“हाँ उसके बाद ही ऑपरेशन करना सीख सकतें हैं।”

“तो फिर इन पांच सालों में क्या पढाते हैं?”

पारो की बात सुन डॉक्टर के चेहरे पर हंसी खेल गयी…

“आपको जैसा लगता है उतना आसान नही है हमारा शरीर। ये एक जटिल मशीन है जिसके कलपुर्जे आपस में ऐसे जुड़ें हैं कि एक सेकंड भी कोई चलने में आगे पीछे हुआ तो बहुत बड़ा अनर्थ हो बैठता है। पहले साल में तो बस हमारा शरीर क्या है और इसके अलग अलग सिस्टम की कार्यप्रणाली को ही पढ़ाया जाता है। ऑपरेशन वो भी शरीर के किसी हिस्से का कर डालना इतना आसान थोड़े ही होता है। आधे इंच का चीरा लगाने के लिए भी तुम्हें मालूम होना चाहिए कि वहाँ की त्वचा के नीचे कितनी वेन्स और नर्वस हैं। ऐसे ही सब सर्जन बन जाते होते तो क्या बात थी?
    ये सारी तो हुई मेडिकल पढ़ाई की बात लेकिन उस कॉलेज में घुसने के लिए भी तुम्हे अलग से इम्तिहान देना होगा, जो आसान नही होता।
   तुमने तो अभी तक बारहवीं के लिए स्कूल भी नही शुरू किया। और उस इम्तिहान में 60% हिस्सा बारहवीं के सिलेबस का ही आता है।”

“और बाकी 40% हिस्सा?”

“वो ग्यारहवीं का रहता है।”

“चलिए तब तो मेरी 40 % तैयारी हो चुकी है।”

  डॉक्टर पारो की बात सुन ज़ोर से हंसने लगा…

“आत्मविश्वास अच्छी बात है लेकिन ये तो अति आत्मविश्वास है। मैं यहाँ जूनियर रेजिडेंट हूँ, अभी एम डी के लिए तैयारी कर रहा हूँ पर मैं भी नही कह सकता कि मेरी पांच साल की पढ़ाई मुझे याद है।”

पारो मुस्कुरा कर रह गयी….

“क्या आप अपनी बहन से मेरी बात करवा सकेंगे।”

“हाँ बिल्कुल! आप अपना नम्बर दे दीजिए। मैं उसे दे दूंगा।”

“मैं आश्रम में रहतीं हूँ,मेरे पास कोई फ़ोन नही है। लेकिन आश्रम के ऑफिस का एक नम्बर है,वो दे सकती हूं। पर बहुत ज़रूरी होने पर ही वहाँ बात हो पाएगी। “

  डॉक्टर ने एक पर्ची पर एक नम्बर लिख कर पारो की ओर बढ़ा दिया…

“श्रेया!! ये मेरी बहन का नाम है। हम दोनों यहीं अस्पताल के बाहर ही अगले मोड़ पर कमरा लेकर रहतें हैं। वो अभी मेडिकल एंट्रेंस के लिए पढ़ रही है। वो तुम्हारी मदद कर सकती है। लेकिन मैं बता दूं कि एंट्रेंस निकालना कोई हंसी खेल नही है। बहुत मेहनत लगती है। चलो अब मैं निकलता हुँ। मेरा टी ब्रेक खत्म हो गया, मुझे और भी काम है।”

“आपका बहुत बहुत धन्यवाद डॉक्टर साहब!”

  मुस्कुरा कर डॉक्टर बाहर निकल गया उसके पीछे पारो भी बाहर चली आयी।

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  वरुण प्रशांत आपस में बातचीत कर रहे थे। वरुण के दिमाग में यही घूम रहा था कि पता नही पारो डॉक्टर के कमरे में इतनी देर से उसे क्या बता या पूछ रही है।
उसी समय उनके दरवाज़े पर दस्तक हुई और दरवाज़ा खोल कर पद्मजा दीदी के साथ स्वस्तिकाचार्य और उनके पीछे उदयाचार्य भी अंदर दाखिल हो गए।

“अब कैसा लग रहा है वरुण?”

“जी आचार्य जी मैं अब पहले से काफी ठीक हूँ। पता नही डॉक्टर छुट्टी क्यों नही दे रहे?”

“उन्हें अपने अस्पताल का बिल जो बढ़ाना होता है। “
पद्मजा दीदी की ये बात वहाँ खड़े किसी भी व्यक्ति को सही नही लगी पर किसी ने उनकी बात का कोई विरोध नही किया।  पद्मजा की आंखें इधर उधर किसी को ढूंढ रही थीं, और ये बात वरुण और प्रशांत से छिपी नही थी।
    उन्होंने अपने साथ लाये फल वहीं एक किनारे टेबल पर रखने के बाद वरुण के लिए जूस ग्लास में ढालना शुरू किया ही था कि वरुण ने उन्हें टोक दिया…

“पद्मजा दीदी! इस वक्त कुछ मत निकालिए। मैं नाश्ता कर चुका हूं।”

“पर इतनी सुबह सुबह कैसे? अभी तो नौ ही बजें हैं।”

“जी दीदी ! पारोमिता ने सुबह ही वरुण के लिए यहीं दलिया बना लिया था। और उसके पहले इसे फल भी खिला दिए थे। अब ग्यारह बजे तक वरुण को कुछ नही खाना है। नाश्ते के ठीक दो घण्टे बाद उसकी एक खून की जांच होनी है।
मज़े की बात ये है कि अस्पताल से आने वाला नाश्ता भी देर से आया, उसके पहले ही वरुण नाश्ता कर चुका था। पारोमिता ने कल ही वरुण के पर्चे पर लिखे खाने पीने के समय को पढ़ लिया था, और उसी के हिसाब से सब कुछ दे दिया है।”

पद्मजा दीदी के चेहरे पर तनाव की रेखाएं उभर आयीं।

“वैसे हैं कहाँ पारोमिता? नज़र नही आ रही?”

उसी समय कमरे का दरवाज़ा खोले पारो भीतर चली आयी…
सब पर नजर पड़ते ही उसने सभी को प्रणाम किया और पद्मजा दीदी के पास आकर मुस्कुरा कर उनके पैर छूकर खड़ी हो गई।
इतने पर भी पद्मजा के मुंह से पारो के लिए कोई आशीर्वाद नहीं निकला, लेकिन उदयाचार्य स्वामी और स्वस्तिकाचार्य जी के चेहरे पर पारो को देखते ही एक मुस्कान खेलने लगी।

” बहन पारोमिता मैं तुम्हारा बहुत सारा आभार व्यक्त करता हूं कि हमारे आश्रम के कर्मठ और युवा योगगुरु कि तुम भली प्रकार सेवा कर रही हो। मैं जानता हूं हम सब आश्रम में एक साथ रहते हैं , और इसलिए एक दूसरे के प्रति एक लगाव मन में आ ही जाता है। बावजूद आवश्यकता पड़ने पर बहुत कम लोग ही इतनी तन्मयता और तत्परता से सेवा कर पाते हैं।
हमारे आश्रम में सिखाए जाने वाले सेवाभाव को तुमने इतने कम समय में जितनी आत्मीयता से ग्रहण कर लिया है उसके लिए तुम्हें जितना भी धन्यवाद कहें वो कम ही होगा।
उम्र में तो तुम हम सब से बहुत छोटी हो, लेकिन अपने सेवा भाव में तुमने बड़ों बड़ों को पीछे छोड़ दिया है। तुमने जिस लगन से वरुण की सेवा की है मैं यह चाहता हूं कि आश्रम में वरुणदेव के लौटने के बाद भी उसकी दवा और खाने-पीने का प्रबंध तुम अपनी निगरानी में ही करवाओ या स्वयं ही करो जैसा भी तुम्हें सुविधा हो। “

” जी स्वामी जी आपकी आज्ञा मेरे सर माथे पर। स्वामी जी मैं एक और बात के लिए आपसे आज्ञा लेना चाहती थी?”स्वस्तिकआचार्य ने पारो की तरफ देखा और इशारे से ही उसे पूछने को कह दिया...

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” स्वामी जी आप सब के प्रयासों से भगिनी आश्रम की कन्याओं के लिए पाठशाला का मार्ग खुल तो गया है लेकिन अब तक प्रारम्भ नहीं हो पाया है। मैं जल्दी से जल्दी अपनी पढ़ाई वापस शुरू करना चाहती हूं। क्योंकि अब परीक्षाओं में ज्यादा समय नहीं बचा है। अगर अभी मैं स्कूल नहीं जा पाई तो कहीं मैं पिछड़ ना जाऊं, लेकिन मैं आप सभी को इस बात से भी निश्चिंत करना चाहती हूं कि मेरे स्कूल जाने से स्वामी जी की सेवा में मेरी तरफ से कोई भी कमी नहीं रह जाएगी। “

” हां यह बात भी हम लोगों को तुम सबसे बतानी थी कि ट्रस्ट की तरफ से पत्र आने के बाद पास ही स्थित शासकीय कन्या शाला में बातचीत हो गई है। और तुम्हारा और बाकी बहनों का दाखिला भी हो चुका है। हमारे आश्रम से बारहवीं के इस सत्र के लिए तुम्हारे अलावा तीन और बहनों ने दाखिले के लिए इच्छा जताई थी। तो तुम चारों का दाखिला करवा दिया गया है। तुम अगर चाहो तो कल से ही कन्या शाला जाना शुरु कर सकती हो।”

” जी आचार्यवर यह तो बहुत ही खुशी की बात है । मैं यहां से इनकी छुट्टी होते ही, अगले दिन से ही स्कूल जाना शुरू कर दूंगी। “

उदयाचार्य और पारो की बातें सुनते हुए वरुण के चेहरे पर मुस्कान खेल गई। वह भी अंदर ही अंदर जानता था कि पारो का पढ़ाई के प्रति विशेष अनुराग है।

” नहीं आचार्यवर!! भले ही डॉक्टर मुझे 2 दिन और अस्पताल में रखना चाहते हैं लेकिन अब उन्होंने मेरे इंजेक्शन बंद कर दवाएं शुरु कर दी हैं और वो मैं कहीं भी ले सकता हूँ। इसलिए मैं आज ही छुट्टी के लिए बात कर लूंगा।”

पारो तो चाहती थी कि वरुण अस्पताल और डॉक्टर की निगरानी में ही रहे लेकिन फिर वरुण की जिद के आगे उनमें से किसी की भी एक ना चली और वरुण ने डॉक्टर से बात करके उसी शाम डिस्चार्ज ले लिया।


वरुण को रह रह कर यही डर सताता कि पारो जैसे उसकी सेवा में लगी फिर रही है आश्रम इस बात को अन्यथा न ले। जाने लोग क्या बातें बनाएं?

लेकिन पारो को जैसे दीन दुनिया से कुछ लेना देना ही नही था , और होता भी क्यों? देव को खोने के बाद जब उसे इन्हीं दुनिया वालों की इन्हीं चार लोगों की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, उस वक्त इन्हीं लोगों ने उसे अपनी ज़िंदगी से बेदखल कर कृष्ण के नाम का बहाना लगा कर आश्रम में पटक दिया था।
तो अब वो इन सब से निश्चिंत हो चुकी थी।

पहले पहल तो वो फिर भी अपने मन में वरुण के लिए पनपते आकर्षण को गलत समझ कर खुद को रोकने का प्रयास भी करती थी। पर अब जबसे उसे वरुण से हुई मुलाकातों का ध्यान आया था तबसे उसे उसी में कृष्ण रूप के दर्शन होने लगे थे, और अब वो उसकी मीरा कह लो या राधा खुद को उसकी भक्ति से रोक पाने में असमर्थ थी।

वरुण जितना ही उसे देख संकुचित हो उठता, उतने ही जतन से वो उसकी सेवा में जुट जाती।

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आश्रम आकर दो दिन बीत चुके थे, और एक दवा के अलावा अब वरुण की सारी दवाएं बंद हो चुकी थी। वरुण ने अब वापस अपनी आश्रम की दिनचर्या में आना शुरू कर दिया था, हालांकि प्रवचन अब भी नही दे रहा था, क्योंकि डॉक्टर के अनुसार उसे अब भी लगातार बोलने में होने वाली शक्ति की हानि का नुकसान उठाना पड़ सकता था।पर अब वरुण के स्वास्थ्य में पहले से कहीं अधिक सुधार दिखने लगा था। अब सुबह उठ कर वो सरोवर किनारे टहलने के बाद सूर्य को अर्ध्य देने के अपने सबसे पसंदीदा कार्य को करने को भी पूरी तरह तैयार था।

सुबह चार बजे उठ कर साढ़े पांच किलोमीटर में फैले आश्रम परिसर का चक्कर लगाने के बाद स्नान आदि से निपट कर वरुण सरोवर में कमर तक उतरा सूर्य को अर्ध्य दे रहा था।
उगते हुए सूर्य की किरणें उसके गौर धवल कंधों पर पड़ कर बिखर रहीं थी। पानी की बूंदे भी कमल पत्र पर जैसे संकलित हों चमकती हैं वैसे ही चमक रहीं थीं।
अर्ध्य देने के बाद जैसे ही उसने वापस जल हाथ में लेने के लिए पानी में हाथ डाला उसे लगा जैसे उसके ठीक पीछे कोई खड़ा उसे निहार रहा है।
उसने सिर घुमा कर पीछे देखा और उसकी आंखें प्रसन्नता से चमक उठीं।

सामने पारो खड़ी थी। स्लेटी रंग के कुर्ते और सफेद सलवार और दुपट्टे के साथ दो चोटियां सामने लटका कर खड़ी पारो ने कंधे पर एक बस्ता भी टांग रखा था। उससे कुछ दूरी पर सरोवर की सीढ़ियों के ऊपर सविता नयना और मधुलिका भी अपना बस्ता टांगे खड़ी आपस में बातें करती पारो का रास्ता देख रहीं थीं।
पारो आज अपने स्कूल के प्रथम दिवस पर स्कूल जाने से पहले वरुण से आशीर्वाद लेने सरोवर की सीढ़ियां उतर आई थी।
उसे देख वरुण ऊपर चला आया।

पारो ने झुक कर वरुण के पैर छुए और वरुण का हाथ पारो के सिर पर अनजाने ही रखा गया….

“सदा खुश रहो!”

पारो ने खड़े होकर उसके सामने हाथ जोड़ दिए…

“आशीर्वाद दीजिये की जिस इच्छा को पूरा करने दुबारा पढ़ाई शुरू करने की ललक जागी है वो पूरा कर सकूं।”

वरुण मुस्कुरा कर रह गया…

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“वैसे भी तुम बहुत ज़िद्दी हो, जो चाहती हो पूरा कर के ही मानती हो।”

“इसलिए आपके कृष्ण मेरी वांछित वस्तुओं को मुझसे छीन लेते हैं क्या?”

“ऐसा नही कहते पारो। बहुत बार हम उसकी इच्छा अनिच्छा समझ भी तो नही पाते, और इसलिए हमें बस ये दिखता है कि हमने ये खो दिया लेकिन उसके बदले में वो हमें जो देता है उसे हम नज़रंदाज़ करते चले जातें हैं।”

“मुझे आपकी ये गहरी बातें समझ में नही आतीं। बस ये समझ आता है कि कृष्ण भी उन्हीं का जीवन कठिनताओं से भर देते हैं जिन्हें जीने की सर्वाधिक चाह होती है।”

“जाओ!!! आज तुम्हारा स्कूल का पहला दिन है, अच्छे मन से जाओ। प्रसन्नता से जाओ। तुम्हारे जीवन के एक नए अध्याय की शुरुवात है । कृष्ण तुम्हारी हर मनोकामना पूर्ण करें।”

” शायद आपकी ही प्रार्थना आपके कृष्ण सुन लें और मेरे मन की बात पूरी हो जाये। “

मुस्कुरा कर वरुण को प्रणाम कर आत्मविश्वास से भरे ऊंचे ऊंचे डग भरती पारोमिता अपनी सखियों के संग अपने जीवन के एक नए अध्याय को रचने के लिए अपने सामने फैले विस्तृत आसमान में पंख पसारे आगे बढ़ गयी…..

…….. उस वक्त शायद उसे भी नही मालूम था कि अब उसका जीवन किस करवट बैठने वाला है…

क्रमशः

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aparna…

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

19 विचार “समिधा -54” पर

  1. बहुत सुंदर लेखनी मैम पढ़कर ही मजा आ गया समिधा मैं तब तक नही पड़ती जब तक बिल्कुल एकांत न हो जैसे आप गहराई से लिखते हो वैसे ही मैं बहुत ही गहराई से पड़ती हु तभी कमेंट करने में भी देर ही जाती है ,,,,,

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  2. पारो के जीवन में एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। वो वरूण से आशिर्वाद लेकर ही जाना चाहती है। उम्मीद है कि पारो की डाक्टर बनने की इच्छा पुरी हो।
    पारो के लिए वरूण से लगाव कृष्ण भक्ति की तरह हो गया है, पर क्या बाकि के लोग उसके इस अहसास को समझ पाएंगें।।
    Superb part👌👌❣️❣️👏👏👏👏

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  3. एक बार यदि प्रेम किसी के हृदय में स्थान बना लेता है तो फिर व्यक्ति को कुछ और दिखाई नहीं देता। यही पारो के साथ हो रहा है। प्रेम के साथ श्रद्धा , समर्पण , कर्तव्य सब समाहित हो गए हैं उसमें। और प्रेम के इसी रूप ने उसे अपना लक्ष्य दिखा दिया है हालांकि इसका रास्ता उसके लिए अनजान है और हो सकता है बेहद कठिन भी हो। पारो के इसी लक्ष्य के साथ ही ये दिखाई देने लगा है कि ये कथा कितनी विस्तृत होने वाली है ❣️❣️… मुझे किसी के कमेंट नहीं दिख रहे और शायद अब मेरा भी गायब हो जाएगा 😅😅

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  4. बहुत अच्छा भाग। पारो ने डॉक्टर साहब से डॉक्टरी पढ़ाई के बारे में अपनी सारी जिज्ञासाएं पूछ ली और आश्रम के सहयोग से अब उस डगर पर अपना पहला कदम भी रख दिया जो डॉक्टर बनाएगा।

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