समिधा – 55

समिधा -55

   आश्रम एक बार फिर अपनी लय में चलने लगा। पूजा पाठ आरती प्रवचन सभी अपने तयशुदा समय पर पूरे होते चले जाते।  भगिनी आश्रम की कन्याओं का पाठशाला का मार्ग भी प्रशस्त हो चुका था।
    पारोमिता अपने तीन अन्य साथियों के साथ पूरे उत्साह से स्कूल जाने और आने लगी थी। लेकिन उसके स्कूल जाने के बावजूद उसके द्वारा की जाने वाली वरुण की भक्ति और सेवा में कोई कमी नहीं आई थी।
रोज सुबह स्कूल जाने से पहले वह वरुण की प्रवचन की सारी तैयारी निपटा कर जाती उसके बैठने के स्थान पर आसन बिछाना उसकी किताबें और कलम वहां रखना साथ ही गर्म पानी का कलश रखना इनमें से कोई ऐसा कार्य नहीं था जो पारो कभी भी भूलती।
   यह सारा कुछ निपटाने के बाद उसे भगिनी आश्रम की रसोई में भी अपनी सखियों के साथ थोड़ी मदद देनी ही पड़ती, भले ही आश्रम की बाकी महिलाएं उन चारों बालिकाओं को देखकर प्रसन्न थीं। पर उनमें कुछ ऐसी महिलाएं भी थी जिनकी आंखों में जलन की भावना चमकने लगती थी। उन्हें लगता था हम ही अकेले इतनी लंबी चौड़ी रसोई में क्यों जूझ रहे है। अगर यह लड़कियाँ बाहर पढ़ने जा रही हैं तो इन्हें एक तरह से बाहर घूमने का मौका मिल रहा है।


      आश्रम के कट्टर अनुशासन से भरे माहौल से बाहर कम से कम 6 घंटे का समय इन लड़कियों को मिल जाता है जिसमें यह अपने तरीके से जी लेती हैं। ऐसे विचार रखने वाली महिलाएं इन चारों पर कुछ अधिक ही कठोर दृष्टि रखने लगी थी और उन्हीं के बनाए नियमों के अनुसार पाठशाला के लिए निकलने से पहले इन सभी लड़कियों को रसोई घर में थोड़ी मदद देनी ही पड़ती थी। पाठशाला से वापस आने के बाद भी इन चारों को अपने हिस्से के काम करने ही पड़ते थे।
     इसका फल यह हुआ कि पारो के अलावा बाकी की लड़कियाँ टूटने लगी थी। उन्हें लगता स्कूल जाने और पढ़ाई करने की थकान ही क्या कम थी जो वहां से लौटने के बाद आश्रम में इतना सारा काम भी करना पड़ता है? उनमें से एक आध के कदम डगमगाने से भी लगे थे।
      और एक शाम जब वह चारों स्कूल से आने के बाद आश्रम के अपने काम निपटा कर सरोवर किनारे बैठे पाठशाला का बाकी बचा काम लिख रही थी तब सरिता अचानक फूट पड़ी….

” मुझे नहीं करनी है ये सारी पढ़ाई ।मुझसे नहीं हो पाएगा।”

” अरे ऐसा क्यों बोल रही है सरिता, हुआ क्या?”

” हुआ क्या तो तू ऐसे पूछ रही है पारो जैसे तुझे नहीं मालूम? देखकर लगता नहीं है कि आश्रम की कुछ दीदीयों का स्वभाव कितना बदल गया है हमारे लिए।
   स्कूल जाना शुरू करने से पहले हम जितना काम किया करते थे अब मुझे लगता है उससे कहीं ज्यादा काम हम पर लाद दिया जा रहा है। जैसे की ये सारी खूसंठ बुड्ढियां हम से बदला ले रहीं हैं , कि हम आश्रम से बाहर रोज घूमने जाते हैं। उन्हें क्या पता कि स्कूल में कितनी सारी पढ़ाई करनी पड़ती है वैसे ही दिमाग का दही हुआ जाता है। उस पर आश्रम आने के बाद इनके ढेर सारे काम निपटाओ।
   मैं नहीं पढ़ पाऊंगी पारो। यही हाल रहा तो बिल्कुल नहीं पढ़ पाऊंगी।”

  ” तू सही कह रही है सरिता। तुझे पढ़ना भी नहीं चाहिए कल ही तू अपना नाम स्कूल से कटवा ले। और फिर पूरी तरह से आश्रम की सेवा में जुट जा, क्योंकि इससे अच्छी जगह तो और कहीं हो नहीं सकती… ऐसे ही तू भी आश्रम की सेवा करते करते 1 दिन इन्हीं दीदियों की तरह खूसंठ हो जाना और फिर कभी कोई हमारी जैसी बालिका यहां चली आई तो उसे भी तू इसी तरह पढ़ने मत जाने देना। उस पर भी काम का बोझ लाद लाद कर उसे इतना झुका देना, कि वह भी टूट कर बिखर जाए और पढ़ाई के अपने सपने को अपनी आंखों से निकालकर इसी सरोवर में बहा दे।”

“तू क्या कह रही है पारो?”

  मधुलिका पारो की बात सुन कर चौंक गईं….. और आगे सरिता को देख कहने लगी…

” पढ़ाई छोड़ने के और भी तो फायदे हैं। पूरा दिन आराम से दीदियों की सेवा करने का सुअवसर भी तो इसे मिलेगा। फिर हो सकता है कि पद्मजा दीदी सबसे ज्यादा सरिता को ही पसंद करने लगे और आगे जाकर जब हम सब बुड्ढे हो जाए तब सरिता को ही भगिनी आश्रम की रसोई का पूरा कार्यभार पद्मजा दीदी के द्वारा मिल जाए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है पारो?”

” तू सही कह रही है मधु । ऐसा ही होगा। “

  सरिता ने बारी-बारी से पारो मधुलिका नैना को देखा और मुंह उतार कर बैठ गई….

” तुम दोनों मेरा मजाक बना रही हो है ना?”

” जी हां जैसी बातें तू कर रही है उसके बाद कोई भी तेरा मजाक ही बनाएगा। हमारी शिक्षा का द्वार खुल जाए इसके लिए इस आश्रम ने कितना बड़ा कदम उठाया है , यह तू सोच भी नहीं सकती। अब अगर 1-1 कर हम हिम्मत हार कर पढ़ना ही छोड़ दें तो हमारे बाद कभी कोई यहां से पाठशाला नहीं जा पाएगा। हम हिम्मत ना हारे अगर अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाते रहें तो यह हमारे इस आश्रम की एक परिपाटी बन जाएगी कि अगर कोई छोटी उम्र की बालिकाएं दुर्भाग्य से इस आश्रम का हिस्सा बनते हैं तो कम से कम उच्च शिक्षा से वंचित तो ना रहे।
   अगर हम चारों ही हिम्मत हार गए तो यह याद रखना कि भगिनी आश्रम से फिर कभी कोई लड़की पढ़ने के लिए नहीं निकल पाएगी।
    बस कुछ दिनों की तकलीफ है सरिता एक बार हम कुछ कर पाए , पढ़ पाए तो इन्हीं सब दीदियों के चेहरे पर हमारे लिए मुस्कान और आंखों में हमारे लिए आशीर्वाद होगा।
    अभी असल में वह अपने समय से हमारे
समय की तुलना करते हैं और इसीलिए दुखी हो जाती है । क्योंकि कहीं ना कहीं उन सब को भी इस मौके की चाह रही होगी जो उन्हें नहीं मिला लेकिन हमें मिल रहा है। और इसीलिए एक स्वाभाविक जलन और ईर्ष्या के कारण वह हमारा मार्ग रोकना चाहती हैं, बाधित करना चाहती हैं। लेकिन दिल ही दिल में कहीं ना कहीं वह शायद यह भी चाहती होंगी की हमारी तरह बाकियों को भी यह मौका मिले।
     हमें उनके स्वभाव का दूसरा हिस्सा देखना चाहिए और उस पर ध्यान देना चाहिए। अभी तो शुरुआत है इसलिए यह सब हमें देखना पड़ रहा है कुछ समय बीतने दो यही दीदियाँ हमारे पक्ष में बाकियों के खिलाफ खड़ी हो जाएंगी, तुम देखती रहना।”

   सरिता मुस्कुराकर पारो के गले से झूल गई।

” चल चल अब लाड बाद में लड़ाना, अभी ढेर सारा काम है स्कूल का। इसे फटाफट लिखना है तभी तो कल की इकाई परीक्षा में हमारे नंबर ठीक आएंगे। “

” ठीक आएंगे ? तेरे तो हमेशा ही अच्छे आते हैं… कभी एक नंबर भी नहीं कटता तेरा। पारो एक बात बता, तेरे साथ ऐसे कैसे होता है कि कक्षा में पढ़ाई की बातें तू एक बार में याद रख लेती है।”

” क्योंकि मैं अच्छे से जानती हूं कि मेरे पास समय कम है। और ढेर सारी पढ़ाई करनी है , तो जितना हिस्सा हमारे गुरुजी पाठशाला में पढ़ाते हैं उसे मैं उसी वक्त ध्यान से सुन कर दिमाग में रख लेती हूं। जिससे बाद में उसे सिर्फ एक बार पढ़ने पर ही वह हमेशा के लिए याद रह जाए।”

” ध्यान से तो मैं भी सुनती हूं पर मेरा दिमाग तेरे जैसा तेज नहीं है।”

” ऐसा कुछ नहीं है सरु। दिमाग तो हम सब के बराबर हैं। बस पढ़ाई करते समय तेरा ध्यान रसोई में लगा रहता होगा, कि आज रसोई में गोभी बन रही है या बैंगन?”

   पारो की बात सुनकर उसकी तीनों सखियां खिलखिला कर हंस पड़ी। वह चारों वापस अपना काम कॉपी में लिखने लगी , कि उसी वक्त आश्रम के ऑफिस से पारो के लिए बुलावा आ गया।

” पारो तुमसे मिलने कोई 2 लोग आए हैं ऑफिस में?”

पारो सोच में पड़ गई कि सप्ताह के बीच में उससे मिलने कौन से दो लोग आ सकते हैं? क्योंकि दर्शन तो महीने के आखिरी रविवार को ही उससे मिलने आ पाता था….

वो उठ कर ऑफिस की तरफ चल पड़ी। वो ऑफिस की तरफ बढ़ रही थी कि कृष्ण मंडप की सीढ़ियों में बैठे वरुण ने उसे जाते देखा और वह भी सोच में पड़ गया कि इस वक्त पारो ऑफिस क्यों जा रही है।
   वह भी यही बात सोचने लगा कि आखिर सप्ताह के बीच में पारो से मिलने कौन आ सकता है ? और अपने मन की शंका का समाधान करने वह भी धीमे कदमों से उठकर पारो के पीछे चल पड़ा।

   ऑफिस में दाखिल होते ही पारो कुछ पल को सामने बैठे दोनों लोगों को देखकर अचानक पहचान नहीं पाई और फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान खिल गई…..

” नमस्ते डॉक्टर साहब कैसे हैं आप?”

” मैं तो ठीक हूं तुम कैसी हो?”

तारों ने मुस्कुराकर गर्दन हाँ में हिलाई और उन दोनों के सामने कुर्सी खींचकर बैठ गयी। सामने बैठे डॉक्टर ने बाजू में बैठी लड़की से पारो का परिचय करवा दिया…..

” यह श्रेया है! तुम्हें बताया था ना, मेरी बहन है! और अभी मेडिकल एंट्रेंस के लिए तैयारी कर रही है। और श्रेया यह पारोमिता है! यह इस साल ट्वेल्थ में है! और यह भी डॉक्टर बनना चाहती है, तो तुम से जितनी हो सके इनकी मदद की अपेक्षा रखता हूं। “

श्रेया ने मुस्कुराकर पारो की तरफ देखा और अपने साथ लाया हुआ एक बैग उसके सामने खोल दिया।

” पारोमिता मेडिकल एंट्रेंस इतना आसान नहीं होता। दिन-रात पढ़ना पड़ता है, मैं भी पढ़ रही हूं। लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि इस साल मेरा सिलेक्शन होना मुश्किल है और इसलिए मैंने सोच रखा है कि मुझे एक और साल इस एग्जाम के लिए तैयारी करने को लग जाएगा। इसलिए मैं अगले साल बिना किसी कॉलेज को ज्वाइन किये ड्राप लूंगी। और उस ड्रॉप ईयर में मैं एक बार फिर से मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी करके एग्जाम दूंगी और मैं जानती हूं कि मैं अगले साल सेलेक्ट हो ही जाऊंगी। तुम भी इस साल ट्वेल्थ में हो। और अब एग्जाम को दो या 3 महीने ही बचे हैं तो ऐसे में तुम्हारा भी इस साल सेलेक्ट होना जरा मुश्किल है।”

” पर मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। “

पारो की यह बात सुनते ही दोनों भाई बहन एक दूसरे को देखने लगे…

” मतलब?” श्रेया के इस सवाल पर पारो ने उसी से पलटकर दूसरा सवाल कर दिया..

” आप हो सके तो मुझे यह बताइए कि एग्जाम के लिए क्या क्या पढ़ना पड़ता है ?और कितने विषय हमें पूरे पढ़ने होते हैं। मेरा चयन हो या न हो लेकिन मुझे तैयारी तो इसी साल पूरी करनी है। हर एक गुजरता दिन मुझे लंबा लगने लगा है , और यूँ लग रहा कब ये परीक्षा हो जाएं। “

  पारो की अजूबा बातें उन दोनों भाई बहन के लिए समझनी दुष्कर थीं।
   श्रेया ने वहीं बैठ कर फिर पारो को हर एक किताब और पढ़ाई की बारीकियां समझानी शुरू कर दी।
   खिड़की के बाहर से अंदर झांकते वरुण ने भी डॉक्टर को देख कर पहचान लिया था और उसकी समझ में आ गया था कि डॉक्टर अपनी बहन के साथ पारो को तैयारियों में मदद देने ही आया है।


    वरुण मुस्कुरा कर वहाँ से जाने को हुआ लेकिन फिर उसका मन वहाँ से एक इंच भी हटने का नही किया। उसे इस तरह सामने बैठी पारो को देखना बड़ा भला लग रहा था।
   श्रेया के साथ पुस्तकों को पलट पलट कर देखती और बेशुमार सवाल करती पारो उसे बहुत प्यारी लग रही थी। उसकी नज़रें पारो पर से हट नही पा रहीं थी और उन कुछ पलों में वो खुद को और अपनी प्रतिज्ञा को ही नही बल्कि इस बात को भी भूल चुका था कि ये ऑफिस भी आश्रम परिसर का ही हिस्सा है और वो जहाँ खड़े होकर अंदर झांक रहा है,वहाँ से वो बाकी आश्रमवासियों को आराम से नज़र आ रहा है।

     कुछ बातों में उलझी पारो की नज़र अचानक खिड़की पर चली गयी और उसे खिड़की पर खडा वरुण नज़र आ गया जो अपलक उसे ही देख रहा था।
   वरुण की नज़र अपने ऊपर महसूस होते ही उसके मन में कुछ अजीब सी खुशी की लहर दौड़ गयी। उसे लगा जैसे उसकी नसों में रक्त का प्रवाह बढ़ गया है। वो मुस्कुराने को थी कि वरुण अचानक पलट कर वापस जाने को हुआ कि उसके ठीक पीछे खड़े प्रशांत ने उसे थाम लिया..

“इतनी रफ्तार में कहाँ भागे जा रहे हैं वरुणदेव जी। ऑफिस में कुछ मेहमान आएं हैं ,ज़रा मिल तो लीजिये।”

  वरुण को लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। वो प्रशांत की पकड़ से छूट कर आश्रम की तरफ भाग जाने को छटपटा उठा पर प्रशांत ने कस कर उसकी बांह थाम रखी थी, और वो उसे साथ ले अंदर दाखिल हो गया….

क्रमशः

aparna …

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

16 विचार “समिधा – 55” पर

  1. पारो के पढ़ने की लगन से पता चल रहा है कि वो शायद पहले attempt में ही एंट्रेंस क्लीयर कर लेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि पारो अपने लिए नहीं बल्कि वरूण के लिए डाक्टर बनना चाह रही है। जब हम कोई काम निस्वार्थ भाव से किसी और के लिए करते हैं तो उसमें सफलता जरूर मिलती है।
    वरूण बेशक पारो को खुद से दूर रहने कह दे पर खुद अपनी फिलिंग्स का क्या करेगा। पारो को देखकर ही खुद को भुलने लगता है🤭🤭 । वैसे प्रशांत बाबू हर बार सही टाइम पर जा पकड़ते हैं वरूण को😁🤭

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